मुंह सिये न चुप रह पाने की अव्यहार-कुशलता के बारे में..
ब्लॉग में कहीं किसी पर कीचड़ उछल-उछाला जा रहा हो, ब्लॉगजगत में एकदम-से ऊर्जा का संचार हो जाता है. ऊंघते लोग चौंकन्ना होकर जाग जाते हैं. किस पर क्या पोस्ट लिखें का पसीना रीसा रहे लोगों के पैरों के नीचे सक्रियता की सीढ़ी खुल जाती है. बहुत सारे लोग तो पोस्ट लिखते ही इसलिए हैं कि सामान्य रूप से सामान्य कीचड़ उछाल रहे हैं की सक्रियता में देखे जायें.. जिसको पता नहीं फिर किस-किस से जोड़कर देखते हुए मेरे जैसा- महाद्वीप के दुख में दुखी- व्यक्ति असामान्य आचरण करने लगे तो ठंडी आह भरकर मुझे नंगई के सरदार के पद से विभूषित करने की लस्सी भी पी सकें.
ख़ैर, पता चला महाद्वीप के दुख में दुखी होना दुर्गुण है, पर दुख कातर होना बुढ़ौती के लक्षण हैं. सामान्य रूप से सामान्य कीचड़ उछालते रहना सहज हास्यप्रियता है. ब्लॉगीय सामाजिकता है. अभय ने जानकारी बढ़ायी व्यवहार-कुशलता है. मित्रता के बारे में भी अभय से कुछ ज्ञान प्राप्त हुआ. कि बलार्ड पियर से चार किलो का किताब ढोकर उनके घर पहुंचाना मित्रता की, उनके स्नेह के अधिकारी होने का विशिष्ट लक्षण समझा जाना चाहिये. जबकि हम समझते थे मित्रता में आप किसी के लिए क्या छोड़ते हैं, क्या दावं पर लगाते हैं ज़्यादा महत्वपूर्ण है, तो दीख रहा है, गलत थे, मित्र से आप क्या पाते हैं की व्यवहार-कुशलता मित्रता को ज़्यादा ऊंचा प्रमाणपत्र दिलवाती है!
आपकी सामान्य, असामान्य, प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष किसी बात से किसी को तक़लीफ़ पहुंचे, इसमें लड़ियाने की बात नहीं. अकारण पहुंच रही हो तब तो एकदम ही नहीं. अर्थ का अनर्थ करके, किसी के लिए भी रोने लगना, धीरज खो देने की अव्यवहार-कुशलता करने लगना प्रगतिशील-पतनशील किसी भी नज़र से टुच्ची बात ही है, लेकिन, जैसाकि अभय ने अपने मित्र के संदर्भ में कहा, मैं अपने रेफरेंस में भी रिपीट कर ले रहा हूं- कि अपने राम भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं ऐसा हमने कब कह दिया?
मगर क़ायदे से कहूं तो इस समूचे टिल्ली प्रसंग में मुझे सबसे ज़्यादा गुस्सा प्रत्यक्षा पर आ रहा है. इसलिए नहीं कि मेरे घर की स्त्री नहीं तो मुझे मुंह खोलने की क्या फालतू की गरज पड़ी थी. इसलिए कि पिछले दिनों भारतीय प्रदेशों पर अर्मत्य सेन और जां ड्रेज़ का विकास सम्बन्धी एक सर्वे पढ़ रहा था- और सर्वे के एक निबंध में उत्तर प्रदेश, और सामान्य तौर पर समूचे हिंदी प्रदेशों की भयावह दुर्दशा के पीछे स्त्रियों की अशिक्षा और घर से बाहर के सामाजिक सवालों में उनका हस्तक्षेप न करना उसकी मुख्य वजह बताया गया था. प्रत्यक्षा शिक्षित हैं, मगर पर दुख कातर हस्तक्षेप में मुंह काला करने आगे हम गए. क्यों गए? इसलिए नहीं गुस्सा हो रहे कि प्रत्यक्षा ने हमसे अपना झंडा उठाने का आग्रह किया, इसलिए कि सुबह-सुबह एक बेमतलब के पोस्ट पर ध्यान खिंचवाकर उसकी गंदगी दिखाने लगीं, और मैं पर गंदगी कातर, असामान्य आचरण करने लगा! गंद और गंदगी की जगह कहीं चार पैसा और चार दिल जोड़ने की व्यवहार-कुशलता में गया होता?
यह बात मुझे सचमुच लगती है कि औरतों का हित इसी में है कि वही बोलें. वह जितना अच्छा और आर्टिकुलेट बोल सकेंगी, उतना उनके समाज में आत्मसम्मान व तरक़्क़ी की गुंजाइश बनेगी. जितना कातर व इंट्रोवर्ट बनी रहेंगी, उतना ही वे हेंहें, ठेंठे वाली मूढ़ लंठई के उपहास व तिरस्कार का विषय बनी रहेंगी.
एक दूसरे जिस सत्य का यूं ही चलते-चलते साक्षात हो गया वह यह कि आप भारतीय समाज में किसी गुट के स्नेह से समृद्ध नहीं हैं, आगे-पीछे सत्रह लोगों को सेटियाये नहीं चल रहे हैं, तो वह ब्लॉगिंग हो, या ब्लॉग के बाहर का समाज, आपका उस समाज में होना, बने रहना, बात करना, मुंह खोलने की हिमाक़त करना सब अक्षम्य अपराध है. क्योंकि व्यवहार-कुशलता के पाठों में दीक्षित, यहां लोग आपकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने आगे नहीं आते. वह व्यवहार-कुशल बने रहकर, गोदी में हाथ धरे, चुप्पे-चुप्पे मुस्कराते रहते हैं, कि गुरु, अब देखें, बुढ़वा कैसे लंगी खाता है! वह सारा हाथ-पैर पटकना व्यक्ति को अपने अकेले अंधेरे में करना पड़ता है. व्यक्ति वह चुप रहकर ख़ामोशी से जीता है, या नंगई का सरदार होकर फैलने लगता है, चुनाव भले उसका हो, है वह हास्यास्पद ही.




