Thursday, February 15, 2007

अच्‍छे आदमियों की अर्से बाद फ़ोन पर लंबी बातचीत

पुरानी यारी थी. छात्र जीवन में दोनों ने साथ-साथ
राजनीति की थी, गरीबी के दिन साथ गुजारे थे, तंग कमरे
में खिचडी खाया-पकाया था. उसी का असर होगा वर्षों बाद भी
आवाज़ पहचानने में एकदम चूक न हुई. हडबड बेतरतीबी
की भावुकता में हाल लिया, दिया गया. सुर कुछ विशेष
ऊंचा रहा होगा, पत्‍नी चौंकी चौके से बाहर निकल आई, कहा,
ऐसे चीख-चीखकर बात मत करो डर लगता है. पत्‍नी को
अनसुना कर मनोहरदास दोस्‍त पर बरसे, ठीक है, साले, फिर
मत करो गुलामी, मगर फिर रोना नहीं कि पैसे का सोचकर
रात को आंख नहीं लगती. दोस्‍त ने हंसकर कहा, बेटा, हमीं तो हैं
दुनिया के सबसे अच्‍छे लोग; आयेंगे अपने भी अच्‍छे दिन.

मनोहरदास ने छूटकर कहा, यह सब चूतियापे
कविताओं की किताब के लिये ठीक हैं बाप और
बीवी को मत बोलना, हाथ की बाल्‍टी फेंककर
मारेंगे. दोस्‍त बेकाबू होकर हंसने लगा, इतना हंसा कि आंख
में पानी भर आया. फिर जिंदगी में खाये लातों का जिक्र छिडा. दोनों ही
के पास कहने को बहुत कुछ था, और सुनने को और-और. सांझ लंबी
थी और दिल हल्‍का-सा भारी-भारी. यारों के बाल खिचडी हो रहे थे और
जेब की बडी तंगी थी. दुनिया में तकनॉलजी व पैसे का तेजी से बर्चस्‍व
बढ रहा था, और उसी अनुपात में उसे ठीक-ठीक समझने के औज़ार
कम पड रहे थे.

मनोहरदास जानता था दोस्‍त गंभीर संकट
में है, और उसकी चौंकन्‍नी समीक्षक दृष्टि ही उन्‍हें इस मंझदार से निकाल
सकती है. लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद एक रिरियाई भावुकता के
सिवा और कुछ उसके काम न आई. पता नहीं यह भी ठीक-ठीक सोचा
कोई वैचारिक नतीजा था, या भावुकता की ही कडी, मनोहरदास ने एकदम से
बिल गेट्स को गाली देते हुए फोन रख दिया.

1 comment:

  1. दुनिया में तकनॉलजी व पैसे का तेजी से बर्चस्‍व
    बढ रहा था, और उसी अनुपात में उसे ठीक-ठीक समझने के औज़ार
    कम पड रहे थे.
    ***
    मुक्त गद्य के गल्प में एक से एक बात रेखांकित हुई है!

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