सिर ओले पड़ेंगे, उंगलियों पर घमौरियां उगेंगी, आवारा कोई बिल्‍ली आकर बरौनियां चूम जायेगी, प्रभुवर, ऐसे में गाल कौन ज़बान मचायेंगे? मतलब भाषा कौन राह, रस्‍ते, पगडंडी, राजमार्ग जाएगी, हमें बुझाएगी? ‘दुनिया को कैसे देखें!’ तो कोई नहीं ही बतायेगा, किस ज़बान में देखें का रास्‍ता कोई सूझायेगा? चारखाने के शर्ट में ट्रक के पुआली पर खजुआये देह ‘अरी होS गोरिया कहां तोरा देस हो, इश्किया के कवन-कवन भेस हो?’ गाना गाके हम मल्‍टीप्‍लेक्‍स का परदा के बाहिर लैंग्‍वेज का मल्‍टीप्‍लूरल डैसेक्‍सन पर काबिज हो जायेंगे, और सफलता-विह्वलतापूर्वक बहिरयाने में सक्‍सेसफुलो होंगे? कैन देयर बी अ लाइट इन दिस डार्कली, ब्‍लडिली कलरफुल टनेल ऑफ़ लिंगोइस्टिक मैडनैस? व्‍हॉट इज़ इश्किया? इश्‍क पिया, पिया?

भाषा के सवाल पर आदमी घबराकर प्रोफ़ेसर बुराक्‍वॉस्‍की के पोथों के पन्‍ने जीमने नेशनल आर्काइव की ओर कूच करेगा, मगर रास्‍ते में ही कहीं एक रीजनल वैरिएंट उसकी गरदन रेतने लगेगी! तमिल, मलयालम, राजस्‍थानी के अनंत तो अभेद्य होंगे ही, खांटी भोजपुरिया भी किसी गठे थ्रीलर का न सुलझता भेद ही होगा-

‘तीन जाना रस्‍ता के होने ठाड़ा रहुअन, भइय्या, अऊर अन्‍हारा में लुकाइल एगो जनाना रहुए, कवन तS एगो पुरकना फिलिम के एगो गाना रहुए, ऊहे गावत रहुए, मेहरारु जात के जरा हिम्‍मत देखीं? मुंह में गिलौरी दाबल दिसासर भुइयां बुलेट बहिरयावते रहुअन, तबहियें तS दन्‍न देना फैरिंग दग्‍गल! केहु के अंजादे न भइल कहंवा से बुलेटिया आइल, कहंवा गइल!’

ओह, समवन शट अप दिज़ वॉयस, प्‍लीज़, हमारे अंतर्तम की अंतरंग ज़बान क्‍या है? घर के परदों, चाह की प्‍याली, किताबों के भीतर दबी दुनिया के परे हमारे मन के खाली बनों की? यहां से निकलकर वहां, वहां से निकलकर यहां, दोस्‍त और दिलदार, फूफा और फटे प्‍यार के बीच हम सहूलियत के शाब्दिक पटरों पर बैलेंस बनाते संपर्क-संबंध की नदी पारते हैं, भाषायी चिचरिकारियों का एक बीहड़ भूगोल बुनते फिरते हैं, एक लयकारी नयनाभिराम भाषाबंद का अंतरंग लहकलोक बुन पाते हैं? कोई अन्‍य दिखाने लगता बताने लगता है डाक्‍टर सर्हषोदन सहाय ने इस सवाल पर यह कहा है, पंडित अनुमोदन मिसिर ने उस सवाल पर वो, हम खुद क्‍या किस ज़बान में कह रहे हैं, सोचकर हम गड़बड़ाने और घबड़ाने कभी नहीं लगते..

अच्‍छा होता अगर संपर्क भर की ज़रुरत का सवाल होता, अंग्रेजी होती ही भले हम उसे अभी भी ठीक-ठीक जानते न होते, मगर फिर यह सवाल होता कि वह हमारे अंतरंग के उछालों को कितना-कितना पहचानती होती?

सत्‍ता ताक़त के घोड़े पर सारे अंतरंगों को रौंदती, बेमतलब, इतिहास का कचड़ा बनाती निर्ममता से आगे जाने किस भविष्‍य में बढ़ी जाती है, भाषा की मासूम चिड़ि‍या, महीन तितलियां जाने फिर किस सूने ज़हान, छितराये आसमान में अपने पतंग फेंकती हैं, मन के आसमान में एक आततायी, चैन हरे जाने वाले तक़लीफ़ से अलग, ठीक-ठीक फिर उड़ता क्‍या है? मन की गोलियां, मीठी बोलियां?

 

ज़रा सा जापान

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ज़रा-सा.. एकदम ज़रा-सा..

http://ia311529.us.archive.org/1/items/InLoveWithJapan/ChillingJapan.mp3

 

औरतों के देश में..

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जिधर नज़र घुमाओ, वही नज़र आतीं, गजब नज़ारा था. अखाड़े की लड़ाई के वक़्त जैसे पेड़ों के डाल और छतों के मुहाने तमाशाई बच्‍चों से पट जायें, शादी के घर जैसे नहान-घर अटा-बझा रहे और चाय के कप पर कप खाली होते रहें, मगर गिलास भर पानी पाना एकदम मुहाल हो और सत्‍यनारायण कथा वाले घर के दालान में अपनी खोयी चप्‍पलें, कुछ उसी तरह से बकिया का सब गायब भले न हुआ हो, जाने कहीं छिप गया था, जो प्रकट, गोचर था वह जच्‍चे वाले घर में बसाइन कपड़ों-सी हर तरफ फैली औरतें ही औरतें थीं.

कोई लहसुन छील रही थी, कोई माथे के ढील धो रही थी तो कोई मेहंदी बीन रही थी, और ताज्‍जुब की बात, सब गुनगुना रही थीं. चौंके के असमंजस में ही एकदम से उछलकर सवाल छूटा होगा, ‘क्‍या गुनगुना रही हैं?’

तिस पर एक तमककर मुड़ी थी (‘गंगा जमुना’ की बैजंतीमाला कि ‘गाईड’ की वहीदा रहमान की तरह?), ‘हम जमीन वालियां हैं, बाबू, हमसे न गुनगुनवाओ, आसमान उड़ाओ! यही जरा दुनिया है, गाकर हम कहां जायेंगी?’ इतना बोलकर तमक कुमारी फिर वापस अपने गाने में उड़ने लगीं..

नीले आसमान में सस्‍ते छापेवाले कुछ फूल से खिल गए, या कुछ रंगीन तितलियां सी उड़ीं और नज़र झपकते में औरतों के छापेदार कपड़ों में लुका गईं!

हुमसभरा बच्‍चों का शोर गूंजता, शोर करते बच्‍चे दीखते नहीं. कोई औरत थपथपाती उस न दीखते को पुचकारकर चुपा देती, फिर हौले अपने गीत में लौट जाती, अपने बझेपने में तैरती, डूबी डोलती.

मैंने हारकर जुसेप्‍पे से सवाल किया, ‘ये मध्‍य प्रदेश की, मंगोलिया की, बुरकिना फासो, मैंक्सिको कहां की हैं औरतें? हमारा सुख-दुख सुनने के, मेरा हाथ अपने हाथ लिये, गाल से गाल सटाने के, गाये जा रही हैं, क्‍यों? किस जबान में गा रही हैं? पहले तो इनका देश क्‍या है, कोई आइडिया होता है, आं? ओ पतली, लंबी चोटी वाली हसीना.. ?’

जिसे पतली, लंबी चोटीवाली कहकर चिन्हित किया था, उस हसीना ने अपने बाल उतार लिये, अपने गंजेपने पर चुनरी फेरती बोली, ‘हमारा कौन देस? देस होता तो हम औरतें होतीं?’

एक उमिरदराज, पुरइन थीं, मुंह में मुसलमानी हुक्‍का गुड़गुड़ाती बोलीं, ‘औरतों बदे देस खोजे कवनो आसान काज है? चहुंओर घुमि आओ, सब्‍बे तरफ औरतन भेंटायेंगी, उनका देस न देखोगे. औरतन की आंख में बस गाना है, सो ही उनका मुलुक, मुलक के राह और पगडंडी, बूझे? मगर तुम बजार के अमदी, कइसे बूझोगे?’

मिट्टी के पुते हुए आंगन से नीले दरवाज़े पर एक औरत तानपूरे की शक्‍ल का एक अफ्रीकी बाजा उठाये बाहर आई, इमली की शक्‍ल का एक बड़ा, भारी वृक्ष था जिसकी फुनगी पर बसंती पंखोंवाली एक चिड़ि‍या सोचती बैठी थी कि उड़ना इतना मुश्किल क्‍यों होता है, उड़ने से ठीक पहले मन इतना घबराता क्‍यों हैं?

जुसेप्‍पे की आंखों के कोर एक बूंद आंसू आकर अटक गया था, लेकिन हमने उसकी बाबत बात नहीं की. हवा में औरतों का अजनबी गाना चुपचाप कांपता, थरथराता रहा, उसी पर कान लगाये उसे बूझने की जुगत में उलझे रहे.