5/24/08

मुंह सिये न चुप रह पाने की अव्‍यहार-कुशलता के बारे में..

ब्‍लॉग में कहीं किसी पर कीचड़ उछल-उछाला जा रहा हो, ब्‍लॉगजगत में एकदम-से ऊर्जा का संचार हो जाता है. ऊंघते लोग चौंकन्‍ना होकर जाग जाते हैं. किस पर क्‍या पोस्‍ट लिखें का पसीना रीसा रहे लोगों के पैरों के नीचे सक्रियता की सीढ़ी खुल जाती है. बहुत सारे लोग तो पोस्‍ट लिखते ही इसलिए हैं कि सामान्‍य रूप से सामान्‍य कीचड़ उछाल रहे हैं की सक्रियता में देखे जायें.. जिसको पता नहीं फिर किस-किस से जोड़कर देखते हुए मेरे जैसा- महाद्वीप के दुख में दुखी- व्‍यक्ति असामान्‍य आचरण करने लगे तो ठंडी आह भरकर मुझे नंगई के सरदार के पद से विभूषित करने की लस्‍सी भी पी सकें.

ख़ैर, पता चला महाद्वीप के दुख में दुखी होना दुर्गुण है, पर दुख कातर होना बुढ़ौती के लक्षण हैं. सामान्‍य रूप से सामान्‍य कीचड़ उछालते रहना सहज हास्‍यप्रियता है. ब्‍लॉगीय सामाजिकता है. अभय ने जानकारी बढ़ायी व्‍यवहार-कुशलता है. मित्रता के बारे में भी अभय से कुछ ज्ञान प्राप्‍त हुआ. कि बलार्ड पियर से चार किलो का किताब ढोकर उनके घर पहुंचाना मित्रता की, उनके स्‍नेह के अधिकारी होने का विशिष्‍ट लक्षण समझा जाना चाहिये. जबकि हम समझते थे मित्रता में आप किसी के लिए क्‍या छोड़ते हैं, क्‍या दावं पर लगाते हैं ज़्यादा महत्‍वपूर्ण है, तो दीख रहा है, गलत थे, मित्र से आप क्‍या पाते हैं की व्‍यवहार-कुशलता मित्रता को ज़्यादा ऊंचा प्रमाणपत्र दिलवाती है!

आपकी सामान्‍य, असामान्‍य, प्रत्‍यक्ष, अप्रत्‍यक्ष किसी बात से किसी को तक़लीफ़ पहुंचे, इसमें लड़ि‍याने की बात नहीं. अकारण पहुंच रही हो तब तो एकदम ही नहीं. अर्थ का अनर्थ करके, किसी के लिए भी रोने लगना, धीरज खो देने की अव्‍यवहार-कुशलता करने लगना प्रगतिशील-पतनशील किसी भी नज़र से टुच्‍ची बात ही है, लेकिन, जैसाकि अभय ने अपने मित्र के संदर्भ में कहा, मैं अपने रेफरेंस में भी रिपीट कर ले रहा हूं- कि अपने राम भी मर्यादा पुरुषोत्‍तम हैं ऐसा हमने कब कह दिया?

मगर क़ायदे से कहूं तो इस समूचे टिल्‍ली प्रसंग में मुझे सबसे ज़्यादा गुस्‍सा प्रत्‍यक्षा पर आ रहा है. इसलिए नहीं कि मेरे घर की स्‍त्री नहीं तो मुझे मुंह खोलने की क्‍या फालतू की गरज पड़ी थी. इसलिए कि पिछले दिनों भारतीय प्रदेशों पर अर्मत्‍य सेन और जां ड्रेज़ का विकास सम्‍बन्‍धी एक सर्वे पढ़ रहा था- और सर्वे के एक निबंध में उत्‍तर प्रदेश, और सामान्‍य तौर पर समूचे हिंदी प्रदेशों की भयावह दुर्दशा के पीछे स्त्रियों की अशिक्षा और घर से बाहर के सामाजिक सवालों में उनका हस्‍तक्षेप न करना उसकी मुख्‍य वजह बताया गया था. प्रत्‍यक्षा शिक्षित हैं, मगर पर दुख कातर हस्‍तक्षेप में मुंह काला करने आगे हम गए. क्‍यों गए? इसलिए नहीं गुस्‍सा हो रहे कि प्रत्‍यक्षा ने हमसे अपना झंडा उठाने का आग्रह किया, इसलिए कि सुबह-सुबह एक बेमतलब के पोस्‍ट पर ध्‍यान खिंचवाकर उसकी गंदगी दिखाने लगीं, और मैं पर गंदगी कातर, असामान्‍य आचरण करने लगा! गंद और गंदगी की जगह कहीं चार पैसा और चार दिल जोड़ने की व्‍यवहार-कुशलता में गया होता?

यह बात मुझे सचमुच लगती है कि औरतों का हित इसी में है कि वही बोलें. वह जितना अच्‍छा और आर्टिकुलेट बोल सकेंगी, उतना उनके समाज में आत्‍मसम्‍मान व तरक़्क़ी की गुंजाइश बनेगी. जितना कातर व इंट्रोवर्ट बनी रहेंगी, उतना ही वे हेंहें, ठेंठे वाली मूढ़ लंठई के उपहास व तिरस्‍कार का विषय बनी रहेंगी.

एक दूसरे जिस सत्‍य का यूं ही चलते-चलते साक्षात हो गया वह यह कि आप भारतीय समाज में किसी गुट के स्‍नेह से समृद्ध नहीं हैं, आगे-पीछे सत्रह लोगों को सेटियाये नहीं चल रहे हैं, तो वह ब्‍लॉगिंग हो, या ब्‍लॉग के बाहर का समाज, आपका उस समाज में होना, बने रहना, बात करना, मुंह खोलने की हिमाक़त करना सब अक्षम्‍य अपराध है. क्‍योंकि व्‍यवहार-कुशलता के पाठों में दीक्षित, यहां लोग आपकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने आगे नहीं आते. वह व्‍यवहार-कुशल बने रहकर, गोदी में हाथ धरे, चुप्‍पे-चुप्‍पे मुस्‍कराते रहते हैं, कि गुरु, अब देखें, बुढ़वा कैसे लंगी खाता है! वह सारा हाथ-पैर पटकना व्‍यक्ति को अपने अकेले अंधेरे में करना पड़ता है. व्‍यक्ति वह चुप रहकर ख़ामोशी से जीता है, या नंगई का सरदार होकर फैलने लगता है, चुनाव भले उसका हो, है वह हास्‍यास्‍पद ही.

5/23/08

लीद और मस्तियों के बारे में..

बोधिसत्‍व सीधे नाम लेकर थूकने की जगह मुझेप्रत्‍यक्षा को साधु-साध्‍वी बुलाकर मीठी गाली देकर निकल लिये. पता नहीं मस्‍ती की लीद किये हैं, या गंभीर चिंतन से पैदा लीद है! साथ ही खोये हुए बच्‍चे की एक्टिंग भी कर रहे हैं. कहां जाऊं, कहां पहुंचूं, रास्‍ता दिखा दो टाइप. मुझमें सधुआहट होती तो मैं सचमुच ठोढ़ी पर हाथ रखकर विचारने लगता कि बेचारे बच्‍चे का कैसे कल्‍याण किया जाये, कैसा उचित पथ-प्रदर्शन किया जाये एटसेट्रा! प्रत्‍यक्षा को फ़ोन किया तो पता चला उनके मन में भी कोई कोमल साध्‍वीभाव नहीं थे. तंज और तल्‍खी थी. लब-लब हो रहा गुस्‍सा था. मैंने बोधिसत्‍व का फ़ोन नंबर देकर कहा इस तरह सुबह खराब करने की जगह एक फ़ोन करके मन की बात कह लो? कोई वजह रही होगी, प्रत्‍यक्षा हमारे इस साधु राय से आश्‍वस्‍त नहीं हुईं, कि ऐसे व्‍यक्ति से बात करके कोई फ़ायदा होगा. प्रत्‍यक्षा की चार बातें सुनकर और अपने तीन निजी अनुभवों की याद करके मैंने भी अंतत: यही राय बनायी कि फ़ायदा नहीं है. मेरे जाने की बहुत जगहें (साहित्यिक, असाहित्यिक दोनों ही) नहीं हैं, बोधि की हैं, और बहुत सारी हैं, और जैसाकि प्रत्‍यक्षा समझ व समझा रही थीं, इसकी संभावना ज़्यादा है कि इन सभी जगहों पर बोधि जायेंगे, उच्‍च विचारों के सौम्‍य कीर्तिमान नहीं स्‍थापित करेंगे, लीद ही करेंगे. और मस्‍त रहेंगे. मस्‍त रहने की मेरी बहुत फितरत नहीं, मगर उसके साथ यह छोटा सा फ़ायदा है कि मैं साहित्‍यकार नहीं, न बन लेने के ऐंड़े बेंड़े अरमान हैं; प्रत्‍यक्षा ने इस ढलती उम्र में रोते-गाते एक किताब निकलवायी है (प्रकाशक और उसके किसी बूढ़े मालिकान को साध कर निकलवायी है, इसका लगता है, बोधि के पास ज़्यादा आत्‍मविश्‍वासी प्रमाण है. इस पूरी प्रकाशकीय दुनिया में पान-सौंफ वाली मोहब्‍बत जो है बोधि की है, तो इस दुनिया के बारे में बोधि जो भी कहें, उसे अकाट्य व विश्‍वसनीय समझा जाना चाहिए), बहुत मस्‍त तो नहीं ही हो पा रही, मगर चिरकुटइयों में लिसड़ाकर दु:खी भी नहीं होना चाहती. मैंने समझाने की कोशिश की हिंदी का साहित्यिक क्षितिज लीद और मस्‍ती की इन्‍हीं खूराक़ों से ही रंगीन बना हुआ है, बाकी आज के समय को समझने की जहां तक साहित्यिक खूराक़ का प्रश्‍न है, हिंदी के पास उसे बताने-दशार्ने का बकरी की लेंड़ी की मात्रा का मसाला भी नहीं. मगर प्रत्‍यक्षा मेरे इन उन्‍नत उद्गारों को समझने से रह गयीं. न उनमें मस्‍ती चढ़ी, न मेरी बातों ने उनकी तक़लीफ़ कम करने का कोई काम किया.

उम्र ने शायद प्रत्‍यक्षा को कोई समझ दे दी है. नंदिनी को नहीं दी है. वह बोधि के आगे अपने बचपने और नासमझी का डिफेंस रखकर कुछ नेक विचार की समझाइश रख रही थीं. बेचारी भूल रही थी बोधि बचपने और नासमझी से बहुत आगे निकले हुए जीव हैं. किधर जाऊं, कहां पहुंचूं की बोधि भोली गुहार लगाते भले दीखें, हिंदी के बहुत सारे पहुंचे हुए जहां पहुंचने में ज़ि‍न्‍दगी भर कांखते रहते हैं, और पहुंच नहीं पाते, वहां गांव से आया हूं मगर शहर सेट करना जानता हूं वाले बोधि हंसते-दौड़ते पहुंच जायें ऐसी बात नहीं, वह वहां पहले ही विराजे होते हैं! और लीद तो कर ही रहे होते हैं, मस्‍त भी रहते हैं (जैसे इन दिनों एकता कपूर के यहां कर रहे हैं, और शास्‍त्रीयता न सिरज पाने के दुख में नहीं, लोकप्रियता के दंभ में दिपदिपाये ही कर रहे होंगें)!

मेरे सामने एक दिन कहेंगे श्रीलाल शुक्‍ल ने एक किताब से ज़्यादा अच्‍छा कुछ लिखा नहीं, उसके ठीक दूसरे दिन श्रीलाल शुक्‍ल को दांत दिखाते हुए महान भी बता जायेंगे. भौं पर बल तक नहीं आयेगा. वैचारिक कंसिसटेंसी? गयी तेल लेने! साहित्‍यकारों के बीच ब्‍लॉगरों को गरियायेंगे, ब्‍लॉगरों के बीच साहित्‍यकारों को. एक दिन हिंदी की दुदर्शा का रोना रोयेंगे, यह कहकर कि देखो, उसने हम जैसे उजबक को कवि बना दिया है, हमारे जैसा विश्‍वविद्यालय के कोर्स में चढ़ा हुआ है, तो दूसरे दिन विनम्रता को दरी के नीचे दाब, चप्‍पल मारने को उद्यत भी होने लगेंगे! भगवान के लिए, इसमें किसी तरह का विरोधाभास न देखें. क्‍योंकि हिंदी संसार ऐसे ही लीदों और मस्तियों से अपनी वर्तमान उन्‍नतावस्‍था को पहुंचा हुआ है! उसका समस्‍त बोध और सत्‍व इसी महत्‍तम स्‍तर का है! हेंहें, ठेंठें कहते हुए कहीं भी किसी को भी कुछ भी कह दो, दूसरी जगह पहुंचकर देखो स्‍वार्थ साधने के लिए ठीक उत्‍तर से दक्षिणायन होना है, तो पलटकर वह भी हो लो, बस इसका ध्‍यान रहे कि लोग हंसते रहें, और अपनी झोली में उचित मात्रा में प्रसाद चढ़ता रहे- सामाजिकता का, अर्थ का- कहीं कसर न रहने पाये!

प्रत्‍यक्षा को तक़लीफ़ हुई इसका मुझे दुख है. अपने लिए नहीं है. क्‍योंकि बोधि को, और उनके उस समूचे साहित्‍य को मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया, और हमेशा इसे पीठ पीछे नहीं, बोधि के मुंह पर बताते हुए किया, और दूसरों के आगे मुझे मालूम नहीं बोधि क्‍या लीद करते रहे होंगे, मेरे आगे कभी मेरे सवालों का समुचित जवाब दिये हों, ऐसा आज तक नहीं हुआ है; हां, दांत चियारते और मस्‍ती ठेलते ज़रूर दिखे हैं- उसका अलबत्‍ता मुझे हमेशा दुख रहा है. मगर वह बोधि के प्रति निजी नहीं, हिंदी की दुर्दशा के प्रति रहा है.

नहीं, मैं दुखी नहीं हूं. मगर बोधि को लग रहा है मस्‍त हूं तो वह भी गलत लग रहा है.

5/22/08

फिर बैतलवा बाल पर.. अहा, ओहो?

ओह, लड़ि‍यायी बकरी चरती उत्‍फुल्लित हरी हरी
संभावनाओं में नहायी रात कैसी, अहा, भरी भरी!


ओह. फिर अहा! कि पहले अहा, बाद में ओह? पद्य में पैर धरते ही, पता नहीं क्‍यों, हमेशा ही असमंजस आकर हमें धर लेता है. और फिर दबोचे रहता है. कितना अच्‍छा होता हम ठीक-ठीक जानते होते कि अदाओं की छटाओं की कैसी बहार फैलायें कि कविताजंलि कहलायें (कहलायेंगे न? कि जांत में जंतायें-भुरकुसायेंगे?). ओह (कि अहा?). कैसे-कैसे तो भाव मन को बींधते रहते हैं, लेकिन, आह, कैसा तो यह निष्‍ठुर समय है कि इन पर, उन पर किसी पर इन दिनों कहां लिखना हो पा रहा है. चिरकुट टिनहा-सी झोले में एक कामकाजी लिखाई गिरी है कि उसी को सम्‍हालते-सम्‍हलने में तबाह हूं. नतीजे में, मन की जो बिंधाहटें हैं, वह वहीं (मन में, और कहां?) उमड़-घुमड़ करती ढेर होती रहती हैं.. मन को चीर कर, की-बोर्ड फाड़कर, ब्‍लॉग की छाती पर हरहराने लगें इसकी नौबत ही नहीं आ रही है. नौबत आती जब टाइम निकलता, यहां तो हाल है, ससुर, टाइमे नहीं निकल पा रहा.

ज़रा सा वक़्त निकले तो ये कर लें वो कर लें के मोहक अरमानों का मुरझाना हो जा रहा है, टाइम का निकलना नहीं हो पा रहा. वह लोग धन्‍य हैं जो नौकरियां कर रहे हैं. ऊपर से हंसने का टाइम भी निकाल ले रहे हैं. फिर वह लोग तो और ज़्यादा धन्‍य हैं जो न केवल हंसते हुए नौकरियां कर रहे हैं, बल्कि हंसते-हंसते पोस्‍ट भी ठेल देने का निकाल ले रहे हैं. टाइम. उसके बावजूद भी हंस ले रहे हैं? बहुत बार तो हास्‍यास्‍पद पोस्‍ट ठेलकर भी बेहूदगी के हौज में पानी उलीचते हें-हें कर ले जा रहे हैं. और टिप्‍पणियों पर टिप्‍पणी करने का भी टाइम निकाल ले रहे हैं!

आजू-बाजू बारह लोगों का श्रृद्धालु सुगंधित चिरकुट समाज श्रद्धापुष्‍प अर्पित करने का भी निकाल ले रहा है. टाइम! और यह सारा व्‍यापार हंसते-हंसते की निष्‍काम, निस्‍वार्थ भावना में ही संपन्‍न हो रहा है! ओहो! तदंतर अहा! सचमुच, यह धन्‍यावस्‍था से ऊपर की अवस्‍था है. सोचकर श्रद्धा से मेरा सिर झुक और आंखें मुंद जाती हैं. फिर इसका स्‍मरण होते ही कि हाथ में कुछ काम है, और अभी खत्‍म नहीं हुआ है, और फ़ि‍लहाल साहित्यिक व ब्‍लॉगिय श्रेष्‍ठता के विमर्श से इस गरीब के जीवन में ज़्यादा ज़रूरी है, मैं धन्‍य-धान्‍य भरे इस संभावनामयी- ओह, कैसी अनोखी तो रच ली है हमने यह धरा- से सरककर अपनी बिंधाहटों में दुबक जाता हूं. सुबुक-सुबुक तो जाता ही हूं..

बहुत सारे मौके हैं जब चुप रहना अच्‍छा नहीं लगता (न रहना अच्‍छी बात होती है), मगर यह भी अपनी दुलारी- दो कौड़ी के श्रृंगार में अपने को धन्‍य मान रही हिंदी बेचारी की चिर-परिचित विशिष्‍ट लाक्षणिकता ही है जहां दो कौड़ी के सुख से सुखी होने व दूसरों को दुखी करने से अलग, इस गाल-बजावन ज़बान में, किसी महत्‍तम मार्मिक अनुभव की व्‍यंजना की उसके व्‍यवहारकर्ताओं को न चिंता होती है, न उसे अपने संस्‍कार में ढालने की कोई वयस्‍क समझ बनती है; बंता सिंह और संता सिंह बड़ी आसानी से समझ आते हैं. उस पर हंसी भी आती है. और काम करते हुए की बेकामी में भी समझ आती है. जैसे दो कौड़ी के बाज़ारी व्‍यवसाय आईपीएल के हुलुलु को सिर पर मुकुट की तरह धारकर मन धन्‍य हो उठने के बाद धन्‍य ही बना रहता है; उसकी हिंसा, उसका बाज़ार और अपनी हार नहीं दिखती. चार बेचारे ब्‍लॉगरों की एक छोटी दुनिया और उस दुनिया में अपनी अभिव्‍यक्तियों की अकुलाहट के प्रति ज़रा विनम्रता दीख जाये वह तो नहीं ही होता, अपना दंभी चिरकुट दुर्व्‍यवहार भी नहीं दिखता?

करने को बहुत सारी बातें हैं, मगर पता नहीं सुननेवाले आपके कान कैसे हैं. हो सकता है बंता सिंह की हास्‍यास्‍पद बेहूदगी पर हंस लेने की रसिकता वाले हों, बंबई में बिलासपुर के विलुप्‍त होने की तक़लीफ़ को समझ सकने की धीरजवाले न हों? फिर करने को मुझे मेरी लिखाई भी तो है, ससुर?

5/20/08

मेमरीज़ ऑव अंडरडेवलपमेंट..

सत्‍यनारायण की कथा का मौका हो या मझली बेटी की मंगनी का, गली में झंडियां लहराने लगतीं हैं व तोरणद्वार सज जाता है वह महत्‍वपूर्ण नहीं, एक के ऊपर एक अलग-अलग आकारों वाले स्‍पीकरों का कानफाड़ू (और पता नहीं क्‍या-क्‍या फाड़ू) तथाकथित वह संगीत बजने लगना महत्‍वपूर्ण है. धाकी-धाकी, तारारा-तारारा का दिमागहीन लयबद्ध रेपीटेटीव शोर शहर के निचले तबके की गलियों को सांस्‍कृतिक ऊर्जा मुहैय्या करवाता है. क्‍या चरित्र है इस सांस्‍कृतिक ऊर्जा का? गरीब घर की लड़की, जो कभी शहर के खाये-पिये-अघायों के डिस्‍कोथेक नहीं जायेगी- न टीवी के परदों पर फ़ि‍ल्‍मी छवियों से अलग कभी उस दुनिया की थाह और अंदाज़ का उसे पता चलेगा- घर, समय व समाज की पाबंदियों के बीच दलेर के इस कुबेर संगीत से, घर के भीतर कपड़ा पछारते, भींडी काटते अपना करीना कपूरत्‍व पाती है? क्‍या पाती है? क्‍या संस्‍कार, कौन-सा समूचापन पाती है? तत्‍वहीन लयबद्ध यह धाकी-धाकी लड़की को कहां से निकालकर कहां पहुंचाता है?..

एक दूसरी तस्‍वीर है: कलश, घड़ा टांगे कुछ औरतों की बीच घोड़ी पर सवार एक घोड़े-सा ही मंगेतर. घोड़े की मंगनी का मौका है, या इसी तरह का अन्‍य कोई रिचुअलिस्टिक संस्‍कार. गली से गुज़रती इन दस औरतों के जत्‍थे की चार कुछ बुदबुदाती-सी गा रही हैं, उसी तरह अन्‍य चार हैं जो हवा में हाथ-पैर फेंकती कुछ फुदकने के अंदाज़ में नाच रही हैं. तो ठीक न यह गाने जैसा गाना है न नाचने जैसा नाचना. बंधे हुए देह व दिमाग़ का यह दूसरी तरह का सांस्‍कृतिक प्रोजेक्‍शन है, एक बार फिर, जिसका करीना कपूरत्‍व ठीक-ठीक बाहर नहीं आ पा रहा है! कहां फंसान हो जा रही है? क्‍यों नहीं अंदर की मचलनें अपने को ठीक-ठीक एक्‍सप्रेस कर पाती हैं? या इस तबके की उद्वि‍ग्‍न विचलनें मन के किसी प्रेतात्‍मा के कब्‍जे में आने पर ही स्‍वयं को ज़ाहिर करती होंगी..रहेंगी?

एक अन्‍य और तस्‍वीर है. निचले तबकों की नहीं, हमसे निम्‍न-मध्‍यवर्गीय तथाकथित शिक्षित समुदाय के बच्‍चे की. वह आपमें, हममें से कोई भी हो सकता है; क्‍या दिक़्क़त होती है इस नमूने, इस टाइप की? संवेदनाओं, फिलिंग्‍स की कंसिस्‍टेंसी का अभाव? लम्‍बी अवधि तक किसी भी भाव को यह टाइप पर्सिस्‍ट नहीं कर पाता. फुदक-फुदक कर एक भाव से दूसरे में शिफ्ट करता रहता है; इसकी हंसी जेनुइन होती है न इसका गुस्‍सा. कमर से लगी (या वहीं कहीं) एक अदृश्‍य पूंछ होती है जो इसकी जोकरई को क्रियाशील किये रहती है. बीच-बीच में यह निहायत रेचेड कैरेक्‍टर आपको आश्‍चर्यजनक रूप से प्रसन्‍न व परम तृप्‍त भी दीखता रह सकता है! इस अधपके रोटी-से आदमी की बाबत नायपॉल ने कहीं काफ़ी कड़वाहट से कहा है- ‘द वर्ल्‍ड इज़ व्‍हाट इट इज़; मेन हू आर नथिंग, हू अलाउ देमसेल्‍व्‍स टू बिकम नथिंग, हैव नो प्‍लेस इन इट.

नायपॉल ने स्‍वयं को इस बड़े संसार में खुद ढाला-ढलाई की थी, अत: वह इस तरह की समाज-निरपेक्ष, व्‍यक्ति-केंद्रित वक्‍तव्‍य आत्‍मविश्‍वासी झोंक में दे सकते थे. ठीक एक पीढ़ी पहले उनके पिता, सीपरसाद नायपॉल, ने कोशिश की थी, और पागल हो गये थे. पता नहीं नायपॉल के कहे में अपने हारे हुए पिता के प्रति भी जजमेंट अंतर्निहित है या नहीं. जो हो, हाफ़ अ लाइफ़- ऑर मैन, कच्‍चा, कटा हुआ. हास्‍यास्‍पद. पेट से भले न हो, दिमाग़ से मालनरिश्‍ड. अंडरडेवलप्‍ड. यह आदमी दलेर के कुबेर से अलग क्‍या खड़ा करेगा? क्‍या करने के लायक होगा? विल ही रियली हैव नो प्‍लेस इन द बिग वर्ल्‍ड?

क्‍यूबन फ़ि‍ल्‍ममेकर तोमास आलिया की पुरानी फ़ि‍ल्‍म है- मेमरीज़ ऑव अंडरडेवलपमेंट, छोटा था जब देखी थी, कल दुबारा देखकर चकित हो रहा था. वह देखना ही मन में इन उल्‍टे-सीधे विचारों, तस्‍वीरें के खिंचते चले जाने की वजह बना.

5/15/08

पहली बार पचास साल का आदमी..


पचास साल का आदमी पहाड़ के नीचे खड़ा था
पचास साल के आदमी ने ज़िन्‍दगी जी ली थी
गया था कई सारे शहर चढ़ी थी ढेरों रेलगाड़ि‍यां
कहां किधर क्‍या ज़मीन सस्‍ती है का हिसाब
जानता था. कितने सारे ‘अनकोडिफाईड’ क़ि‍स्‍से थे
डेटा शीट कंपाइल होना बाकी था अब बाकी ही रहेगा
जैसे जेल जाते-जाते रह जाने का वह प्रसंग, या फिर
कुत्‍ते के काट खाये से बच जाने का. तीन शर्म
की कहानियां, आधी विजय की, सवा चार हंसियों की
एक वह इमारत याद आती है जाने किस बात की इमारत
हुआ करती थी. एक वह अच्‍छा स्‍कूल हुआ करता था
मगर अब नहीं रहा, जैसे वह बड़ा लाजवाब मित्र
हुआ करता था- हूनरमंद, होशियार. मगर बहुत पहले
की बात है अब कुछ कहां बचा. बीसेक दवाइयों
के नाम जानता था. पचास साल का आदमी
एक बार खुलकर हंसना चाहता था मगर हंसते हुए
हास्‍यास्‍पद दीखने की घबराहट में चुपके-चुपके
बिन-आवाज़ रो रहा था पचास साल का आदमी
पता नहीं गहरी नींद से कैसे तो अचानक आंख खुली थी
इतने तो काम पड़े थे. रस्सियों का बंटना, झोले में कामों
का अंटना, इतने तो नाम पड़े थे. और समय जो है इतना-इतना
सारा हाथ रहता लेकिन हाथ कहां आता. बारह वर्ष के उद्दंड, उश्रृंखल,
शरारती बच्‍चे की तरह भागा जाता. सोचकर थकाहट होती कि आख़ि‍र
ये माजरे थे क्‍या. होशियारी की ऐंठ में ग़लत गांव निकल आये थे?
जाने कहां पहुंचना था जाने कहां पहुंच गए थे? सिरे से सब ग़लत
होता रहा था ग़लत हो गया था. करेक्टिव मेज़र्स नहीं बचे थे
न बचा था ठांव? पचास साल का आदमी एकदम से मुड़कर
एकदम से कहीं और निकलना चाहता था. पचास साल का आदमी
पांच वर्ष के बच्‍चे की तरह पहली मर्तबा पानी में उतरने के ख़्याल
से एकदम से घबरा रहा, अपनी उद्वि‍ग्‍न चंचलता में लड़खड़ा रहा था.

5/12/08

खड़े हुए, बड़े हुए हैं?..



इसको गिरा उसको पटक रहे हैं, दालान के बेंच पर कूद रहे हैं, बाहर चीख रहे अंतर में कूक रहे हैं. शराफ़त से मुस्‍करा रहे हैं, हाथ हिला रहे हैं, हथेली दबाकर लिख रहे हैं, हिल रहे हैं हंस रहे हैं; बच्‍चे बड़े हो रहे हैं. मैं, जाने क्‍या था, अपने में अड़ा हुआ, अभी तक वहीं, बीच सीढ़ि‍यों खड़ा हुआ हूं. दीखे हैं अचक्‍के तब ओह, अचानक कैसे समझ आता है अरे, इतनी उमर निकली? - मगर, हाय, थे कहां हम पड़े हुए, अभी तक बड़े हुए. तसल्‍ली से बैठ सकें इतने कहां खड़े हुए? पता नहीं क्‍या था छत की धूप में गर्म हवाओं से हवाई हाथ आजमाने गया था, या छिटकी फुहारों में भटकने का, कसकभरी ठुमरियों में भींजने का मोह था, ओह? आयी होगी बरसात, नशीली छांह में ठुमरियों का तैरा होगा कोई नीला बाजरा, रहा होगा रंगीला, सपनीला- अगर रहा ही होगा माजरा; क्‍योंकि मुझसे पूछिये तो सच, मन में लम्‍बा ऐसा कुछ ठहरता नहीं, याद कुछ ऐसा पड़ता नहीं. आंख लग गयी होगी, या तैरते हुए हम किसी और के सपने में निकल गये होंगे, कहानी कहीं और घूम गयी होगी, समय किसी और की आंचल में खर्च हुआ होगा, क्‍योंकि हमने तो जैसा पहले ही बताया, अपनी शर्म में गड़े हुए अभी तक वहीं बीच सीढ़ि‍यों खड़े हुए हैं. हुआ इतना भर ही है कि आसपास बच्‍चे बड़े हुए हैं.

5/10/08

कहां समझ आता है?..


हंसी-खेल में कहीं नस सरक जाये
या पैर की उंगलियों के बीच जाने
कहां से सरककर एक कंकड़
चला आये, छूटा-दबा रह जाये
और अचानक गड़े ऐसे कि मुंह
से कसकती एक कराह छूटे
चटककर कहीं कुछ भीतर टूटे
वैसे ही रहते-रहते जीवन
समझ लेने की हकबकायी
बेचैनियां समझ आती हैं
जीवन कहां आता है?

सूने दोपहर की सन सन
बजती ख़ामोशी. तकिये पर
ढीला गिरा इक चेहरा. प्‍यास
व हहास की कुछ यूं ही कह गयीं
दिल मरोड़ जानेवाली पंक्तियां
थर्मस में रखा ज़रा से सपनों का
ज़रा सा मीठा पानी. छोटी
छोटी चोट खायीं ढेरों कहानी
चाबुक चलाती सफ़र की फटकार
समझ आती है. सफ़र, ससुर,
कभी ठीक कहां समझ आता है?
(अभय के लिए)