फ्रेंच डाक्टर, लेखक, दार्शनिक आनरी लाबोरित ने कहीं लिखा है ऐसे वक़्तों में ज़िन्दा रहने और सपना देख सकने का इकलौता रास्ता यही है कि आदमी पलायन करे. मोटी-पतली किसी भी गली से 'निकल' ले. डाकसाहब ऐसे हल्के नहीं कि ऐसी हल्की बात करें, मगर कर रहे हैं. लोग करते हैं करना पड़ता है, ज़मीन पर खड़ा आदमी एकदम पेड़ पर चढ़ जाता है, आखिर 'आन्ना कारेनिना' के पहले भाग की पहली पंक्ति भी है 'vengeance is mine', अब सोचिये लंबी सुफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बाबा तॉल्सताय दयानंद ने शुरुआत ही कैसे गीली चाबुकवाली की, ही मस्ट हैव हैड हिज़ रिज़न्स. पट्रिसिया हाइस्मिथ 'द टैलेंटेड मिस्टर रिप्ले' में समझाइश देती हैं, 'if you wanted to be cheerful, or melancholic, or wistful, or thoughtful, or courteous, you simply had to act those things with every gesture.'
इसीलिए ऐसे ही नहीं कहता कि देयर आर मोमेंट्स व्हेन द मैन इनसाइड मी फील्स सिंपली स्पीचलेस..













अपनी छुटपन वाली उम्र में (इससे यह मतलब कतई न निकाला जाये कि अब बड़प्पन वाले में दाखिला ले लिये हैं!) हम 'स्क्रीन' और 'पिक्चर-पोस्ट' से काट-काटकर फ़िल्मी कतरनें बटोरा करते थे (मैं बच्चादार बाप नहीं, सोचकर सशोपंज में हूं पता नहीं छुटपन वाली उम्र के बच्चे आज क्या बटोरते हैं. ईश्वर न करे कैंची की जगह छुरी लेकर बटोर-कामना करते हों?), उसके बाद हसरत रहने लगी लड़की न भी हो कम से कम लड़कियों के प्रेमपत्र ही हों, दूसरों को ही लिखे हों हम बस उन्हें स्टोर सकें, कैटालागिंग हमारे हाथ से हो! उसके बाद एक दौर आया हम तो मैट्रिक के आसपास ही डोलते रहे मगर साथ के यार-दोस्त थे देखता सब बड़ी जिम्मेदारी से मार्कशीट बटोर रहे हैं. तो बटोर के ये अलग-अलग दौर रहे, बाद में जाकर आमतौर पर अब यह सब कहीं हो गया कि प्रेम का तो क्या पूछना सारे प्रेमपत्र तक जाने कहां घुस गए, जिधर देखो, यार लोग इकलौती चीज़ जो बटोर-सहोर रहे हैं वह बैंक का काग़ज़-पत्तर है..
चूंकि मेरे पास बैंक की चांदनी तो क्या चिथड़े भी नहीं तो मन मारकर किताबों के कवर सहेज रहा हूं. कवर दूसरों के ही हैं हमारी तरह आपकी भी आदतें पुरानी, पहले से बिगड़ी हों तो कवर-चुराव की एक जगह यह रही..
बंटवार: किताबी दुनिया
पत्थर दर पत्थर जुड़ती मीनार खड़ी होती की तर्ज पर शब्द गोड़ते, गांठते किताब तैयार हो जाती लेकिन किताब है कि बार-बार खुद को बचा ले जाती है. पथरीले पहाड़ पर खड़ा हूं और मानो पत्थर पकड़ में न आते दबी आवाज़ में उपहास करते हों- हमें साधोगे, ऐसा, रियली? लेकिन पहले ज़रा ये बताओ, हमें पहचानते हो?
वही हमेशा का संशय जो सुर-समय-समाज में कहीं का नहीं रखता फिर आत्मा पर चील की तरह आकर बैठ जाता है कि पथरीले पहाड़ पर खड़ा हूं शब्दों को नहीं पहचानता? समाजभागा शब्दवन में ज़िन्दगी बीत रही है शब्दों को बिना पिये आखिर क्या खाकर नहीं पहचान पाता? फ़िल्म नहीं बनी की कहानियों की कई फ़िल्में हैं जो न केवल बनकर खत्म हुईं, कलात्मक उजास के चौड़े मैदान, लम्बे मुकाम बुनती आगे निकल गईं, किताब नहीं लिखी की कहानी के उजाड़ के रेगिस्तान को फिर मैं कैसे पार क्यों नहीं पाता?
जहां खड़ा हूं मीनार नहीं है आड़े-तिरछे किसी तरह जोड़कर लगाये पत्थर की दीवार है एक पहाड़ी घर की गरीबी है एक घिसे हुए कूकर में कोयले की गंधभरा बासी राजमा है स्टील की थाली में प्याज़ के टुकड़े मोटा चावल है प्लास्टिक के टूटे मग्गे पानी है एक कातर बीमार मां की घबराहट है एक गुस्से में थरथराते किशोर बच्चे की मदहोशी है जो थाली को पैरों से ठेल पथरीली दीवार से दूर सामने पहाड़ों के अनंत की ओर यह कहता दौड़ गया है कि इस घर से नफ़रत है उसे! इन पहाड़ों से..
जीवन कल नहीं था न कल होगा, जो है आज अभी इसी क्षण में जीवन है और उसे जैसे उथले, गहरे अर्थों में हम भरते हैं साधकर कहीं हांके लिये चलते हैं वही हमारी जीवनकथा बनती है, मगर शब्द? कल नहीं थे, न कल होंगे, आज अभी इसी क्षण में उनका रहस्यलोक मैं भेद लूंगा, कैसे उन्हें छेद लूंगा? जीवन हिन्दी साहित्य की तरह सरल, सुगम, सहज परिभाषित प्रगतिशील और प्रगतिविमुख नहीं, कि शेल्फ पर नागर रहते हैं फिर गुलशन नन्दा की फ़िल्म का गाना मन में सुहाना बना रहता है दुकान में धरने की हिम्मन नहीं बनती; जैसे कॉन्डोम घर में रहता है दीखता नहीं, दीवार के कैलेण्डर पर गणेशजी निर्विकार चेहरा लिये सर्वहितकारी, सर्वसिधारी लोकोपकारी मुद्रा में डोलते दिखते हैं. होशियार, सोशली हूनरमंद सहज साहित्यपंथ परगत-पगडंडी पर निकल जाता है पीछे छूटे पत्थरों पर गीले पेटीकोट में औरत चीखती माथा पटकती है- अब मुझमें तेरा दिल नहीं लगता, हरामी, अब तुझे मैं सुंदर नहीं लगती, बोल? स्वत्व उन चीखों में कौंधता रहता है भोथरा साहित्य आंखबंद बना रहता है समय-समाज शब्दबद्ध करना नहीं जानता..
कहां से आई है कहां जायेगी यह कौन सड़क है जहां खड़ा हूं. झोले में इवान सेर्ग्येविच तुर्ग्येनेव का ‘स्केचेज़ फ्रॉम अ हंटर्स एलबम’, ‘होम ऑफ़ द जेंट्री’ होगी तो फिलिप लारकिन की कवितायें और लोस्सा की ‘डेथ इन द आंदेज़’ भी होगी और इससे बेपरवाह होगी कि जीवन से कितना लबालब हैं, घंटे से अगर प्रगतिशील नहीं हैं!
बदसूरत सुदर्शन हंसता हुआ जांघ खुजाकर कहेगा सब गुटका छाप हैं, गुरु, जीवन है न साहित्य, खाली प्रगतिशीलता है स्साली, और इतना बास छोड़ती है कि आदमी जांघ की जगह नाक खुजाने लगे!
मैं हंसना चाहूंगा हंसी पकड़ नहीं आयेगी, मुर्दा फुसफुस में बुदबुदाऊंगा सब सही है, बेटा, स्वतंत्रता चाहनेवाले नैतिकता का ठेका अपने पास रखना चाहते हैं, इतिहास की विसंगतियों पर भारी पोथे हैं पर अपनी किताब कहां है? उसकी पहचान पायेंगे? शब्द- उसका संधान पायेंगे?
बंटवार: मन की गांठ