Thursday, February 15, 2007

बेबेल के दायरे

हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे कि हफ़्तेवार, या कम स कम पाक्षिक तौर पर ही, कुछ वैसी फिल्‍मों का नाम सुझा सकें जिनका देखा जाना ज़रूरी है, जो किन्‍हीं शक्‍लों में हमारे लिए सामयिक समाज की उलझी खिडकियां खोलती हैं, या जिनमें सिनेमाई शिल्‍प की कोई अनोखी, मोहक छाप है. ज़ाहिरन, यह हमेशा संभव नहीं होगा, पर जैसा कि हमने पहले ही कहा, अपनी ओर से हम पूरी कोशिश करेंगे.

तो फि़लहाल पहली बात तो उन बंधुओं से जो कलकत्‍ता, दिल्‍ली व बंबई जैसे महानगरों में निवास करते हैं और सीमित नेटवर्क की कुछ वैसी भी फिल्‍में जिनके पल्‍ले आ जाती हैं जो ठीक-ठीक मेनस्‍ट्रीम की उतनी हॉलीवुडियन फिल्‍में नहीं. विदेशी फिल्‍मों का वितरण यूं भी हमारे यहां एक बहुत छोटी व लाचार दुनिया है, और सिर्फ रोने के नाम पर इस विषय पर बहुत देर तक रोया जा सकता है.
खैर, बात अभी इन दिनों सर्कुलेशन में बनी मैक्सिकन फिल्‍म 'बेबेल' की है. जिन बंधुओं से सपरे वे इसे ज़रूर जाकर देख आवें. 'अमोरेस पेरोस' व '21 ग्राम' जैसी फिल्‍मों के बाद बेबेल लेकर आनेवाले मैक्सिकी फिल्‍मकार की खास बात यह है कि अपने भूगोल के लंबे फैलाव के बावजूद (फिल्‍म अमरीका, मैक्सिको, मोरक्‍को व जापान के बीच घूमती है) फिल्‍म का बेसिक क्राफ्ट बहुत सिंपल है. फिल्‍म में जो विशेष दिलचस्‍प है वह 29/11 के बाद समूची दुनिया के अमरीकी इंटरप्रि‍टेशन का खाका है जहां हर बात अमरीकी स्‍वार्थों व उनकी हैसियत के जोर से मनवाई जा रही है. जहां गरीब और अमरीका के खिलाफ़ होना, दिखना, जैसे आज के समय का सबसे बडा अपराध हो गया हो. फिल्‍म इस बात को बहुत सीधे मगर बडे साफ तरीके से पकडती है. मित्र, मौका न चूकें, थोडे पैसे खराब करें और जाकर फिल्‍म देख आयें.

अब दूसरी बात दो अन्‍य फिल्‍मों की. यह उनके लिये जिनके यहां ब्रॉडबैंड का इंटरनेट कनेक्‍शन है, और जो थोडा सुभीते से डाउनलोड कर सकते हैं. ऐसे मित्र टोरेंट्स से परिचित भी होंगे. तो भैया लोगो, आपको सलाह है आप ज़रा गुगल के सर्च इंजिन में इन दो फिल्‍मों का टोरेंट खोजें. पहली है 'द कॉरपोरेशन' (कॉरपोरेंशंस का इतिहास, दुनिया को किस बेहया, हिंसक तरीके से वे लूटते रहे हैं उसकी विहंगम झांकियां व ज़रा ढंग से उनका कच्‍चा-चिट्ठा); दूसरी है, 'एन इनकंविनियेंट ट्रूथ', इसका विषय ग्‍लॉबल वॉर्मिंग है, और निहायत सादे तरीके के एक स्‍लाईड शो के बावजूद अल गोर साहब इसमें एनवॉयरमेंटल डिसास्‍टर का एक दिलचस्‍प खाक़ा खींचते हैं और भविष्‍य के प्रति सावधान होने की एक रुपरेखा रखते हैं. जो मित्र फिल्‍म लोकेट न कर सकें कम से कम इस वेबसाईट की खबर ज़रूर लें- http://climatecrisis.org

1 comment:

  1. प्रमोद जी
    वादा अच्छा लगा कि आप अपने फिल्मी खजाने से कुछ-कुछ हर हफ्ते बांटते रहेंगे. बेबेल के दायरे के बहाने आपका ये वादा मुझ तक भी पहुंच गया है. हां. हां, आपने नीचे जिन दो फिल्मों को रिकमंड किया है. उसमें से एक कॉर्पोरेशन इत्तेफाक़ से मैं देख चुका हूं. ब्रिटिश काउंसिल में सिनेमा का फेस्टीवल चल रहा था. दो घंटे से लंबी ही होगी आपकी कॉर्पोरेशन. मैं सांसे रोके देखता रहा. मुझे लगा कि ब्रिटिश काउंसिल जैसी जगह पर ये फिल्म कैसे दिखाई जा रही है लेकिन फिर लगा कि उनके पास डिसेंट के लिए जगह है. शायद वो डिसेंट को मैनेज करना जानते हों. फिलहाल इतना ही. आशा है आप स्वस्थ और मस्त होंगे.

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