Tuesday, February 27, 2007

खडखडिया साइकिल और लम्‍बा रास्‍ता

मोर्चे पर पार्टी वर्कर की पहली, दूसरी, तीसरी कडी आपने पढी. यह चौथी किस्‍त है:


गोपाल जी सीधे प्रैस नहीं गये. अब अपनी नहीं, पत्‍नी की चिंता हो रही थी. कैसा कामकाजी देह था बेचारी का, देखते-देखते कांटा हो गई है. भाई, देखरेख करना चाहिये न? एक अपनी ही तो संभाल करनी है, कौन बडा काम है? हम अब दुनिया संभालें कि घर बैठकर मेहरारु अगोरें? गमला के बारे में सोचते हुए उन्‍हें चिढ हो रही थी, और गुस्‍सा आ रहा था. फिर यह गुस्‍सा मोहन की तरफ मुड गया. वह घर छोडकर न जाता तो ऐसी नौबत न आती. अपना सगा भाई भी अपना नहीं होता. आदमी आखिर किसका भरोसा करे. रिश्‍तेदारी में भी सब कटे पडे हैं, कोई हाल-चाल लेने तक नहीं आता. हमसे नाराज़गी है, निभाओ नाराज़गी, मगर बेचारी उस औरत ने क्‍या बिगाडा है. जब सपरा है आपके काम-कारज में कितना जांगर चलाई है. आज उसे दरकार है तो कोई पूछवैया नहीं. यही साला जगत की रीत है. आज हम कहीं बडे सरकारी बाबू होते तो हमारे दरवाज़े सब चिरकुट पार्टी का भीड लगा रहता. सब हांकी देते फिरते कि गोपाल जी हमारे मौसा हैं, गोपाल जी फूफा हैं! लेकिन गोपाल जी नोट नहीं काट रहे तो कुच्‍छो नहीं हैं. सब शिक्षा-दीक्षा बेकार है. सरकार का षडयंत्री सूचनातंत्र और सामा‍जिक पिछडेपन का ज़हर सबके नस में घुसा बैठा है- बाहरी हो चाहे अपने घर का आदमी. सबमें वही स्‍वार्थी और जनविरोधी संस्‍कार. इसीलिए तो उनके जैसों की समाज को इतनी ज़रुरत है. नकुल जी इसको कहां से बुझेंगे. उनको तो समाज का लौकना ही ज़माने से बंद हो गया है. इन्‍हीं विचारों की घिसी हुई पुरानी फिल्‍म दिमाग में घुमाते, खड-खड करती साइकल को गली में खेलते बच्‍चों से बचाते, गोपाल जी दीनानाथ बैद के दरवाजे पहुंचे. मगर बैद जी दुनिया-जहान का सब काम छोडकर उन्‍हीं के इंतज़ार में नहीं बैठे थे.

घर पर पता चला बेटी के लिए लडका देखने गाजीपुर गए हैं. उनकी छोटी लडकी से पानी लाने को कहकर वह बेंच पर घडी भर सुस्‍ताने को बैठे. अब दो दिन में फिर एक पूरा चक्‍कर लगाकर इनको जोहते हुए आना होगा. यह सोचते हुए भी गोपाल जी को चिढ हुई कि बैद जी को भी ससुर आजे दामाद देखने जाना था!

मगर दीनानाथ बैद अच्‍छे आदमी हैं. गोपाल जी को पैसों के लिए कभी तंग नहीं किया. उल्‍टे मौका-बेमौका सौ-पचास की मदद ही करते रहे हैं. गोपाल जी की राजनीतिक विवेचना भी मुडी डुलाकर चुपचाप सुन लिया करते हैं. ये नहीं कि बीच-बीच में बात काटकर अपनी राय दिये बिना उनको खाना नहीं पचता. दरअसल बैद जी शांत प्रकृति के हैं, सबसे बना के चलते हैं. गोपाल जी का पर्चा अपने कागज़ के नीचे रख लेते हैं, गौर से उनकी राजनीतिक समीक्षा सुनते हैं, मगर आजतक किसी पार्टी कार्यक्रम में हिस्‍सेदारी करने नहीं आये. पूछने पर हमेशा यही कहते हैं कि साहेब, जितनी पाटी को हमरी जरुरत है, उससे जादा दरकार हमारी मरीजों को है, मानते हैं न?

***

जाने क्‍या कारण है कि घर और धंधे दोनों की कमाई के बावजूद गुप्‍ता जी ऐसी जगह प्रैस खोले हैं. साफ-शुद्ध आदमी एकाएक अंदर चला आये तो अदबदाकर उल्‍टी कर दे. पीछे की तरफ तंग सीढी से ऊपर कमल प्रैस के मुख्‍य दफ्तर तक पहुंचने के लिए गोपाल जी को इतने वर्षों बाद अब भी मानसिक तैयारी करनी पडती है. पता नहीं कहां का क्‍या रसायन है कि ऐसी महक छूटती है. और दो-चार नहीं, बारहों महीने. गोपाल जी ही नहीं, जैराम और सर्वेश्‍वर चौधरी भी कमल प्रैस आने के नाम से बहुत उत्‍साहित नहीं होते.

नाक पर हाथ धरे, पडोस के पिछवाडे नाद पर बंधे एक गाय की जुगाली देखते धीमे-धीमे गोपाल जी ऊपर आ गए. नीचे ध्‍यान नहीं गया था कि गुप्‍ता जी का नीला पुरनिया बजाज पार्किंग नहीं है, ऊपर लेबर से खबर हुई कि गुप्‍ता जी कागज के इंतजाम में निकले हैं, घंटा-पैंतालिस मिनट में लौटेंगे. काम करनेवाले सब पुराने लोग थे. गोपाल जी को बहुत सालों से देख रहे थे. मुबारक नाम का ज़रा लंगडा के चलनेवाला एक मुसलमान लडका पार्टी के पोस्‍टर के लिए तनी मुट्ठी वाला आदमी या नारा लगाती जुलूस की कुछ उलटी-सीधी कलाकारियां भी कर दिया करता था. उसने गोपाल जी को देखा तो एक काले कपडे में हाथ पोंछता किसी को चाय के लिए आवाज़ दी. गोपाल जी उसके जवाब में हाथ उठाकर मुस्‍कराये मगर अंदर ही अंदर अभी भी सोच में पडे थे कि गुप्‍ता जी ने पैसों की बात उठाई तो उनको क्‍या जवाब देंगे. पर्चा रात में छपकर तैयार नहीं हुआ भद्द हो जायेगी. मुबारक के पास आने पर झोले से अपनी पुरानी कापी निकालकर उसे खोलते हुए बोले, एक छोटा पर्चा है, कल सुबह तक मिल जाये तो अच्‍छा है.

मुबारक मुस्‍कराने लगा, आप भी एकदम लास्‍ट मिनट में आते हैं, कामरेड साहेब. सुबह से एक कुंजी चढा हुआ है, कल शाम तक तो उसी में फंसे रहेंगे. पर्चा के लिए अभी कहां से टाईम लहेगा.

गोपाल जी का चेहरा उतर गया. नकुल जी की अलग-अलग अप्रीतिकर भंगिमायें दिखने लगीं.

अधूरे ब्‍लॉगमुग्‍धता का पूरा बयान

एक ज़माने में यह मधुबाला, मुमताज़, मीना, माधुरियों ने किया था. अब ब्‍लॉग कर रहा है. हमको हमसे छीन रहा है. हम अपने नहीं रह गए. ब्‍लॉग के हो गए हैं. रवीश कुमार खामखा हल्‍ला किये हैं. एक ग़ैर-वैवाहिक संबंध ही तो बनाया है, नौकरी अभी कहां छोडी है. असल सूफी कहलाने के वे आधिकारिक अधिकारी नहीं. हम तो हुज़ूर, यहां दुनिया-जहान के सारे एंगेजमेंट भूलकर बस ब्‍लॉग की सीढियों के नीचे आकर जम गए हैं. दिन-रात का भौतिक, स्‍थूल फ़र्क मिट गया है. सिर्फ ब्‍लॉग का समय रह गया है. टीवी बकवास है, अख़बार रद्दी है, किताबें सब पढ चुके. अब तो बस पोस्‍ट ही पढना चाहते हैं. जिस तरह कभी जे. एम. अकबर का पैर ‘दीन-ए-इलाही’ और आई. गांधी का ‘नसबंदी’ में धंसा था, हमारा ब्‍लॉग में धंस गया है. पैर ही नहीं पराक्रम, प्रतिष्‍ठा सब धंसा हुआ है. चेतन-अचेतन किसी भी घडी में ब्‍लॉग थोडे से बखत के लिए भी जो मुंह फेर ले, हम सिंधु से लौटती सिकंदर की सेना की तरह एकदम पराजित से महसूस करने लगते हैं. पत्‍नी अब अच्‍छी नहीं लगती. उसका सवाल अच्‍छा नहीं लगता. सोचते हैं कमेंट में ही क्‍यों नहीं पोस्‍ट करती, वहीं जवाब दे दिया करेंगे. बंटु को स्‍कूल में एडमिशन की दिक्‍कत हो रही है. हम चाहते हैं लेकिन उस दिशा में सोच नहीं पा रहे. उस वक्‍त अपने को टेपलेट और फॉंट एंड कलर्स के बारे में सोचते व्‍यस्‍त पाते हैं. बंटु बिगड रहा है मगर ब्‍लॉग सुहा रहा है. घडी भर ताज़ी हवा लेने के लिए खुली खिडकी पर जाकर कुहनी टेकते हैं. मगर मन कंप्‍यूटर पर ही टिका रहता है. राउटर की टिमटिमाती हरी बत्तियां देखकर हमारा मन उसी तरह खिल जाता है जैसे मरनेवालों का काशी और काबा पहुंचकर खिलता होगा. ब्‍लॉग हमारा वृंदावन है. अब सारे भजन हम उसी के वृक्ष के नीचे खडे होकर गाना चाहते हैं. हमने स्‍वानंद किरकिरे से कहा है हमारे ब्‍लॉग के लिए गाना लिखो. अब तो एकलव्‍य रीलीज़ भी हो गई है. स्‍वानंद लिख नहीं रहा है. हमें अच्‍छा नहीं लग रहा. हम गोर्बाचोव और पुतिन की तरह दो धुरियों पर जाकर खडे हो रहे हैं. ब्‍लॉग इतिहास में इस परिघटना की सुखद स्‍मृति नहीं दर्ज़ होगी.

स्‍मृतियों की सूखती घास पर बैठा अंग्रेजी का प्रसन्‍न पोस्‍टर

यह अकारण नहीं है कि क्षेत्रीय भाषाओं के फ़ीके रंगों की बनिस्‍बत अंग्रेजी साडी का रंग ज्‍यादा चटख व गुलाबी लगता है. जातीय पहचानों के इस नये विज्ञान में देशज कहीं पीछे छूट गया है. हमारे मन व समय से उसकी पपडियां धीरे-धीरे उतरती व विस्‍मृत हुई जा रही हैं. दिल्‍ली में साहित्‍य अकादमी की इमारत के बाहर व भीतर भटकते हुए कुछ इन्‍हीं सवालों पर भावुक हो रहे हैं अविनाश.

कविता में अब तक स्‍मृतियां खासी काम आती रही हैं. गांव, अपने छोटे शहर के बदबूदार नाले में गिरी गेंद को
निकालने का उत्‍साह और सड़कों पर बहाये कोलतार के गोले बनाकर कमीज़ की जेब में डालने की हिम्‍मत. जबकि मालूम होता था कि ये कमीज़ अब दुबारा कभी धुल नहीं पाएगी. फट जाएगी, लेकिन कोलतार से अलग नहीं होगी. ग़रीब बाबूजी की ग़रीब पत्‍नी में मौजूद मेरी अमीर मां ने लेकिन कभी ऐसी फटकार नहीं लगायी, जिससे इस तरह की हिम्‍मत के लिए आगे हौसला पस्‍त पड़ जाए. यह सब कुछ कविता में आएगा, तो एक जादू की तरह लोग पढ़ेंगे. लेकिन जिंदगी का विज्ञान स्‍मृतियों की कक्षा में और उलझ जाता है. समाज आगे बढ़ता है अपने पुरानेपन को झाड़कर.

कई बार इस तरह की प्रस्‍थापनाएं कुछ ऐसी टो‍करियों में डाल दी जाती हैं, जिनके बाहर चिप्‍पी सटी होती है- ये परंपरा से कटे हुए हैं, इनकी कोई ज़मीन नहीं है, इनका कुछ नहीं हो सकता. लेकिन सच यही है कि पुरानी ऐतिहासिकता से वे सारे सूत्र खारिज़ और कमज़ोर हो गये हैं, जिनसे हम साम्राज्‍यवादी ज़मीन से एक किसान के लिए थोड़ी मिट्टी मांगने की ताक़त बटोर सकें. इक्‍कीस फ़रवरी की दोपहर साहित्‍य अकादमी के दरवाज़े पर एक पोस्‍टर चिपकाया गया था. नौजवान लड़की थी. नाम था रूपा बाजवा. पैदाइश का साल छपा था 1976, यानी कुल 31 साल. इन रूपा बाजवा को 2006 के लिए अपने अंग्रेज़ी उपन्‍यास ‘द साड़ी शॉप’ के लिए साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार मिला है. हिंदी में ज्ञानेंद्रपति को यह पुरस्‍कार मिला है और उर्दू में मख़मूर सईदी को. दोनों की उम्र 50 के ऊपर है. अब इस फर्क से ये भी साफ होता है कि सम्‍मान लायक समझी जाने वाली उम्र से भी ये तय होता है कि कोई समाज अपने पुरानेपन से कितना बंधा हुआ है या आधुनिकता के लिए उसने अपने रौशनदान कितने फैलाये हुए हैं. हम हिंदी समाज के ना‍गरिक हैं. हम विज्ञान से ज्‍यादा भावनाओं की कद्र करते हैं. हमें लाइब्रेरी में बरसों से बसी पुरानी किताबों की खसखसाहट विभोर कर देती है. और घर की किसी बूढ़ी महिला को मानस के पद गाते हुए देख कर लगता है कि हमारी दुनिया में कितनी लय बची हुई है.

हमारी भाषा मैथिली के वयोवृद्ध लेखक चंद्रनाथ मिश्र अमर वहीं रूपा बाजवा की तस्‍वीर के सामने खड़े मिल गये. वे अकादमी पुरस्‍कार की मैथिली राजनीति के सूत्रधार रहे हैं और उनसे लड़कर कभी इस भाषा में अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त लेखक नहीं हुआ जा सकता. हालांकि वो अपनी उम्र के आखिरी सालों में हैं और खड़े रहना उनके लिए ज़रा मुश्किल होता है. मैं दौड़ कर उनके लिए कुर्सी लाया और जैसे ही वे उसकी गहराइयों में धंसे, बताया कि जोड़ों में दर्द रहने लगा है और मोतियाबिंद की वजह से लिखने-पढ़ने में अब ज़रा दिक्‍कत होती है. फिर वे मेरे दादाजी के जिक्र पर आये और कहा कि उनके अक्षर छापेखाने के अक्षरों से भी अधिक सुव्‍यवस्थित और सुंदर हुआ करते थे. उनकी कई किताबें अप्रकाशित हैं, आपलोगों की जिम्‍मेदारी बनती है उन्‍हें छपवाना. मिथिला का गौरव तो वही सारी पुरानी चीज़ें हैं. साहित्‍य के बाज़ार का लाभ उठाने वाले अमरजी को साम्राज्‍यवादी बाज़ार से इसलिए कोफ्त है कि क्‍योंकि वे स्‍वाद पर हमला कर रहे हैं. कहा कि अब न चावल में वो स्‍वाद बचा, न सब्‍ज़ी न दाल में. मिठाइयों में भी वो स्‍वाद नहीं. नये लेखन में भी अब वो पुराना स्‍वाद कहां. न लय न छंद न गहराई. वर्णरत्‍नाकर हमारा गौरव है, लेकिन हम उसे भूलते जा रहे हैं. मैंने उनसे आग्रह किया कि वे उन स्‍वादों के संस्‍मरण लिखें, लेकिन मोतियाबिंद का जिक्र आग्रह के आड़े आ गया और इससे पहले कि तमाम असहमतियों के बावजूद मैं उनसे लिखवाने के दुराग्रह की ओर बढ़ता, उनकी गाड़ी आ गयी और एक बार फिर मेरे आसपास सिर्फ वही तस्‍वीर बची- रूपा बाजवा की.

हिंदी के कितने ही लेखक अभी रूपा बाजवा की उम्र में हैं और वे दरियागंज से लेकर मंडी हाउस में सर उठाये घूमते रहते हैं, लेकिन कलमकारी के नाम पर हंस और कथादेश में कविता-कहानी छप जाने से आगे उनका उत्‍साह जवाब दे देता है. ज्‍यादा से ज्‍यादा इस काबिलियत का इस्‍तेमाल अख़बारों या व्‍यावसायिक तरीक़े से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं में नौकरी हासिल करने तक ये उत्‍साह बना रहता है. और जब तक ऐसी नौकरियां नहीं मिलती हैं घरों से पैसे आते हैं, फ्रीलांसिंग चलती है और कभी कभार एक अदद साहित्‍य अकादमी की लाइब्रेरी में वे पाये जाते हैं. बरसों बाद एक बार फिर इस लाइब्रेरी में गया. अलमारियों की वही कतारें अपनी पुरानी जगह पर खड़ी. लकड़ी की उन्‍हीं पुरानी कुसिर्यों पर बैठे किताबी कीड़े उन्‍हीं पुराने चेहरों में... और वही पुरानी गंध, जो दस साल पहले सन सनतानबे में हमें मिला करती थी. हमारे एक मित्र कहीं इन्‍हीं में खो गये थे. मुझसे अलग छूट कर. हर चेहरे को नज़दीक से जाकर निहारने और मित्र को तलाशने का धैर्य भी नहीं बचा था. मैंने अपनी ऊब को एसएमएस में दर्ज किया और उनके नंबर पर छोड़ दिया. जवाब आया- बाहर रुकिये, बस पांच मिनट में आया. और वे पूरे एक घंटे बाद हमें उसी पोस्‍टर के सामने मिले, जिसमें रूपा बाजवा अपनी उम्र से हमें चिढ़ा रही थीं.

सूना घर और सूने सपने

मोर्चे पर पार्टी वर्कर की पहली, दूसरी किस्‍त आपने पढी. नीचे उससे आगे...

पत्‍नी को जबर्जस्‍ती बिछौने पर लिटाने के बाद गोपाल जी गोद में थाली लिये उसके सामने आकर बैठे. दाल की कटोरी में सुबह की सूखी रोटी डुबोकर धीमे-धीमे खाते रहे. पत्‍नी ने सुझाव दिया उठकर प्‍याज काट दे, गोपाल जी ने आंखें तरेर कर उसे बरज दिया. वह इनकी तरफ करवट लिये चुपचाप पडी इन्‍हें देखती रही. गुप्‍ता जी और दूसरी चिंतायें अचानक इतनी देर में एकदम जैसे भूल सा गया था. पत्‍नी और घर की सामान्‍य दुरव्‍यवस्‍था के बोझ तले गोपाल जी बेस्‍वाद निवाले निगल रहे थे. ऐसे कैसे चलेगा, कब तक चलेगा? पूरी उमर समाज की चिंता में धूल-गर्द खाते बिता दी, और अपना ही घर समाज-विछिन्‍न भुतहा सूनसान का डेरा बना पडा है!

मोहना के रहने से घर में कम-स-कम चहल-पहल रहती थी. हंसता हुआ वह जोर-जोर से बातें करता था. गोपाल जी से तो न अब जोर से बातें करते बनता है, और घर में हंस सकें ऐसी तो कोई बात उन्‍हें सूझती ही नहीं. गमला भी मोहन की संगत में खिली-खिली रहती थी. उसके लिए आंवडे और कटहल का अचार बनाती. कढी खिलाते हुए उससे अपने बचपन और ननिहाल के किस्‍से कहती. गोपाल जी ने तो पत्‍नी के संग वह अंतरंगता कभी नहीं जिया. गमला उनका आदर करती है मगर उन्‍हें अपने घर के किस्‍से उसने कभी नहीं सुनाये. पत्‍नी के साथ ठीक से समय बिताने की उन्‍हें फुरसत ही कब मिली. और अब तो जाने क्‍या है कि घर के अंदर उनके घुसते ही मुर्दनी छा जाती है. गमला हाथ में कोई काम लेकर बैठ जाती है. और गोपाल जी इधर-उधर कुछ असमंजस में भटकते रहने के बाद पार्टी का मुखपत्र निकालकर उसकी सूक्ष्‍म जांच करने में जुट जाते हैं. कि शायद कोई छूटा हुआ सूत्र हाथ लगे, कोई ऐसा सूराग मिले जिसे वे अपने अज्ञान में अब तक समझ न सके थे, और उसे समझ लेने के बाद उनकी सारी उलझनें दूर हो जायेंगी. कभी उन्‍हें अपनी सीमित शिक्षा से क्षोभ होता तो कभी यह सोचकर वह संशयग्रस्‍त होते कि पार्टी मुखपत्र संगठन की कमियों और उसके कारकों की सही पहचान नहीं कर रहा. फिर इस बात से उन्‍हें स्‍वयं पर क्रोध आता कि अपनी अपर्याप्‍त समझ और बेतरतीब ज्ञान की वजह से वे ऐसे ओछे नतीजे निकालने की हडबड में रहते हैं. क्‍या मालूम पार्टी बडे परिदृश्‍य की रोशनी में स्‍थानीयता की ऐसी सूक्ष्‍म समीक्षाओं पर उचित व पर्याप्‍त ध्‍यान न दे पाती हो.

जिस पार्टी से उन्‍हें समाज और इतिहास की समझ मिली, सभ्‍यता में उन जैसे मामूली जनों के स्‍थान को जिसने गाढे रंगों से चिन्हित किया, उसके प्रति किसी भी तरह का संशय वह पाल भी कैसे सकते हैं भला! नहीं, नहीं, वह बात नहीं, गोपाल जी मन ही मन स्‍वयं को समझाते. पार्टी के प्रति तो अब भी असीम श्रद्धा है. विश्‍वास है. पर पार्टी से ही तो विवेक और आत्‍म-मंथन का संस्‍कार मिला है. कुछ तो है कहीं आखिर जो छूटा जा रहा है. नकुल जी के दोष सामने नहीं आ रहे और सच्‍ची जनभावना का निरादर हो रहा है. वक्‍त रहते इसका निराकरण न हुआ तो इससे तो पार्टी का ही नुकसान होगा. और पार्टी का नुकसान गोपाल जी किसी भी सूरत में होने देना मंजूर न करेंगे.

कभी-कभी इन्‍हीं सब उधेडबुन में खोये-खोये गोपाल जी को झपकी आ जाती और सपना देखते कि कचहरी के बडे थाने में भारी पुलिस निगरानी में उन्‍हें सींखचों में कैद रखा गया है. और वह न केवल थोडा भी विचलित नहीं हैं, बल्कि उनके चेहरे पर असीम शांति है. क्‍योंकि उन्‍हें अपनी जनता के प्रतिकार पर पूरा भरोसा है. और वैसा ही जल्‍दी ही घटित भी होता है. थाने का लंबा-चौडा कमरा अचानक आंदोलनकारी झंडों की लाली और नारों के शोर से कांप उठता है. पुलिस के हतप्रभ सिपाही घबराकर एक ओर हट जाते हैं और कुछ जोशीले युवाओं की टोली गोपाल जी को सींखचों के पीछे से आज़ाद कराकर अपने कंधे पर उठाये उन्‍हें कचहरी के खचाखच भरे अहाते में लाकर स्‍थापित करती है. जननायक गोपाल जी के जयघोष के ऊंचे, भव्‍य शोर से कचहरी की पुरानी इमारत थरथराने लगती है.

रोटी खत्‍म करने के बाद थाली में ही गोपाल जी ने हाथ औंचा. पत्‍नी बुदबुदाई, आओ, थोडा आराम कर लो. हम गोड दबा देते हैं.

गोपाल जी के मन में ऐसा कोई इरादा नहीं था लेकिन मुंह से यही निकला, हमारी चिंता मत करो. हमें अभी प्रैस जाना है.

बाकी का आगे...

Friday, February 23, 2007

ब्‍लॉग के फ़ायदे

इस अर्थशास्‍त्री झमेले से बाहर आते हैं. दम घुट रहा है. आर्थिक सवालों के लपेटों में जब भी झांकने गया हूं हमेशा यही नतीजा निकला है. कि दम घुटता है. और फिर डिप्रेसन शुरु होता है. और डिप्रेशन शुरु होने का मतलब आप समझ ही रहे हैं- टाईम की ऐसी-तैसी हो जाती है. ब्‍लॉग के होने से अब यह सुविधा हो गई है कि अपना डिप्रेसन आपकी तरफ फेंक सकें. बाद में आपकी प्रतिक्रिया पाकर और अच्‍छा लगता है कि डिप्रेसन की अच्‍छी तस्‍वीर खींची है. हालांकि कुछ लोगों की शिकायतें भी आती हैं कि तस्‍वीर तो जो थी सो थी, डिप्रेसन के वर्णण में व्‍याकरणिक अशुद्धियां रह गई हैं.

ब्‍लॉग को शुरु करके अब आराम हो गया है. नहीं तो अकेले डिप्रेस होते-होते कुछ थकान-सी हो जाती थी. अब तसल्‍ली है आपकी तरफ से जिज्ञासा वाली नज़र उठेगी कि आज अज़दक में डिप्रेसिंग क्‍या है. हम मेज़ पर पैर फैलाये, सिर के पीछे हाथ बांधे इतमिनान से चेहरा उठाकर कहेंगे वो देखो उधर, डेस्‍कटॉप पर शॉटकट पडा हुआ है, जाकर देख लो. आप आईकन मैक्सिमाइज करके कंप्‍यूटर की खिडकी को अज़दकी उजाले से भर देंगे, और भीनी मुस्‍की मारके कहेंगे, अच्‍छा है, और हमारा डिप्रेसन सार्थक हो जायेगा! क्‍योंकि आर्थिक मोर्चे पर तो वह सार्थक होने से रहा. नहीं, उस दिशा में तो अब हमने उम्‍मीद छोड दी है. एक तो अपनी उमर हो रही है, दूसरे कुमारमंगलम एंड पार्टी अपनी वाली को स्‍थापित करने के चक्‍कर में हमारी वाली अर्थव्‍यवस्‍था पर यूं भी थू-थू कर रहे हैं. कुमारमंगलमों की सक्रियता बढने के बाद तो अपने आर्थिक संगणकों के अस्तित्‍व तक को लेकर हमारे अंदर शंका हो गई है (संदर्भ के लिए कृपया रेफर करें: कुमारमंगलम एंड टोली के अर्थशास्‍त्र में हमारी नून-तेल-तरकारी वाली व्‍यवस्‍था की हत्‍या). लेकिन ब्‍लॉग ने हमें इस संकट से उबार लिया है. हमारे वास्‍तविक आर्थिक पिछडेपन को टेक्निकल ऊंचाई के वर्चुअल स्‍पेस में भेजकर हमें अपने दुखों पर हंसने के लिए मुक्‍त छोड दिया है. और अपने साथ आपको हंसता देखकर तो हम बीच-बीच में भूल भी जाते हैं कि हम दरअसल क्‍यों हंस रहे हैं.

पर ब्‍लॉग के फ़ायदे ही फ़ायदे हों ऐसा नहीं, नुकसान भी है. ब्‍लॉग जहां नई दोस्तियां बनाता है वहीं पुरानों में दरार भी लाता है. दोस्‍त (नैचुरली, पुराने) को ख़बर हुई कि हमने अपना ब्‍लॉग शुरु कर दिया और वह (पुराने) पीछे रह गए तो उन्‍होंने हमसे मुंह फुला लिया. हमने पूछा क्‍या बात है तो जबर्जस्‍ती गंभीर होकर बोले, ब्‍लॉग-स्‍लॉग लेकर हम क्‍या करेंगे. ऐसा करो, हमारी जो कवितायें हैं उनको तुम अपने यहां ही चढा दो, हम वहीं देख लिया करेंगे. न हमने उनकी कवितायें आज तक अपने यहां चढाईं, और न उन्‍होंने आज तक हमारा ब्‍लॉग देखा है. वैसे भी दोस्‍त पुराने हो गए थे. दोस्तियों की भी एक उम्र होती है. हमने एक आह भरी और बात भूल गए. मगर यह किस्‍सा एक ही दोस्‍त का नहीं. आगे सुनिये.

कुछ ऐसे भी दोस्‍त हैं कि रास्‍ते में सामने से आ रहे हों और हम पर नज़र पड जाये तो एकदम से रास्‍ता बदल लेते हैं. फ़ोन करो तो फ़ोन नहीं उठाते. कि मैं बेवकूफ बच्‍चे की तरह उत्‍साहित होकर फिर सवाल करुंगा कि इसको देखा? उसको पढा? और वो फिर सिर झुकाकर शर्मिंदा होंगे कि यार, बहुत टेंशन चल रहा है, तुम्‍हारे ब्‍लॉग के लिए टाईम नहीं मिला. और मैं अविश्‍वास व शॉक से उन्‍हें देखूंगा जैसे मुझे अभी-अभी अपनी पत्‍नी के किसी के साथ भाग जाने की ह्रदयविदारक ख़बर मिली हो. और फिर तेजी से मेरे माथे पर डिप्रेसन के गाढे बादल मंडराना शुरु करेंगे. तो ब्‍लॉग के फ़ायदे हैं, लेकिन नुकसान भी हैं. मगर उसके बारे में फिर कभी.

जाने वो कैसे लोग थे जिनके

''जिन्‍हें नाज़ है हिन्‍द पर वो कहां हैं...'' मालूम नहीं आपकी स्‍मृतियों में इसकी कोई धुधली, झिलमिलाती याद शेष है या नहीं. मगर हिंदी फिल्‍मों की जब कभी विचारोत्‍तेजक चर्चा होगी, लोग बार-बार इस खास रचना के जादू, इसकी मार्मिकता- की पहचान करने लौटेंगे. प्‍यासा इस 27 फ़रवरी को अपने प्रदर्शन के पचास वर्ष पूरे कर रही है. देखिये गुरु दत्‍तप्‍यासा पर विशेष सामग्री: सिनेमा-सिलेमा में.

Wednesday, February 21, 2007

ना विसाले यार होता

अर्थशास्‍त्र हमारे पल्‍ले नहीं पडता. ऐसा नहीं है कि हमने कोशिश नहीं की. अलग-अलग मौकों पर किताबें खंगाली, आर्थिक रपटों में सिर घुसाया, दोस्‍तों के साथ चखचख किया पर कुल जमा-हासिल यही है कि आर्थिक दृश्‍यावली तेजी से बदलती रही, अब सुनने में आ रहा है भाग रही है, और हम अभी तक पहलेवाली जगह पर खडे हैं.

अर्थशास्‍त्र पल्‍ले नहीं पडता. आर्थिक मामलों और हमारे बीच कुछ वैसे ही कुहरिल, गाढे प्रेम-संबंध हैं जैसाकि अमरीकी फौज और इराकी आबादी के बीच कुछ वर्षों से बना हुआ है. दिक्‍कत यह है कि आजू-बाजू अमरीकी फौज हो तो आपको बडी तेजी से उसे समझना होता है. वर्ना ज्‍यादा संभावना है कि अमरीकी फौज आपको पहले समझ लेगी. फिर आप या तो कारागार में होंगे या फिर ऐसी लंबी यात्रा पर निकलने को मजबूर होंगे जहां पहुंचकर वैसे भी कारा-सारा सब बेमानी हो उठता है. तो उसी मजबूरी में उलझा मैं फिर से कुछ अर्थशास्‍त्र सुलझाने की कोशिश में जुटा हूं. और हमेशा की तरह, समझ में आ रहा है कि हम कितना कम समझ रहे हैं.


दिक्‍कत दरअसल यह भी है कि नून-तेल-तरकारी की अपनी रोजमर्रा की व्‍यवस्‍था हांफते-संभालते जैसे हम हैंडल करते हैं, वह अर्थशास्‍त्र की हमें एक समझ देता है. उसके दूसरे दिन मीडिया हमारे गाल पर तमाचा जडकर सूचित करती है कि हम जो अर्थशास्‍त्र समझ रहे हैं वह असल अर्थशास्‍त्र का सूचकांक नहीं, असल अर्थशास्‍त्र जो है वह कहीं और रचा जा रहा है! यही वजह थी पिछले दिनों रतन टाटा के विदेश में कोरस स्‍टील हथियाने की खबर पढकर हमें भारी झटका लगा. लगना ही था. अपनी महत्‍वाकांक्षा और पचपन हजार करोड के इंवेस्‍टमेंट में हमारी अर्थव्‍यवस्‍था इसके आगे कहीं नहीं टिक रही थी. टिक क्‍या नहीं रही थी, मज़ाक दिखने का चांस बना रही थी. फिर पता चला ऐसा ही एक और अभियान कुमारमंगलम बिडला ने फतह किया है. उनकी कंपनी हिंडालको ने अटलांटा की नोवेलिस को अपने कब्‍जे में लिया है. आगे और, पुणे की एक गुमनाम सी कंपनी- सुजलोन जर्मनी की आरईपावर सिस्‍टम्‍स पर घात लगाये बैठी है. रिलायंस वाले भी पीछे नहीं हैं, और व्‍यवसायी समुदाय में काफी गहमागहमी का नज़ारा है. खबरों की और उलट-पुलट करते हुए हमारी जानकारी में आया कि भारतीय बिजनेस का यह एक नया ट्रेंड है. उसके पंख और अरमान दोनो खुल रहे हैं. देश की कमाई से ज्‍यादा वह लंदन, न्‍यूऑर्क स्‍टॉक एक्‍सचेंज और नास्‍डेक की लिस्टिंग में शामिल होने की आकांक्षा रखता है.

तो धीरे-धीरे एक गूढ रहष्‍य पर से पर्दा उठ रहा है. एक बेसिक सच्‍चाई धुंधलके से उभरकर बडे पर्दे पर छा रही है. मतलब नून-तेल-तरकारी का हमारा दलिद्दर अर्थशास्‍त्र और बाबू कुमारमंगलम, रतन जी और टोली का अर्थशास्‍त्र निहायत अलग-अलग दुनियाओं में जी रहे हैं. अब इसमें फंसान यह है कि कौन वाला अर्थशास्‍त्र भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था का मापक शास्‍त्र हुआ. कहीं ऐसा न हो कि कन्‍फ्यूज़न में हमारा वाला लिस्टिंग में ही न चढे. इस देश में जिस पैमाने पर धांधलियां होती हैं, इतनी-सी धांधली की बिसात क्‍या है. फिर आजकल अंतर्राष्‍ट्रीय फलक पर चीन के पीछे-पीछे भारत को जमवाने की कुछ ज्‍यादा ही तुरही बज रही है. इस बडे खेल में हमारी छोटी-सी अर्थव्‍यवस्‍था को भाई लोग सीधे नक्‍शे से उठवा लें तो कोई ताजुब्‍ब नहीं. शायद उनका कसूर भी नहीं. ऐसे उलझे परिदृश्‍य में यह तय करने के लिए कि कौन वाली असल भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था है इसमें किसी एक के गरदन पर छूरी तो चलानी ही होगी. ज़ाहिर है बाबू कुमारमंगलम बडे आदमी हैं, ऐसा प्रस्‍ताव किसी ने उनके कान में फुसफुसाकर सुनाया भी तो सुनकर हंसने लगेंगे. अलबत्‍ता हम ज़रुर डरे हुए हैं.

Tuesday, February 20, 2007

बडे रोते हैं इस घर में बच्‍चा नहीं रोया

मोर्चे पर पार्टी वर्कर की पहली कडी आपने यहां पढी. नीचे आगे का नज़ारा लीजिये.

काली माता की संगत से बाहर आकर गोपाल जी ने चेहरे पर फेरा हुआ अंगोछा हटाकर गरदन पर रख लिया. एक कच्‍ची दीवार का सहारा लेकर खांसने लगे. थूकने के लिए दो बार झुके, उल्‍टा होकर खों-खों करते रहे. ऐसी खांसी से आम तौर पर उन्‍हें डर लगता था पर आज उन्‍होंने संभाल लिया. अंगोछे से आंखों का गीलापन और मुंह पोंछा और धीमे-धीमे डेग भरते हुए मोटर मरम्‍मत की दूकान के पीछेवाले खुले मैदान तक आ गए. मैदान के कोने में गोपाल जी ने एक टूटी हुई दीवार ढूंढ रखी है. उसके एक छोर पर बैठकर सामने गांवों की ओर की हरियाली का ध्‍यान करते हुए थोडी देर आत्‍म-चिंतन में व्‍यतीत करना उनको प्रीतिकर लगता है. मगर आज इस लक्‍ज़री से बिछोह ही उचित है. अभी पर्चा छपवाने का काम छूटा हुआ है. तीन दिनों में वह झमेला (माने नकुल जी) फिर माथा खाने पहुंच रहे हैं. गोपाल जी उन्‍हें फिर से नई व्‍यंग्‍योक्ति मारने का मौका नहीं देना चाहते थे, कि- समय पर एक पर्चा तक रेडी नहीं कर सकते, पता नहीं क्‍या सोचकर लोगों ने नगर संयोजन का कार्यभार दे रखा है! इसकी कल्‍पना मात्र से गोपाल जी का मन कसैला हो गया.

गुप्‍ता जी को मनाकर किसी तरह कल सुबह तक पर्चा प्रैस से निकलवा लेना होगा. लेकिन पिछली दफा पुराना बकाया चुकता करने की बात हुई थी वह अभी तलक पेंडिंग पडा है. रामधनी और जैराम को हजार-डेढ हजार मोबिलाइज करने का काम सौंपा था, उस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है. बकाये की बात उठाकर गुप्‍ता जी पर्चा छापने में अडंगा किये तो बडा अहित हो जायेगा. सोचते हुए गोपाल जी के मुंह का स्‍वाद और कडवा हो गया. गमछे से मुंह पोंछकर उन्‍होंने कुरते की जेब टटोली और तय किया कि प्रैस साइकिल रिक्‍शा से जायेंगे.

रिक्‍शेवाला पैसों के लिए हुज्‍जत करने लगा. गोपाल जी ने उसे समझाने की कोशिश की कि मान जाओ, भैया, हम जनता के ही आदमी हैं, मगर दिन भर जनता की सवारी लादे रहनेवाले रिक्‍शेचालक पर इसका कोई असर न हुआ.

प्रैस की तरफ निकलने की बजाय गोपाल जी घर की ओर निकल लिये. वैसे भी आज सुबह से जाने क्‍यों सिर कुछ भारी-भारी-सा लग रहा था. ऐसे वक्‍त कहीं बुखार-उखार में गिर पडे तो अच्‍छा सत्‍यानाश हो जायेगा.

गोपाल जी इस भोले ख्‍याल से घर लौटे कि पत्‍नी से अदरक-लौंग की चाय बनवाकर पियेंगे, दो रोटी पेट में डालकर घंटे भर झपकी लेंगे, फिर नई ताक़त के साथ बाहर आयेंगे समाज का सामना करने. लेकिन घर पहुंचकर उन्‍हें दूसरा ही नज़ारा देखने को मिला. बीमार गमला स्‍टोव के धुंये के बाजू लगी पडी थी. पास जाकर देखा रो रही है. पत्‍नी की स्थिति देखकर गोपाल जी घबरा गए. उकडू उसके पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ धरकर बोले- मना किया था न बिछौना से उठने को? तुम्‍हारी हालत है अभी है उठने-बैठने की, बोलो?

पत्‍नी मुंह फेरकर रोती रही. अबकी गोपाल जी का पारा चढा- तुम रो काहे रही हो? मोहना आया था? झगडा करके गया है?

पत्‍नी ने धीमे से इंकार में सिर हिलाया और मुंह पर साडी दाबे सुबकती रही. अपने से छह साल छोटे भाई मोहन से गोपाल जी को अब भय होता है. जाने कब मर्यादा भूलकर तू-तडाक में बात करने लगे. पहले ऐसा नहीं था. तब मोहन के मन में भाई के लिए इज्‍ज़त थी. बडे भाई उसके लिए दूसरों से अलग और सलीके-समझदारी वाले इंसान थे. मगर जब से गोपाल जी ने आईटीआई में दाखिल होने की मोहन की इच्‍छा के आगे यह कहकर हाथ जोड लिया, कि बाबू, हम तुमको बाहर भेजने का पैसा कहां से लायेंगे, भाईयों के रास्‍ते अलग हो गए थे. एक दिन चौक में गोपाल जी ने भाई को ट्रक से सामान उतरवाते देखा तो शाम को बिफरकर लताडा- तो अब यही बाकी रह गया है? मजूरी करोगे तुम?

दूसरे कमरे में कपडा बदलते हुए मोहन ने जवाब दिया था- क्‍यों, मजूरी करनेवालों के खिलाफ हो तुम?... चाहते हो तुम्‍हारे उन बीस लोगों की पांत में झंडा लेके हम भी तहसीलदारी पे नारा लगायें?...

लगभग दौडते हुए कमरे में घुसकर गोपाल जी ने छोटे भाई पर कसकर हाथ मारा था. मारते रहे थे. उबलते उल्‍टा-सीधा बोलते रहे थे. मोहन मुंह सिये मार खाता रहा था. गमला के हल्‍ला मचाने पर गोपाल जी शांत हुए थे. दूसरे दिन मोहन घर से निकला तो फिर तीन दिन तक वापस नहीं आया. दुबारा आया तो अपने कपडे उठाने आया था. गमला की ममता और उसके रोने-धोने के बावजूद मोहन घर में ठहरा नहीं. गोपाल जी पीछे वाले कमरे में चुपचाप सिर को हाथों में लिये बैठे रहे. जीवन की अनपेक्षित मांगों के आगे वह एक बार फिर हार गए थे.

-फिर तुम रो काहे रही हो? क्‍या बात है, गमला?...

पत्‍नी ने आंख के आंसू पोंछे. आंचल में नाक सुडककर धीमे-धीमे सहज हुई, बोली- कोई बात नहीं. ऐसे ही रो रहे थे.

गोपाल जी दीवार से लगकर पत्‍नी के बाजू बैठ गये. लाड से उसका माथा लेकर अपने कंधे से सटा लिया. उनका भी मन करता है कभी ऐसे ही बैठकर फुरसत से रोयें. बिना वजह. मन भर. मगर मौका ही नहीं बनता. अकेली औरत क्‍या और कितना करे बेचारी. मोहना के घर में रहते उसकी ममता को एक रास्‍ता मिल जाता था. अब तो वह सहारा भी नहीं रहा. घर में एक बच्‍चा होता तो शायद गमला ऐसी मुरझाई और थकी-थकी और उदास न रहती. इतनी मनौतियां चढाईं, इतने व्रत-उपवास किये, मगर छूंछी ही रही. गोपाल जी क्‍या कर सकते थे. दो बार पत्‍नी गर्भवती हुई. मन में हुलकारें उठीं, लगा इस बार मैदान मार लेंगे, क्रांति हो ही जायेगी. मगर क्रांति क्‍या छोटा-मोटा विद्रोह भी नहीं हुआ.

बाकी का आगे...

फिर वही शाम वही ग़म वही तनहाई है

टाईम की किल्‍लत का रोना हमने पहले यहां रोया था. वह कहानी नीचे एक कदम और आगे बढ रही है:

पैनल डिस्‍कसन के संयोजक का निजी कसूर नहीं. वह तो हैं ही इस रोल में कि ज़माने की हवाओं को हवा देते रहें. और ज़माने की हवा यही है कि उसमें हवा तो नहीं ही है, टाईम एकदम नहीं है. बंबई की लोकल में आपका रोज़ाना का आना-जाना होता और झपट्टा मारकर ट्रेन की भीड को जीत लेने की कला में अगर आप पारंगत न होते, तब आपको सिंसीयरली अंदाज़ हो जाता कि प्‍लेटफॉर्म पर पांच-पांच मिनट का नुकसान करते हुए आपने जीवन का कितना कीमती समय बंबई की लोकलों में खो दिया है. ‘टाईम इज़ मनी’ का मुहावरा बंबई के लोकल्‍स को ध्‍यान में रखकर ही ईजाद किया गया है. मगर लोकल की लसर-पसर की भीड में फंसे हुए मुसाफिर अक्‍सर इस महत्‍वपूर्ण सूक्ति को भूल जाते हैं. और इसके महत्‍व पर विचार करने की बजाय सामनेवाले के तेलिया बालों को सूंघते और मां की आंख हमको इसी ट्रेन में क्‍यों चढना था जैसी गालियों से खुद को नवाजते हुए सफर पूरी करते हैं. अलबत्‍ता लोकल छोडते ही उन्‍हें बोध होता है कि ट्रेन उनका कितना टाईम खा गई!

मैं दोस्‍त की तरफ देख रहा हूं मगर उसकी बातें नहीं सुन रहा. क्‍या फ़ायदा? बीस सालों से वह कह रहा है, बीस सालों से मैं सुन रहा हूं. हुआ. अब नहीं सुनना. पंखे का घनघनाना सुनता हूं. सोचता हूं कितना टाईम खराब हो रहा है. रसोई में दोस्‍त की पत्‍नी कामवाली पर भुनभुना रही है कि वह बहुत टाईम खराब करती है. दोस्‍त का बच्‍चा कंप्‍यूटर पर वीडियो गेम खेलता टाईम खराब कर रहा है. इस बात के अहसास से मैं कांप-सा जाता हूं कि हम सबने मिलकर कितना सारा टाईम खराब कर लिया है. इस टाईम को संजोकर रखा जा सकता था. इसका दिल्‍ली जाने में उपयोग हो सकता था. मगर एक कदम आगे जाकर मैं एक कदम फिर पीछे लौट आता हूं. याद आता है पिछली दफा दिल्‍ली के दोस्‍त के यहां चार दिन गुज़ारते हुए सीधे-सीधे लग रहा था मैं खामखा टाईम खराब कर रहा हूं. दोस्‍त ने अपनी लिखी किताब पढने को थमा दी थी उसे पढते हुए तो और भी एक्‍स्‍ट्रा टाईम खराब हुआ था.

कोई भले कितना ही अंतरंग क्‍यों न हो, सिनेमा चलने का प्रस्‍ताव रखे, मैं झट मना कर देता हूं. ढाई घंटे खराब करने को अब अपने पास टाईम न रहा. किल्‍लत है. टाईम को संजोकर रखना है. उसको संभाल-संभालकर और किफायत से उपयोग में लाना है. और पंखे की घनघनाहट को सुनता मैं जान रहा हूं कि मैंने ऑलरेडी कितना टाईम लूज़ कर दिया है. इस टाईम को ठीक-ठीक कहीं क्रियेटिवली इन्‍वेस्‍ट होना है. -कहां? इसका मुझे अभी कायदे से अनुमान नहीं. मगर बहुत सारी कोमल संभावनाएं हैं जिसके पीछे मैं टाईम को कर सकता हूं. और खुद जाकर उसके पीछे खडा हो सकता हूं. टाईम ऐसी प्रेमिका है जिसके साथ मैं रिश्‍ते बिगाडना नहीं चाहता. मैं सोच रहा हूं. हालांकि इस गिल्‍ट के साथ ही सोच रहा हूं कि मैं टाईम नाली में बहा रहा हूं.

टाईम मैनेजमेंट का यह किस्‍सा यहीं निपटता दिखता नहीं. लौटकर यह फिर आएगा...

मोर्चे पर पार्टी वर्कर

क्षमा कीजियेगा यहां उन पार्टियों की चर्चा नहीं होनी है जिनकी चिंता और चर्चायें यूं भी राष्‍ट्रीय अख़बारों का मुख्‍य खबर बनी रहती हैं. जो दिल्‍ली के आलीशान बंगलों से ऑपरेट करते हैं. खबरी चैनल में घुसते और उद्योगपतियों के ऑफिस से निकलते हैं. कितनी भी बडी मुसीबत आ जाये हमेशा मुस्‍कराते हुए पत्रकारों को जवाब देने की काबिलियत रखते हैं. यह बडी खुराकों पर पलनेवाली बडी मछलियां हैं. आपको जानकारी न हो तो हम दे दें कि इन बडी पार्टियों से अलग इस बडे देश में बहुत सारी छोटी पार्टियां भी हैं. अपने गोपाल जी ऐसी ही एक नगण्‍य-सी पार्टी के नगण्‍य-से वर्कर हैं, जो न केवल अब तक सामाजिक बदलावों के घोषणापत्र छापती है बल्कि हैरतअंगेज़ तरीके से उसमें यकीन भी करती है. तो आईये, ऐसी ही बेमतलब, बेसिर-पैर की, बिना उद्योग‍पतियों के सपोर्टवाली और खबरी चैनलों से हजारों मील दूर वाली पार्टी के पार्टी वर्कर गोपाल जी की नगण्‍यता पर से थोडा धूल झाडकर, उनसे मिलने चलते हैं.

इस बेमतलब और खामखा चिडचिडी और उत्‍साहित-सी होती पार्टी के गोपाल जी नगर संयोजक हैं. नगर ऐसा नगर है जिसने नगर होने की सारी अदायें पाल ली हैं मगर सहुलियतों के स्‍तर पर किसी बडे देहात के आगे-पीछे चलता रहता है. तो नगर है. लेकिन नहीं भी है. जैसे भारत में पैसा आ रहा है लेकिन हमारे घर में नहीं आ रहा. बहरहाल, गोपाल जी ऐसे उदीयमान नगर के नगर संयोजक भये. मुरझाये चेहरों व धीमे-धीमे अक्षर ज्ञान की जटिल बुदबुदाहटों में उतर रहे कुछ दस-बारह सकुचाई-सी संभावनाओं की एक युवा-अधेड जन टोली के साथ डिपो के ऊपर के एक अंधेरे-से कमरे में गोपाल जी शनिवार दर शनिवार अपनी साप्‍ताहिक मीटिंग करते हैं. उच्‍च कमान के मासिक पत्र के विशेष अंशों का सामूहिक अध्‍ययन होता है. स्‍थानीय, क्षेत्रीय और राष्‍ट्रीय परिस्थिति पर परिवर्तनकारी एकमत नज़रिया बन सके इसके लिए गोपाल जी साथियों का दिशा निर्देश करते हैं. और अतिशय ज्ञान के बोझ से साथीगण थकते-से दिखें तब डिपो के बाजूवाली गुमटी के लौंडे को चाय के लिए आवाज़ लगाई जाती है. पिछले ग्‍यारह वर्षों से गोपाल जी पार्टी की ओर से दिये गए इस भारी जिम्‍मे का पूरे तन-मन से निर्वाह कर रहे हैं. धन होता तो उससे भी करते मगर धन देखने का सौभाग्‍य गोपाल जी को आज तक हुआ नहीं.

पार्टी, राष्‍ट्र और अंतर्राष्‍ट्रीय शांति के हित में बनी यह व्‍यवस्‍था पिछले ग्‍यारह वर्षों से- डोलती, लुढकती, सिमटती, फिर जुडती- निर्वाध रुप से चल रही थी, और गोपाल जी उसे पूरी आत्‍मा के जोर से चला पाने में सफल भी होते रहे थे, मगर अचानक उसमें व्‍यवधान आ गया है. गोपाल जी की वजह से नहीं पार्टी की वजह से आ रहा है. पार्टी कहती है गोपाल जी की वजह से आ रहा है. माने गोपाल जी से ऊपर जो जिला सचिव नकुल जी हैं वह स्‍थानीय जन समर्थन में आई गिरावट के लिए सीधे-सीधे गोपाल जी को जिम्‍मेदार बता रहे हैं. (थोडा सा व्‍यतिक्रम में जाते हुए आपको सूचित करे कि यह रुपक जिला सचिव नकुल जी के बारे में भी उतना ही है जितना नगर संयोजक गोपाल जी के बारे में. पार्टी के साथ नकुल जी का तीसेक वर्षों का प्राचीन व कुछ वैसा ही रिश्‍ता है जैसा भारतीय सभ्‍यता और मोहंजोदडो और हडप्‍पा के बीच रहता आया है. पार्टी से नज़दीकी का भाव ऐसा प्रगाढ कर लिया है नकुल जी ने कि अब पार्टी को व्‍याख्‍यायित करने की उन्‍हें ज़रुरत नहीं होती. बिना प्रयास के वह इंदिरा इज़ इंडिया वाला उदाहरण हो गए हैं. पेट में दर्द उठता है तो काडर के बीच कहते हैं पार्टी के पेट में उठा है.) गोपाल जी की आत्‍मा जानती है कि नकुल जी की बातों में एकांगिकता है, मिथ्‍यारोपण है, छद्म जनभावना और अनावश्‍यक वैचारिक व्‍यभिचार है. और सबसे ज्‍यादा तो गैर-पार्टी आचरण है. मगर दिक्‍कत यह है कि ग्‍वातेमाला का सही उच्‍चारण और लातिनी अमरीका को एटलस में खोज लेने के बावजूद नकुल जी के मुंह लगने से गोपाल जी को अभी भी भय होता है.

नकुल जी की तेजी से बोलने और बोलते चले जाने की आदत के सामने गोपाल जी वैसे ही असहाय हो जाते हैं जैसे मेहरी और अस्‍पताल के अभाव में बच्‍चा जननेवाली गर्भवती स्त्रियां होती होंगी. फिर नकुल जी अपनी हर बात पार्टी का ऐसा ही मानना है के तडके के साथ गोपाल जी की ओर फेंकते थे. और हर बार पूरी तैयारी के बावजूद ऐसा हो नहीं पाता था कि नकुल जी हवा में ऊंचा शॉट लगायें और बाउंड्री पर गोपाल जी उनका कैच लोप लें. कैच वह लगातार मिस कर रहे थे. और नकुल जी का स्‍कोर कंटिन्‍युवसली बढ रहा था. लेकिन इससे भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है कि नगर स्‍तर पर पार्टी का स्‍कोर प्रभावी रुप से घट रहा था. इसकी चिंता गोपाल जी को अपनी बीमार पत्‍नी और घर की दरिद्रता से ज्‍यादा उद्वीग्‍न किये रहती है. दो महीनों में पार्टी का प्रांतीय सम्‍मेलन होने को है. कलकत्‍ता से बडे नेता पहुंचने वाले हैं. सबकी नज़रों में जनता व पार्टी-शत्रु के रुप में चिन्हित होने के ख्‍याल मात्र से गोपाल जी का दबा हुआ दमा फिर से उभर आया था. सबसे छिपाकर वह नियम से नगर के दूसरे छोर पर अवस्थित काली माता के दर्शन को भी जाने लगे मगर अपराध-बोध से उन्‍हें छुटकारा नहीं मिल रहा था. तीन रातों की उनींदी थकान के बाद अंतत: गोपाल जी ने तय किया कि पार्टी के आगे प्रांतीय सम्‍मेलन में मुंह की खाने से बचने की एक ही सूरत है कि वह अपने इलाके में नकुल जी को मुंह की खिलायें. और इसके बारे में उत्‍साह से योजना बनाते हुए गोपाल जी को अचानक बोध हुआ कि वे इतना कमज़ोर नहीं हैं जितना अपने को समझे हुए थे.

बाकी का आगे...

Sunday, February 18, 2007

परिणीता

आसमानी साडी और हरे सूती की कुरती में
औरत सुन रही है बातें, बात नहीं करती
टिन के लाल नये फूलकारी वाले बक्‍से पर

रंगीन चूडियों के गजमज वाले हाथ
गोद में डाले सिमटी बैठी औरत
देखती है आस-पास की वही जानी-पहचानी
दुनिया जैसे जीवन में देख रही हो पहली बार

टेकर के लौंडों का शोर है. मिठाई दूकान का बोर्ड
अपनी किस्‍मत की ही तरह कुछ तिरछा होकर
लटक गया है. तीन बच्‍चे संभाले एक आदमी
लारीवाले की हुज्‍जत में उलझा हुआ है. धूल है
और माथे पर चढती धूप. एक गिरती-सी दीवार
के जंगले पर बिजली के तारों का नंगा गुच्‍छा है. एक
आवारा कौआ है चीखता. एक मां अपने बच्‍चे को पेशाब कराती.
वही दृश्‍य हैं जिनके बीच बडी हुई है औरत मगर आज
नये और अनोखे और कितने नशीले लगते हैं.

धूप छूती है औरत के कानों को वह साडी खींचकर
ऊपर कर लेती है. आदमी का कहा सब क्‍यों इतना
सुहाना लगता है. मामा से झगडे की उसकी सफाई. इंटर में फेल
होने के बाद पढाई छोडने का किस्‍सा. और यह कि सब दोस्‍त
उसके शराबी नहीं और वह मां की बहुत इज्‍ज़त करता है और
दुनिया की हर चीज़ से ज्‍यादा उसे बथुये का साग पसंद है.

हंसता आदमी अचानक कहानी अध-बीच छोडकर
निकालता है बंडल अदा से
सुलगाता है बीडी. गोदी के चमकीले बटुये पर
हाथ धरे सोचती है औरत कुछ दिन निकल जायें फिर वह
इस बीडी की आदत पर लौटेगी.

बस आने में अभी देर है.
औरत को जाना है बस की मंजिल से
और आगे. संकोच में सुबह से मुंह में अन्‍न
गया नहीं मगर थकी नहीं है
औरत धीरे-धीरे हो रही है औरत.

Saturday, February 17, 2007

टाईम के किल्‍लत की सामाजिक बहार

खबरी चैनलों पर यह खेल आप सबों ने देखा होगा. पैनल डिस्‍कसन में चेहरे पर गंभीर मुद्रा बनाये हुए संयोजक साहब अ का उत्‍तर सुन रहे हैं. अ ने तौलकर अपना जवाब अभी आर्टिकुलेट करना शुरु किया ही है कि संयोजक जी के अंदर उन्‍हें सुनने की इच्‍छा मर गई. ठीक है, ठीक है की मुंडी डुलाते हुए अ से हटकर स की तरफ मुडते हैं और अपना अगला सवाल दागते हैं.

संयोजक के इस बेहूदा आचरण से अ के साथ-साथ अगर आपको भी तक़लीफ हुई हो तो यह आपकी दिक्‍कत है, क्‍योंकि संयोजक के पास अ की रामकहानी सुनने का वक्‍त नहीं. दर्शकों के पास धीरज नहीं. इसलिए अ अगर चुटकी बजाते ही अपनी बात साफ-साफ और संक्षेप में नहीं कह सकते तो उनके जीवन को धिक्‍कार है, क्‍योंकि उनका समय खत्‍म हुआ. पैनल डिस्‍कसन कोई रात भर चलनेवाली चीज़ नहीं. दूसरे शोज़ हैं. फिर ब्रेक्‍स हैं. विज्ञापन हैं. इतना फालतू टाईम किसके पास है?

खबरी चैनलों पर खामखा बमगोला होना फिजूल है, किसके पास टाईम है? किसी के पास नहीं है. सब टाईम को पैसा में बदलने के बडे सामाजिक उपक्रम में लगे हुए हैं. इस गलतफहमी में मत रहियेगा कि इस उच्‍चादर्शी अभियान में सिर्फ टाटा और अंबानी ही पहलकदमी ले रहे हैं. अहां, पूरा समाज ले रहा है. जो तत्‍काल और झमाझम पैसे बना नहीं पा रहे, उनका टाईम आह भरने और खुद पर शर्म करने में फंस रहा है. फिर आह भरना भूलकर क्‍या करें किधर से पैसा जुगाडें की क्रियेटिव और कनस्‍यूमिंग सोच उनका टाईम खाना शुरु करती है. थोडा-बहुत रोता-गाता पैसा झडना शुरु हुआ तो फिर ये झमेला कि इसको कहां-कहां और ठीक-ठीक कैसे खर्च करें. किधर से कितना लोन लिया है कितना चुकाना है आदि-इत्‍यादि. मतलब यह कि टाईम वाली किल्‍लत सीन से हटती है नहीं. एकदम वक्‍त नहीं बचता.

भागाभागी वाली अदाओं में पत्‍नी के साथ शॉपिंग मॉल की झांकी ले रहे हैं. इतना देख लिया ले लिया मगर अभी इतना और छुटा हुआ है. ठीक है, बाकी का अगले हफ्ते देखेंगे! टाईम रहेगा? यार, किसी तरह से निकालेंगे. हरामी, इतने सारे बिल्‍डर्स हैं मगर किसी को ये नहीं सूझता कि शॉपिंग मॉल्‍स के अंदर ही कुछ हाउसिंग सोसाइटिज़ बनवाना शुरु करें. तब कितनी सहूलियत रहेगी! सुबह चाय की पहली चुस्‍की लेते हुए खिडकी से बाहर का एक नज़ारा लिया और सुबह ही तय कर लिया कि आज किधर-किधर पंजा मारना है. किन-किन मालों से घर भरना है. ख़ैर, जर्मनी में किसी बिल्‍डर ने यह अकलमंदी दिखाई है, तो अपने यहां वाले भी दिखायेंगे. अपने यहां वालों की अकल ज़रा धीरे-धीरे खुलती है. तो भारी बेकली और छटपट की इन दृश्‍यावालियों में जनाब अ के लिये किसी के पास कहां वक्‍त है? नहीं है. सिर्फ संयोजक का कसूर नहीं है. बेचारे संयोजक को अभी जाने किन-किन चाय पार्टियों में जाना है. मंत्री जी की छोटी साली के रिसेप्‍शन में जाना है. गुडगांव के मकान के रेनोवेशन के लिए समय निकालना है. फिर बिग बी से बाईट भी लेनी है. फिर क्रिकेट है, शिल्‍पा है, सीरियल्‍स हैं. इतने सारे दूसरे हलचल हैं, सेंसेशंस हैं! अ के लिए फालतू टाईम किसके पास है? आखिर हैं कौन ये जनाब अ? ऐश्‍वर्या से इनकी शादी हो रही है? फिर? काहे फालतू सिर चढा रहे हो, कह दिया ना, टाईम नहीं है! सॉरी.

हटियेगा नहीं, अभी हमारा टाईम खत्‍म नहीं हुआ. ब्रेक के बाद आ रहे हैं वापस...

Friday, February 16, 2007

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: छह

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की आखिरी किस्‍त


तकसिम की तरफ जाते हुए, मैं गलाता की बत्तियों के अध-उजाले नज़ारों की झलकी लेने घडी भर को ठहरता, फिर बेयोलू की ओर निकल जाता कि इस्तिकलाल एवेन्‍यू के पहले की किताब दुकानों में किताबें पलटता कुछ मिनट गुजार सकूं. फिर बीयर और वोदका का घूंट लेने उन बीयर बारों में रुकता जहां शोर-शराबे वाली भीड की आवाज़ों पर टेलीविज़ल का हल्‍ला भारी पडता होता, और जिस तरह वहां बाकी लोग जलाये होते, मैं एक सिगरेट सुलगाता (इर्द-गिर्द नज़र मारकर देख लेता कि आसपास कोई मशहूर कवि, लेखक या कलाकार तो नहीं बैठा) और जब महसूस करने लगता कि मैं भारी मुंछियल मर्दों का कुछ ज्‍यादा ही ध्‍यान खींच रहा हूं- क्‍योंकि मैं इधर-उधर आंखें घुमाता, अकेला और बच्‍चों-सी सूरत वाला होता- तो मैं फिर बाहर निकल जाता कि रात में घुलमिल सकूं. एवेन्‍यू पर थोडी टहल के बाद मैं बेयोलू की पिछवाडे की गलियों की ओर निकल जाता, और ककरकमा, गलाता, चिहां‍गीर पहुंचने के बाद मैं सडक-बत्तियों के उजालों और गीले फुटपाथ पर टिमटिमाती नज़दीक के टेलीविज़न स्‍क्रीन की रोशनी को निहारने के लिए ठिठकता. और फिर किसी कबाडी की दूकान के अंदर झांकते हुए, या फिर एक रेफ्रीजरेटर को देखकर जिसे किसी बेचारे पंसारी ने अपनी दूकान में बतौर सजावट डाला होता, या दवाईयों के किसी दूकान में अबतक लगे किसी मेनेक्विन (मेरे छुटपन के दिनों में इसका प्रचलन था) को देखते हुए मुझे महसूस होता कि कितना खुश था मैं. अम्‍मी के साथ जिरहों के बाद जो भव्‍य, शुद्ध, बेहोशी जगाने वाला क्रोध मैं उन क्षणों में महसूस करता, बेयोलू के गिर्द- या उस्‍कूदर, या फातिह के पीछे की गलियों में घंटे भर की टहल के बाद गायब हो जातीं. जहां कहीं भी मैं पहुंचता, और जैसे-जैसे बदन की ठंड बढती जाती, मेरे शानदार भविष्‍य की सुलगती आग मुझे उष्‍मा देती. तब तक बीयर और लंबी थकान के असर में मेरा माथा हल्‍का हो चुका होता. और शोकज़दा सडकें किसी पुरानी काली-सफेद फिल्‍म की मानिंद टिमटिमाती-सी लगतीं, एक ऐसा लम्‍हा जिसे फ्रीज़ करने और छिपा लेने की तबियत होती- और उसी लम्‍हे मन करता कि उन सूनसान गलियों से बाहर निकलकर घर लौटकर अपनी मेज़ के आगे कागज़ और पेंसिल लेकर बैठूं कि लिखूं या ड्रॉ कर सकूं.

‘दीवार पर वह जो पेंटिंग लगी है, ना’ नरमिन और अली ने हमारी शादी में गिफ्ट किया था. जब उनकी शादी हुई तो हम उसी कलाकार के पास गए कि बदले में उनके लिए भी हम उसी की बनाई कोई पेंटिंग लेकर जायें. काश कि तुमने देखा होता कि तुर्की का ऐसा मशहूर कलाकार किस कदर बेकल हो रहा था कि आखिरकार उसके दरवाज़े कोई पेंटिंग खरीदने पहुंचा था, याकि अपनी खुशी छिपाने के लिए उसने कैसा हास्‍यास्‍पद जामा ओढ लिया था. अपने हाथों उसकी पेंटिंग लिये जब हम बाहर निकले तो जिस तरह वह लगभग फर्श बुहारता हमें सलाम पर सलाम दाग़ रहा था, जैसी चिकनी-चुपडी बोलता हमें विदा कर रहा था, तुम किसी दुश्‍मन के लिए भी कामना न करते, मेरे बेटे, कि वह इस देश में कलाकार और पेंटर बने. इसीलिए मैं किसी से बोलती नहीं कि तुमने कलाकार बनने के लिए अपनी पढाई छोड दी है. जिन लोगों को तुमने अभी-अभी चिडी दिमाग कहकर खारिज़ किया, एक दिन उन्‍हीं लोगों को तुम्‍हें अपनी तस्‍वीरें बेचनी होगी. जब उन्‍हें पता चलेगा कि पढाई छोडकर तुमने अपना भविष्‍य- अपनी पूरी जिंदगी तबाह कर ली है- तब हां, तुम्‍हारी एकाध पेंटिंग वह तुमसे ज़रुर खरीदेंगे. बस रहम दिखाने की खातिर, तुम्‍हारे अब्‍बू और मुझे छोटा दिखाने की गरज से, या फिर उनको तुमपर तरस आयेगा और वह कुछ पैसे तुम्‍हारे हाथ में रखना चाहेंगे. लेकिन किसी भी सूरत में तुम्‍हारा वे अपनी बेटियों से व्‍याह होने नहीं देंगे. वह प्‍यारी-सी लडकी जिसकी तुम तस्‍वीरें बनाया करते थे, क्‍या लगता है तुम्‍हें, क्‍यों आनन-फानन में उसके बाप ने उसे स्वित्‍ज़रलैंड भेज दिया भला? जिस तरह की हमारी यह जगह है ऐसे गरीब मुल्‍क में- जहां हर तरफ कमज़ोर, हारे हुए, अधपढे लोग भरे पडे हैं, वहां लोग आपको कुचले नहीं और आपको ऊंचा जीवन मिले, आप इज्‍जत से अपना सिर उठाकर चल सकें, इसके लिए आपको अमीर बनना पडेगा. इसलिए आर्किटेक्‍चर मत छोडो, मेरे बेटे. ऐसा करके बाद में बहुत दुख उठाओगे. ले’काबुर्जिये को ही देखो. वह पेंटर होना चाहता था लेकिन उसने आर्किटेक्‍चर की पढाई की.’

बेयोलू की सडकें, उनके अंधेरे कोने, भाग निकलने की मेरी ख्‍वाहिश, मेरा अपराध- सब जलती-बुझती नियॉन बत्तियों की तरह मेरे माथे में झिलमिला रही थीं. मैं जानता था आज की रात अम्‍मी और मेरे दरमियान झगडा नहीं होगा, कुछ मिनटों में मैं दरवाज़ा खोलूंगा और शहर की सुकूनदेह सडकों पर भाग निकलूंगा. और आधी रात तक भटकने के बाद, मैं घर लौटूंगा और अपनी मेज़ के आगे बैठूंगा और कागज़ पर उस पूरे गणित को कैद करुंगा.

‘मैं कलाकार नहीं होना चाहता,’ मैंने कहा. ‘मैं एक लेखक बनूंगा.’

इस्‍तांबुल के आखिरी अध्‍याय का यह किस्‍सा तो यहां खत्‍म हुआ. मगर इस थोडा लंबे चले सिलसिले में हम एक छोटी-सी कडी और जोडना चाहते हैं. नीचे अंग्रेजी में उद्धृत पंक्तियों पर पहले एक नज़र डालिये:


”I believe literature to be the most valuable hoard that humanity has gathered in its quest to understand itself. Societies, tribes, and peoples grow more intelligent, richer, and more advanced as they pay attention to the troubled words of their authors, and, as we all know, the burning of books and the denigration of writers are both signals that dark and improvident times are upon us. But literature is never just a national concern. The writer who shuts himself up in a room and first goes on a journey inside himself will, over the years, discover literature's eternal rule: he must have the artistry to tell his own stories as if they were other people's stories, and to tell other people's stories as if they were his own, for this is what literature is. But we must first travel through other people's stories and books.”

यह पंक्तियां उस बडी तकरीर का हिस्‍सा हैं जो पिछले वर्ष सात दिसम्‍बर को स्‍वीडन में पामुक ने अपना नोबल स्‍वीकारने के दौरान पढा था. तुर्की जुबान में. अंग्रेजी में उसे पूरा देखने में आपकी दिलचस्‍पी हो तो उसे यहां देखिये: अब्‍बू का बक्‍सा.

(भूमिका व पहली किस्‍त, दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी किस्‍त)

ऊंची इमारतों के अंधेरे

आज की सच्‍चाई है कि हमारी पूरी सामाजिकता घिर-घिरकर बस अपने घर, अपने परिवार तक सिमटकर रह गई है. परिवार से बाहर के समाज को हम पहचानते नहीं. वह हमें सशंकित व भयभीत करता है. हम दस तरह की लक्ष्‍मण रेखायें खींचकर इस समाज से अपना नाता जोडते हैं, अपेक्षायें पालते हैं. समाज के जीवंत स्‍पंदन में हमारी सांसों का भी योगदान हो, उसकी गुणवत्‍ता बढाने में हम भी अपनी तरफ से कुछ योग करें, यह मानसिकता बतकहियों में हम भले प्रकट करते रहें, हमारी आत्‍माओं से उसका लोप हो गया है. संगम पाण्‍डेय पेशे से पत्रकार हैं, हमारे पुराने मित्र हैं. आज उनका एक ई-मेल आया. एक छोटी घटना का जिक्र है, लेकिन इसी मानसिकता की वह एक बडी तस्‍वीर बनाता है. गनीमत है बच्‍चे अभी इस समाज के बडों जितना समझदार नहीं हुए. एक नज़र आप भी देखिए:
आज एक दिल को छू जाने वाली घटना हुई. नौवीं मंजिल पर एक खाली पड़े फ्लैट के दरवाजे के नीचे एक फांक बनी हुई है. एक कुत्ते ने उसमें घुसने की कोशिश की, और उसकी गर्दन वहां फंस गई. वह शायद कल दोपहर से ही इस तरह फंसा हुआ था. बिल्डिंग में रहने वाले तमाम लोगों ने कुत्ते के रोने की दर्दनाक आवाज सुनी, पर उसपर तवज्जो देने की फुरसत किसी के पास नहीं थी. फुरसत थी चुन्नू (संगम का दसेक साल का बेटा) और उसके दोस्त कार्तिक और उसकी बहन विदुषी के पास. कार्तिक शायद छुट्टी पर था, वह सुबह ही कुत्ते को देख आया था. चुन्नू के आने के बाद तीनों उसे मुक्त कराने के लिए वहां पहुंचे. उन्होंने काफी परिश्रम किया. आखिर एक ईंट की ठोकर से दरवाजे के नीचे की एक टायल ढीली हुई और इस तरह कुत्ता मुक्त हुआ. डेढ़ दिन से फंसे-फंसे वह बुरी तरह लस्त हो चुका था. किसी तरह उतरा और हमारे फ्लोर के एक बिना दरवाजे के खाली फ्लैट में पड़े मलबे पर जाकर पड़ गया. बच्चों ने उसे रोटी दी, जिसे उसने लपक कर खा लिया, और फिर पड़ गया. शाम को वह फिर बुरी तरह रोने लगा. इस बार मैं और मीना भी गए. उसे पानी और डबलरोटी दी गई. उसने जल्दी से उन्हें खा लिया. उसे ओढ़ाने के लिए एक कपड़े का बंदोबस्त भी हो गया है. मगर बच्चों की चिंता खत्म नहीं हुई. वे बहुत देर तक उसके बिछौने के लिए एक खाली डिब्बा ढूंढ़ते रहे. उसके लिए जॉर्डन, जैकी इत्यादि नाम सोचते रहे. मैंने अपनी व्यावहारिक बुद्धि से उन्हें बताया कि उसे उतना ही दो जितना उसके स्वस्थ हो जाने तक के लिए जरूरी है. वरना वह परक जाएगा और स्वस्थ होने के बाद भी घर के चक्कर लगाएगा. अच्छा हो कि कुत्ता जल्द ही स्वस्थ हो जाए. ताकि कहीं कोई कचोट बाकी न रहे.

Thursday, February 15, 2007

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: पांच

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की पांचवी किस्‍त

‘फ्लॉबेयर को देखो, सारी जिंदगी वह उसी मकान में रहा जहां उसकी मां रहती थी!’ अपने नये पत्‍तों को गौर से जांचते हुए, थोडी दया व थोडी कातरता से अम्‍मी ने बात आगे बढाई. ‘लेकिन मैं नहीं चाहती कि तुम अपना सारा जीवन इसी मकान में मेरे साथ पडे-पडे बिताओ. वह फ्रांस था. जब लोग कहते हैं कि देखो, महान कलाकार जा रहा है तो वहां पानी भी बहना बंद कर देता है. जबकि यहां कोई पेंटर स्‍कूल छोडकर अगर अपनी मां की संगत में जिंदगी काटे तो या तो वह दारुबाज हो जायेगा या फिर उसका अंत पागलखाने में होगा.’ और फिर एक नया तुरुप: ‘तुम्‍हारा अगर एक पेशा होता, तब यकीन मानो, तुम्‍हें अपनी पेंटिंग से सचमुच खुशी मिलती.’

‘ऐसा क्‍यों था कि दुख, गुस्‍से व बेहाली के इन क्षणों में उन उजाड गलियों की अपनी निशाचरी टहलों में- जहां मेरा संग देने को सिर्फ मेरे ख्‍वाब होते थे- मुझे आनंद की अनुभूति होती थी? पर्यटकों को प्रिय सूरज में नहाये इस्‍तांबुल के पोस्‍टकार्ड वाले नज़ारों की बजाय आखिर क्‍यों मुझे नीम-अंधेरों में ढंकी पिछवाडे की गलियां, शामें, जाडे की सर्द रातें, गली की मद्धिम रोशनी के नीचे से गुज़रते भुतहा लोग, फ़र्शी पत्‍थरों वाले नज़ारे, उनका अकेलापन ज्‍यादा पसंद थे?

‘अगर तुम आर्किटेक्‍ट न बने या कमाई का कोई और ज़रिया नहीं खोजा तो उन कंगाल, विक्षिप्‍त तुर्की कलाकारों जैसा कुछ हो जाओगे जिनके पास अमीरों व ताक़तमंदों की दया पर आश्रित होने से अलग और कोई चारा नहीं बचता- भेजे में घुसती है बात? ज़रुर घुसेगी- इस मुल्‍क में महज़ पेंटिंग के बूते किसी का गुज़ारा नहीं चल सकता. तुम दयनीय हो जाओगे, लोग नीची नज़रों से देखेंगे. ग्रंथियां, बेचैनी और कुढन मरने के दिन तक तुम्‍हारा पीछा न छोडेंगी. तुम्‍हारे जैसा ज़हीन, इतना प्‍यारा, जिस तरह जिंदगी से तुम लबालब भरे रहते हो- वाक़ई तुम इस तरह की चीज़ करना चाहते हो?’

मैं बेसितास तक टहलता हुआ जाता और दोलमाबाशे महल की दीवार से लगा-लगा दूर स्‍टेडियम तक पहुंचकर, दोल्‍मुस स्‍टॉप तक की दुरी नाप आता. मुझे रात में महल की इन ऊंची, पुरानी, काईयों से नहाई भारी दीवारों से लगे-लगे टहलना अच्‍छा लगता था. मैं अपने माथे के अंदर खदबदाते गुस्‍से की उस ऊर्जा को महसूस करता जो मेरे दोलमाबाशे पहुंचने तक हर गुज़रते मिनट के साथ और हिंसक होती चली जाती, फिर मैं एक गली के अंदर घुसता और बारह मिन्‍टों के अंदर तकसिम पहुंच चुका होता.

‘जब तुम छोटे थे, खराब से खराब मौके पर भी हमेशा मुस्‍कराया करते थे. खुश और उम्‍मीदबर रहते थे. ओह, कितने प्‍यारे बच्‍चे थे तुम. तुम्‍हें देखनेवाला बिना मुस्‍कराये नहीं रह पाता था. इसलिए नहीं कि तुम खूबसूरत थे, बल्कि इसलिए कि तुम्‍हें खबर ही न थी कि उदासी किस चिडिया का नाम है, क्‍योंकि बोर तो तुम होते ही न थे. खराब से खराब सूरत में भी तुम अपनी खातिर कुछ खोज लेते थे और घंटों खेल में डूबे रहते थे, ऐसे थे तुम हंसमुख. इस तरह का बच्‍चा एक परेशान, त्रस्‍त कलाकार बने, अमीरों के पीछे-पीछे घूमता फिरे- मैं तुम्‍हारी अम्‍मी न होती तो भी मुझसे बर्दाश्‍त न होता. इस‍लिए मैं नहीं चाहती कि मेरी बातों का तुम बुरा मानो, और अब गौर से मेरी बात सुनो.’

अगली दफा आखिरी किस्‍त...

(भूमिका व पहली किस्‍त, दूसरी, तीसरी, चौथी किस्‍त)

घर वापसी

दो छोटे कमरे और एक अंधेरा बरामदा
सोचकर ताज्‍जुब हुआ इतनी-सी जगह
में अम्‍मां ने नौ लोगों को पाला-पोसा
संसार में मुफलिसी, तीतर बटेर के खेल
खेलने, आवारा घूमने के काबिल बनाया.

आंगन में दीवार से लगी जंगलगी टूटी
साइकिल पड़ी. बरसाती पानी में और
करियाती हुई. तुलसी का एक मुरझाया,
लावारिस हो रहा पौधा.

वह स्‍त्री जो चालीस वर्षों तक इस उखड़े घर को
कोमलता से भरने के जतन करती फिरी
चूल्‍हा बरतन में झुंकती रही
छोटे-छोटे सिक्‍कों से ऊंचे हौसले सिलती रही
अब अचानक सब छोड़कर एकदम से चुप हो गई है.

दीवार के शीशे में जड़ी उसकी फोटो के नीचे छुट्टन
बैठा पालक में भात सानकर खा रहा है. ज़रा हटकर
दरवाज़े से बाहर बाबू दांत पर गुड़ाखू मल रहे हैं
थोडी देर में पानी के लोटे के लिए आवाज़ लगायेंगे
भौजी अनसुना किये रहेगी. रामजीत तीन दिनों से गायब है
उसकी याद करने की किसी को फुरसत नहीं.

मैंने भौजी से कहा भौजी इस बार कटहल की तरकारी खिला दो
भौजी लंबी सांस छोड़कर बुदबुदाई एक दिन
इस घर के लोग उसकी जान लेकर छोड़ेंगे.
सुगना पिंजरे में बेमतलब पंख मार रहा है.
मैं फुसफुसाकर कहना चाहता हूं अम्‍मां
मैं तुम्‍हारी खातिर घर लौटा हूं. अम्‍मां तुम कहां हो.
अम्‍मां बहुत गोड़ दुख रहा है.

दरवाज़े के बाहर बाबू पानी के लिए आवाज़ लगाते हैं
छुट्टन भात की मक्‍खी उड़ाता है
भौजी अनसुना किये दीवार तकती बैठी रहती है
थोड़ा ठहरकर छुट्टन कहता है मैं भैया के लौटने तक रुक जाऊं.

श्री सु कु जी का परदेस प्रवास

हमारे एक परम प्रिय, मन से नेक़, सु कु जी अभी-अभी महीना भर का समय इंग्‍लैण्‍ड के एक छोटे शहर में गुजार कर लौटे हैं. नई-नई लगी नौकरी का ऑरियेंटेशन था सो थोडा-बहुत गोरे सीनियरों का लेक्‍चर सुनने से अलग माथे पर काम का विशेष बोझ था नहीं. फुरसत में श्री सु कु मियां छोटे व लगभग खाली-खाली-से लगते शहर की साफ़ सडकों व अपनी भरी जेबों की नई जीवन शैली का खुशी-खुशी अभ्‍यस्‍त हो रहे थे. यहां के देसी सैरों में उन्‍हें किसी चर्च के अंदर पैर रखने का कभी ख़याल नहीं आया था मगर इंग्‍लैण्‍ड में जितना सपर सकता था, उन्‍होंने सभी चर्च, चैपल, कैथेड्रल का मुआयना किया. अपने डिजि‍टल कैमरे में सारी झांकियां कैद कीं. बत्‍तख, बागीचे, औरतें, सडक, हाईवे, बुड्ढे, बस, बाज़ार, आसमान, दिन का अंधेरा, रात के उजाले कुछ नहीं बख्‍शा. इतनी तस्‍वीरें उतारीं कि सब देखने की गुजारिश पर आदमी का उनसे झगडा हो जाये.

श्री सु कु जी के साथ ही इंग्‍लैण्‍ड गये नई नौकरी के दो अन्‍य सिपाही फुरसत के दिनों में नई शादियों के बसे अपने नये घरों के लिए जब कप-चिलमची और फोटो-फ्रेम खरीदते हुए शॉपिंग मॉल्‍स रगेद रहे थे, हमारे सु कु जी ब्रिस्‍टल, मैनचेस्‍टर, लीवरपुल और लंदन की बसें और रेल पकड रहे थे; ट्रेफेलगर स्‍क्‍वॉयर, बकिंघम पैलेस, विक्‍टोरिया व अलबर्ट म्‍यूजियम हॉलों की नुमायश देख रहे थे. बाद में, यहां तस्‍वीरों को दिखलाते हुए उन्‍होंने अपने छोटे भाई को सूचित किया, ‘देख रहे हो ना, हमारा कोहिनूर यहीं बंद है! हमारे यहां का सब लूट-लूटकर अपने यहां सजाया है! उनका बस चलता तो ताज़महल, अजंता और एलोरा भी उठा के लेके जाते! यही हाल ईजिप्‍ट का किया है- पूरी दुनिया का किया है, यार! वर्ना वो हैं क्‍या. पूरी यूके की आबादी से ज्‍यादा लोग तो अकेले अपनी बंबई में रहते हैं! पूरे आयरलैण्‍ड में जितने लोग रहते हैं उससे ज्‍यादा बोकारो में रहते हैं.’ मैंने एतराज़ किया, ‘सु कु जी, आप इस तरह कॉंन्फिडेंटली मत बोलिये.’

श्रीयुत सु कु ने जवाब दिया, ‘नहीं, सर, मैं करेक्‍ट बोल रहा हूं. कॉलोनियल हिस्‍ट्री ने हमारा एकदम बेडा गर्क कर दिया. आर्ट, सोसायटी, सडकें, शहरों का मेन्‍टेनेंस, आर्किटेक्‍चर, लाईफ-स्‍टाईल किसी भी चीज़ में हमारा कोई मुकाबला ही नहीं है उनसे. वी आर वे-वे बिलो देयर मार्क. वी आर- पथेटिक. ऐसी पहाडियां दिखती हैं कि देखकर तबियत हरी हो जाये! फिर हवा- आप उनको छू और सूंघ सकते हो. यहां बंबई में तो पता ही नहीं चलता कि हवा नाम की चीज़ रहती कहां है!’ छोटे भाई ने जो बहुत देर से विदेश की बडाई सुनता खार खाये बैठा था, चिढे अंदाज़ में प्रतिकार किया, ‘ठीक है, ठीक है, बंबई ही इंडिया नहीं है. इंडिया में हवा है अभी!’ सु कु जी ने भाई को अनसुना करते हुए अपनी बात में जोडा, ‘छोटे-छोटे गांव में वहां ऐसी गाडियां दिखती हैं जो आपको बंबई की सडकों पर नहीं दिखेंगी! यहां सब सेकेंड रेट है. गोरों की बात ही अलग है, यार.’ मैंने सु कु जी को समझाने की कोशिश की कि वे कुछ ज्‍यादा ही विदेशी नशे में धुत्‍त होकर लौटे हैं, स्‍वदेस प्रेम कुछ तो उनकी ज़बान की कडवाहट कम करे. हमारे परम-प्रिय श्री सु कु ने हिक़ारत से एक बार मेरी ओर देखा फिर मोहल्‍ला के ब्‍लॉग पर रवीश कुमार की ताज़ा टिप्‍पणी के शीर्षक (क्‍या इस मुल्‍क को चूतिया बनाया जा रहा है? ) पर उंगली उठाते हुए एकदम-से ज़हर उगला, ‘ये गलत है. यह दरअसल सवाल नहीं स्‍टेटमेंट होना चाहिये.’

अनुराग कश्‍यप की राजनीतिक समझ से हमें हमेशा से शंका रही है, अब आगे अपने चहेते सु कु जी को भी मैं सशंकित नज़रों से देखने को मजबूर हो रहा हूं. जीवन की ऐसी दग़ाबाजियां अब आये दिन होती रहती हैं, क्‍या कीजियेगा. अपने समय और इतिहास की लपेट से किसी का कितना बचना होता है?

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: चार

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की चौथी किस्‍त


‘तुम्‍हें अपनी यूनिवर्सिटी की पढाई खत्‍म करने का आखिर कोई तो तरीका ढूंढना ही होगा,’ अम्‍मी ने अपने आगे नया खेल सजाते हुए कहा. ‘पेंटिंग के बूते तुम अपनी जिंदगी नहीं चला सकते. तुम्‍हें कोई नौकरी ढूंढनी होगी. वैसे भी हमलोग अब पहले की तरह अमीर नहीं रहे.’

’ये सच नहीं है,’ मैंने कहा. बहुत पहले से सोच-समझकर मैंने यह नतीजा निकाला हुआ था कि मैं जिंदगी में कुछ न भी करुं तो भी मेरे घरवाले मेरा खर्चा तो ज़रुर उठायेंगे.

‘तुम यह कहना चाहते हो कि तुम पेंटिंग से अपना खर्च चलाओगे?^’

थोडी कातर और थोडा ताने-सी मारती जिस गुस्‍से के अंदाज़ में अम्‍मी ने ऐश-ट्रे में अपनी सिगरेट बुझाई, और इतने महत्‍वपूर्ण विषय पर बात करते हुए भी वह जैसे ताश खेल रही थी, मुझे इसका खूब अंदाज़ था कि हम किधर बढ रहे हैं.

’यह पैरिस नहीं है, यह समझ लो. यह इस्‍तांबुल है,’ अम्‍मी ने कहा, जैसे इस बात से उसे खुशी हो रही हो. ‘अगर तुम दुनिया के सबसे पहुंचे हुए कलाकार होते तो भी यहां कोई तुम्‍हारी रत्‍ती भर भी परवाह नहीं करता. पूरी जिंदगी अकेले काटते. किसी के पल्‍ले न पडता कि पेंटिंग के पीछे तुमने इतना अच्‍छा भविष्‍य चौपट क्‍यों कर लिया. अगर हम भी समृद्ध समाज होते जहां कला और पेंटिंग की इज्‍जत होती तब मालूम नहीं, तब शायद और बात होती. मगर यूरोप में भी सब यही मानते हैं कि वैन गॉग और गोगें सनकी थे.’

यकीनन उसने अस्तित्‍ववादी साहित्‍य के बारे में वह सारी कहानियां सुन रखी थीं जिसे पचास के दशक में मेरे अब्‍बू खूब दिलो-जां से पसंद करते थे. एक विश्‍वकोश जैसी डिक्‍शनरी हुआ करती थी, जिसके पन्‍ने अब पीले पड गए थे और जिल्‍द जीर्ण-शीर्ण हो चला था, तथ्‍यों की जांच के लिए वह मेरी अम्‍मी की सबसे बडी कूंजी थी. ज्ञान के उस खास रिवाज़ का जवाब मैंने इस व्‍यंग्‍यपूर्ण प्रत्‍युत्‍तर के साथ दिया: ’तो तुम्‍हारी Petit Larousse कहती है कि सारे कलाकार सनती होते हैं?’

‘मुझे कोई अंदाज़ नहीं, मेरे बच्‍चे. एक शख्‍स अगर बहुत प्रतिभाशाली, बहुत मेहनती है, और उसकी किस्‍मत भी अच्‍छी है तब शायद यूरोप में वह मशहूर हो जाये. लेकिन तुर्की में तुम सिर्फ पागल हो सकते हो. प्‍लीज़, मेरी बातों को गलत मत समझो. ये सब मैं तुम्‍हें अभी इसलिए कह रही हूं कि बाद में तुम्‍हें पछतावा न रहे.’

लेकिन मुझे अभी पछतावा हो रहा था, और यह सोचकर और ज्‍यादा हो रहा था कि वह पेशेंस खेलती और अपनी किस्‍मत पढती मुझसे ऐसी चोट पहुंचानेवाली बातें कह सकती थी.

’तुम्‍हारे हिसाब से ठीक-ठीक क्‍या वजह है जो मैं इतना चिढा हुआ हूं?’ मैंने पूछा, शायद इस उम्‍मीद में कि वह कुछ ऐसा कहे जिससे मेरे घाव को और चोट पहुंचे.


’मैं नहीं चाहती कि लोग समझें तुम्‍हें साइकॉलाजिकल दिक्‍कतें हो रही हैं,’ अम्‍मी ने कहा. इसीलिए मैं अपने दोस्‍तों के बीच कहती नहीं फिरती कि तुम अपनी क्‍लासेस नहीं अटेंड कर रहे. वो ऐसे लोग नहीं जो समझें कि क्‍यों तुम्‍हारी हैसियत का लडका पेंटिंग के पीछे यूनिवर्सिटी छोड रहा है. उन्‍हें लगेगा तुम्‍हारा दिमाग़ चल गया है, पीठ पीछे तुम्‍हारा मज़ाक उडायेंगे.’

’तुम्‍हें उनसे जो कहना है कहो,’ मैंने कहा. ‘उनकी तरह नमूना न बनने की खातिर तो मैं कुछ भी छोड दूं.’

’तुम ऐसा कुछ भी नहीं करने जा रहे,’ अम्‍मी ने कहा. ‘आखिर में तुम वही करोगे जो छुटपन में करते थे- अपना बस्‍ता उठाओगे और बडबडाते हुए स्‍कूल जाओगे.’

’मैं आर्किटेक्‍ट बनना नहीं चाहता- मुझे पक्‍का मालूम है.’

’दो साल और पढ लो, मेरे बेटे, यूनिवर्सिटी का डिप्‍लोमा हासिल कर लो, फिर उसके बाइ तय करते रहना कि तुम्‍हें आर्किटेक्‍ट बनना है या पेंटर.’

’नहीं.’

’तुम्‍हें बताऊं तुम्‍हारे आर्किटेक्‍चर छोडने पर नरीहान क्‍या सोचती है?’ अम्‍मी ने कहा, और मैं समझ रहा था कि अपनी एक सबसे बेकार सहेली की राय की आड में वह मुझपर चोट करने की कोशिश कर रही थी. ‘मेरे और तुम्‍हारे अब्‍बू के बीच जो ये रोज़ लडाईयां होती हैं तुम उससे परेशान हो, तुम्‍हारा मन भटका हुआ है- क्‍योंकि वे हर वक्‍त दूसरी औरतों के पीछे भागते रहते हैं- ये कहती है नरीहान.’

’मुझे परवाह नहीं चिडिया-से भेजे वाले तुम्‍हारी सोसायटी के दोस्‍ते मेरे बारे में क्‍या सोचते हैं!’ मैं चीख़ा. बावजूद जानते हुए कि वह मुझे उकसाने की कोशिश कर रही थी मैंने उसके जाल में पैर फंसाया, इस उम्‍मीद में कि यह सबकुछ नाटकबाजी की बजाय असल रोश की तस्‍वीर बन जाये.

’तुम बहुत अभिमानी हो, मेरे बच्‍चे,’ अम्‍मी ने कहा. लेकिन तुम्‍हारी यह चीज़ मुझे पसंद है. क्‍योंकि जिंदगी में जो ज़रुरी है वह कला-फला की बकवास नहीं, स्‍वाभिमान है. यूरोप में बहुत लोग हैं जो कलाकार बनते हैं क्‍योंकि वे अभिमानी और ईमानदार हैं. क्‍योंकि वहां कलाकार को बनिया और जेबकतरा नहीं समझा जाता. कलाकारों से लोग ऐसे पेश आते हैं मानो वे खास हों. लेकिन तुम बताओ इस तरह के मुल्‍क में तुम कलाकार बनोगे और तुम्‍हारा स्‍वाभिमान फिर भी अक्षुण्‍ण बना रहेगा? जिन्‍हें कला की कोई तमीज़ नहीं ऐसे लोग तुम्‍हें मंजूरी दें, तुम्‍हारी कला खरीदें, इसके लिए तुम्‍हें हुकूमत, अमीरों- और सबसे गये-गुज़रे, अधपढे ख़बरनवीसों के आगे नाक घिसनी होगी- तुम समझते हो तुमसे यह सब होगा?’

मेरे उन्‍माद ने मुझमें एक ऐसी मदहोश-सी करनेवाली ऊर्जा भर दी कि मैं अपने आपे से बाहर निकल आया. मैंने एक अद्भुत महत्‍वाकांक्षा का अहसास किया- इतनी विराट कि खुद मुझको हैरानी हुई- कि घर छोड दूं और बाहर गलियों में निकल भागूं. फिर यह सोचकर मैंने खुद को रोक लिया कि यहां लफ्जों की मार-काट मचाता अगर मैं थोडी देर और जमा रहा, जितना हो सके उतनी तहस-नहस करके, दम भर बग़ावत करके, चोट देकर और जवाब में चोट पाकर, इसके बाद जब हम दोनों ही अपना सबसे तीख़ा ज़हर उगल चुके होते, मैं तब भी भागकर दरवाज़े से बाहर गाढी, गंदले शाम और पिछवाडे की गलियों में पहुंच सकता था. गलियों की बत्तियों की फ़ीकी या गुल रोशनियों के पार, तंग ईंटोवाली सडकों की उदासी में मेरे पैर मुझे उबड-खाबड फुटपाथों पर इस छोर से उस छोर तक चलवाते. और ऐसी शोकपूर्ण, गंदी व बदहाल जगह से जुडे होने के एक पतित सुख से मैं आनंदित होता. गुस्‍से में लबालब डूबा, विचारों व तस्‍वीरों की कडियों की लडियों में गुज़रता मानो वे किसी नाटक के किरदार हों, उन महान कार्यों की कल्‍पना करता जो मैं किसी दिन करुंगा- मैं बिना ठहरे चलता चला जाता.

बाकी आगे...

(भूमिका व पहले के किस्‍तों के लिये ऊपर दायें लिंक पर माऊस की तीर बजायें)

बडा हो रहा बच्‍चा

जामुन के पेड से छूटकर गिरा था बच्‍चा
पिता देखने आये अस्‍पताल
बहन आई दो संतरे लेकर
लौटने लगे जब
अस्‍पताल की खिडकी से लगकर
बहुत देर रोया बच्‍चा.

कभी गले में तक़लीफ रहती
कभी दाने आ जाते कभी फोडा
पिता कहते कोई नहीं,

जा, खेल आ.
कोई नहीं के जतन में बच्‍चा खेलने चला जाता
और तक़लीफ भूल जाती


जो अगर बदमाशी लगती
पिता फिर पीटते बहुत
दंड का एक दूसरा तरीका था
कपडे उतरवा के बाहर गली में खडा कर दिया
बेइंतहा चोट लगती
वापस कपडे पाकर भी नंगा देर तक कांपता बच्‍चा

इतने तरीके थे बडे होने के
हिंसा और अपमान का एक बीहड-सा भूगोल था
इनसे इतर तरीकों का बचपन भी पाया जाता है संसार में
यह समझने के लिए बच्‍चे को बडा होना पडा
कभी तो बच्‍चा निडर क्‍या मज़े में रहता
सडक के एक छोर से दूसरी तक
बिजली और जादू फैलाकर
लगभग एक अच्‍छी-सी कविता हो जाता.

स्‍कूल के अंधेरों व हैरत के उजालों में
बच्‍चा किसी दूर की कल्‍पना करता
कोई नई जगह, कोई एक चेहरा,
एक गाने की धुन तेज़ी से घूमती साइकिल
कोई फिल्‍म रंगीन

बच्‍चा ठहरकर भागता
और फिर चुपचाप वापस लौटता घर
चकित होकर पहचानने की कोशिश करता
कि वह क्‍या है यहां जो उसकी छाती पर सवार
एकदम-से उसे इतना उदास बना डालता है, कि वह
क्‍या है जिसे वह पहचानता नहीं अब इस घर में, या कि
बदल गया है वह खुद.

रात की नींदों में डोलती
शहर के सिरे से जब एक रेल गुजरती
बच्‍चा उसमें सवार होता
यह न सचमुच की रात होती
न सचमुच की रेल
इच्‍छाओं के तागों में बच्‍चा भविष्‍य बुन रहा था
असल यात्रा के फलित होने में अभी और बरस बाकी थे.

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: तीन

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की तीसरी किस्‍त

फिर दूसरे मौकों पर, अपने तर्कों को गरिमा देने के लिए अम्‍मी मुझसे कहती कि उसने मेरा नाम ओरहान इसीलिए रखा था क्‍योंकि सभी ओटोमन सुलतानों में एक सुलतान ओरहान ही ऐसे थे जिन्‍हें वह सबसे ज्‍यादा पसंद करती थी. सुलतान ओरहान कभी हवाई योजनाओं के पीछे नहीं भागते रहे थे, न खामखा अपनी तरफ लोगों का ध्‍यान आकर्षित किया था. हर तरह की अति से बचते हुए उन्‍होंने निहायत सामान्‍य-सी जिंदगी जी थी. यही वजह है कि इतिहास की किताबों में दूसरे ओटोमन सुलतान को इतनी इज्‍ज़त, इतने किफ़ायतशारी से याद किया जाता है. यह कहते हुए अम्‍मी मुस्‍कराती, और यह साफ हो जाता कि वह चाहती थी कि मैं समझूं कि वह क्‍यों इन्‍हें इतना ज़रुरी गुण मानती थी.

उन शामों को जब अम्‍मी अब्‍बू का इंतज़ार करती होती, और मैं अपने कमरे से निकलकर उससे बहस करने आता, मैं जानता होता कि मेरी भूमिका इस्‍तांबुल के नाम पर पेश होनेवाले बदहाल, मामूली , उदास जीवन के प्रति विरोध की होगी, और उससे जुडे साधारणपने के उन तमाम आसरों का जिसकी अम्‍मी मेरे लिए कामना किया करती. कभी-कभी मैं खुद से सवाल करता, ‘मैं क्‍यों बाहर जाकर फिर उससे जिरह कर रहा हूं?’ और कोई संतोषजनक जवाब न पाने पर मैं अंदर एक ऐसी बेचैनी महसूस करता जिसके मानी मैंने तब समझना शुरु नहीं किया था.

’तुमने पहले भी क्‍लासों की गुल्‍टी मारी है,’ अपने पत्‍तों को जल्‍दी-जल्‍दी फेंटते हुए अम्‍मी कहती, ‘तुम कहते मैं बीमार हूं, मेरा पेट दुख रहा है- जब हम चिहांगिर में थे, तब तुमने इसकी आदत-सी डाल ली थी. तो एक दिन जब तुमने कहा- मैं बीमार हूं, मैं स्‍कूल नहीं जाऊंगा- मैं तुमपर चीखी थी, तुम्‍हें याद है? मैंने कहा था- तुम बीमार हो या नहीं, तुम अभी यहां से निकलोगे और सीधे स्‍कूल जाओगे. मैं तुम्‍हें घर के अंदर नहीं देखना चाहती.’

कहानी के इस मोड पर आकर, जिसे सुनाने का वह कोई मौका नहीं चूकती, अम्‍मी ठहरती- शायद इस ख़याल से कि इसे सुनकर कितना मेरा पारा चढता है, और मुस्‍कराती. इसके बाद एक अंतराल आता जब वह अपने सिगरेट का कश लेती, और फिर बिना मुझसे आंख मिलाये, मगर हमेशा कुछ झूमती-सी आवाज़ में, वह जोडती, ‘उस सुबह के बाद मैंने तुमसे फिर नहीं सुना कि- मैं बीमार हूं, मैं स्‍कूल नहीं जा रहा.’

‘तो मैं अभी कह रहा हूं!’ मैं दुस्‍साहसी होकर जवाब देता, ‘आर्किटेक्‍चर फैकल्‍टी में मैं दुबारा पैर रखनेवाला नहीं.’
’फिर क्‍या करोगे? मेरी तरह घर में बैठोगे?

धीमे कहीं मेरे अंदर यह जिद उठती कि इस जिरह को खींचकर इसकी हदों तक ले जाया जाये. फिर दरवाज़ा पीटकर किसी लंबे, तन्‍हां सैर को निकल जायें- बेयोलू के पिछवाडे की गलियों में थोडा नशे में, थोडा वहशी बने सिगरेटें धूंकते रहें और हर किसी और हर चीज़ से नफ़रत करें. उन वर्षों मेरा टहलना घंटों चलता. और कभी ढेर सारी घुमाई कर चुकने के बाद- दुकानों के शीशे, रेस्‍तरां, अध-रोशन कहवाघर, पुल, सिनेमा हॉल, विज्ञापन, लिखावटें, गंदगी, कीचड, फुटपाथ पर इकट्ठा गाढे पानी के जमाव में बरसात की बूंदों का गिरना, नियॉन बत्तियां, कारों के हेडलाईट्स, कुडेदानी को ऊपर-नीचे खंगालते कुत्‍तों की टोली देखते हुए एक दूसरी इच्‍छा मेरे अंदर उमडती, कि घर जाऊं और इन सारी तस्‍वीरों को लफ्जों में भरुं, सही शब्‍द खोजूं जो इस गाढी रूह, इस थके, इस रहष्‍यभरे जंजाल को ज़ाहिर कर सके. यह आग्रह कुछ वैसा ही दुर्दमनीय हुआ करता जैसा पुराने दिनों की एकदम-से पेंट करने की बेचैनी, लेकिन तब मुझे मालूम न होता मैं इस इच्‍छा का क्‍या करुं.

‘ये क्‍या लिफ्ट की आवाज़ है?’ अम्‍मी ने कहा. हम दोनों सुनने के लिए ठहर गए, मगर ऐसा कुछ सुनाई न पडा जो लिफ्ट का अंदाज़ दे. अब्‍बू ऊपर नहीं आ रहे थे. अम्‍मी ने जैसे ही वापस अपना ध्‍यान पत्‍तों में लौटाया, एक नये जोश में उन्‍हें फेंटने लगी, मैंने ताजुब्‍ब से उसकी ओर देखा. उसका अपना एक अंदाज़ था जो मेरे छुटपने में मुझे बहुत राहत देती थी, हालांकि बाद में जब उसने अपना स्‍नेह वापस खींच लिया उसके इसी अंदाज़ से मुझे तक़लीफ हुई थी. अब मेरी समझ में नहीं आता कि उसके भावों के क्‍या मतलब निकालूं. मैंने खुद को प्‍यार और गुस्‍से के एक असीमित मंझधार में फंसा पाया. चार महीने पहले, एक लंबी खोज-पडताल के बाद, अम्‍मी ने मेचिदियेकॉय में उस ठिकाने को खोज निकाला था जहां अब्‍बू अपनी माशूका से मिला करते थे. केयर टेकर से होशियारी से चाभी वसूल वह खाली मकान के अंदर उस दृश्‍य का सामना करने गई जिसका बाद में निर्ममता से वह मेरे आगे बयान करनेवाली थी. अब्‍बू जिसे घर में पहना करते थे उन पजामों का एक जोडा इस दूसरे बेडरुम के एक तकिये पर सजा पडा था, और बिस्‍तरे से लगे मेज़ पर ब्रिज-संबंधी किताबों का एक मीनार सजा था- कुछ वैसा ही जैसा घर में बिस्‍तरे के बाजू के अपने हिस्‍से में उन्‍होंने बना रखा था.

अम्‍मी ने जो कुछ देखा था, काफी वक्‍त तक उसका किसी से जिक्र नहीं किया. यह तो महीनों बाद, ऐसी ही एक शाम जब वह अपने पेशेंस में मगन थी- होंठों में सिगरेट और आंख के कोने टेलीविजन से लगे हुए थे- और मैं अपने कमरे से निकलकर उससे बात करने आया कि यकायक उसके मुंह से वह कहानी फूट पडी. हालांकि मेरी परेशानी ताडकर उसने अपना किस्‍सा छोटा कर लिया था. फिर भी, बाद में हर दफा जब मैं इसके बारे में सोचता- एक दूसरे मकान का ख़याल जहां रोज़ मेरे अब्‍बू जाया करते थे- मेरे रोंगटे खडे कर देता. गोया यह कोई ऐसी चीज़ थी जो मुझसे कभी न हो सकी और उन्‍होंने कर दिखाया था- अब्‍बू ने दूसरा, अपना एक जुडवां खोज लिया था, और उस दूसरे मकान में वह अपनी माशूका नहीं, इस शख्‍स के साथ वक्‍त बिताने जाया करते थे. इस भ्रांति ने ही मुझे अहसास दिया कि मेरा जीवन ही नहीं, मेरी आत्‍मा में भी कुछ है जो अपूर्ण है.

अगली किस्‍त आगे...

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: दो

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की दूसरी किस्‍त

उन दिनों कभी खुलकर तो कभी बिना नाम लिये अम्‍मी और मेरे बीच जिस चीज़ पर अक्‍सरहां जिरह हुआ करती- वह मेरा अनिश्चित भविष्‍य था. क्‍योंकि 1972 की सर्दियों में, आर्किटेक्‍चर फैकल्‍टी के अपने दूसरे साल के दरमियान, मैंने अपनी क्‍लासें अटैंड करना लगभग पूरी तरह से बंद कर दिया था. क्‍लास रजिस्‍टर में मेरी अनुपस्थिति मेरे कॉलेज निष्‍कासन का सबब न बने, से ज्‍यादा मैं शायद ही कभी तसकिसला आर्किटेक्‍चर फैकल्‍टी में कदम रखता.


कभी घबराहट में मैं खुद को तसल्‍ली देता कि, ‘आर्किटेक्‍ट न भी बना, तो कम से कम यूनिवर्सिटी का एक डिप्‍लोमा तो मेरे पास होगा.’ जिन चंद लोगों का मुझ पर थोडा असर था उनमें मेरे अब्‍बू और उनके कुछ दोस्‍त भी यह बात काफी दुहराते. यह सब सुनकर अम्‍मी की नज़रों में मेरी कहानी और संदेहास्‍पद होती. मैंने पेंटिंग से अपनी मुहब्‍बत को मरते देखा था, उससे जन्‍मे तक़लीफदेह खालीपन को जिया था, इसलिये भी मन के गहरे इस बात को बखूबी जान रहा था कि आर्किटेक्‍ट होना मेरे बूते की बात नहीं. साथ ही यह भी समझता था कि सुबह तक किताबें और नॉवेल पढते हुए, और तकसिम, बेयोलू और बेसितास की गलियों में रात-रात भर भटकता मैं पूरी जिंदगी नहीं गुजार सकता. कभी मैं दहशतज़दा एकदम से टेबल से उठ खडा होता कि अम्‍मी को अपनी हकीक़त से रुबरु करवा दूं. चूंकि मुझे इसका अंदाज़ न लगता कि मैं यह क्‍यों कर रहा था, और इसका तो और भी कम कि मैं उसके आगे क्‍या कबुलवाना चाहता था, कई मर्तबा लगता जैसे आंखों पर पट्टी चढाये हम एक-दूसरे से भिडे हुए हैं.

’मैं भी जब छोटी थी, तुम्‍हारी ही तरह थी,’ अम्‍मी कहती (मैं बाद में तय करता कि वह यह सब मुझे चिढाने के लिये किया करती). ‘तुम्‍हारी तरह मैं भी जिंदगी से भागा फिरा करती थी. जबकि तुम्‍हारी चाची-मौसियां सब यूनिवर्सिटी में दाखिल थीं, इंटेलैक्‍चुअल्‍स के बीच उठा-बैठा करतीं, मौज-मजा और नाच, पार्टियों में जातीं, और मैं तुम्‍हारी तरह घर में मुंह छिपाये पडी रहती और घंटों उजबकों की मानिंद, वह रिसाला जो तुम्‍हारे दादू जान को इतना पसंद था, इलस्‍ट्रेशन- उसे उलटा-पुलटा करती.’ फिर वह सिगरेट का एक कश खींचती, और मेरी ओर यह ताडने के अंदाज़ से देखती कि उसकी बातों का कुछ असर हो रहा है या नहीं. ‘संकोची थी, जिंदगी से खौफ़ होता था मुझे.’

उसके मुंह से यह सुनकर मैं समझ जाता उसका मतलब है- ‘तुम्‍हारी तरह’, और मेरे भीतर गुस्‍सा उबलना शुरु हो जाता. मैं यह सोचकर खुद को शांत करने की कोशिश करता कि वह यह सब ‘मेरे भले के लिये’ कर रही है. मगर अम्‍मी वही ज़ाहिर करती होती जो तुर्की में गहरे धंसी, बडे पैमाने पर समर्थित एक सामाजिक धारणा थी. और मेरी खुद की अम्‍मी भी वैसा ही सोचती है सोचकर मेरा दिल तार-तार हो जाता. टेलिविजन से मेरी आंखें हटकर बोसफोरस के ऊपर-नीचे तैरती जहाजी सर्चलाईट पर जाती, और मैं मन ही मन इस सबक को अपने अंदर दोहराता, और सोचता कैसे मुझे उसकी एक-एक बात से नफ़रत है.

इसे मैंने अपनी अम्‍मी से नहीं, जो यूं भी कभी खुले तौर पर इसका इज़हार नहीं करती थी, बल्कि इस्‍तांबुल के आलसी बुर्जूआजी और वैसी ही सोच रखनेवाले अखबारी स्‍तंभकारों से जाना था जो अपने पिटे, महा-निराशावाद के क्षणों में यह नतीजा निकालते थकते नहीं थे कि, ‘इस तरह की जगह से कुछ भी अच्‍छा नहीं निकल सकता.’

ऐसी सोच ने लंबे अर्से से इस शहर की इच्‍छाशक्ति को तोडकर रखा हुआ है. वही अवसाद इस निराशावाद के खाद का काम करती है. मगर यह अवसाद अगर बरबादी और गरीबी की देन है तो फिर शहर के अमीरों ने आखिर इसे गले क्‍यों लगा रखा है? शायद इसीलिए कि उनका अमीर होना भी महज़ एक संयोग है. फिर शायद इसलिए भी कि जिस पश्चिमी सभ्‍यता की नकल का वह सपना देखते हैं उसके मुकाबले खडी होने लायक एक भी शानदार चीज़ उन्‍होंने पैदा नहीं की है.

अम्‍मी के पास अलबत्‍ता उसके इन चेतावनियों भरे मध्‍यवर्गीय चखचख का कुछ आधार था जो वह ताजिंदगी दोहराती रही. शादी के ठीक बाद, मेरे व मेरे भाई की पैदाईश के पश्‍चात, अब्‍बू ने निर्ममता से उसका दिल तोडना शुरु किया. उनकी लंबी अनुपस्थियां, और शादी के बखत उसे जिसका दूर-दूर तक अंदाज़ न था- परिवार में धीमे-धीमे घर कर रही तंगी. मुझे हमेशा लगता कि इन बदकिस्‍मतियों ने उसे मजबूर कर दिया था कि लंबे समय तक समाज के आगे वह एक सुरक्षात्‍मक पोस्‍चर बनाये रहती. हमारे बचपन के वर्षों में, जब कभी वह मुझे और मेरे भाई को लिये बेयोलू खरीदारी को जाया करती, और सिनेमा या पार्क जैसी जगहों में मर्दों को अपनी ओर देखने पर उसका ध्‍यान जाता, उसकी सतर्क मुद्रा से अंदाज़ होता कि परिवार से बाहर किसी भी मर्द के साथ वह किस हद तक सावधानी बरता करती थी. अगर मैं और मेरा भाई सडक पर किसी बात को लेकर जिरह करने लगते तो मैं देखता, अपने गुस्‍से व तकलीफ़ के बावजूद, किस कदर वह हमारे बचाव को बेचैन हो जाया करती.

यह सावधानी मैं खास तौर पर अम्‍मी की लगातार ‘नार्मल, सामान्‍य, और लोगों की तरह बर्ताव’ करने की अपेक्षाओं में देखता. यह मांग बहुत हद तक पारंपरिक नैतिकता से जुडी थी- विनम्र होने का महत्‍व, जितना पास में है उसे स्‍वीकारते हुए सुखी रहना, और सूफी वैराग्‍य का पालन जिसका असर हमारे पूरे कल्‍चर पर छूटा पडा था- लेकिन इस नज़रिये से उसे यह बात किसी तरह समझ न आती कि कोई अचानक कॉलेज क्‍यों छोडना चाहता है. उसके ख्‍याल में अपने महत्‍व की खामख़याली में, अपने नैतिक व बौद्धिक कामनाओं को इतनी गंभीरता से लेकर मैं गलती कर रहा था. ज्‍यादा अच्‍छा होता मैं अपना सारा जोश ईमानदारी, सदाचार, कर्तव्‍य-परायणता का निर्माण व दूसरों जैसा बनने पर खर्च करता. अम्‍मी की बातों में ऐसे इशारे होते मानो आर्ट, पेंटिंग, क्रियेटिविटी- यह सब ऐसी चीज़ें थीं जिन्‍हें संजीदगी से लेने का हक़ सिर्फ यूरोपियन लोगों को था, बीसवीं सदी के उर्तरार्द्ध में इस्‍तांबुल में रह रहे हमारे जैसे लोगों को नहीं, जो गर्दन तक गरीबी में धंसे हुए एक ऐसे कल्‍चर में जी रहे हैं जिसने अपनी ताक़त, इच्‍छाशक्ति और अपनी भूख को खो दिया है. ‘इस तरह की जगह से कुछ भी अच्‍छा नहीं निकल सकता’ की स्‍मृति से अगर मैं हमेशा सावधान बना रहा तो आनेवाले जीवन में पछताऊंगा नहीं.

अगली किस्‍त का इंतज़ार करें...

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: एक

इस्‍तांबुल और ओरहान पामुक की यादें

मुरव्‍वत और तंगहाली के समाजों में विचार की बहुत जगह नहीं होती. खाये-अघाये मंचों पर कुछ वैचारिक मुद्राओं वाले ‘पोज़’ लिये जाते हैं. इन मंचों से बाहर कुछ चोट खाये, घबराये लोगों के दिमाग़ में उलझी लक़ीरें बनती हैं, आत्‍मा में भाप उठता है, बेचैन करवटों की लंबी रातें होती हैं; फिर जिंदा रहने के सामाजिक तकाजे उन सारी बेचैनियों को धकियाकर उन्‍हें भीड का जड हिस्‍सा बना डालते हैं.

मीडिया के फरेब और भारी आर्थिक विभाजनों वाले आज के भारतीय समाज में अच्‍छा लेखन दुर्लभ है. वैसा लेखन जिसमें विचारों की रवानी हो, अपने समय का मार्मिक, जीवंत स्‍पंदन हो, संवेदनाओं की पारदर्शी, विविड संकल्‍पनायें हों. जो आज के डिस्‍ट्रैक्‍टेड उपभोक्‍ता समय में आसानी से ‘डेटेड’ होने की मुश्किलों को प्रवीणता से मात करती हो-जिसमें पूरब और पश्चिम के अच्‍छे लेखन की सुघड, सजीव चाशनी हो, और सोने पर सुहागा की मानिंद जो भरपूर मनोरंजन भी करे- ऐसा लेखन तो अपनी गरीब बिरादरी में निश्‍चय ही अकल्‍पनीय और अप्राप्‍य फैंटेसी समझा जायेगा. मगर तुर्की के ओरहान पामुक हमें यह सब देते हैं. काफी सहजता से देते हैं, और काफी-काफी मात्रा में देते हैं.

तुर्की यूरोप के मुहाने पर है. उसके भौतिक हालात निश्चित ही भारत से बहुत बेहतर हैं, लेकिन एक गौरवशाली ऐतिहासिक अमीरी के पश्‍चात यूरोप और दुनिया के आगे ओछा व घटिया होने की प्रतीती, गरीबी व बेरोज़गारी की मार झेलते तुर्की और भारत में ढेरों समानतायें भी हैं. 1954 में जन्‍मे ओरहान पामुक इसी वैविध्‍यपूर्ण तुर्की को अपनी लेखनी में उकेरते, साधते व सजीव करते हैं. अबतक छह उपन्‍यासों के र‍चयिता पामुक की हर किताब एक बौद्धिक सनसनी की तरह है. उनका चौथा उपन्‍यास नई जिंदगी तुर्की इतिहास में दुकानों के रैक से सबसे तेजी से गायब होनेवाली किताब साबित हुआ. 1998 में प्रकाशित पांचवा उपन्‍यास मेरा नाम लाल है की लाखों प्रतियां बिकी हैं, अबतक बिक रही हैं. पिछला वर्ष पामुक के लिये भारी सरगर्मियों का वर्ष रहा. एक विदेशी पत्र को दिये इंटरव्‍यू में तुर्कियों द्वारा आरमेनियाइयों की भारी पैमाने पर नरसंहार की चर्चा से पामुक ने न केवल हाल के तुर्की इतिहास के एक मुश्किल छत्‍ते को छेडा था, अपने खिलाफ आग उगलने को मुस्लिम चरमपंथियों को एक अच्‍छा बहाना भी दिया. सरकार मामला अदालत लेकर गई और पामुक को देशद्रोही होने की सज़ा सुनाई गई. भारी विवादों व अंतर्राष्‍ट्रीय दबावों के बीच फिर अदालती फैसला खारिज़ हुआ, और दूसरी तरफ पामुक नोबेल के साहित्यिक पुरस्‍कार से नवाज़े गये.

पामुक की छठवीं किताब इस्‍तांबुल उपन्‍यास नहीं, संस्‍मरण है. एक शहर की यादों के बहाने ओरहान के एक उच्‍च-मध्‍यवर्गीय परिवार के उनके अपने बचपन, कैशोर्य का वृतांत है. उनके अंतर्लोक व गिर्द की विचार-यात्रायें हैं. नीचे प्रस्‍तुत अंश पामुक की उसी किताब का आखिरी अध्‍याय है. यह अंश गोकि उनकी जानी-पहचानी चमकदार किस्‍सागोई का प्रतिनिधि चित्र नहीं, मगर एक परेशांहाल, पस्‍त व निढाल समाज में कलाकार होने की कामना रखनेवाला नौजवान जिन द्वंद्वों व अंदरुनी लडाईयों से जूझता अपनी शख्सियत खडी करता है, उसकी एक दिलचस्‍प झांकी ज़रुर पेश करता है.


अम्‍मी से एक बातचीत: पेशेंस, सावधानी और कला

लंबे समय तक अब्‍बू की राह तकती अम्‍मी ने अपनी शामें बैठक में अकेले काटीं. अब्‍बू अपनी शामें ब्रिज क्‍लब पर बिताते, वहां से कहीं और निकल जाते, फिर इतनी देर से लौटते कि तबतक इंतज़ार करती अम्‍मी थककर सोने जा चुकी होतीं. रात के खाने को मेरे और अम्‍मी के आमने-सामने बैठ चुकने के बाद (तबतक अब्‍बू का फोन आ चुका होता. मैं कहीं फंसा हुआ हूं, उनका जवाब होता, लौटने में देरी होगी, तुमलोग खाना-वाना कर लो) अम्‍मी क्रीम के रंगवाले टेबल कपडे पर अपने पत्‍ते सजाती और अपना भविष्‍य पढती. एक वक्‍त में एक, महत्‍व के अनुरुप आजू-बाजू लगाते हुए उन बावन पत्‍तों वाले के हर पत्‍ते को जिस तरह वह फेरती, उसमें पत्‍तों के पीछे छिपे राज़ को खोलने की उसकी कोई भारी इच्‍छा न दिखती, और न ही पत्‍तों के एक खास संयोजन के उस खेल में उसे कोई मज़ा मिलता जिसमें लोग भविष्‍य की अपनी लुभावनी तस्‍वीरें निकाला करते थे. उसके लिये तो यह बस एक पेशेंस का खेल था. बैठक में पहुंचने के बाद जब मैं उससे सवाल करता कि आज अपनी किस्‍मत पढ ली या नहीं, तो उसका हमेशा वही जवाब होता:

’मैं यह अपनी किस्‍मत पढने के लिये नहीं कर रही हूं, डार्लिंग, ये सब वक्‍त काटने के लिये है. क्‍या टाईम हुआ... एक बार और आजमाती हूं, फिर सोने जाऊंगी.’

इतना कहकर वह हमारे काले-सफेद टेलिविज़न (तुर्की में उन दिनों वह एक नई चीज़ था) पर चल रही पुरानी फिल्‍म, या गुजरे ज़माने में रमजान कैसे मनता था का कोई चैट शो (तब सरकारी नज़रिया बतानेवाला बस एक चैनल हुआ करता था) पर एक नज़र मारती और कहती, ‘मैं ये सब नहीं देख रही, चाहो तो बंद कर दो.’ पर्दे पर जो कुछ भी चल रहा होता- कोई फुटबॉल मैच, या अपने बचपन की गलियों की काली-सफेद तस्‍वीरें- उसे देखता मैं कुछ वक्‍त गुजारता. शो से ज्‍यादा मेरी अपने कमरे और अपनी अंदरुनी उथल-पुथल से छुटकारा पाने में दिलचस्‍पी होती, और बैठक में बने रहने के दरमियान वही करता जो रोज़ रात का नियम था, अम्‍मी से बातें करता कुछ समय बिताता.

ऐसी कुछ बतकहियां कडवे बहसों में बदल जातीं. मैं भागा अपने कमरे लौटता और दरवाज़ा बंद करके किताबों और अपराध-बोध में सुबह तक डूबा रहता. कई दफा, अम्‍मी से जिरह के बाद, मैं इस्‍तांबुल की ठंडी रातों में बाहर निकल जाता और तकसिम और बेयोलू के गिर्द, भीतर की अंधेरी और झमेलों से भरी गलियों में सिगरेट पर सिगरेट धूंकता तबतक भटकता रहता जबतक कि सर्द हवायें मेरी हड्डयां न कंपाने लगतीं, और फिर अम्‍मी समेत शहर के हर शख्‍स के सोने जा चुकने के बाद ही मैं घर लौटता. सुबह के चार बजे सोने को जाना और दोपहर तक सोये रहने की मेरी कुछ आदत-सी बन गई- आगे के बीस वर्षों तक मैं यही आदत जीता रहा.

बाकी अगली किस्‍‍तों में...

अच्‍छे आदमियों की अर्से बाद फ़ोन पर लंबी बातचीत

पुरानी यारी थी. छात्र जीवन में दोनों ने साथ-साथ
राजनीति की थी, गरीबी के दिन साथ गुजारे थे, तंग कमरे
में खिचडी खाया-पकाया था. उसी का असर होगा वर्षों बाद भी
आवाज़ पहचानने में एकदम चूक न हुई. हडबड बेतरतीबी
की भावुकता में हाल लिया, दिया गया. सुर कुछ विशेष
ऊंचा रहा होगा, पत्‍नी चौंकी चौके से बाहर निकल आई, कहा,
ऐसे चीख-चीखकर बात मत करो डर लगता है. पत्‍नी को
अनसुना कर मनोहरदास दोस्‍त पर बरसे, ठीक है, साले, फिर
मत करो गुलामी, मगर फिर रोना नहीं कि पैसे का सोचकर
रात को आंख नहीं लगती. दोस्‍त ने हंसकर कहा, बेटा, हमीं तो हैं
दुनिया के सबसे अच्‍छे लोग; आयेंगे अपने भी अच्‍छे दिन.

मनोहरदास ने छूटकर कहा, यह सब चूतियापे
कविताओं की किताब के लिये ठीक हैं बाप और
बीवी को मत बोलना, हाथ की बाल्‍टी फेंककर
मारेंगे. दोस्‍त बेकाबू होकर हंसने लगा, इतना हंसा कि आंख
में पानी भर आया. फिर जिंदगी में खाये लातों का जिक्र छिडा. दोनों ही
के पास कहने को बहुत कुछ था, और सुनने को और-और. सांझ लंबी
थी और दिल हल्‍का-सा भारी-भारी. यारों के बाल खिचडी हो रहे थे और
जेब की बडी तंगी थी. दुनिया में तकनॉलजी व पैसे का तेजी से बर्चस्‍व
बढ रहा था, और उसी अनुपात में उसे ठीक-ठीक समझने के औज़ार
कम पड रहे थे.

मनोहरदास जानता था दोस्‍त गंभीर संकट
में है, और उसकी चौंकन्‍नी समीक्षक दृष्टि ही उन्‍हें इस मंझदार से निकाल
सकती है. लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद एक रिरियाई भावुकता के
सिवा और कुछ उसके काम न आई. पता नहीं यह भी ठीक-ठीक सोचा
कोई वैचारिक नतीजा था, या भावुकता की ही कडी, मनोहरदास ने एकदम से
बिल गेट्स को गाली देते हुए फोन रख दिया.

किताबों का शोकगीत

कहीं नहीं गई हैं यहीं हैं किताबें. तखत के पैताने,
टांड के जगर-मगर के बीच, खिलौनों के बाजू,
अलमारी के खानों में, घडी के पीछे, अखबारों के नीचे
कितनी सारी तो किताबें. बस पन्‍नों के बीच की महक
बदल गई है, जिल्‍दों का रंग कुछ फ़ीका पड गया है.
याद नहीं कब चूमी गई थीं आखिरी बार
मगर यही हैं. उम्र गुज़ारती, धीमे-धीमे पियराती हुई,
सासें गिनतीं, अपने समूचेपने में.

पॉलिथीन की हरी थैली में लिये दयाशंकर धीमे दरवाज़ा खोल
कमरे में दाखिल होते. करीने से बाहर करते अमर्त्‍य सेन, फिर
पवन कुमार वर्मा. बडे भाई कृपाशंकर मुंह बनाकर गोली
फेंकते अब यह सब नौटंकी पढोगे? वह हनीफ़ कुरैशी
और नायपॉल के मुरीद थे. कृपा अपने दया के लिए दुनिया
देखने की नई खिडकियां खोलना चाहते थे. चीन, अरब
व जापान की नई हलचलों की रोशनी में उसे नहलाना
चाहते थे. मो यान और मुराकामी दिखलाना चाहते थे.
मगर संस्‍कारी दया भाई के दबदबे से अलग अपना
ज्ञान मांजना चाहता था. विवेकानंद पहचानना चाहता था. दिमाग
में भारत की एक मुकम्‍मल तस्‍वीर बनाना चाहता था. कभी-कभी भाई
से छिपाकर रजनीश भी पढता. कृपाशंकर होशियार थे. दूर से गलत
किताबें सूंघ लेते. फिर दयाशंकर और रजनीश दोनों का जीना
हराम हो जाता. मगर यह सब तब की बात है जब संगीत सीखनेवाली
बंगालिन सहपाठिन ने दयाशंकर के प्रेम को ठुकरा दिया था, कृपा ने
लोकसभा की एक संगीन-सी नौकरी से खुद को बचा लिया था. उसके
उपरांत आलोडन व आरोहण का काल रहा. एक गहरी आत्‍म-समीक्षा
के बाद कृपा ने खबरिया चैनल की एक चौदह घंटे की नौकरी
थाम ली थी. रील्‍के व नेरुदा भूलकर बोकारो ईस्‍पात नगर
की एक सुधड कन्‍या की गृहस्‍थी बांध ली थी. और अब फुरसत में
किताबें नहीं नींद की सोचते. दयाशंकर दो वर्षों से हॉलैंड में हैं. नींद का
रोना उन्‍हें भी है. फुरसत में अब वह किताबें नहीं अपना ओरकुट समाज
व ई-मेल संभालते हैं. अपनी रसोई, बाथरुम व खिडकी के आगे सजे
बर्फ़ की तस्‍वीरों से भौजाई व भाई को उपकृत करते हैं.

किताबों पर कभी कृपाशंकर को जो चैनल पर कार्यक्रम
करने को कहा गया तो शायद सूझेगा नहीं उन्‍हें करना क्‍या है.
कतई याद नहीं आयेगी उन्‍हें एडम स्मिथ का वैल्‍थ
ऑव द नेशंस और अमिय बागची का आर्थिक इतिहास. चेज़रे पवेज़े
की कवितायें और स्‍तांधाल की सामाजिक समीक्षा. शायद अदबदाकर
कृपा डैरलिंपल की लास्‍ट मुग़ल व सुकेतु मेहता की मैक्सिमम सिटी की
मोटाईयों का सहारा लें. जॉनी डेप व मीरा नायर के हल्‍लों के कोरस में
अपने दर्शकों को सूचित करें ग्रेगरी डेविड रॉबर्ट्स का शांताराम कैसे
हमारे समय का ज़रुरी दस्‍तावेज़ है. भाई, नौकरी और बाज़ार का मामला है.
वर्ना तो तौबा कीजिये कि इतने भारी पोथे पढे जायेंगे. पंद्रह-बीस वर्षों पहले
वे शैतान और सिरफिरे लोग हुआ करते होंगे जो प्रगति प्रकाशनों
के बोझा उपन्‍यासों के भाग एक, भाग दो निपटाने का समय
व सहुलियत रखते थे. हुज़ूर, मोबाईल का बिल भरने और सीए की सीटिंग के
लिये तो यहां मोहलत नहीं निकलती, आप खामखा मांदेलस्‍ताम और तुर्गेनेव
का झमेला दे रहे हैं. यार, रहने दीजिये जहां पडी हैं, अच्‍छी हैं, जिंदा हैं.
सभ्‍यता का ज़रुरी खाद हैं किताबें और हमारे मन में उनकी बडी इज्‍ज़त है.

कहीं तो गई नहीं हैं किताबें. यहीं-यहीं तो हैं किताबें.
कुछ पीलापन ही तो चढा है, ऐसा क्‍या खाक़ गजब हुआ है. थोडा पीला
तो यह पूरा का पूरा मुल्‍क हुआ है.

शाहरुख खान और सामाजिक परिचर्चा

अमरीका ने दुनिया के आगे राजनीति के रास्‍ते नहीं खोले, और न ही हॉलीवुड की कभी कोई प्रगतिशील भूमिका रही है. लेकिन व्‍यक्तिगत तौर पर वहां ढेरों आवाज़ें हैं जो अलग-अलग मौकों पर देश की वर्तमान राजनीति से अपनी असहमति प्रकट करती रही हैं. जॉन क्‍युसाक मेनस्‍ट्रीम के बडे स्‍टार हैं, उम्र उनकी कुछ उतनी ही होगी जितनी अपने शाहरुख खान की है. पिछले हफ्ते सनडैंस फेस्टिवल में अपनी नई फिल्‍म ‘ग्रेस इज़ गोन’ (क्‍युसाक फिल्‍म के प्रोड्यूसर भी हैं. फिल्‍म एक ऐसे चोट खाये पति के बारे में है जिसे ताज़ा-ताज़ा इराकी लडाई में अपनी पत्‍नी के मरने की ख़बर मिली है और उसे यह हादसा अपने खुशहाल घर में अपनी दो कमउम्र बेटियों के आगे खोलना है) के प्रैस कॉन्‍फ्रेंस में क्‍युसाक ने कहा चूंकि सरकार ने इराक से लौट रही अमरीकी झंडे में लिपटे ताबूतों के टीवी-मीडिया में प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा रखा है, वह कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे देश में लोगों को सच्‍चाई की एक असल झलक दिखे. ग्रेस इज़ गोन ने उन्‍हें यह मौका दिया.

अब सनडैंस से ज़रा हिंदुस्‍तान लौटते हैं. अपने टेलिविज़न शो के लॉंच पर दो हफ्ते पहले शाहरुख खान ने अपने जवाबों से मीडिया का काफी ज्ञानवर्द्धन किया था. अपने टीवी प्रदर्शन से वे खुश हैं के जवाब में उनका चहकता हुआ उत्‍तर था, कि उनके बेटे की टीचर ने उन्‍हें ‘ए’ दिया है! पिछले वर्ष पेप्‍सी में मिलावट के विवाद का एक हल्‍ला मचा था, बहुतों ने उसे बैन करने की मांग की थी. अपने चहेते शाहरुख की इस पर प्रतिक्रिया थी अगर यहां पेप्‍सी को बैन किया गया तो वह अमरीका जाकर पेप्‍सी पियेंगे. क्‍युसाक और खान की टिप्‍पणियों को मैंने एक जगह सिर्फ इस मंशा से याद किया है कि वे बातचीत में सरोकारों का, विमर्श के स्‍तर का, एक बेसिक अंतर दिखाती हैं. कुछ है हमारे समाज में जिसकी वजह से वह वाजिब सवालों के वाजिब सामाजिक मंच नहीं खडे करता. चर्चाओं के गंभीर निहितार्थ ‘कूल’ चुहल व जुमलेबाजियों में निपटा दिये जाते हैं, और ऐसे ‘इंटरऐक्‍शन’ कभी गंभीर सवालों को गंभीर तरीके से ‘पोज़’ करने का मौका ही नहीं बनते. अंग्रेजी के काफी राष्‍ट्रीय अखबार हैं, जिनकी पृष्‍ठ संख्‍या रोज़ बढती रहती है, मगर उन पृष्‍ठों के बीच झांकती पचहत्‍तर प्रतिशत दुनिया एक अय्याश नये 'लाईफ-स्‍टाईल' का विज्ञापन भर है, और रोज़-रोज़ इन अखबारों को देखते हुए यह नहीं लगता कि वे उसी भूगोल की कहानी कह रहे हैं जिसके आजू-बाजू निठारी जैसे वीभत्‍स कांडों का सच व उडीसा, छत्‍तीसगढ की गरीबी बसती है!

सवाल यहां सिर्फ किसी शाहरुख का नहीं (जिसका समाज के लिए अपनी ‘कूल’ अदाओं से अलग अन्‍य भूमिकाओं में उपयोग लगभग शून्‍य के बराबर हो), सवाल उन सभी जन संचार माध्‍यमों का है जो सार्वजनिक चिंतायें, सरोकार व जिरह ‘डिज़ाईन’ करती हैं. और अंतत: पाठकों-दर्शकों को इन्‍हीं हल्‍के जुमलेबाजियों के मनोरंजन में उलझाये रखना चाहती है. बात के स्‍तर को उससे थोडा भी ऊपर उठाने के ख़याल से लगता है इन सभी माध्‍यमों का दम फूलने लगता है. इन दिनों न्‍यूज़ चैनलों पर फिल्‍मी उपस्थिति कुछ इतनी ज्‍यादा है कि हमारे एक मित्र की टिप्‍पणी थी कि आजकल वे कब विज्ञापन हैं और कब ख़बर, फर्क़ करना मुश्किल है. आनेवाले वर्षों में दुनिया किन भयावह स्‍तरों पर जल व अन्‍य संसाधनों का संकट झेलने जा रही है, या ग्‍लोबल वॉर्निंग पर किस तरह चौतरफा खतरे की घंटियां बज रही हैं, ऐसी चिंताओं की भारतीय न्‍यूज़ चैनलों पर अभी दस्‍तक तक नहीं पहुंची है, अलबत्‍ता अभिषेक व ऐश्‍वर्या के आसन्‍न विवाह, उनका बंगला, उनके होने वाले बच्‍चों पर चुटकी बजे और वे स्‍टोरी करने की भागम-भाग मचाये दिखते हैं.

बस मनोरंजन के लिए ही एक दिन आप बीबीसी व भारतीय न्‍यूज़ चैनलों की समानांतर झलकियां लेते रहिये, और फिर ज़रा सुलझे माथे से इस फर्क का आकलन कीजिये. इसे समझने में ज्‍यादा वक्‍त नहीं लगेगा कि कैसे सभी भारतीय चैनल न्‍यूज़ नहीं, मनोरंजन चैनल्‍स हैं. और हिंदी फिल्‍मों की गिरफ्त में उतने ही ज्‍यादा हैं जितना अपने यहां टेलिविज़न है. वह अपने समय व सामाजिक सरोकारों का कोई मंच बन सकें इसकी उन्‍हें तमीज़ है और न शिक्षा. या फिर शायद दोनों ही नहीं है. गौर फ़रमाईये जिन दिनों हमारे यहां क्रिकेट का बुखार नहीं होता, या जनाब बुजूर्ग बच्‍चन दाढी सहलाते हुए अपनी किसी नई बेमतलब फिल्‍म के बारे में कोई संजीदा बेमतलब टिप्‍पणी नहीं दे रहे होते, उन दिनों न्‍यूज़ चैनलों में क्‍या सुस्‍ती और उदासी की हवा फैल जाती है. इतने बडे मुल्‍क के पास किसी चर्चा पर एकजुट होने की कोई सूरत नहीं निकल पाती. फिर अकेले एक बेचारे शाहरुख खान का क्‍या कसूर!