Monday, December 31, 2007

बकअप सुकु का न्‍यू ईयर फकअप सेलिब्रेशन..

हमारे अंतरंग चिरकुट मित्र सुकु पहले अकेले थे, एक अदद दोपहिया और एक अदद चुप रहनेवाली बीवी थी, सब गंदा-गंदा था मगर मोरओलेस कंट्रोलेबल गंदा था.. फिर जाने कैसे तो बीवी के पैर भारी हो गए, पीछे-पीछे एक सैंट्रो कार आ गई (बैंक-लोन की सहायता से), और उसके पीछे दो जुड़वां बेटे आ गए (बिना बैंक-लोन की सहायता के).. उसके बाद से, घंटा, ज़िंदगी जो है एकदम बदल गई है. टेंशनवाले मसलों पर तो टेंशन होता ही है, जो टेंशनवाले नहीं हैं उनपर भी होता है. जैसे अभी हो रहा है. टेंशन. कुछेक घंटे बचे हैं मगर
अभीतक साफ़ नहीं हो पा रहा न्‍यू ईयर सेलिब्रेट करना कैसे है! सुबह से दायें-बायें सत्रह फ़ोन किये, इल्‍लम से पूछा क्‍या प्‍लैनिंग क्‍या है? टिल्‍लम से पूछा अबे, तूलोक क्‍या कर रहे हो? बारह लोगों के कचर-मचर के बीच एटीएम से माल बाहर कर लाये, दारु तो कर ही लाये. टीवी के केबल उखाड़ लिया, कि कहीं ऐसा न हो कि साली सारी शाम टीवी से चिपके-चिपके- शेखर सुमनों व साज़ि‍द खानों के दो कौड़ी के चुटकुलों में फंसे-फंसे निकल जाये!.. मगर फिर चट केबल जोड़ भी लिया कि, स्‍साला, ऐसा न हो कि कुछ और हाथ न आये और अपन टीवी से भी हाथ धुलवा बैठें?..

ओह, कैसा हदस-हदस वाली टेंशन है. बदहवासी में पहले मिनट-मिनट और फिर घंटे पर घंटे निकले जा रहे हैं! पिछले तीन घंटों में इकलौता एक अच्‍छा काम यही हुआ है कि एक दूसरा चिरकुट दोस्‍त दारु पीकर ठुमका लगानेवाले गानों की सीडी दे गया है! सीडी सही है, माने प्रॉपरली बज रही है, मगर ससुर, ठुमका लगायेंगे किसके साथ? नये साल की भड़ैंती भी अपनी ही बीवी को लपेटे करेंगे तो घंटा जश्‍न जैसा फिर जश्‍न कहां? फिर सोसायटी में किसकी बीवी को लपेटने की कोशिश करें? कहीं बात फैलकर कुछ का कुछ हो गयी, बच्‍चों के बीच खुल गई, नेबर साहब फौज़दारी पर उतर आये तो? मगर इससे पहले ठुमका लगाने के लिए प्रॉपर जगह चाहिए, वह कहां है? पार्किंग लॉट के पास झाड़ी है उसका क्रियेटिव ठुमकई इस्‍तेमाल कर लें या पानी की टंकी वाली छत का? यार, किधर जायें, किसके साथ जायें, इतने सवाल थे और सोच-सोचकर सुकु बाबू का दिमाग़ सड़ रहा था. ऊपर से साले (बिना बैंक-लोन की सहायता से) ये दिल जलाते बच्‍चे! सुबह से चैन से नहीं बैठ रहे थे, और न बैठने दे रहे थे. सुकु की इच्‍छा हुई एक लात लगाकर जुड़वों को बाहर भेज दें. भेज दिया भी. फिर लगा पता नहीं बाहर बच्‍चे क्‍या गड़बड़ी करें, या वो न करें, बाहर ही जाने उनके साथ क्‍या गड़बड़ी कर दे, तो लात लगाकर बच्‍चों को वापस फिर अंदर भी कर लिया.. मगर इस प्रश्‍न का अब भी समाधान हाथ नहीं लग रहा था कि नया साल सेलिब्रेट कैसे करें..

मुझसे जैसा हमेशा होता है रहा नहीं गया, सुकु से कहा- यार, इतना टेंशनियाओ नहीं, तीन सौ तिरसठ दिन निकल गए, एक दिन घंटा बचा है, यह भी निकल जाएगा. सुकु फैलके बोले, अबे, चुप करो.. और हाथ छोड़ने लगे (पैर तो पहले से छोड़ रहे ही थे)!..

ओह, सुकु.. व्‍हाई, सुकु? बट व्‍हाई नॉट, सुकु?..


बाकी भाइयो.. व बहनो एटसेट्रा.. सबको तहेदिल व ऊपर-ऊपर.. नये साल की बधाईयां एटसेट्रा..

(इलस्‍ट्रेशन: नितिन, फोटोशॉप भड़ैंती: प्रसिंह)

नये वर्ष में आप जहां जा रहे हैं..

नये साल के सेलिब्रेशन की भागम-भाग है, और चूंकि अब समय काफी कम है, और भागनेवाले फ़ि‍लिम इंडस्‍ट्री के लोग हैं, उनके भागने के भदेस में भी एक अदा है.. अब क को लीजिए, वह सत्‍तर केजी वाले ह्यूज होल्‍डाल में अपना सारा फ़र और फटीग ठुंसवाते हुए तिबासेल भाग रही हैं. पूछे जाने पर कि, भई, इतना सारा सामान? ये सब तो ठीक, मगर ये तिबासेल है किधर.. तो मिस क के कुत्‍ते का जवाब था तिबासेल किधर है इज़ नॉट द प्‍वायंट. प्‍वायंट है पिछले वर्ष तिबासेल के ठीक बाहर मिस्‍सी के एक्‍स लव ने क पहुंचे इसके पहले ही अपने एक्‍स फ्लेम को किस्‍सी किया था. तो इस बार मिस क का इरादा है ठीक तिबासेल के सेंटरस्‍पॉट में वह अपने एक्‍स की आंखों में आंखें डालकर अपने कुत्‍ते को किस करेंगी.. और इस बार सिर्फ़ एक्‍स ही नहीं सारी दुनिया देख लेगी व्‍हाट मटिरियल शी इज़ मेड ऑव!..

फॉर न्‍यू ईयर सेलिब्रेशन आर इज़ गोईंग टू गोवा, लाइक ही हैज़ डन इन ऑल हिज़ एडॉलसेंट एंड मच्‍यूर्ड करियर. दिक्‍कत सिर्फ़ इतनी है कि इस बार सारे कुत्‍ते भी गोवा जा रहे हैं, लाइक दे हैव गॉन टू गोवा ऑल देयर एडॉलेसेंट एंड मच्‍यूर्ड लाईफ़! शायद यही वजह है कि कोई ब्‍लॉगर गोवा नहीं जा रहा. बग़दाद जाने की बात तो दूर, वह बिलासपुर भी नहीं जा रहा. लेकिन एसआर के जन्‍नत जाने की ख़बर है. दरअसल वह मय मन्‍नत अपने समूचे तामे-झामे के साथ मायामी जा रहे हैं. एंड करन, बिकॉज़ ही वुड फील वेरी लोनली विदाऊट एसआर, देयर इज़ अ स्‍ट्रॉंग पॉसिबिलिटी ऑव हिज़ ऑल्‍सो पिकिंग अ फ्लाईट एंड स्टिकिंग फॉर मायामी..

बट व्‍हाट ऑव राजेश, शम्‍मी एंड ओल्‍डेन जिलटेंडर? ऑर फॉर दैट मैटर अवर ओन एंड ओन्‍ली गोलविंदा? आर देम, ऑर हि, गोईंग एनीव्‍हेयर? आला रे, आला रे, बट जाला रे व्‍हेयर? ओह, लाइफ़ इज़ सो गोल-गोल, क्रूड एंड क्रुएल, दैट वॉंटिंग सो-सो मच्‍च एंड फाइंडिंग सो-सो लिटिल कैन बी ब्‍लेसिंग एंड ए किक ऑन द एस एट द सेम टाईम. यकीन न हो तो गो एंड आस्‍क गोलविंदा.. एंड प्‍लीज़ बी जुबिलेंट एंड चीयरफुल एज़ द होल इंडस्‍ट्री वुड बी फ्लाइंग अब्रोड, एंड इट वॉंट्स यू टू स्‍टे हियर, इन द इंडि-पिंडी एंड बी जस्‍ट हैप्‍पी बिकॉज़ यू लव इंडिया एंड कांट एक्‍चुअली गो एनीव्‍हेयर...

Saturday, December 29, 2007

इतनी ब्‍लॉगिंग ठेलकर आप क्‍या साबित करना चाहते हैं?..

आदमी (या औरत) अपने को बर्दाश्‍त करते रहने के सिवा और क्‍या-क्‍या बर्दाश्‍त कर सकता है? माने एक सवाल है आदमी (या औरत) ब्‍लॉग कब तक झेलता रह सकता (या सकती) है? मेरी दाढ़ी की ही तरह आखिर हर चीज़ की एक उम्र होती है, नहीं होती? (नहीं, मैं बेनज़ीर की समझदारी की उम्र की नहीं बात कर रहा. वॉज़ शी रियली सेन एनफ़ टू रिटर्न टू पाकिस्‍तान? अबॉव दैट, देन, मूव अराऊंड इन पब्लिक? कुडंट शी कंडक्‍ट द होल ‘एफ’ इलेक्‍शन बाई स्‍टेइंग इनसाईड सम पैलेस एज़ स्‍टेट गेस्‍ट? ये सारे सवाल मेरे लिए उसी तरह रहस्‍य हैं जैसे प्राचीन पाली या अभिषेक बच्‍चनों-से रिटार्डेड्स पर उमड़ती आपकी लड़ि‍याहटें..). एनीवे, पाकिस्‍तानी डेमोक्रेसी के जो ब्‍लॉक्‍स हैं वह पाकिस्‍तान सेटल करेगा मगर ब्‍लॉग का सवाल तो हमारा- मेरा.. गुजर रहे साल के अंत और नये की शुरुआत का सवाल है. क्‍या अगले वर्ष भी मैं यूं ही पतनशीलता के हाथ (और पैर) चलाता रहूंगा? और आप हें-हें, ठें-ठें करते (या नहीं करते) रहेंगे? डज़ंट इट साऊंड एब्‍सर्ड? वेल, टू मी इट सर्टेनली डज़! हर चीज़ की उम्र के साथ एक हद भी होती है. आदमी (या औरत) आखिर कितने वक़्त तक ‘ओहो, ब्‍लॉग!’, ‘अहा, ब्‍लॉग!’ करते हुए एक्‍साईट रह सकता है? और बावजूद ऐसी चिरकुटइयों के आदमी (या औरत) बना रह सकता है? इस देश में सब जानते हैं सब संभव है मगर क्‍या ब्‍लॉगवर्ल्‍ड में भी वही सब रिपीट होगा? कि लोग कचर-कचर करते रहेंगे और बात निकलेगी तो कहीं दूर तक नहीं ही जायेगी?

कितने सारे सवाल हैं और ब्‍लॉग में जो है कहीं किसी का जवाब नहीं है. ब्‍लॉग के बाहर भी कहां है. दोस्‍त, समाज, साहित्‍य, गली हर कहीं ठुल्‍ला-ठेलईगिरी छाई हुई है. कोई सही सवाल पोज़ नहीं कर रहा. पोज़ कर भी रहा है तो जवाब के लिए बगले झांक रहा है या मेरे तीन वर्ष पहले लिखे पोस्‍ट का संदर्भ क्‍वोट कर रहा है. हद है. भई, जब तीन वर्ष पहले मैं इतना फालतू नहीं ही था कि ब्‍लॉगिंग करता बैठूं तो मेरे तीन वर्षीय पोस्‍ट को संदर्भित करने का क्‍या तुक है? हर वक़्त मुंह बजाते रहने और की-बोर्ड टिपियाते रहने का भी है? क्‍या हम कुछ समय के लिए चुप नहीं रह सकते? क्‍या पोस्‍ट दर पोस्‍ट लिखते हुए ही दर्शाया जा सकता है कि हम कितने बड़े चिरकुट हैं, चुप रहकर भी तो हिंदी समाज में इस लक्ष्‍य की प्राप्ति होती रही है?..

मैं बाज आया, सचमुच. नये वर्ष में (किसी भी सूरत में.. चाहे कहीं से हरे पत्र प्राप्‍त हों चाहे प्रेमसने पत्र!) वे सब चूतियापे नहीं करने हैं जो कंप्‍यूटर के मुंह से पोस्‍टरूपी पीक थुकलवाती रहे! एनफ़ इज़ एनफ़! भाई (या बहन), आप अपने घोड़े (या खच्‍चर) मज़े में दौड़ाते रहो पर अपन अपने बैल को ज़रा आराम देने का इरादा रखते हैं.. !

Thursday, December 27, 2007

किस रास्‍ते, कौन पगडंडी..


किसी सुलझे-दुनियादार घोड़े से पूछूं, किस सफ़र के आख़ि‍र में मिल जायेगी शांति, जानता होगा मेरे सुख का राज़? या इतिहास से साबूत रह गयी रंग खोयी कोई डोंगी जो करवायेगी पार सभी मुश्किल, घनघोर रात? महीन सुबह की कोमलता में कौन संकेत पढ़कर किस पगडंडी कौन रास्‍ते निकल चलूं कि चमकते आकाश के नीचे मिले ज़रा निर्दोष ज़मीन का टुकड़ा?

नर्मदा तीरे क्‍या बुदबुदाते हैं बाबा, सचमुच गुल खिलायेगा गंडा? या वैष्‍णो देवी के रास्‍ते क्‍या ज़ाहिर कर देना चाहती है उस बदहाल कुली की मुस्‍कान? ओह, मराकेश के कहवाघर में पढ़े जा रहे अख़बार में छिपा है मेरे सुख का भेद, या आर्मेनिया के किसी निर्जन गांव के बदरंग गिरिजाघर की निपट ख़ामोशी में? उत्‍तर-पूर्व का वह लड़का बार-बार क्‍यों मुस्‍कराता है, पिघलते मोम की तरह धीमे-धीमे चांदनी क्‍यों मेरे पलकों पर जलती उतरती जाती है? जंगली एक हाथी हंसता पत्‍तागोभी के खेत में भागता है, एक नन्‍हा साही मेरे किताबों के झोले से सिर बाहर निकाल हैरत से झांकता है.



Wednesday, December 26, 2007

लाइफ़बाय की टिकिया, कि कड़ुआ तेल?..

प्रेमी जो अपने को अबतक प्रेमी समझने की गलती किये हुए था (हमेशा करता रहा था, और शायद इसीलिए, दूसरों के लिए ही नहीं, लड़की तक के लिए हास्‍यास्‍पद था. लड़की- जिसके घर का नाम शारदा वर्मा था- अपने को प्रेमिका महसूस अवश्‍य करती थी, किंतु नितांत दूसरे महीन, मुलायम व लुभावने संदर्भों में. गुलकी बुआ की शादी के दौरान दूसरे माले के भंडारे के अंधेरे में तथाकथित प्रेमी के जोर-जबर्जस्‍ती के समक्ष एक अप्रीतिकर दैहिक प्रसंग जो लड़की ने स्‍वेच्‍छा से घट जाने दिया था, सिर्फ़ उसी बिना पर वह सुरती खाने व हवाई चप्‍पल धारण करनेवाले किसी बिंदेश्‍वरी को अपना सर्वस्‍व मानने से पूरी तरह इंकार करती थी. ऐसा शारदा ने उसे नमकीन चाय पिला और बेनमकवाली तरकारी खिलाकर ज़ाहिर करने की कोशिश की भी, लेकिन प्रेमी ने इन निर्मम संकेतों को मीठा चरणामृत समझ पी लिया, और मदहोशी पर ज़रा भी आंच आने नहीं दी.. प्रेमिका के रसीले खेल मान सांकेतिकता के नये मुहावरों में सज्जित, संजोये रखा). शारदा के बड़े भाई विष्‍णुप्रताप के लिए ‘बिंदेसरी’ प्रेमी नहीं वह थैली था जिससे उसकी उपस्थिति में सुरती झड़ती, या जिसे रास्‍ते में कहीं रोककर उसकी साइकिल उधार ली जा सकती. विष्‍णुप्रताप से छोटे अजयप्रताप के लिए ‘बिन्‍नेसर’ प्रेमी कम वह जरिया ज़्यादा थे जिसका खुद के पास पैसों के अभाव में सिनेमा देखने के मौके पर ‘संगी-सहोदरता’ के नाम से बड़प्‍पन से इस्‍तेमाल होता आया और किया जाता रहा है.

तथाकथित प्रेमिका शारदा के विवाह में रुकावट को तथाकथित प्रेमी बिंदेश्‍वरी अपनी नौकरी में रुकावट से जोड़कर देखते थे. यही वजह है कि आसनसोल जिंक डिपो में काफी खींचतान के बाद किसी तरह तेईस सौ की नौकरी हाथ लगने के अनंतर पहली छुट्टी में वह बेहद आशान्वित गुलाबी शर्ट में प्रेमिका के सम्मुख उपस्थित हुए, और प्रेमिका के नयनों में किसी भी तरह के गुलाबीत्‍व के अभाव में किंचित उद्वेलित व व्‍यग्रमना होने भी लगे. समय से पूर्व विदाई लेकर प्रेमिका को प्रताड़ि‍त कर रहे हों के अंदाज़ में झोले में सामान ठूंसते कातर-से स्‍वर में प्रार्थना की- इतनी दूर से आया मगर.. ओह.. क्‍या उम्‍मीद लेकर.. अब कुछ दोगी तुम?..

शारदा के स्‍वर की भावना प्रेमी-प्रेमिका संवाद से ज़्यादा सामनेवाले कमरे में टेलीविज़न पर चल रहे नाटकीय अंत से वंचित रह जाने के झल्‍लाहट में नहायी हुई थी. उसने उसी चिढ़े स्‍वर में कहा- कौनची मांग रहे हैं? सफर बास्‍ते साबुन का टिकिया? कि कंपौंडर वाला शीशी में थोड़ा कड़ुआ तेल डालके दे दें, कान में गिरा लीजिएगा कि हमरा बात का ठीक-ठीक अर्थ बूझ सकें! एकदम्‍मे कइसा थेथर अमदी है, जी!

पेट, लड़की और भूख..

- अबे, ठेल-ठेलके खाओगे, कुत्‍ते की मौत मरोगे!

- न ठेलके न खाकर कुत्‍ते की मौत न मरेंगे?

- संशयग्रस्‍त कुत्‍ता-विमर्श, प्राचीन चीन संग्रहणी, भाग: तीन, खंड: सात.

लड़के को गोद में रोते बच्‍चे को चुप कराने के खेल से हमेशा भय रहा लेकिन लड़की छोटी थी जभी से फूले पेट पर हाथ फेरते हुए गर्व से आसपास के संसार को देखने का अरमान पाले थी. और अंतत:, बीस वर्ष बाद, अब जब अरमान लगभग पूरा होने के कगार पर था, ढेरों ऐसी चीज़ें थीं जो लड़की में संशय जगा रही थीं. बैलून की तरह फूलते जाते अपने देह को बिछौने से उतारने और बिछौने पर लिटाने में उसे घबराहट होती कि वह उसका अनिष्‍ट कर डालेगी. बहुत सारे अनिष्‍टों की आशंका में वह भरी-भरी भुरभुराती रहती. मगर इन सब दुविधाओं से ऊपर सबसे बड़ी चिंता थी वह अपनी क्षुधा कैसे शांत करे. लड़का भी काम से घबराया घर लौटता कि कहीं लड़की भूख से कातर छटपटायी तो नहीं बैठी हुई!

धीरे-धीरे सेब कुतरती (सेब के बाद संतरे की फांक, और उसके अनंतर काजू के टुकड़े, फिर गाजर का हलवा, फिर..) लड़की सोचती क्‍या ऐसा कोई क्षण होगा जब वह भूख को पार पा लेगी? मगर कहां पा पाती. जहां कहीं जाती, बेहया व नंगी भूख वहां पहले ही पहुंची होती. धीमे-धीमे डोलते देह वह लड़के के लिए नाश्‍ता तैयार करती और चिंता करने लगती लेकिन दोपहर के खाने का क्‍या? नहाने के लिए जाते हुए बिस्‍कुट साथ लेकर जाने का मन होता. ज़रा-सा सुस्‍ताने के लिए लेटी हुई लड़की को मन होता बाजू में केले का हौदा होता तो वह छील-छीलकर केला खा लेती. या इमरती या लड्डुओं की तश्‍तरी? लड़का रात को बगल में लेटा मज़ाक करता नींद न लगे तो मुझे जगा लेना. ऐसा न हो सुबह उठूं और कनपटी पर कान न हो.

- क्‍यों कान न हो?- लड़की सवाल करती.

- इसलिए कि भूख से रात में कुतरकर तुम हजम कर चुकी होंगी! हंसते हुए लड़का लड़की को छेड़ता. लड़की बुरा मानके कहती- अच्‍छा तो मैं राक्षस हूं? और क्‍या-क्‍या खाके तुम्‍हारा हजम कर जाऊंगी वो सब भी बता दो ज़रा?

- भई, कुछ भी खा सकती हो, लड़का हथेली पर पेंसिल बजाता चेहरा गंभीर बनाकर कहता- कुर्सी, कपड़े, तकिया, जूते, घड़ी, हैंगर, परदे..

लड़की फूले हुए मुंह को और फुलाकर बुरा मान लेने का अभिनय करती दूसरे करवट हो लेती. दूसरे करवट आंखें मूंदे गंभीरता से सोचती यह सब खा लेने पर उसकी क्षुधा शांत हो जायेगी?..

Saturday, December 22, 2007

शूटिंग के दौरान एक फ़ि‍ल्‍मकार का आत्‍ममंथन..

जब नहीं थी जीवन में कितना अंधेरा था. टिना या संयुक्‍ता नहीं, शूटिंग, मैन (टिना या संयुक्‍ता अब भी कहां हैं?).. दस बजे तक सामनेवाले कमरे में दोनों लौंडे आकर बैठ जाते (पहला तो असित मगर इस दूसरे का क्‍या नाम था? पहली बार मिलने आया था, कहा था.. आपसे बहुत कुछ सीखना चाहता हूं, सर! आजकल किस फ़ि‍ल्‍म पर काम कर रहे हैं? ‘तेरे मेरे’? हां, हां, ‘मुंबई मिरर’ में मैंने रिपोर्ट पढ़ी थी.. वो नहीं बना रहे? दूसरी स्क्रिप्‍ट पर काम कर रहे हैं? ओ, हाऊ लकी ऑफ मी.. आपके साथ स्क्रिप्‍ट भी सीखने को मिलेगा! क्‍या सॉफ्टवेयर यूज़ करते हैं, सर? मेरे पास फाईनल ड्राफ्ट का एक पाईरेटेड वर्ज़न है, आई कैन गेट इट फॉर यू, सर!). निकर पहने, लबर-झबर डोलता मैं जांघ और सिर खुजाता सुबह ओरियेंट करने की कोशिश करता. ओह, व्‍हॉट ए हेडेक.. कल रात क्‍यों इतनी पी ली थी! चेतन की फ़ि‍ल्‍म भी शुरू हो गई. सिर्फ़ मेरी नहीं शुरू हो रही. बट इट विल! अनिल ने प्रॉमिस किया है! दैट कपूर चैप वॉज़ ऑल्‍सो सेइंग साथ में एक फ़ि‍ल्‍म करते हैं.. करेंगे, करेंगे, जल्‍दी करेंगे.. बट व्हिच वन? इतनी सारी कहानियां हैं खुदी को याद नहीं रहता कि किस वाली कहानी की बात हो रही है! एम आई गेटिंग ओल्‍ड ऑर व्‍हाट? लेकिन कपूर के साथ कौन हिरोईन काम करेगी? मेरे साथ ही कौन करेगी? ओह, व्‍हाट ए लोनली लाईफ माईन हैज़ बिकम.. फॉरगेट अबाऊट पिंचिंग एंड ऑल, नोबडी इवन फ्लर्ट्स! द लाईफ इज़ रियली हेल व्‍हेन यू आर नॉट शूटिंग, वेल, व्‍हेन आई एम नॉट शूटिंग!

शूटिंग शुरू होते ही सब कितना ड्रास्टिकली बदल गया है. नो मोर स्‍क्रैचिंग ऑफ थाइस. पिपल हैव बिकम सो नाइस. (वेल, दे हैव टू. अदरवाइस एक-एक की बांस कर दूंगा..) पार्टिकुलरली गर्ल्‍स. दे डोंट माइंड माई टेलिंग देम डर्टी जोक्‍स. दे एंड अप इवन गिगलिंग! इन दिनों नींद भी ठीक से आ रही है. सर्कुलेशन इज़ प्रिटी फ़ाईन. सुबह उठने के बाद सोचने का लफड़ा भी नहीं रहता कि आज क्‍या करें.. बट व्‍हाट इज़ बिकमिंग ऑफ द फ़ि‍ल्‍म? इज़ इट गोइंग एनीव्‍हेयर? कल झाड़ी के पास कटिंग पीते हुए (हू वॉज़ दैट बास्‍टर्ड?) कौन कह रहा था कहानी एकदम डिब्‍बा है? आई जस्‍ट कंट्रोल्‍ड माईसेल्‍फ.. अदरवाइज़ आई कुड हैव किल्‍ड दैट मदर.. लेकिन, ओनेस्‍टली, फ़ि‍ल्‍म कहीं जा रही है? कहानी में थोड़े-बहुत लोचे तो हैं.. कहानी जैसी कहानी साली है कहां?.. सात करोड़ उड़ा देने के बाद ये सवाल अब सोच रहा हूं? फ़ि‍ल्‍म फ्लोर पे लाने के पहले नहीं सोच सकता था? कैसे सोचता? इतना सोचता बैठा होता तो फ़ि‍ल्‍म फ्लोर पर आती नहीं दैट्स ए फैक्‍ट. लास्‍ट फ़ि‍ल्‍म में भी कहां सोचा था मगर फ़ि‍ल्‍म चली कि नहीं? मुंबई मिरर ने थ्री एंड हाफ स्‍टार दिया! अब्‍बास सेड इट वॉज़ माई बेस्‍ट टिल डेट. नेहा जोसेफ़ मेंशन्‍ड इट वॉज़ बिगनिंग ऑफ ए न्‍यू एरा इन इंडियन फिल्‍ममेकिंग!


ओह, इट्स ऑल राइट. कहानी के बारे में इतना सोचकर मैं अब क्‍या उखाड़ूंगा. इफ अनिल सेंसेस कहानी में लोचा है ही विल स्‍टार्ट हिज़ टैन्‍ट्रम्‍स. फ़ि‍ल्‍म फिर खत्‍म ही नहीं होगी! कैन आई अफॉर्ड दैट? एंड आई एम नॉट एनीवे कंसिडर्ड कंवेशनल स्‍टोरी टेलर, आई शुड स्टिक टू दैट पर्सोना! अबे, फ़ि‍ल्‍म खत्‍म हो जाये किसी तरह.. आई एम ऑल्‍रेडी फ़ीलिंग सो टायर्ड एंड बर्न्‍टआऊट! बट हू इज़ दैट गर्ल?..

Thursday, December 20, 2007

लोग भूल गए हैं..

लोग भूल गए हैं. कम से कम मैं तो रहा ही हूं. अब जैसे आज ही देखिए, क्‍या नाम है उनका.. देखिए, भूल रहा हूं, शिकायत करने लगे कि क्‍या महाराज, आजकल कमेंट-वमेंट नहीं करते? मैंने कहा- यार, और कुछ नहीं, बस भूला हुआ हूं. आज यूं ही टहल करने की गरज से निकला, एक ब्‍लॉग की खिड़की खुली, देखकर भुनभुनाहट हुई कि यह सब क्‍या चिरकुटई लिखी जा रही है. झल्‍लाहट में ऐसा ही कुछ कमेंट लिखने जा रहा था कि नज़र गई कि ससुर, यह तो अपना ही ब्‍लॉग है! सचमुच भूल रहा हूं. सिर्फ़ पुरानी चि‍ट्ठि‍यां ही नहीं हैं, एक समूचा जीवन है जो हाथ से सरका-खिसका जा रहा है! और भाई लोग हैं अपने कमेंट को रो रहे हैं! कुछ शरम करो, यार. शरम नहीं रहम ही करो!

मगर इस भूले हुए से क्‍या कुछ का क्‍या कुछ लिख गया तो? इस कैंप से उस कैंप की हेरा-फेरी हो गई तब? जैसलमेर से कोई पत्र लिखकर कहे बड़ी विचारप्रवण, प्रवर और जाने क्‍या-क्‍या अर लिखा आपने, मन में उमंगों की तरंगें उठने लगीं, हिलोर झकझोर भरने लगे आदि-इत्‍यादि तब? फिर मैं अपना इतना-सा मुंह लेकर किधर जाऊंगा? या जितना-सा भी है लेकर कहीं नहीं भी कैसे जाऊंगा? क्‍यों भूल रहा हूं? क्‍या उम्र पीछे से आकर हाथ मार रही है? अपना अकाउंट नंबर और पासवर्ड तो याद है लेकिन? और हाल के महीनों और तेईस वर्ष पहले जहां-जहां और जिस-जिसने लंगी लगाई थी, वह भी? तब? क्‍या यह भूलना सिर्फ़ ब्‍लॉगकेंद्रित, ब्‍लॉगसीमांकित है? ऐसा किसने क्‍या लिख दिया और मैंने पढ़ लिया कि स्‍मृति इस हिंसा व वीभत्‍सता से हाथ-पैर छोड़ने लगी? कौन लोग हैं जो इस तरह तोड़फोड़ फैला रहे हैं? पहले से ही लतियाये हुए मुझ-से निष्‍पाप को सता रहे हैं?


ओह, दुनिया किस तेजी से बदल रही है. क्‍यों बदल रही है? अभी वर्ष भर भी तो नहीं हुआ हमें आये हुए और क्‍या से क्‍या हो गया (किस बेवफ़ा के प्‍यार में?). मैं भूलना नहीं चाहता, रियली. लेकिन रहा हूं.. इट्स ए फैक्‍ट.. क्‍या? आपने क्‍या नाम बताया अपना?

सादा जीवन उच्‍च विचार.. हू सेड सो? एंड व्‍हाई?

किस चिरकुट ने यह स्‍लोगन दिया था? माने देने के पहले भविष्‍य की एक तस्‍वीर तो बनायी होती, एक मर्तबा सोचा होता समाज में सादा जीवन कितना हास्‍यास्‍पद हो जायेगा? उच्‍च विचार तो देने के वक़्त भी रहा होगा. इस देश में हमेशा से रहा है. गरीब मुल्‍क में लोगों के हाई प्रोटिन के नारे से एक्‍साईट होने की बात समझ में आती है लेकिन हाई थॉट की बात से एक्‍साईट होंगे? क्‍यों होंगे, भाई? हाई थॉट को खाकर देह में प्रॉटिन आयेगी? जिस किसी भले (या बुरे, जैसी भी नीयत का) आदमी ने उछाला था, स्‍लोगन उछालने के पहले इन संभावनाओं पर विचार किया था? किसी थिंक टैंक की राय ली थी, ऐड एजेंसी की सर्वे और पॉलिंग का सहारा लिया था दैट वन इज़ पिचिंग द राईट स्‍टफ इन राईट डायरेक्‍शन? मुझे नहीं लगता. आपको भी नहीं लगता होगा. किसी उल्‍लू को ही आज सादा जीवन की बात चुपचाप कफ़ सिरप की तरह पिलाई जा सकती है. वह पी भी लेगा बिकॉज़ दैट्स व्‍हाई ही हैपेंस टू बी ए उल्‍लू! उल्‍लू बसते भले पेड़ पर हों चलते भेड़ की चाल हैं. भेड़ की चाल चलेंगे और सादा जीवन के ख़तरनाक़ गड्ढों को देखने से रह जायेंगे. वर्ना आज दस तरह के लोनों से घिरा हुआ, नाक और अपनी नज़रों तक में गिरा हुआ कौन आदमी है जो पैरेलली सादा जीवन के गड्ढे में गिरने के अरमान रखता हो? उच्‍च विचार की तो मत ही पूछिये. उच्‍च विचार रखकर वह इस पॉलिसी और उस स्‍कीम का क्‍या करेगा? ये पॉलिसी और वो स्‍कीम क्‍या करेंगी? सोसायटी की बिल्डिंग का सिक्‍योरिटी गार्ड भी बिविल्‍डरमेंट के अटके लिफ्ट में उलझ जायेगा. आप ज़्यादा सादा जीवन का नमूना बनने की कोशिश करें तो हो सकता है आपको बिल्डिंग में अंदर आने घुसने से रोक दे!


सादा जीवन उच्‍च विचार. व्‍हॉट ए न्‍युसेंस. अबॅव ऑल ए बिग नॉनसेंस! किस दुनिया में रहकर लोगों को ऐसे खुराफातों का ख़्याल आता था? किसी दुनिया में रहते भी थे या नहीं? सादा शादी तक के आईडिया से तो लोग आज अफ़्फ़ और आह् करने लगें और यहां पूरे जीवन के ही सादा होने का प्रस्‍ताव रखा जा रहा है! एज़ इफ यू विल से एंड वी विल एक्‍सेप्‍ट एंड अप्रीसियेट इट! ओह, जस्‍ट शट्अप. सादा व्‍हॉट? एंड सादा व्‍हॉई?

गिव अस उच्‍च जीवन एंड सादा विचार. दैट मेक्‍स मोर सेंस. फॉर टाईम बीइंग एट लिस्‍ट. कौन जानता है. हो सकता है कल को सादा विचार को भी लात लगाने की इच्‍छा जोर मारने लगे?

सौ चूहे खाकर बिल्‍ली पतनशील हज पर चली..

सेंचुरी सेलीब्रेट करने की अपने यहां परंपरा रही है. ज़्यादा गिरे हुए पचास पहुंचते ही थाली, कलछुल पीटना शुरू कर देते हैं. मैंने नहीं पीटा. सौ पहुंचकर भी नहीं पीटा. जेनुइन पतनशील लीक की स्‍थापना नहीं होती. लोग कहते (माने वही गिने हुए आठ) कि देखो, अपने को पतनशील लगाते थे और इतनी-सी बात पर (माने सौ पहुंचने पर) फुदकने लगे (फिसलने लगे. हें हें हें) ! सही बात है. फिर यूं भी मैं प्रगतिशील लोगों के मुंह नहीं लगना चाहता. उलझना नहीं चाहता.

हालांकि निर्दोष-सी इच्‍छा थी कि पतनशीलता आंदोलन बने, सालाना न सही छमाही गौहाटी, गजपुर में कैंप लगें, सभापतित्‍व पाकर व असमी सुकुमारियों के कर-कमलों से गले में माला वारकर, उनके मीठे बोझ हाथों में धारकर उन्‍हें उपकृत करूं. वह सब नहीं हुआ. हिमाचल और पंजाब की रहने दें, राजस्‍थान पुलिस भी हमें नहीं खोज रही! लंदन, जोहानेसबर्ग की क्‍या कहें, बिहार शरीफ विश्‍वविद्यालय तक ने अपने अंडर ग्रेजुएट कोर्स में पतनशील साहित्‍य नहीं चढ़ाया है, न हमसे पैसा खाके चढ़ाने को सोच रही है. न इस विशेष मद में पैसा खिलाने को लोगों ने हमारे एकाउंट में पैसा पूल किया है. पतनशीलता के जो थोड़े बहुत हाफ़-हार्टेड कन्‍फ़्यूज़्ड, डिसओरियेंटेड प्रहरी थे, नौकरियों ने उनका ख़ून जलाकर उन्‍हें यू भी किसी काम का नहीं रखा है. ऑथेंटिक पतनशील तो नहीं ही रखा है. फिर इन भाईयों को अभी भी इसका भय है कि पतनशील पोस्‍टर पर इनके मुख-राशि का कटआऊट फबेगा या नहीं? अबे, इसी दो कौड़ी आंतरप्रेनुअरशिप के बूते पतनशीलता को आगे बढ़ाने, ठेलने का सपना देख रहे थे? हद है, अनामदास, यू बिट्रेड मी, मैन! या तो आप जेनुइनली अनोनिमस रहो या फिर अपने को पतनशील मत कहो!


पतनशीलता की ज़रा-सी कहीं रोशनी नहीं ऐसे में आदमी क्‍या खाक़ सेलीब्रेट करे? किसके बूते करे? अभय जैसों रेनेगेड्स को लाईन में खड़ा करके करे? यू टू, रवीश, फॉर वन्‍स यू कुड हैव बीन जेनुइनली रबिश? लेकिन अब तक प्रगतिशीलता की पूंछ थामे ऐसों के लिए अभी गुजरात के सिवा और कहीं कुछ कहां दिख रहा है? मैं और पतनशील आंदोलन तो नहीं ही दिख रहे. ओह, इट ब्रेक्‍स माई हार्ट! ऐसे में क्‍या लिखूं, किस चीज़ से लिखूं? मगर शुद्ध एक पंक्ति न लिख सकनेवाले जहां दिन में बाईस पंक्तियां लिख रहे हैं, मैं चुप बैठा रहूं? एक बैलेड की भूमिका तक न लिखूं? एक ऑथेंटिक पतनशील म्‍यू‍ज़ि‍कल की ओपेनिंग? व्‍हॉट डू यू सजेस्‍ट, अभय? देखिए, ऐसी नाज़ुक घड़ी में अपना नाम सुनकर इस व्‍यक्ति का चेहरा कैसा सफ़ेद-ज़र्द पड़ गया? ओह, डोंट बी सच ए पुट ऑन, बी ए मैन, मान! ओके, लेडीज़, मिस प्र, आप ही बताओ! व्‍हॉट? व्‍हॉट इज़ द पॉयंट, दे आर ऑल इल्लिटरेट? भई, एज़ इफ़ आई डोंट अंडरस्‍टैंड, भई, ऐसा चिरकुटी अंधेरा है इसीलिए तो इस डार्न डार्कनेस में पतनशीलता की जोत जलानी है? यू डोंट अग्री? फ़ाईन, यू मिस बी, वोंट यू रेकमेंड सम अमेजिंग जेसुदास नंबर टू चियर अप द ओकेज़न? ‘आज जाने की ज़ि‍द ना करो, यूं ही पहलू में बैठे रहो..’ ? हे, हे, लेडी, हाऊ द अरब वाईरसेस हैव इन्‍फेक्‍टेड एंड अफेक्‍टेड यूअर इमैजिनेशन.. यू आर मिक्सिंग फनी फ़रीदा ख़ानम विद जेनुइन जेसुदास? ओह, हाऊ हार्ट रेंचिंग!..

अबे, यारो, नथिंग टू सेलीब्रेट द सेंचुरी दैन? ओके, आई एंड अप विद् ए पीस ऑव माई ओन. नथिंग लेस दैन ए जुएल ऑफ ए पतनशील पोयम (लात नहीं खानी तो जस्‍ट एक्‍सेप्‍ट एंड अप्रीसियेट इट!)..

लिखो, लिखो, लिखो. दिन के बीच दिन के बाहर लिखो. सुबह लिखो सुबह को तोड़कर लिखो, जब नहीं हो समय जोड़कर लिखो. घोड़े घड़ी घमंडी पर लिखो, बचा रह जाये तो दालमंडी पर लिखो. चंडी चिरकुंडी ‘हाय, यहीं तो रखा था, नहीं मिल रहा, जी?’ की खोयी हुई दंडी पर लिखो. सोचते हुए सोचने के पहले, नींद में दबे हुए खुद से पके हुए थकी अकुलाहट में, अलबलाहट में लिखो. अ- ल- ब- ल लिखो लिखो. मुंह में लार हो बथता कपार हो सपने में सियार हो, अंतत: सिरे से सिरे तक खालिस चिरकुट व्‍यौपार हो, बीच में लाज मत लाओ बाज मती आओ, लिखो, ठेलकर लिखो.

Monday, December 17, 2007

जिसके बिना काम नहीं चलता..

ऐसी लिस्‍ट नहीं बनायी है, हालांकि जब भी ऐसे मौके बने हैं तब आम तौर पर हुआ यह है कि लिस्‍ट ही हमें बनाती-सी लगती हैं! लिस्‍ट में हम कुछ हसरतों-सा ठेलने लगते हैं. माने कि वर्ष में दो बार पैरिस और तीन बार काहिरा गए से काम चलेगा, या क्‍या दो हज़ार पाउंड किसी यात्रा-खर्च के लिए पर्याप्‍त होंगे टाइप. फिर अडिशन-सब्‍स्‍ट्रेक्‍शन के झमेले. या फिर कुछ ऐसे मद जो खुद लिस्‍ट में ठिलने लगते हैं. मसलन सोनाली या बर्नाली का हुंकारी के स्‍वर में सवाल करना कि हम? हमारे बिना चल जाएगा? काम? तुमि की पूरा-पुरी कॉ‍न्फिडेंट? ऐं, की बोलछो की?..

तो फिर लिस्‍ट तैयार करने का मज़ा क्‍या! एडवेंचर से ज़्यादा वह भय की तस्‍वीर बनने लगती है. ऐसे ही सोच लेना ज़्यादा सुकूनदेह है कि किसके बिना चलेगा किसके बिना नहीं. सोनाली-बर्नाली सवाल करें तो जवाब देने की नहीं बस मुस्‍कराने की ज़रूरत पड़ती है. आप अपना मतलब कन्‍वे कर दें, वह अपना आकलन गेस करके अकुलाती-लड़ि‍याती रहें. लात-हाथ या प्रेम के अन्‍य मार्मिक क्रिया-व्‍यापारों की नौबत नहीं आती. दिन शांत बना रहता है. आदमी तसल्‍ली से सोचता रह सकता है कि किसके बिना चलेगा, किसके बिना नहीं चल पाएगा. सुबह उठकर नहाने, बाबा मार्क्‍स का एक और पंडित राहुल सांस्‍कृत्‍यायन के तीन निबंधों के परायण के बिना? आपका मालूम नहीं, मेरा चल जाता है. सोचता था नहीं चलेगा लेकिन देख रहा हूं इन दिनों पेपर के परायण के बिना भी चल जा रहा है (सोनाली-बर्नाली तो नाराज़ हैं ही कि पूरे तीन दिन उनसे व्‍यौहार-मनुहार के बिना मैंने खींच लिया है. बेचारी-सुकुमारी-मारी बड़ी ही खिंची-खिंची-सी हैं. मैं भी तना-तना-सा हूं, वर्ना नदी के द्वीप के भर्र-भर्र नाला हो जाने में ज़रा वक़्त नहीं लगेगा. लगेगा?)..


कलम? कागज़? क्‍या ज़रुरत है? आदमी को लिखने के लिए एक अदद चेकबुक से अलग किसी दूसरे कागज़ की क्‍यों ज़रुरत होनी चाहिए? मुझे नहीं लगता होनी चाहिए. हवाई चप्‍पल? चप्‍पल, जहाज़, योजनाएं जिस-जिसके पहले हवा और हवाई का जुड़ाव होता हो, मेरे ख्‍़याल में ज़रूरी हैं. नहीं हैं? सपनों की? नहीं. सपने गलत हैं. जैसा वक़्त है ये आसानी से स्‍वप्‍न दु:स्‍वप्‍न में बदल सकते हैं. हर सूरत में उनसे बचने की ज़रुरत है. तकिये? तकियों के बिना नहीं चल सकता. तकिये तो चाहियें. तीन-चार. ज़्यादा हों तो भी चलेंगी. पसलियों के पीछे, कांख के नीचे. पैरों के बीच. कहीं भी फंसाकर अच्‍छा लगता है. आपको नहीं लगता? अरे? आपके-हमारे बीच एक तकिया तक नहीं, फिर हमारे बीच है क्‍या? वेरी सरप्राइज़िंग. रियली! क्‍योंकि कमेंट्स के बिना मैं दिन बिता लेने की सोच सकता हूं, तकियों के बिना नहीं (कमेंट्स न पाकर अंतत: मैं स्‍वयं को क्‍वेश्‍चन कहां, आपकी समझ व सोच-सामर्थ्‍य को करता हूं)..

यूं ही कमेंट्स की बात निकलवाकर आपने मेरी सोच का क्रम गड़बड़ा दिया. बखूबी मेरा इस गड़बड़ाये क्रम के बिना काम चल सकता था! अब? क्‍या कहने को बचा है सिवाय इसके कि मेरी याद में आप नय्यरा नूर की उदासी गायें, मैं राय कूडर और मानुएल गालबान बजाऊं. ओह.




Saturday, December 15, 2007

सुगंधी इन द लैंड ऑफ सुख

सुगंधी किस्‍मतवाली है. जीवन में जो चाहा, पाया. बाकी सहेलियां इस टिल्‍ले कस्‍बे उस मरगिल्‍ले शहर गईं, सुगंधी व्‍याह कर टोक्‍नो गई. सपनों के देश में सपनों का शहर टोक्‍नो. बचपन से सुगंधी लोगों को बातें करते सुनती- ऐसा टोक्‍नो, ओह, क्‍या कमाल की जगह. ताली बजाओ तो ये हो जाये, आंख नचाओ तो वो! खूब-खूब बातें करते रहते लोग. सपना देखते, योजना बनाते. जा नहीं पाते. सुगंधी पहुंच गई थी. बिना आंख नचाये. बिना ऊपर-नीचे आये. जैसे उसकी किस्‍मत में टोक्‍नो नहीं, टोक्‍नो की किस्‍मत में वह लिखी थी. ओह, टोक्‍नो. उफ़्फ़, टोक्‍नो!

कार में पति सुगंधी का हाथ भींचे हैरत से टोक्‍नो को तकता रहा- ओह, कैन यू बिलीव इट, वी रियली मेड इट? ओ गॉड, वी आर हियर! जबकि सुगंधी टोक्‍नो की बजाय पति को तकती रही. सोचती तबसे हाथ दबाये क्‍या ज़ाहिर करना चाहता है. हाथ छोड़ दे तो मैं कौन चीज़ दबाकर क्‍या ज़ाहिर करुंगी. पति इतना उछल रहा है सोचकर सुगंधी भी कार में जितना फुदकना था, फुदकती रही. सुखी टोक्‍नो में सुखी पति की सुखी सुगंधी. सुखी नौकरी, सुखी घर, सुखी पड़ोस, सब सुखी सुखी सुखी.

सुख का पहला दिन बीता. दूसरा, तीसरा फिर कितने तो सुख के दिन बीत गए. नींद का गड़बड़ाया क्रम दुरुस्‍त हो गया, पति के तनावग्रस्‍त पेट की पेचिश पटरी पर आ गई, सुगंधी ने रसोई में अपने मसाले और अपना लक्ष्‍मी-गणेश सेट कर लिया. टोक्‍नो में इस चीज़ के लिये ये और उस चीज़ के लिए वो की फेहरिस्‍त बनाकर फ़्रि‍ज पर चिपका ली और तीन बार जम्‍हाई लेकर सुखी हो गई. तभी सुख का ऊबाऊ, उदास क्रम टूटा. माने जीवन के मामूली अनोखेपने का हस्‍तक्षेप हुआ.


बात यह हुई कि दो दिन पहले दफ़्तर की किसी गैदरिंग में पतिराज कोई दावत दबाकर लौटे थे. और लौटने के बाद से घंटे-घंटे भर पर वही ‘ओह, व्‍हाट फुड द बगर्स इट हियर. कांट टेल यू अबाऊट द डैम ब्रोकोल्‍ली!’ का रेकर्ड बजाते रहते. सुन-सुनकर सुगंधी के कानों को सुख तो नहीं ही हो रहा था. तीसरे दिन पति मियां घर से निकलकर नौकरी गए, और सुगंधी सुपरस्‍टोर गई ‘डैम ब्रोकोल्‍ली’ हथियाने.

शाम को पतिलाल खाने पर बैठे तो खाने के सुखी मेज़ पर रसम था, अप्‍पम, टिक्‍कम, बक्‍कम था और थी मसाले में तर, ऊपर से नीचे खर्र-खर्र ब्रोकोल्‍ली बोगांजा! चहकती हुई सुगंधी के लाड़ में पति ने मुंह में रखा तो गले में कहीं कुछ बिगड़ा, ब्रेक हुआ. आंखें फैलाकर बोले- देयर सीम्‍स टू बी समथिंग रॉंग समव्‍हेयर विद् ब्रोकोल्‍ली, सुगंधी? सुगंधी ने चम्‍मच से पति के मुंह में नया कौर ठेला, चहककर बोली- नो रॉंग. एवरीथिंग फाईन, फाईन. बेस्‍टमबेस्‍ट, राजा!

पति के बाद अपने मुंह में पहला निवाला रखने के बाद सुगंधी समझी इट वॉज़ नॉट सो. डैम ब्रोकोल्‍ली वहीं मेज़ पर थूक दिया. कुडंट स्‍टैंड दैट डैम थिंग वन मोर टाईम!

बट अदरवाइस इट वॉज़ आल सुख एंड सुखेस्‍टेमसुख इन टोक्‍नो, एंड सुगंधी कुडंट आस्‍क फॉर मोर.

Friday, December 14, 2007

थोड़ी तार्किकता, थोड़ी गप की चाशनी में आदत..

(खूंटे से बंधे खेलते, खड़कते भूपेन के लिए)

ग़लत धारणा है कि आदत अंगद का पांव है विकराल है गरीब की गरीबी है एक बार आकर फिर साथ नहीं छोड़ती. जो ऐसा कहते हैं उन्‍होंने आदत को जिया है, ज़िंदगी जीने से रह गए. सच पूछिये आदत सोलह साल के उमर की वह भूखी-भटकी हवस है जो ज़रा-सा धीरज और समझदार दुलार से बड़े आराम से पटरी पर लौट आती है. मध्‍यवर्ग का ऊलजुलूल पोपली नैतिकता का फलसफ़ा है जो ज़रा-सी बात पे हांकता है बेबात की कांखता है मगर आड़े वक़्त चार लात खाकर दुम दबाकर सबसे पहले भागता है. आदत हव्‍वा नहीं है. आदत के खौफ़ में मरने की ज़रूरत नहीं, बेचारी कमज़ोर, मासूम-सी सिगरेट की डंडी है उंगलियों में कांपती है, एक ज़िंदगी से ज़्यादा कहां कुछ मांगती है.

धरातल का ज़रा-सा फर्क़..

एक

- फिर?..

- फिर क्‍या?

- इतने दिनों बाद मिल रहे हो और देखो ज़रा खुश तक नहीं हो!

- हूं.. जितना हो सकता हूं.. सच्‍ची.

- क्‍या बात क्‍या हुई? फिर चिट्ठी आई है.. कि मकान-मालिक.. नहीं, आंसुओं में डूबी चार सौ पन्‍नों की किताब पढ़ ली? या रात भर आवारा टहलते रहे, दुनिया-जहान.. मेरे बारे में- सब नयी राय बना ली?

- ऐसा क्‍यों कहती हो..

- तो कैसे कहूं.. तुम खुद तो कुछ कहोगे नहीं? कभी-कभी लगता है तुमसे बात नहीं करती दीवार पर सिर मारती रहती हूं!

- दीवार पर सिर तो मेरा है!.. सारा समय.. इतने शब्‍द.. कहां जाते हैं, कहीं जाते हैं?.. फिर भी रोज़ टाईपराइटर पर बैठ जाता हूं.. जैसे कितनी कहानियां कहनी हैं.. कुछ नहीं कहना मुझे.. किसकी कहानी जानता हूं? अपनी कहानी तक मैं नहीं जानता!



दो

- What is wrong, lady, you look down?

- Nay.. I am all right.

- You are?

- Hmm, tell you so.

- Yeah?

- Yes.

- Well, I thought I might offer some help. A word or two of some advice..

- No need. I’ll get by. Thanks anyway for your kindness, sweetheart.

- Fine, if you need anything, you know where to get me.

- I do.

- Can’t see that expression on your face. I’d rather you cry your heart out on my shoulder.

- I appreciate your concern. You’re a darling.

- I know that.

Thursday, December 13, 2007

माधुरी लौटी वह नहीं लौटा..

माधुरी घर लौट आई थी. दूसरे दिन गली के छोर पर माधुरी के स्‍वागत में ‘आजा नचले’ का गाना स्‍पीकर पर नहीं बज रहा था, लेकिन अपने अचानक भाग जाने पर माधुरी गली को जिस शर्म, खीझ और गुस्‍से में भरा छोड़ गई थी, वह उसके उसी तरह अचानक लौट आने पर नदारद था. माधुरी के भाई प्रकाश ने दोस्‍तों के बीच कांपते हुए कहा था माधुरी और उसका यार हाथ आ जायें तो वह अपने हाथों तेल डालकर उन्‍हें आग के हवाले कर देगा! अब जबकि माधुरी लौट आई थी प्रकाश ने तेल और माचिस का एक बार जिक्र भी नहीं किया था. हाथ का रिमोट हाथ में धरे माधुरी के पिता टीवी के सामने जकड़े बैठे रहे जैसे टीवी बंद करना उनके लिए नामुमकिन हो गया हो, और टीवी के बंद करते ही घर में कोई भयानक विस्‍फोट होगा और सबकुछ चिथड़े-चिथड़े कर देगा. जबकि उस रात या उसके बादवाली सुबह भी ऐसा कुछ नहीं हुआ. भीतर के कमरे में माधुरी की मां अलबत्‍ता रोने लगी मानो गांव किसी नज़दीकी रिश्‍तेदार की लंबी बीमारी के बाद मरने की अभी-अभी खबर पायी हो. पलंग के सिरहाने मां से ज़रा दूर माधुरी रोयी नहीं, चुपचाप सिर झुकाये बैठी रही. दरवाज़े के परदे से लगे मीनाक्षी और रजत बड़ी बहन को खौफ़ और हैरत में भरे तकते रहे. मीनाक्षी के लिए विश्‍वास करना मुश्किल था कि इतने पर भी दीदी ज़िंदा है. घर में बैठे रहना असंभव हो जाने पर प्रकाश एकदम-से उठकर बाहर चला गया.

इस तस्‍वीर की सन्‍न कर देनेवाली ख़ामोशी से अलग माधुरी के ‘यार’ के घर की तस्‍वीर ज़रा अलहदा थी. बहुत ज्यादा शोर हल्‍ला-गुल्‍ला था. जान लेने की बातें हो रही थीं. बद्दुआ उछाले जा रहे थे. ईश्‍वर को कोसा जा रहा था जिसने उस नीच लड़की की नहीं, सड़क दुर्घटना में उनके बेटे को लील लिया था.

सुबह-सुबह सुख में नहायी हुई खुशी..

“Life has more imagination than we have, you know.”
- The Lady Next Door, Francois Truffaut.
“If he doesn’t know where else to go in his spare time, why did he say he wanted to go to India? I went to India and I didn’t even want to go. I walked in Bombay and I saw nothing but hot little men and women who really didn’t know where to go.”
- Here Comes, There Goes, You Know Who, William Saroyan.

अट्ठारह रुपये के घिसे गमछा में गीला हाथ पोंछते, तंबाकू और पान से खराब दांतों का प्रदर्शन करते राधेमोहन खुश हैं. ऐसी कोई ख़ास वजह नहीं. सुबह नित्‍यकर्म के लिए न केवल सपरकर एकांत मिल गया था, बैठने को साफ़-सुथरी जगह भी मिल गयी थी. फिर बाल्‍टी लेकर सूखे कुएं के बाजू के निगम के नल पर दौड़े गए तो वहां भी एक-दूसरे की जान लेने की जगह हंसी-खुशी का माहौल था. औरतें आपस में झोंटा खींचने की बजाय पटीदारी की बहनों की तरह पेश आ रही थीं. दैया की मां ने सास के काम के लिए पंचाग देखने की बात उठाई. आधे घंटे में पंडितजी से आकर मिलने का आग्रह किया. बिना स्‍नान किये, बिना शिवलिंग पर जल चढ़ाये इस तरह जजमानी का रजिस्‍टर खुलता देख राधेमोहन को बलिया से चक्रधरपुर आकर बाबूजी के साथ बिताये अपने अप्रेंटिसशिप के पुराने दिनों की भावुक याद हो आई. बाबूजी की साइकिल के पीछे बैठकर इस जजमान के यहां से उस जजमान के यहां भागने के कैसे व्‍यस्‍त, कमाऊ दिन थे. कितनी जल्‍दी राधेमोहन के हाथ उनकी अपनी एक अलग साइकिल आ गई थी.. मगर बाबूजी के गुजर जाने पर कितनी ही जल्‍दी सब बदल भी गया था!

दैया की मां को मुस्‍कराकर साढ़े दस बजे तक आने की बात से मनवाकर राधेमोहन जल्‍दी-जल्‍दी देह पर कांसे के टुटही लोटे से पानी उलीचने लगे. दैया की मां को बताने की ज़रूरत नहीं हुई कि घर में आटा चुक गया है, पत्‍नी के हल्‍ले के जवाब में उन्‍हें मेन बाज़ार जाकर बोरी ढो के लानी है. दैया की मां ने पलटकर देरी का अपना रोना भी नहीं रोया. राधेमोहन सूखी धोती चढ़ाकर अभी गमछा धो रहे थे कि गंजेड़ी सोमारू ने पीछे से आकर दो बार जैराम किया.

मंदिर से लगे पीपल के नीचे आज हमेशा की तरह आवारा कुत्‍तों का जमाव नहीं था. न साइकिल चोरी गई थी न साइकिल पर चढ़ा भारी चेन. दीवार पर पाथे गोईंठों के साथ भी किसी ने हरमपना नहीं किया था. न मंदिर की सीढ़ि‍यों पर कोई कुत्‍ता पखाना करके गया था. पूजा करके घर लौटे तो पत्‍नी जाने कहां से थाली में तिलकुट, मुढ़ी और गुड़ निकालकर धूप में खटोला खींचकर उस पर रख रही थी.

बिना पत्‍नी के गाली-गलौज के राधेमोहन चुप्‍पे-चुप्‍पे नाश्‍ता ही नहीं कर लिए, बेटी पायल बाहर आई तो सिर्फ़ थाली वापस लेने नहीं आयी थी, ‘पापाजी’ के लिए हाथ के स्‍टील के गिलास में चाय लेकर आयी थी. बाप को चाय देते हुए लड़की ने स्‍कूल के किसी खर्चे या कापी-कागज़ का जिक्र नहीं किया.

खटोले से थोड़ी दूर पर मर्तबान में मूली और गाजर के अचार को सूखता देख राधेमोहन अपनी गृहस्‍थी की व्‍यवस्‍था से प्रसन्‍न हुए. आंगन की छोटी-सी हरियाली भी आज कुछ ज्यादा ही हरी-हरी दिख रही थी. अघाहट के संतोष से एक भरी-पूरी डकार छूटी. टूटे कप में अपना चाय सुड़कती पत्‍नी ने सवाल किया- कौन बात है आज बड़ा खुश हैं?

फटी मगर धुली हुई गंजी पर कुर्ता चढ़ाते हुए राधेमोहन सिर्फ़ मुस्‍कराये, जवाब नहीं दिया.

Wednesday, December 12, 2007

मिठास से लबरेज़ एक गाना..

- मिठास है?

- हम्‍म.. देखने की नज़र चाहिए.. फिर तुम्‍हारी आंखों पर तो इतना मोटा चश्‍मा चढ़ा है!

- इसीलिए कि सारी उम्र आंखें फाड़-फाड़के देखने की कोशिश करता रहा.. सब तरह के लोगों के बीच घूमके रायशुमारी की.. मगर मिला क्‍या? हमारी तो जहां तक नज़र जाती है अंधेरा ही अंधेरा दिखता है..

- आपके साथ बड़ी दिक्‍कत है, अबु तालेब, आप पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं लेकिन खुदा के रसूख में आपका यकीन नहीं..

- आह्, अब यही बाकी था.. और?..

- उस बच्‍ची से क्‍या सीखा आपने? कभी ऊंची आवाज़ बात नहीं करती, कभी किसी ने शिकायत करते नहीं सुना..

- किसकी बात करती हो?

- जिस पर ज़रा भी आपकी मनहूसियत की छांह नहीं पड़ी.. सउद.. आपकी बेटी..

- आह्, एक तुम हो और दूसरी वो.. जाने किस परात में तुम औरतें खाना खाती हो कि इतनी उम्‍मीदबर बनी रहती हो..

- ज़िंदगी बहुत हसीन है, तालेब साहब, रोज़-बरोज़ के छोटे वाक़यों में ख़ून जलाकर हम खुदा की कैसी बंदगी करते हैं? इंसान की तहजीब, उसकी नेकदिली का कैसा इंसाफ़ करते हैं..


- रहने दो अपना फलसफ़ा, और जल्‍दी से कॉफ़ी का एक प्‍याला पिलाओ..

- तब से आपकी हुज़ूर में ही तो लगी हूं.. लीजिए, संभालिए अपना प्‍याला और गाना सुनते हुए अपने आग और अंधेरे पर ठंडे पानी के छींटें छिड़किये!

- किसका कह रही हो, परवीन, कैसा गाना?

- वही जो सामी ने बाजे पे लगाया है

- (खिड़की से चेहरा बाहर निकालकर) नील यंग, चचा, यू विल लव इट!


बर्फ़ और सुबह..

ठंड. बरसात. बर्फ़. कीचड़. ठिठुरता नान लेकर घर लौटता बच्‍चा. शकूर की उखड़ी हुई दुकान पर फुसफुसाकर जिरह करते तीन बूढ़े. बाजे पर ओम कुलसुम का घिसा हुआ आदम के ज़माने का गाना. दुकान के अंदरूनी हिस्‍से में जवान बेटे को अकल की बात समझा-समझाकर हार रही शकूर की बेवा. सन् बासठ में उतारी गई शकूर और उसके छह बच्‍चोंवाले हंसते परिवार की फ़ोटो (जिनमें से चार अब दुनिया में नहीं). पुराने बक्‍से-असबाब. जर्मन मशीन-टूल का कंजास. अंग्रेज बिस्‍कुट का खाली खोखा. होंठों के ऊपर जाने कहां से उग आये बालों से लापरवाह उम ताबी चूल्‍हे पर पानी गर्म करने के बाद कॉफ़ी के तैयार होने की राह तकती. बाजू में कंबल में डेढ़ साल की बेटी नींद में भूली हुई. सड़क पार हज्‍जाम रामी की गुमटी के दरवाज़े पर पिछली रात के झगड़े की खुरचन. ख़ामोशी. वहशत. हमेशा की तरह धुले कपड़ों में नाके की चौकी पर संतरी के सवालों का बड़े सब्र से जवाब देते अबु हदी.


- जितना हाथ बढ़ाओगे उतने जूते खाओगे.. किसी के आगे हाथ फैलाने का क्‍या फ़ायदा, रफी मियां?

- मतलब घर में बंद बिला शिकायत कैद रहो, बच्‍चे पैदा करो और इंतज़ार करो कब ठंड खतम हो.. कब ज़िंदगी?

- एक बात कहूं, जनाब? सब आये यहां.. रोमंस आये, बाइजें‍टेनियंस, क्रुसेडर्स, तुर्क, अंग्रेज कौन नहीं आया यहां? आज कहां हैं सब? किसी का पता नहीं.. सब गायब हो गए.. सोवियत रूस कहां है? हवा हो गयी.. एक दिन सब गायब होते हैं.. चीजों के बदलने में बस एक उंगली भर की दरकार होती है, हां.. कोई हस्‍ती नहीं है.. बस खुदा-ताला की ही एक हस्‍ती है!

लाशों को दफ़नाकर अपने-अपने अंधेरों में अपने गुस्‍से व हार से जूझकर सोए पड़े सलेम, तालेब, माहेर, अयमान.

Tuesday, December 11, 2007

अ डिटेक्टिव म्‍यूजिकल..

हम जासूसी उपन्‍यास क्‍यों पढ़ते हैं, उन्‍हें क्‍लासिकी साहित्‍य का दर्जा मिलना चाहिए या नहीं जैसी जिरहों पर मैंने ढेरों लेख पढ़े हैं. बीच-बीच में अपने इस ‘गिल्‍टी प्‍लेज़र’ पर शर्म व ग्‍लानि भी हुई है.. मगर जैसे इंडियन मिडिल क्‍लास बहसों में समाज के विकास की ढेरों अवधारणायें पकाने-पचाने के बावजूद वास्‍तविक जीवन में अंतत: ठेले अपने ही विकास को रखता है, या जैसे प्रमोद सिंघ हैं सिगरेट के नुकसान की जिम्‍मेदार लिस्‍ट बनाते हुए होंठों में मगर केएन सिंह स्‍टाइल की सिगरेट झुलाते रहना नहीं भूलते, वैसे ही मेरा भी जासूसी उपन्‍यास पढ़ना कम भले हो गया हो, बंद नहीं हुआ है. जॉर्ज सिमेनॉन की कोई पुरानी जिल्‍द दिख जाये तो अब भी भावुक एकांत खोजने लगता हूं.

ढेरों लिखवैया हैं, सबकी अपनी-अपनी पसंद है, चूंकि हमारी पसंद को ज़रा ज़मीन से ऊपर चलने की आदत है तो हमने बचपन में भले इब्‍ने सफ़ी, कर्नल रंजीत, चेज़, पुज़ो –और फलना और ढिकना को तकिये के नीचे सजाया हो, अब आलमारी में नहीं सजाते. आलमारी में बेल्जियम के मॉडर्निस्‍ट सिमेनॉन मिलेंगे, और मिलेंगे हमारे चहेते इटली के दार्शनिक लियोनार्दो शाशा और स्‍पेन के वामपंथी जासूसंदाज़ मानुएल वास्‍क्‍वेज़ मॉंतलबान.

दिल्‍ली में यहां-वहां से जो किताबें उठायीं, एक किताब मॉंतलबान की भी थी, ‘व्‍युनोस आयरस क्विंटेट’. इन दिनों शुरू किया है. इधर-उधर से कुछ लाइनें टीप रहा हूं. छोटे-छोटे टीज़र्स समझिए. टांगो का अपना स्‍टॉक नहीं है, तो बैकग्राउंड के लिए बीच-बीच में दूसरी लड़ि‍यां टांक रहा हूं. संभल के पैर रखिएगा, देखिए, गिरें नहीं..


Welcome to Buenos Aires. We know you come here because Argentina is up for sale to foreigners. But it’s not only Japanese who are buying us: even the Spaniards are here, although Spain itself is for sale as well… We Argentines love people to take our watches, our sweethearts, our islands. So we can write tangos about it afterwards!

बत्तियातो का बेचारा मुल्‍क मेरा..



Marx said you only get to know a country when you’ve eaten its bread and drunk its wine.

पाओलो कोंते का समझदार सहकर्मी



As individuals we tend to forget the harm we do or that’s done to us. Why should it be any different for a society?

फ्रंचेस्‍को दे ग्रेगोरी का कप्‍तान साब की मांसपेशियां..



I’m more interested in the biological memory of the animals than in the historical one of men. What use is historical memory to us today?

ये आखिर का डेविड ग्रिसमैन का डाऊन होम वॉल्टज़‍, ब्‍लू ग्रास मैंडोलिन एक्‍स्‍ट्रावैगांजा से है. जितना ले सकते हैं, मज़ा लीजिए.



Monday, December 10, 2007

जो नहीं है उसे हममें ठेलने की कोशिश न करें!..

भारत बेहतर हो रहा है कहां-कहां हो रहा है? इकॉनमी के चार प्रतिशत क्षेत्र में?.. सर्विस सेक्‍टर में? बिहार का एक लड़का मिनमिनाये स्‍वर में कहता है बिहार में सड़कें बन रही हैं, विकास हो रहा है. जिन लोगों ने कभी नगद देखा नहीं था वो बैंक में अकाउंट खोल रहे हैं.. ज़्यादा अंदर पहुंच गए हैं, जो नहीं पहुंचे मॉल के बाहर टहल रहे हैं (कोई किताब खरीद रहा है? नहीं, हम किताब खरीदने और पढ़नेवाली संस्‍कृति नहीं हैं.. हम उपवास रखने और धर्म के नाम पर थुरा व थूर देनेवाली संस्‍कृति हैं.. हमरे इसके और उसके खिलाफ़ कुछ बोले, साले, तो देह की यहीं भुरकुस निकाल के रख देंगे, हां?).. हम नाला पार करके नाले के पिछवाड़े पिकनिक मनाके सुखी हो जानेवाली संस्‍कृति हैं.. एक दशक पहले तक इंजीनियरिंग और मेडिकल में जोंक की तरह क्‍लायंटेल से चूस-चूसकर शहर में सबसे जल्‍दी बड़ा मकान पीट लेनेवाली.. और अब सर्विस सेक्‍टर की इकॉनमी मैं पैसा खींच-खींच कर सबसे अलग बन जाने और वहीं बने रहने में गुमान महसूसने वाली संस्‍कृति हैं. खाने के स्‍पॉट्स बदल गए हैं, देह के कपड़ों के लेवल भी. घर का डेकॉर और घर के बाहर की गाड़ी. अंतर्मन का विस्‍तार, माथे की चिंता का परतदारपना.. विवेक की डेंसिटी? वह सब क्‍या होता है? उस सब के होने व हमारे उसमें होने की कोई आवश्‍यकता है? क्‍या अंतत: संसार से इस सारी बौद्धिकता का बाजा बजाकर उसे किसी रीसायकल बिन में डालकर हम उसे भूल जानेवाले नहीं?

क्‍या करेगा कोई भारतीय कार्ल लेवी स्‍त्रास, रोलां बार्थ, एरिक हॉब्‍सबाम, एडवर्द सईदों का? हमें दोपहर में दाबकर खाने और फिर सोने की आदत है. पढ़ने की मजबूरी ही होगी तो हम बैंकवाला कागज़ पढ़ने को पड़ा है. आपका पोस्‍ट पढ़ लिये इतने में ही सिर पिरा रहा है. लोकप्रिय लिबिर-सिबिर नहीं लिखना तो हिंदी में काहे लिखते हैं? हमारे हिंदी में ऐसा परायापन ठेलने की कोशिश न करिये.. हमारी संस्‍कृति में नहीं है.

कलकत्‍ते की हवा में सुबह-सुबह..

- का जी, आप तो कलकत्‍ता न जा रहे थे, जी? का हुआ, एत्‍ता जल्‍दी लौटके आइयो गये? कि घंटा, गइबे नय किये, ऐं?..

- रसोगुल्‍ला, खीरमोहन, चित्रकूट, सोंदेस.. ओह, कोलकाता!

- एगो बात बोलिए, सिंघजी.. कवनो पंडिजी से पंचांग देखाके पिलैनिंग कैंसिल कै लिये.. कि प्रियन्‍कर महराज अपना घर का केताब सब का लिस्‍ट भेजके आपको डिप्रेसन में भेज दिये? हें हें हें.. बोलिए न, ठाकुर साहेब, कौची कलकत्‍ता का मारग में आ गया, जी?

(चुप कर, थेथर ससुर! कलकत्‍ता निकल गए होते तो तुम नराधम से सुबह-सुबह इस स्‍नेहासिक्‍त संवाद का सुअवसर कहां आता? कहीं गली के मुहाने पर चुक्‍कड़ की छुटो चा पी रहे होते.. सिंघड़ा, काचोड़ीर गुन-ग्‍यानेर मोंदो-मोंदो सुगंधो पात्‍ताम, ना की? तोर बोकार मुख देखबार ओभिशाप थाकबे, स्‍साला!)

- सुने, साथ में एगो बीडियो कैमरा लेके जा रहे थे, प्रियन्‍कर जी पे डकूमेंट्री बनावे वाला थे का हो? कि सुचित्रा सेन पर.. कि कवनो हेराइन को ब्रेक देबे वाला रहे? बैकग्राउंड का म्‍यूजिक देते बाबू रशीद ख़ान? हें हें हें, का सिंघजी?..

(ओ टा कि थॉमस बेरनार्डेर नतून बोई ना कि?.. आर कि पोड़ा-सुना चोलछे एइ दिन?.. दीपशिखा, ऐसा क्‍यों है तुम्‍हारे शहर में कि हर चालीस कदम पर मिठाइयों की दुकान मिल जाती है, और बजाय इसके कि तुम कोशिश करो मैं सिर्फ़ तुम्‍हारी आंखों में देखता रहूं, तुम ऐसी स्थितियां बना रही हो कि मेरी आंखें भटक-भटककर मिठाइयों पर जा रही हैं? तुम ऐसी नहीं थीं, दी‍पशिखा.. तुम कितना बदल गई हो? मगर उतना नहीं बदली हो जैसे पुराणिक की तरह के लोग तुम्‍हें बदनाम करने के लिए लिख रहे हैं, येस, देयर इज़ अ टिंज ऑव ट्रूथ.. बट नॉट द होल ट्रूथ..)


- चल गये होते, महाराज.. कुछ सस्‍ता कुरता-टुरता कीनते? कालेज इस्‍ट्रीट का बोइ-बज़ार पर धावा बोलते.. बंगला लइकि-टइकि से मन में मोह-माया जगाते, हां, सिंघजी?..

(इस शहर की गलियों से यह क्‍या गंध छूटती है, दीपशिखा? और इन इकतल्‍ला पुराने मकानों की छत पर, देखो, अब भी कपड़े सूखते हैं? और वह तुम्‍हारा पुराना टेप रिकॉडर्र, एखनो आछे ना कि? तुम्‍हें याद है अनिरबन की शादी में बाबुन घोषाल के हेमंग दा वाला गाना गाने पर तुमने क्‍या कहा था? लाल किनारे की पीली साड़ी में किस तरह तुम्‍हारा चेहरा तमकने लगा था? उस शाम मोयना दी के घर तभी हमने तय किया था कुछ दिनों के लिए ये शहर छोड़ देंगे.. इस शहर की चिक्-चिक्.. शाम बाज़ार की शामें.. भागकर रांची चले जायेंगे.. या दक्षिण में कहीं, कनो स्‍मृति आछे?)

- कभी कुच्‍छो साधते हैं कि खाली खयालिये पुलाव जीमते रहेंगे, सिंघजी.. अरे, बोलिये न, महाराज?

(बोलेंगे नहीं, अब लात चलायेंगे, ससुर!.. आमाय खोमा कोरो, शिखा, खूब मोन छीलो जे, किंतु आशते पारी ना.. कतो कारोन.. किंतु एखन की बोलबो, गो!)

Sunday, December 9, 2007

हंसमुखलाल के दु:ख के कारुणिक चित्र..

आज हंसने और हंसानेवाले आदमी की स्‍वागत-संगत में दस-बारह बंबईया बिलागर इकट्ठा हुए. हालांकि बोधिसत्‍व बीच-बीच में चुटकुले सुनाने का न केवल बहाने खोजते रहे, बल्कि पाते भी रहे.. मगर चूंकि वहां मेरे जैसा लटके मुंह वाला व्‍यक्ति भी उपस्थित था, रहते-रहते समीर लाल के चेहरे पर भी मुर्दनी तैर जाती. हालांकि मेरे चेहरे के लटकने की, समीर लाल से मिलने की मजबूरी से अलग, अन्‍य वजहें भी थीं.. ख़ैर, अभी उन्‍हें यहां गिनाने का यह मौका नहीं है. फ़ि‍लहाल आप आज के लटके चेहरों और सहमी मुस्‍कराहटों के क्‍लोज़अप्‍स देखिए, वह किस्‍सा बाद में कभी..

पहले वह आदमी जिसकी वजह से यह सारा तमाशा हुआ. देखिए, पहुंचते ही हंसना शुरू कर दिया!



युनूस और अनीताजी हैरत में.. ऐसे भला कोई करता है.. बेबात हंसता है? सरेआम?..



अनिल सिंह और अभय भी सभ्‍यता के तकाज़े में चुप हैं.. अलबत्‍ता किसी भी क्षण हाथापाई हो सकती है!



मैंने कहा तस्‍वीर काली-सफ़ेद कर दूंगा, तब जाके हंसी उड़ी..



इस पर शशि सिंह मुझे घूरकर देखने लगे कि मेहमान का सारा ज़ि‍म्‍मा मेरा है, बिहारी होके हंसी उड़वाइएगा?



शशि फिर ज़मीन देखने लगे जबकि अनिता कुमार त्रासदी पर नज़र रखने की जगह, कैमरे पर नज़र रखे थीं. औरतों से और उम्‍मीद क्‍या जा सकती है?



युनूस मियां इस पर मुस्‍कराने लगे..



अनिल सिंह पोज़ देने..



और अभय दांत दिखाने..



विमल को सूझ नहीं रहा था कि अभी कोई चुटकुला सुनायें या गाना..



मैंने डांटकर कहा अबे, करूं तुमलोग की फ़ोटा काली-सफ़ेद?.. एकदम से दोनों पटरी पर आ गए..



पटरी पर बोधिसत्‍व नहीं आये, अलबत्‍ता आने की लगातार सोचते रहे..



विकास डर कर कैमरे की बजाय आसमान की ओर देखने लगा..



समीर लाल ने हर्ष त्‍याग हर्षवर्द्धन का सहारा लिया..



ओह.. कितना ड्रामा.. अभी आपका मन नहीं भरा तो नीचे रीड मोर पर क्लिक करें, अभी और हैं..


हारे हुए हंसमुख लाल..



फिर कैमरे की ओर देखतीं अनिता कुमार..



जाने कौन बात की फुदकन में चहके हुए शशि और विमल लाल..



मन ही मन अलबत्‍ता देखो, कइसे मुदित हैं.. ओह..



बेशर्मों और बेशर्मी का एक बेमिसाल क्षण..


Saturday, December 8, 2007

बात क्‍या है जानते हो, सीताकांत?

क्‍या है जानते हो, सीताकांत? बातें, बातें, बहुत सारी बातें बोलकर क्‍या होता है कुछ नहीं होता? चक्राकार घूमते रहते हैं (भारतीय दर्शन में भी प्रवृति है. यह भी सही, वह भी सही), घूमकर थक जाने पर ज़रा सुस्‍ताके फिर बोलने लगते हैं. घूमकर अंत नहीं होता चलती चली जाती हैं बातें मगर जाती कहां हैं, सीताकांत? मैं नहीं कहता कि हर विचार का सामान्‍यीकरण करें लेकिन नहीं लगता तुम्‍हें कि चर्चा की शुरुआत, मध्‍य और अंत होना चाहिए? दर्शन की पुरानी लीक में कुछ नये मूल्‍यों का भी समावेश होना चाहिए? अनादिकालता की अमूर्तता में सामयिकता की चिंताओं का पुट? दार्शनिकता की टेक का नहीं फिर मतलब क्‍या होगा, नहीं, खुद बोलो तुम?

विचार को सीमित करने की बात नहीं है, मित्र, न स्‍थूलता का मेरा आग्रह है. लेकिन जीवन की लय और रोमान को बातों में मिलाये बिना हम बात कहां ले जायेंगे. चार दिन बाद फिर यही चिंता होगी, चार दिन बाद फिर कोई और या मैं यही गाना गायेंगे. तुम ऐसे सुलझे, तीक्ष्‍णबुद्धि, विचारवान हो मगर इस पर सोचते नहीं हो ताज्‍जुब होता है. गुस्‍से में नहीं हूं न कातरता है, विनम्र निवेदन है, एक बार विचार करो, मित्र सीताकांत?

Friday, December 7, 2007

ए सर्टेन एम्बिग्‍युटी..

कैमरे के व्‍यूफाइंडर में वह आईना दिख रहा है जिसमें व्‍यूफाइंडर से आईने पर नज़र गड़ाये मैं खुद को देख रहा हूं.. इस आशिंक दिखने के देखने को प्रसन्‍नता नहीं है.. निठल्‍लेपने के अलग-अलग क्षणों में बेचैनी उस ख़ास दिखने को देख लेने की है जो मेरे निज की जानी हुई पहचान को कैप्‍चर कर ले.. बट विल दैट बी पॉसिबल? इज़ पॉसिबल? निज की जानी हुई पहचान का अमूर्तन क्‍या एक फ़ोटो में मूर्त रूप पा सकता है? एक नौसिखिये की ऊलजुलूल उधेड़बुनी खुराफाती बेचैन हरक़तों में? आई क्लिक सम मोर स्‍नैप्‍स डिसजोंयेटेडली एंड वंडर.. लेकिन सुबह-सुबह क्लिक-क्लिक करते हुए सिर्फ़ यही नहीं है जो सोच रहा हूं..

चौदहवीं सदी के बेरगमो के उस बादशाह के असमंजस का भी ख़्याल है जिसने फिरेंज़े के एक पहुंचे हुए व्‍यवसायी से पूरब का मलमल खरीदा है, और आईने में अपनी गुलाबी नयी धज देखता दुविधा में है कि सामंतों का साथ निभाने की पुरानी परिपाटी निभाता चले, या तेज़ी से अमीर हो रहे व्‍यवसाइयों पर अपने अजाने भविष्‍य का सब दांव पर लगा दे!.. पिता के दाहिने पैर के काले, मुर्दा पड़ गए नाखून की याद करता हूं. क्लिक-क्लिक. मैं दीप्ति से कहता इफ यू गो ऑन लुकिंग एट समथिंग फ़ॉर प्रिटी गुड लेंग्‍थ ऑव टाईम, यू विल गेट टू द हार्ट ऑव इट्स एसेंस. वह पलटकर जवाब देती- ऑन द कंट्रररी, इफ यू कीप लुकिंग एट द सेम डैम थिंग, यू लूज़ सेंस ऑव ऑल पर्सपेक्टिव! क्लिक-क्लिक. ओह, व्‍हाई गेटिंग अ सिंपल, प्रॉपर स्‍नैप इज़ सच एन इम्‍पॉसिबिलिटी? लाइक अराइविंग एट अ डिसिज़न कि कल कलकत्‍ता जा रहा हूं या नहीं. माने जा तो रहा ही हूं इन द सेंस कि टिकट कटवा लिया है, कपड़े धुलवा लिया हैं, किताबें और झोला और बाकी दंद-फंद सजा लिया है. बट इन माई हार्ट ऑव हार्ट आई एम नॉट कंविंस्‍ड व्‍हेदर आई कैन मेक इट इन माई प्रेज़ेंट स्‍टेट ऑव बीइंग, गुड ऑर बैड व्‍हॉटेवर? सो इन अ सेंस मैं कल कलकत्‍ता जा रहा हूं. क्लिक-क्लिक. मगर कलकत्‍ता पहुंचकर थकान और एक कटा-पिटापन ही जीना है तो जा क्‍यों रहा हूं इन द फ़र्स्‍ट प्‍लेस? लोग ऐसे ही नहीं कहते (लोगों से ज़्यादा मैं कहता हूं) कि लाइफ़ इज़ फुल ऑव फ़नी एंड स्‍ट्रेंज एम्बिग्‍युटिज़..

Thursday, December 6, 2007

हाऊ यू डुईंग, फ्रेंड?..

किताबों की मीनार एक ख़ास एंगल में टिकी हुई हैं. ज़रा-सी उंगली लगी कि समूची मीनार भरभराकर गिर सकती है. मन में इस वेग से ख़्याल के आते ही आदमी बाहर निकली उंगली पीछे खींच लेता है. कॉरीडोर से कोई औरत गुजरी है. मुड़ी गर्दन के पलक झपकते में उसके वस्‍त्र, बालों और गाल की झलकी भर दिखी, हालांकि उसके सैंडल के आवाज़ अभी भी गायब नहीं हुए हैं. जैसे अस्‍पताल के भारी शीशे वाले दरवाज़े के पार मशीन व तारों में घिरे दानिश का हाल समझना असंभव था, लेकिन वह गायब नहीं हुआ था. आदमी के हाथ बरबस अपने सेल फ़ोन पर चले गए थे.. कि वह दानिश का नंबर घुमाकर पता कर ले वह सचमुच गायब हुआ है या नहीं.. दूर कहीं किसी मोटर या मशीन की आवाज़ आ रही थी. शहर में फिर कोई नया मशीनी तत्‍व जुड़ रहा होगा.. या हट रहा होगा?.. क्‍या आदमी शहर के बारे में कभी एक वाजिब, साबुत-सा निबन्‍ध लिख सकेगा? एवर? क्‍लीन एंड क्‍लीयर?

आसमान में हवाई जहाज नीची होती हुई ऊंची इमारतों के पीछे से गायब हो जाएगी.. हवाई जहाज के गायब हो जाने के बाद भी कुछ वक़्त तक उसकी आवाज़ बनी रहेगी.. आवाज़ के छोटे-छोटे टुकड़े आसमान से इमारतों की छत पर गिरेंगे. एक फकीर कहेगा मैं सब देख रहा हूं. एक बूढ़ी औरत शिकायत करेगी कि उसकी खराब दांतों का कोई इलाज नहीं करा रहा.

पर्कुलेटर में कॉफ़ी का उबाल आएगा. एक गौरेया बेमतलब खिड़की की मुंडेर पर आकर बेचैनी से दायें-बायें गर्दन हिलायेगी. टीवी पर मोनिका बेलुच्‍ची वाले विज्ञापन के बाद अफग़ानिस्‍तान के गरीब बच्‍चे दिखेंगे.

हिंदी का एक मूर्ख लड़का एक मूर्ख हिंदी पत्रिका के मूर्ख संपादक को ज़ि‍द में पत्र लिखेगा कि उसकी कविता के खिलाफ़ जो मूर्ख आलोचना पत्रिका के ताज़ा अंक में छपी है, उसमें कविता के वास्‍तविक मर्म को समझा नहीं गया है. पड़ोस के बरामदे में बाहर से आई एक कस्‍बाई लड़की की हंसी हिंदी के मूर्ख लड़के को उसकी मूर्खता में डिस्‍टैक्‍ट कर देगी.. मोहल्‍ले की गली में एक सब्‍जीवाला आवाज़ देगा.. बाजू के किसी घर में दीवार पर हथौड़े की ठकठकाहट बजने लगेगी..

दानिश के जीवन के अभी भी ढेरों उलझे वर्ष बचे होंगे..

ममान, मैं तुमसे बहुत नाराज़ हूं..

मिश्री में घुली किसी फ्रेंच औरत की ललाबाई का पुराना, घिसा रेकर्ड था जो बज रहा था. भारी रजाई के अंधेरे में ललाबाई की धीमी तानों को तैरता सुनते हुए मेरा रोने का मन करने लगा. एकदम-से रजाई से चेहरा बाहर निकालकर मैंने चिल्‍लाकर ममा को इत्तिला की- फेर में मत रहना कि मौसा फ्रांसुआ या लाबेल काका की तरह मैं बैंकर बनूंगा, मैं नर्स बनूंगा, हां. बड़ा होके वही करूंगा जिससे मुझे खुशी हो! नर्स, नर्स, नर्स!

सामने आना मारिया का बिछौना बनाती हुई ममा ने जवाब नहीं दिया. चुपचाप चादर की सलवटें दुरुस्‍त करती रही. मैं ख़ौफ से भर गया कि कहीं ऐसा न हो, ममा मेरी ओर पलटे तो उसके चेहरे पर एक भीनी, दबी हुई मुस्‍कान खिंची हो, मानो मौसा फ्रांसुआ की तरह उसे भी मेरी भविष्‍य संबंधी अपने बारे में राय बनाने की बात फिजूल लगती हो, और उनकी तरह वह भी मानती हो मैं चाहे जितनी भी बकबक करूं, होगा वही जो पापा और उनके करीबी दोस्‍त मार्तिने फ़ैसला करेंगे. सोचते ही मेरा ख़ून उबलने लगा. मैंने चीखकर ममा से जवाब तलब की- अब चुप क्‍यों हो? वही करूंगा जो मुझे करना है.. बात हो गई, बस!

- तो मैं कौन बहस कर रही हूं. जो करना होगा, करना, बाबा, मगर अभी सो जाओ! सुबह फिर जूलिया के साथ उठते वक़्त झिक-झिक करोगे, अच्‍छी आदत नहीं है, बेटे- ममा ने बिना मेरी ओर देखे कहा और बिछौने के बाद डेस्‍क पर आना मारिया के कागज़-नोटबुक्स ठीक करने लगी.

बेवकूफ की तरह रजाई से चेहरा बाहर निकाले मैं उधेड़बुन में फंसा रहा कि ममा ने अपनी तरह से मुझे निरुत्‍तर भले कर दिया हो, इसके मुगालते में न रहे कि उसका झांसा मैं समझता नहीं. उसे ज़ाहिर करने की मेरे पास फ़ि‍लहाल तरक़ीब न हो मगर इसका ये मतलब नहीं कि बड़ों के खेल मैं समझता नहीं? खूब समझता हूं.. और थोड़ा बड़ा हो जाऊं तो चट ममा के मुंह से सचाई उगलवा लिया करूंगा.. ममा की होशियारी और अपने बड़ा न होने पर मुझे बेतरह गुस्‍सा आ रहा था. ममा पर ज़्यादा.

सोने से पहले कल रात दूध नहीं पियूंगा. खाने की मेज़ पर जूलिया जैसे ही मेरी प्‍लेट में सलामी रखना चाहेगी, मैं दोनों हाथ बढ़ाकर प्‍लेट छेंक लूंगा फिर ममा को अक़ल आएगी! ओह, कितना गुस्‍सा आ रहा था मुझे ममा पर. जबकि वह अब रेकर्ड की औरत के स्‍वर में स्‍वर मिलाकर ललाबाई गा रही थी, और चाह रही थी कि दौड़कर मैं पीछे से उससे चिपट जाऊं और उसे प्‍यार कर लूं (ममा से ज़्यादा मैं चाह रहा था!) और फिर वह झूठे रजाई से मेरे बाहर आने पर अपनी नाराज़गी दिखाये.. ओह, इतना बुद्धू नहीं हूं मैं कि उसके झांसें में फंसूं. आज तो किसी भी सूरत में नहीं! मगर कितनी अच्‍छी ललाबाई है, और कितनी तो मीठी ममा की आवाज़ है.. कितना-कितना तो मेरा मन रोने का कर रहा है! लेकिन दांत भींचे हुए मैंने अपने रोने को बुरी तरह से रोका हुआ है..

(ज़रूरी नहीं आप मुझे फ्रेंच बच्‍चा ही समझें.. ठीक-ठीक मैं क्‍या बच्‍चा हूं, यह अभी भी मुझे जानना है.. लेकिन अरब या अफ्रीकी तो मैं कतई नहीं हूं.. ममान ज़ि‍द करके आपसे मनवाना चाहे तो भी यकीन न कीजिएगा.. उसकी किसी बात का न कीजिएगा..)

Wednesday, December 5, 2007

हमारे सीईओ बन जाओ, प्रभु!

धन्‍य हो, महाराज, इस भूखंड पर अब भी पुण्‍यात्‍मा बचे हुए हैं
सही है शहरों में कॉरपोरेशंस ने ज़मीन घेरा है मगर यह भी सही है
मुनि-ऋषि-महात्‍माओं से घिरे हुए हैं. नहीं तो हम कहां से कहां
पहुंच जाते, प्रभु? मगर गहरे उतरकर देखता हूं तो क्‍यों
सिर्फ़ अतल गहराई ही दीखती है? हम कहीं कहां
पहुंच पा रहे हैं, प्रभु? बाबा रामदेव कहते हैं बैठना बंद करो
देह हिलाओ! श्री श्री रविशंकर उच्‍चारते हैं सही-सही सांस लो
सब सही होगा. जबसे सुना है, प्रभु, घरघराती जैसी जो भी
सांस थी, अटक गई है. बैठा नहीं, गिर गया हूं
देह कहां से हिलाऊं? किस तरह छाती में सांस लाऊं.
प्रभु, सुना है जबसे ख़ून सूख गया है. ऐसा क्‍या हुआ
हमारा कि हम देह हिलाना भूल गए, छाती में सांस
लाना भूल गए? हमसे और कहां-कहां गड़बड़ी हुई, मालिक?
भक्ति, हमारी भक्ति खरी है? कि उसमें भी हमने खटाई डाल दी है?
खूला आंगन हवादार होना चाहिए था वहां चटाई डाल दी है?
खाना हम ठीक से खा रहे हैं? कि सिर्फ़ संडास तक जाकर
पेट खाली करने का रास्‍ता बना रहे हैं? घर हमारे कैसे हैं जैसे
होने चाहिएं वैसे हैं? हमारे बच्‍चे सही बात पर मुस्‍करा
रहे हैं, प्रभु? दुनिया-देश की जैसी समझ बननी चाहिए
वैसी बना रहे हैं? शिक्षा सही चल रही है? संस्‍कृति
समाज? घर के भीतर औ’ बाहर का लोक-लाज?
ठीक-ठीक बताओ, प्रभु, मैं जेन्‍युनली घबरा गया हूं
इस अगति से हमें उठाओ, हमारा कुछ कराओ, मालिक!
कितनी अच्‍छी बात है, सोच-सोचकर जीवित बचा हुआ हूं
सांस धौंकनी की तरह चल रही है कि अब भी इस पापिन
धरा पर पुण्‍यात्‍मा बचे हुए हैं. बता रहे हैं सांस लो छोड़ो
जांगर चलाओ. सब कहीं अंधेरा-अंधेरा है प्रकाश में आओ.
ओहोहो, धन्‍य हैं हम, प्रच्‍छन्‍न धन-धान्‍यपूर्ण यह धरा
गड्ढे की देहरी पर दांत दिखाता हूं खड़ा. आप ज्ञानदान
करो, सब हमारी भ्रांति हरो. व्‍हॉट नेक्‍स्‍ट?

Tuesday, December 4, 2007

बुककवर्स पर नौ नोट्स..

• If a novelist can finish a book without dreaming of its cover, he is wise, well-rounded, and a fully formed adult, but he’s also lost the innocence that made him a novelist in the first place.

• We cannot recall the books we most love without also recalling their covers.

• We would all like to see more readers buying books for their covers and more critics despising books written with those same readers in mind.

• Detailed depiction of heroes on book covers insult not just the author’s imagination but also his readers’.

• When designers decide that The Red and the Black deserves a red and black jacket, or when they decorate books entitled Blue Houses or Chateau with illustrations of blue houses or chateaux, they do not leave us thinking they’ve been faithful to the text but wondering if they’ve even read it.

• If, years after reading a book, we catch a glimpse of its cover, we are returned at once to that long-ago day when we curled up in a corner with that book to enter the world hidden inside.

• Successful book covers serve as conduits, spiriting us away from the ordinary world in which we live, ushering us into the world of the book.

• A bookshop owes its allure not to its books but to the variety of their covers.

• Book titles are like people’s names: They help us distinguish a book from the million others it resembles. But book covers are like people’s faces: Either they remind us of a happiness we once knew or they promise a blissful world we have yet to explore. That is why we gaze at book covers as passionately as we do at faces.

ओरहान पामुक के अन्‍य रंग से, फेबर एंड फेबर, 2007.

एक बदचलन स्‍त्री के फ़रेब..

पैरों में ऊनी मोजे थे, ऊपर कसे हुए स्‍नीकर्स. भारी चादर पर शॉल साटे कसकर देह पर खींचे हुए थी फिर भी जाने कहां से रह-रहकर ठंड की सूई चुभती. बिना आंखें खोले, पैर उलझाये, देह सिकोड़े कोशिश करती ठंड का असर कम जाये और सुबह धूप निकलने तक नींद में खलल न हो. मगर थोड़ा वक़्त गुजरता नहीं कि फिर जगह-जगह सुइयां चुभतीं.. अबकी ठंड का अहसास होने पर औरत ने हारकर आंखें खोल लीं. कसमसाकर अपने कंधे पर सिर गिराये, धीमे-धीमे नाक बजाते आदमी की बोझ से खुद को मुक्‍त किया और उसी गुड़ी-मुड़ी अवस्‍था में अकड़ी देह को सीधा करने लगी. कितने घंटे हो गए थे इस तरह अंड़से, अकड़े-अकड़े बैठे..

गिरी हुई खिड़कियों के बाहर सब कहीं अंधेरा था. घर्र-घर्र करती बस धीमी चाल पहाड़ी रस्‍ते चढ़ रही थी. आगे मोड़ आया तो बस की बत्तियों से घास के कुछ टुकड़े रोशन हुए. घुमाव के पीछे छुटते फिर सब अंधेरे में छिप गया. सिर्फ़ बस की घर्र-घर्र की आवाज़ बनी रही. औरत ने सोचा कहीं ऐसा न हो कि ड्राईवर भी नींद में बस चला रहा हो, फिर सोच के बचपने का अहसास होने पर औरत सामने से चेहरा हटा कर शॉल हटाकर घड़ी खोजने लगी. पता नहीं सुबह होने में अभी और कितनी देर है? मगर घड़ी तो सीट के नीचे बक्‍से में है. मोबाइल भी बंद करके ‘इन्‍होंने’ घड़ी के साथ ही रख दिया था. अपनी चीज़ों में आदमी के दखल का सोचकर औरत जाने किस पर खिझी तनकर बैठ गई. पता नहीं कब सुबह हो. अब राम-नाम जपते रहो चुपचाप! जबकि कंधे का सहारा हट जाने के बावजूद आदमी के सोने में खलल नहीं आया. नाक भी बजती रही. अलबत्‍ता उसके बजने का स्‍वर बदल गया था. ऐसा नहीं कि आदमी के निश्चित सोये रहने से औरत को जलन हुई मगर शायद उसकी पसलियों में कुहनी ठेलकर औरत अपना समय वापस चाहती थी. आदमी ने चिंहुककर आंखें खोली, फिर होंठों के कोने पर इकट्ठा हुए लार को उल्‍टे हाथ पोंछते हुए कहा- ‘आंSS, आ गए?’, नज़रें गड़ाकर हाथघड़ी देखी, बुदबुदाया- ‘अभी बहुत टाईम है.’ और दुबारा आंखें मूंद लीं.

कान पर मफलर लपेटे, एक मामूली शॉल लपेटे कैसा मज़े में सो रहा है. जैसे दुनिया में किसी बात की चिन्‍ता नहीं. उसके जगे होने की चिन्‍ता नहीं! अपना सर्वस्‍व सौंपने को उसे ऐसा ही व्‍यक्ति मिला. ज़रा-सा सिर उठाकर औरत ने नींद में डूबे बस के अंदर एक उड़ती-सी नज़र डाली. जैसे देखने के लिए कि उसके भीतर के शर्म को किन्‍हीं और आंखों ने तो नहीं देखा, हालांकि पूरा बस सो रहा था फिर भी जाने क्‍या सोचकर औरत उदास हो गई.

जब पहली बार देखने आया था तब कैसे सम्‍भल-सम्‍भलकर बोलता था. धीमे-धीमे. तब अभी की तरह ऐसी बड़ी-बड़ी मूंछें भी नहीं थी. आवाज़ भी अब कितनी रूखी हो गई है! हंसी भी ऐसी कि अनजान बच्‍चे डर जायें. बहुत बार रहा नहीं जाने पर औरत ने स्‍वयं कहा है- ठीक है, अब चुप भी करो!

शादी के तीन-चार साल तक वह दुखी रहती थी कि उसके बच्‍चा नहीं है, मगर अब तो उसे बच्‍चों का सोचकर झुंझलाहट होती है. खामख़ाह जीवन में झंझट बढ़ता. स्‍कूल में नाम लिखवाते वक़्त कैसा अजीब लगता कि बच्‍चे का बाप.. पहले औरत को भी अजीब नहीं लगता था कि मंडी से लाकर फलों की दुकान चलाते हैं, अब सोचती है तो जाने क्‍यों सोचकर बेचैनी होती है. कहीं बात उठे तो वह कोशिश करती है आदमी के काम के बाबत उसे सीधे कहना न पड़े. सिर्फ़ काम ही नहीं, वह आदमी के किसी भी चीज़ में साझीदार नहीं दिखना चाहती!

मज़दूर कारखाने में जाकर अपने हिस्‍से के काम से काम रखते हैं कारखाने की बड़ी तस्‍वीर में नहीं उलझते, औरत भी वैसे ही, आदमी की ज़रूरतों के निपटारे से निपटकर आदमी की दुनिया से बाहर, अपने एकांत में लौट आती. आदमी के होने को अपने लिए खारिज कर देती. कभी आदमी उसे आवाज़ देता खोजता आता तो औरत झुंझलाहट से भर जाती. अपने एकांत में छिपी गुमसुम चुप बैठी रहती. जबतक कि बाहर से आकर आदमी उसे ढूंढ़ न निकाले. हैरत भरा फिर जब वह सवाल करता कि इतनी देर से पुकार रहा है, उसने जवाब क्‍यों नहीं दिया? औरत उसे जवाब देने की जगह उल्‍टा सवाल करती- ‘इतनी जल्‍दी तुम लौट क्‍यों आये?’

नींद और अंधेरे में डूबे बस के घर्र-घर्र के बीच औरत ने आंखें मूंद लीं. एक झपकी-सी आई होगी जभी आदमी का बोलना सुन पड़ा- ‘अरे, अभी तो ... ही बजे हैं!’, फिर औरत ने कंधे पर उसके सिर का बोझ महसूस किया. कड़वाहट में वह कुछ कहना चाहती थी, मगर थकान व उनींदेपन के दबाव में चुप बेजान, मुर्दा पड़ी रही..

Monday, December 3, 2007

कंगले अमीर लोग!

डोंबिवली महाराष्‍ट्र के इंटिरीयर का कोई देहात नहीं, मुंबई से लगा हुआ ‘फलता-फूलता’, पुराने से नए में तब्‍दील होता, नया उपनगरीय केंद्र है. उपनगरीय रेल के सेंट्रल लाईन पर और कल्‍याण से महज छह किलोमीटर की दूरी पर है. कल शाम किसी पुराने परिचित का कर्ज़ा उतारने सड़क के रास्‍ते डोंबिवली की तरफ जाना हुआ. बीच-बीच में ढेरों नए निर्माण-उपक्रमों पर नज़र पड़ती रहती है. रास्‍ते में महाराष्‍ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी) का एक बड़ा इंडस्ट्रियल कॉम्‍प्‍लेक्‍स है. रिलायंस के दो विकराल कंपाउंड्स हैं. दूसरी ढेरों औद्योगिक ईकाइयों के कैंपसेस हैं. ज़्यादा नहीं, हो सकता है चार-पांच वर्ष की अवधि में डोंबिवली तक में एक औसत आदमी का मकान खरीदना असंभव हो जाये. ऐसे में आप स्‍वाभाविक कल्‍पना कीजिएगा कि डोंबिवली तक का रास्‍ता सजा-धजा, स्‍वस्‍थ्‍य और डोंबिवली एक नये, चमकते उपनगर की तस्‍वीर प्रस्‍तुत करता होगा? नहीं, साहब, ऐसा कुछ भी नहीं है. रास्‍ते में ढेरों ऐसे पॉयंट्स हैं कि कहीं बीच-रात आप अटक जायें तो किसी गांव-जंगल में भटक जाने की प्रतीति हो. रास्‍ते की तो मत ही पूछिये. इतने सारे गड्ढे हैं कि हड्डी-हड्डी बजने लगे! मगर कोई पहचान का व्‍यक्ति बता रहा था कि इस तरह हड्डी-हड्डी बजाते हुए काफी लोग रोज़ सड़क के रास्‍ते मुंबई नौकरी करने पहुंचते हैं (रेल से तो पहुंचते हैं ही). खास डोंबिवली के अंदर पहुंचिए तो आस-पास अभी काफी ज़मीन होने के बावजूद निजी और सार्वजनिक डिब्‍बानुमा निर्माणों का स्‍तर ऐसा है कि आप देर तक घबराते रहें कि अगर मानवीय ठंसाव के पहले स्‍तर का यह स्‍तर है, तो गजर-मजर के बाद आलम क्‍या होगा!

रास्‍ते में ज़रा-ज़रा दूर पर लगी हुई जो औद्योगिक ईकाइयां हैं, बाहर सड़कों का नज़ारा देखकर उनकी आत्‍मा में कुछ नहीं होता? नहीं ही होता होगा, वर्ना ऐसा नज़ारा होता ही क्‍यों. शायद हम ऐसा मुल्‍क हो गये हैं कि हमारे घर का हिसाब-किताब ठीक से चलता रहे तो बाहरी दुनिया गड्ढे में जाये नहीं, गड्ढा बना रहे, हमें कुछ नहीं होता. डोंबिवली की हटाइए, पवई से कल्‍याण की ओर निकलते हुए ठीक आईआईटी कैंपस गेट के बाहर संकरी गेटवे सड़क पर ट्रैफिक की जो हाय-हाय मची रहती है, उसे ही व्‍यवस्थित करने का क्‍या रास्‍ता निकल गया? ज़रा आगे एक हाल का बना नया फ्लाईओवर है, ठीक फ्लाईओवर से लगा गड्ढों का ऐसा सुहाना नेकलेस है कि आप बायें जाते हुए दायें की गाड़ी से लड़ न जायें तो उसी क्षण किसी ईश्‍वरीय अदृश्‍य सत्‍ता के प्रति आपमें भक्ति उमड़ने लगे!

अभी कुछ महीने पहले फोर्बेस की दुनिया के बीस सबसे अमीर लोगों की लिस्‍ट प्रकाशित हुई थी. तीन दिन तक मुकेश अंबानी विश्‍व के सबसे अमीर आदमी बताये जाते रहे. फिर वह उपाधि वापस बिल गेट्स के माथे गई. मगर अब भी मुकेश की अमीरी दुनिया के चौदहवें क्रम पर है. अट्ठारहवें नंबर पर उनके छोटे भाई अनिल अंबानी है. पांचवा स्‍थान भारतीय मूल के और अब भारतीय नागरिक भी लक्ष्‍मी मित्‍तल हैं. मगर इससे हमारे सामाजिक-नागरिक जीवन की बेहतरी में दो कौड़ी तक का भी कोई फर्क़ आता है? आएगा? अपने मित्रों, जाननेवालों के बीच दुनिया के ये पहुंचे हुए अमीर, अचानक बातचीत के बीच भारतीय लद्धड़ इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर की बात निकले तो क्‍या करते होंगे, मुस्‍कराते हुए वाईन पीते रहते होंगे? गुस्‍से और शर्म से उनकी नसें नहीं फड़कती होंगी? कि उनके लिए मुल्‍क सिर्फ़ पैसा छापने की ज़मीन है, मुल्‍क का इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर तेल लेता रहे? कहनेवाले कहते हैं अकेले रिलायंस का सालाना टर्नओवर भारतीय जीडीपी का पचास प्रतिशत है, ऐसे में कुछ तो ऐसे उद्योगपतियों की हस्‍ती होगी, उनकी बतकही की साख होगी! कहने के लिए ही धमकी वाले अंदाज़ में किसी दिन महाराष्‍ट्र की सरकार को कहें, कि अबे, ये इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर दुरुस्‍त करो नहीं तो अगले वर्ष हम टैक्‍स नहीं देंगे! जहां का पीट-पीट के खा रहे हैं उस धरती के लिए इतना तो करें? बहुत ज़्यादा करने की कह रहा हूं? इतना भी नहीं करे तो दुनिया के पांचवे, चौदहवें, अट्ठारहवें इंडियन आदमी की अमीरी का घंटा हम क्‍या करें? हमारे समाज के लिए तो वह हम सबों की तरह वह एक कंगला ही ठहरा.. हमारी ही तरह जो गड्ढों से गुजरता अपने गंतव्‍य तक पहुंचता है!

एक लड़की का परायापन..

कुएं की देहरी पर खड़ा बाबू कुएं के अंदर झांकने की कोशिश करता. सकलदीप बो या छोटकी चाची बरजतीं कि गिर जाओगे. बाबू बिना सिर घुमाये जवाब देता कि नहीं गिरेगा, और कुएं के अंधेरे में झांककर ताज्‍जुब करता कि काई और हरे पानी पर डोलती परछाईं का बच्‍चा उसकी ओर देखता हुआ क्‍या इशारे कर रहा है. दुनिया से दूर ऐसी गहराई और अंधेरे में छुपे परछाईं के बच्‍चे के बारे में सोचते बाबू की देह में झुरझुरी दौड़ जाती, और वह, मानो इतनी मात्रा का रोमांच बर्दाश्‍त न कर पाता हो, एकबारगी कूदकर कुएं की देहरी से अलग हट जाता.

ज़मीन को अपलक देखता जाने किस जादू में खोया, धूल में नहाया मुन्‍ना उठंगा एक कदम आगे जाता और झाड़ि‍यों के पार गायब हो जाता. दौड़ते-दौड़ते बाबू ठहर जाता और हवा में सूंघने लगता. रामधनी काका से पूछने पर वह सिर हिलाकर कहते हां, ऐसा ही है. अलग-अलग टाईम हवा में अलग-अलग महकों की ड्यूटी लगी रहती है. नीम, तरबूज, कच्‍चा गुड़, चावल की माड़, गीले-बसाईन कपड़े, सूखी मकई, ईंख सबकी ड्यूटी लगती है.

कांसे की थाली में खाना परसते देख शोभा रोने लगती, उसके लिए अलग से स्‍टील की थाली मांगकर लाई गई थी. तब भी उसे तसल्‍ली नहीं थी. खाने से पहले भात के सारे लाल दाने वह बीन-बीनकर अलग करती, तब कहीं जाकर पहला कौर मीसती. बाबा कहते ऐसा पक्‍का मकान खड़ा होगा जैसा टोला में दूसरा नहीं! ईया मुंह फेरकर हुक्‍का गुड़गुड़ाने लगती. बड़के चाचा कमजोर ओरचन वाली खटुली को बिछाकर सवाल करते गांव के छोरवाली ज़मीन का फ़ैसला कबतक होगा. बाबा झींककर कहते उनका पनबट्टा कहां है? रमधनिया के हियां देख लो, ओझाजी का देखो! सब पक्‍का दुमंजिला खड़ा कर लिए हैं तब क्‍या वे लोग इतने गए-गुजरे हैं? खटोले के कोने पर देह टिकाये छोटके चाचा शीशे का एक बड़ा खाली मर्तबान ऐसे तकते रहते जैसे दुनिया का सारा भेद उस मर्तबान में छिपा हो. बाबू मर्दों के पीछे धीमे कदमों चुपचाप घूमकर जाता और नज़दीक सामने खड़ा होकर ईया का हुक्‍का गुड़गुड़ाना देखता. ईया थोड़ी देर में खीझकर कहती हट, खांसी आएगी. बाबू कहता नहीं, हुक्‍के की महक आती है. हज्‍जाम के आने पर बाबा पहले उसे चार गाली सुनाते फिर कुर्सी के हत्‍थे पर पटरा डालकर जनार्दन मुन्‍ने को पटरे पर बिठाता और थोड़ी देर में कच्-कच् के साथ उसके पैर, कुर्सी और ज़मीन पर कटे हुए बालों के गुच्‍छे गिरने लगते. पता नहीं क्‍या बात होती कि तब तक शोभा रोने लगती. अंदर कोई बर्तन गिरता और बड़की चाची की बड़बड़ाहट सुन पड़ती कि शोभा जैसी लड़की पाकर वह कितना परेशान हैं. हुक्‍का एक ओर कर, अंदर की ओर मुंह उठाकर ईया आवाज़ लगातीं कि आ जा, रानी बेटी, हमरे काजे आ जा! परित्‍यक्‍त और अजानी, दरवाज़े की मुंडेर पर बिसुरती शोभा ठहरकर इशारा करती कि वह हुक्‍के के पास नहीं आ सकती..