पहाड़ पर मुठभेड़..

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सपने में दिखे वॉग्नर, मुख्य सड़क से हटकर कहीं अंदर गए टीले की नोक पर के चिरकुट सजावटी रेलिंग पर कुहनी गड़ाये सस्ती सिगरेट धूंक रहे थे. सामने, नीचे दूर तक फैले घाटियों के विस्तार की अथाह उदासियां थीं, गजर-मजर बादलों के धुंधलकों की अराजकता एक बेमतलब मोहब्बत की भावुकता की तरह उन पर धीमे-धीमे चू रही थी. मैं वही देखता पागल बना रह सकता था, लेकिन घबराकर मैंने यह थाहने की कोशिश की कि संगीत-सरदार पनामा पी रहे हैं या चारमिनार!

दांत निपोरे-निपोरे मैं हर्षकातर दीखा, ‘देखिए, अर्दोनो वाली किताब जाने कब किसके यहां से चुराये रहने के बावज़ूद आपके संगीत को आजतक भले नहीं पहचान सका, आप मगर पहली ही नज़र में पकड़ा गए! लेकिन हुज़ूर, बात समझ नहीं आई, वियेना के बाजू किसी पहाड़ी रेसॉर्ट में दीखते, यहां हलद्वानी के सस्ते तलछट में क्या ढूंढ़ने आए हैं? यहां संगीत का ‘स’ भी नहीं मिलेगा, मंगलेश की कविता भी दिल्ली में ही अपने शब्दं सहेजती है?’

वॉग्नर बाबू चुप्पे –चुप्पे तकते रहे. उन नज़रों में प्रूस्त ने रिल्कें को जिन नज़रों तका होगा वह दंग अंतरंग मनभावनता भी नहीं थी, एक प्रैग्माटिक डकैत की सूनसान आंखों का घिसा घसियारापन था, फुसफुसाकर कुछ देर तक एक लंबे मंत्र सरीखा बोलते रहे, गुरुवर फ्रेंच में बोलते तो थाह भी लेता, लेकिन यहां तो खालिस जर्मन बीयर बह रहा था, मैंने घबराकर हाथ जोड़ दिये- क्षमा करें, मालिक, ताज़ा-ताज़ा पटना से लौटा हूं और फिलहाल ‘चखना’ बंद कर रखा है!

‘कब था आखिरी बार जब हमें सुने?’ यह संगीत-सरदार ने खांटी संस्कृत में कहा, हम समझ गए मगर साथ ही यह भी समझ आया कि हम सरीखे संस्कृतिविहीन के लिए सांगितिक सुरबहार की जिरह में उतरना कैसी टेढ़ी खीर साबित होनेवाली है!

मैं एकदम से हंसने लगा. वैसे ही जैसे भ्रष्टाचार का मामला सामने आते ही भारतीय नेता उच्च रक्तचाप और छाती में तक़लीफ़ की शिकायत करके जेल की जगह अस्पताल की शरण में निकल जाता है, या हिंदी प्रदेश की लड़कियां बौद्धिकता का सीधे सामना होने पर अकेलेपन के बीहड़ रास्तों पर निकलने के, मुस्कराती शादी के सहूलती संसार की तरफ गोड़ बढ़ा लेती हैं..

आंख खुली तो देखकर राहत हुई कि चलो, ससुर, अपना ऑईपॉड नहीं ही काम कर रहा, क्या ज़रुरत थी, खामखा पिटे हुए पहाड़ पर संगीत-शिखर से ठिलने पहुंच गए?

 

दुनिया रोज़ बदलती है?

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कहीं कवि कह गया है तो उसके कल्पना-विधान में बदलती होगी ही. वैसे भी हिंदी में भौतिक जगत पर रुमानी भाववाद आरोपित करने का भयकारी, लगभग उन्मादभारी, प्रगतिशील प्रचलन काफी पुरातन रहा है. सारे कवि लाइन से बताते नहीं थकते कि हे इहलोक के जाने किन अंधारकोनों में छिपे, पसिंजर रेलों में फंसे कराह-कुमुद जनसमुद्र, घबराना नहीं, दुनिया बदिल रही है, समाजबात, बाबू, धीरे-धीरे पसिंजर गाड़ी में पीछू-पीछू आय रही है! ‘छुक-छुक.. दुनिया.. छुक-छुक.. रोज़.. छुक-छुक.. बदिल.. छुक-छुक.. रही है.. छुक-छुक..’ मुंगेर और मोतिहारी में डेढ़ सौ कबिता के सर्कुलेशन और राजधानी पटना और महाराजधानी दिल्ली में एगो गोष्ठी निष्पादन से ‘दुनिया बदिल रही है!’ का एगो महानुष्ठान, क्रांतिधारी पोस्टंर तैयार हो जाता है. एक बच्चे की शादी के सिलसिले में मैं पिछले पांच दिनों पटना के पड़ोस, मसौढ़ी में था, दुनिया बदलने के इस विज्ञान की बहुत थाह नहीं ले सका. अलबत्ता बांह में तीन जगह और पैर में दो चोटों के महीन सिंगार के अवसर वैसे ही सहज-सुलभ हुए जैसे आमतौर पर बिहार की फिसलनभरी सड़कों पर हमारी तरह के सुलझे पथिकों को हो ही जाते हैं, फिर भी विवाह जैसे सामाजिक गैदरिंग के अवसर पर यह अफ़सोस बना रहा ही कि स्कोर्पियो, बोलेरो की झांकियों की ‘नवके’ सजाव में बराती के ‘पुरनके’ भेड़-ठंसाव में हम समाजोत्थान की परिघटना का ठीक-ठीक अनुशीलन कर क्यों नहीं पाये?

आखिर क्या वज़ह रही होगी कि हिंदी का कवि एक मुस्‍कीभरी नज़रों में जो पढ़ जाता है, वह हम बारहा चश्मा़ पोंछ-पोंछकर भी देखने से रह गए? इसलिए कि हाईस्कू‍ल में अंकगणित में अट्ठारह नंबर पाये थे? और शायद इसीलिए भी कि सायंस फ़ि‍क्‍शन में अपनी कभी गति बना नहीं पाये? सोचकर गुस्सा् आता है कि गुणाकर मु‍ले ने विज्ञान पर इतना लिखा, ‘विज्ञान के वंचितों के नुकसान’ वाली भी एक किताब लिखकर छोड़ गए होते? लोग पढ़ते नहीं, ठीक है, लेकिन लिखकर कहीं छूटी तो रहती?

मगर ‘हेने’ और ‘होने’ ‘जेकरा-जेकरा’ और ‘जेतना’ सब जो ‘बदिल’ रहा है (झारखंड में मधु कोड़ाई करके सब ले गए वाले कौड़ाओं का तो बदले गया है!) के विज्ञान को ठीक से पढ़ पाने का चश्मा जाने पटना के किस सुपरमॉल में बिक रहा है, हम दु:खीमन ‘अकनालेज’ कर रहे हैं ‘नवका’ बना बाथरुम का ‘बिछिलाहट’ देख लिए, ज्ञानधन का ‘चमकाहट’ लोकेट नहीं कर सके! अशोक राजपथ पर थोड़ी देर के लिए राजकमल प्रकाशन की ‘दुकनिया’ में भी कुल जमा चार गो टाइटिल जो ‘कीने’ वो भी ज्ञानपिपासा का सांति से डेस्पेरेशन का खांसी का कंट्रोलिंग ‘डेभाइस’ कहीं ज़्यादा था!

दुनिया रोज़ बदलती है. अरे? देखिए, फिर ले खांसी का दौरा सुरु हो गया!

 

उलझन..

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सीधे कहूं या बात घुमाकर कहूं? किसी जाननेवाले ने कहा सीधे कहने की बात मत ही कहना क्‍योंकि तुम्‍हें जाननेवाले (जितना जान सकते हैं) समझ ही लेंगे मज़ाक कर रहे हो, टेढ़ा ही कहो मगर भगवान के लिए चंद्रबिंदु ताक पर रखकर मत कहा करो! मैंने नाराज़ होकर एकदम टेढ़ेपन में कहा, "हे हमें पहचाननेवाले, मेरे लिखने में चंद्रबिंदु की अनुपस्थिति मेरे भाषायी प्रयोग की पैदावार नहीं, हिंदी रेमिंग्‍टन की की-बोर्ड में दर्ज़ सीमाओं का संसार है, रवि रतलामियों और देबआशीष की नाक़ामियों के मद्देनज़र है, लेकिन हमारे ब्‍लॉग पर चांद का मुंह टेढ़ा तो क्‍या कभी चांद का कैसा भी मुंह दिखा जैसी बात उन्‍होंने कभी की कहां है?" मुझे जानने का भरम रखनेवाले भाई साहब ने मुंह टेढ़ा करके कहा- सीधा नहीं कह सकते? कुछ भी? मैंने सीधे सोचने की कोशिश की, एक छोटे पॉज़ (पाज़, ऑक्‍तावियो नहीं. भारत नहीं, मैक्सिको व इतिहास के बारे में उनकी एक किताब है, बड़ी अच्‍छी है लेकिन इस वक़्त नाम याद नहीं पड़ रहा, जबकि गुलशन नन्‍दा के सभी टाइटल्‍स एकदम ज़ुबान पर धरे हुए हैं? स्‍मृति इस तरह के भद्दे मज़ाक क्‍यों करती है? आपके साथ करती होगी, ठीक है, वैसी ही आपकी चिरई-बुद्धि है, लेकिन मेरे साथ?) के टेक पर मैंने कहा, "दोस्‍त (कहां का दोस्‍त? कैसा दोस्‍त?), एक के बाद एक दो सामाजिक फ़ि‍ल्‍में देख ली हैं, समाज और हिंसा दोनों से लबरेज़, संभवत: उसी के असर में दिशा लड़खड़ा गई है, वर्ना आप मुझ जैसे सीधवे में कुछ ज्यादा ही टेढ़ा प्रक्षेपित कर रहे हो, वह हूं नहीं जो दीखता हूं, और जो दीखता हूं वह कभी कहां हो पाता हूं?"

मुझे जानने का स्‍वांग रचनेवाला, जैसे कभी हमें जाना ही न हो की अदा में मुंह सिये आगे निकल गया. पीछे से मैंने आवाज़ लगायी, 'वैसे आपकी चंद्रबिंदु वाली बात जायज़ है लेकिन उसका मुझसे ज़्यादा कसूरवार हिंदी में माइक्रोसॉफ़्ट के एजेंट रवि रतलामी की शैतानी है..' तो ज़ाहिर है मैंने आवाज़ लगायी और उसका अपेक्षित असर न हुआ, आवाज़ वापस मेरे पास लौट आयी, और फिर मेरे पास ही बनी रही.

सोचनेवाली बात है अपनी हिंदी रेमिंग्‍टन वाली गैरहा‍ज़ि‍र चंद्रबिंदु का क्‍या किया जा सकता है, या सीधी बात को टेढ़े तरीके से कहने के अपने तरीकों का. इतनी देर से सोच रहा हूं मगर जवाब नहीं सूझ रहा. इतनी देर से सोचने पर याद आया कि अब तो थोड़ी देर में यह नौबत भी आ सकती है कि सोचने लगूं इतनी देर से सोच क्‍या रहा हूं? सचमुच, इतने दिनों से आखिर क्‍या सोच रहा हूं? सोचते हुए अपने को इस तरह सोचता देखने के बिम्‍ब-बमकारी ख़्याल से काफ़ी घबराहट हो रही है. ऐसी कोई किताब हाल में बाज़ार में नहीं आयी है जिसे उलटते-पुलटते जाना जा सके कि इन दिनों मैं क्‍या सोच रहा हूं? सम बुक? एनी डैम बुक?

क्‍या करुं सोचने से बचने के लिए घबराकर मिलोराद पाविच को ही पढ़ना शुरु कर दूं? लेकिन मेरे पास जो इकलौती किताब की प्रति थी वह किसी भाई ने उड़ा ली है (हो सकता है हरामख़ोर किसी भगिनी ने ही उड़ायी हो, मगर देखिए, देखिए, देखिए हमारी उदारता कि ऐसे गाढ़े वक़्त में चाहकर भी हम स्‍त्री जन-दुर्जन के प्रति अनुदार नहीं हो पा रहे!), टेढ़ायी का फिर दूसरा काम क्‍या करें?