Thursday, February 15, 2007

सिनेमा: तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्‍खा क्‍या है...

जिस तरह से बहुत हद तक उन्‍नीसवीं सदी का उत्‍तरार्द्ध व बीसवीं का प्रारंभ उपन्‍यासों के लिए स्‍वर्णकाल था (दॉस्‍तॉवेस्‍की, तॉल्‍सताय, ज्‍वॉयस, प्रूस्‍त का विहंगम संसार दुबारा रिपीट नहीं हुआ. हो नहीं सकता था.), कुछ वैसा ही सिनेमा के लिए पिछली सदी में साठ और सत्‍तर का दशक था. दूसरे विश्‍व युद्ध के पश्‍चात् नये आर्थिक व राजनीतिक गोलबंदियों-समीकरणों में बंध रहे यूरोप की कला के लिए ये विस्‍फोटक वर्ष थे. लडाई के दिनों का इतालवी ‘नव यथार्थवाद’ अपनी भाषा व मुहावरे संवार कर बेर्तोलुच्‍ची के ‘इल कॉन्‍फर्मिस्‍ता’ व ‘लास्‍ट टांगो ईन पैरिस’ जैसी फिल्‍मों में सघन शिल्‍प की ऊंचाई की उन शिखरों तक पहुंचा था जिसकी नींव रोस्‍सेलिनी, अंतोनियोनी, पसोलिनी, फेल्लिनी, गोदार जैसे फिल्‍मकारों की मिली-जुली परंपरा के बिना असंभव होता.

पश्चिमी यूरोप के बरक्‍स रुसी बर्चस्‍व के नीचे जी रहे पूरब के चेकोस्‍लॉवाकिया, हंगरी, पौलेंड अपने ढंग से काले-सफ़ेद सिनेमा का कविताई मुहावरा गढ रहे थे. मिलोश फॉरमैन, कारेल चेचिना, जिरी मेंजेल जैसे नामों का इसमें बडा योगदान था (हमारे एक दोस्‍त कहा करते थे जिसने फेल्लिनी और चेचिना को नहीं देखा उसने अभी सिनेमा देखना शुरू नहीं किया है. मैं डिफेंस में उन्‍हें समझाने की कोशिश करता, हिंदुस्‍तान सीमित साधनों और कस्‍बाई संवेदनाओं का गरीब मुल्‍क है, पार्टनर. ज़ाहिरन, मेरे इस तर्क ने उन पर कभी विशेष काम नहीं किया). यूरोपीय अनुभवों के इन ज़खीरों ने हॉलीवुड में भी अपने कद्रदां पैदा किये, उनके शिल्‍प पर अपनी छाप छोडी. मगर साठ की राजनीतिक गर्मी का अंतत: उतार शुरु हुआ, और अस्‍सी के आते-आते नई राजनीतिक गोलबंदियों व बाज़ार के बढते प्रभुत्‍व में आलम यह था कि फेल्लिनी जैसी बडी हस्‍ती घर पर बेकार बैठी थी, बेर्तोलुच्‍ची सेंटीमेंटल एपिक्‍स के दौर में उतर चुके थे, और हॉलीवुड में स्‍टुडियो के मालिकानों की नये दम-खम के साथ वापसी हो रही थी.

इसके बाद की कहानी में बहुत चमकते सितारे नहीं; मगर इस पूरी श्रृंखला में भारतीय, और खासतौर पर हिंदी सिनेमा, आखिर कौन करवट सो रही थी?...

इसके बारे में आगे कभी तसल्‍ली से...

1 comment:

  1. आज सोचा देखा कि पहली पोस्ट में क्या लिखा था आपने! देखा टिप्पणीविहीन है यह पोस्ट। सो टिपिया दिये। बाकी जो नम गिनाये विदेशी सिनेमा कारो के उनमें से न हमको कोई जानता है न हम किसी को जानते हैं।

    ReplyDelete