Thursday, February 15, 2007

मास्‍टर गुनीराम

गुनीराम चीन नहीं गये थे. न कभी लाल किताब देखी थी.
दरअसल देखने के नाम पर तो अख्‍़ाबार की 'बीटवीन द् लाईंस'
पढने का कौशल तक नहीं था गुनीराम के पास. क्रांति वह
मनोज कुमार वाली जानते थे और 'नियो लिबरल इकॉनमी' जैसी
कोई चीज़ तो भूले भी उनके सपने में नहीं आ सकती थी.
देखिये,आप खामख़ा गुनीराम को उलझा रहे हैं. गुनीराम गुणी
ज़रूर हैं पर उसका एक विशेष भारतीय संदर्भ है.

चाय में पावरोटी डुबोकर खाना स्‍वास्‍थ्‍यवर्द्धक होता है
जैसे केले व दो भुने हुए अंडे से देह
व दिमाग में ताक़त आती है की समझ लेकर गुनीराम
समझदार हुए थे. फुरसत निकालकर तिरिया माता के दर्शन को
उलझी पहाडी पगडंडियों का रास्‍ता तय करते. बाबूलाल की साईकिल
मरम्‍मत दुकान पर सत्‍यशोधक शिविर की त्रैमासिक पत्रिका
का अद्योपांत गंभीर परायण करते. मां और पत्‍नी दोनों
की सलाहों को बराबर का महत्‍व देते. बटुए में रामपुर वाले
शर्मा जी का पता व बेटे बलराम की फोटो लिये गुनीराम रोज़ाना
बेझिझक चौदह किलोमीटर साईकिल पर नापते. गर्मी की ताप या जाडे
की डंक ने कभी गुनीराम का हौसला पस्‍त नहीं किया.

भिलाई में पोस्‍टेड हेड कांस्‍टेबल ठाकुरदास से गुनीराम को बडा संबल
मिलता है. पत्नी नहीं रहती मगर गुनीराम अजानी आपदाओं की
आशंकाओं से आश्‍वस्‍त रहते हैं. इस छमाही स्‍थानीय चुनाव
निपट जाये तो गुनीराम एक दफे़ मां को लेकर बनारस ज़रूर
जाना चाहते हैं. हिंदुस्‍तान की तरक्‍़की में गुनीराम को पक्‍का
भरोसा है.

1 comment:

  1. हिंदुस्तारन की तरक्‍़की में गुनीराम को पक्का.
    भरोसा है.
    ***
    जाने इन वर्षों में भरोसे का कुछ परिणाम निकला कि नहीं... जो भी हो पर भरोसा बना रहना चाहिए.

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