Thursday, February 15, 2007

शाहरुख खान और सामाजिक परिचर्चा

अमरीका ने दुनिया के आगे राजनीति के रास्‍ते नहीं खोले, और न ही हॉलीवुड की कभी कोई प्रगतिशील भूमिका रही है. लेकिन व्‍यक्तिगत तौर पर वहां ढेरों आवाज़ें हैं जो अलग-अलग मौकों पर देश की वर्तमान राजनीति से अपनी असहमति प्रकट करती रही हैं. जॉन क्‍युसाक मेनस्‍ट्रीम के बडे स्‍टार हैं, उम्र उनकी कुछ उतनी ही होगी जितनी अपने शाहरुख खान की है. पिछले हफ्ते सनडैंस फेस्टिवल में अपनी नई फिल्‍म ‘ग्रेस इज़ गोन’ (क्‍युसाक फिल्‍म के प्रोड्यूसर भी हैं. फिल्‍म एक ऐसे चोट खाये पति के बारे में है जिसे ताज़ा-ताज़ा इराकी लडाई में अपनी पत्‍नी के मरने की ख़बर मिली है और उसे यह हादसा अपने खुशहाल घर में अपनी दो कमउम्र बेटियों के आगे खोलना है) के प्रैस कॉन्‍फ्रेंस में क्‍युसाक ने कहा चूंकि सरकार ने इराक से लौट रही अमरीकी झंडे में लिपटे ताबूतों के टीवी-मीडिया में प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा रखा है, वह कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे देश में लोगों को सच्‍चाई की एक असल झलक दिखे. ग्रेस इज़ गोन ने उन्‍हें यह मौका दिया.

अब सनडैंस से ज़रा हिंदुस्‍तान लौटते हैं. अपने टेलिविज़न शो के लॉंच पर दो हफ्ते पहले शाहरुख खान ने अपने जवाबों से मीडिया का काफी ज्ञानवर्द्धन किया था. अपने टीवी प्रदर्शन से वे खुश हैं के जवाब में उनका चहकता हुआ उत्‍तर था, कि उनके बेटे की टीचर ने उन्‍हें ‘ए’ दिया है! पिछले वर्ष पेप्‍सी में मिलावट के विवाद का एक हल्‍ला मचा था, बहुतों ने उसे बैन करने की मांग की थी. अपने चहेते शाहरुख की इस पर प्रतिक्रिया थी अगर यहां पेप्‍सी को बैन किया गया तो वह अमरीका जाकर पेप्‍सी पियेंगे. क्‍युसाक और खान की टिप्‍पणियों को मैंने एक जगह सिर्फ इस मंशा से याद किया है कि वे बातचीत में सरोकारों का, विमर्श के स्‍तर का, एक बेसिक अंतर दिखाती हैं. कुछ है हमारे समाज में जिसकी वजह से वह वाजिब सवालों के वाजिब सामाजिक मंच नहीं खडे करता. चर्चाओं के गंभीर निहितार्थ ‘कूल’ चुहल व जुमलेबाजियों में निपटा दिये जाते हैं, और ऐसे ‘इंटरऐक्‍शन’ कभी गंभीर सवालों को गंभीर तरीके से ‘पोज़’ करने का मौका ही नहीं बनते. अंग्रेजी के काफी राष्‍ट्रीय अखबार हैं, जिनकी पृष्‍ठ संख्‍या रोज़ बढती रहती है, मगर उन पृष्‍ठों के बीच झांकती पचहत्‍तर प्रतिशत दुनिया एक अय्याश नये 'लाईफ-स्‍टाईल' का विज्ञापन भर है, और रोज़-रोज़ इन अखबारों को देखते हुए यह नहीं लगता कि वे उसी भूगोल की कहानी कह रहे हैं जिसके आजू-बाजू निठारी जैसे वीभत्‍स कांडों का सच व उडीसा, छत्‍तीसगढ की गरीबी बसती है!

सवाल यहां सिर्फ किसी शाहरुख का नहीं (जिसका समाज के लिए अपनी ‘कूल’ अदाओं से अलग अन्‍य भूमिकाओं में उपयोग लगभग शून्‍य के बराबर हो), सवाल उन सभी जन संचार माध्‍यमों का है जो सार्वजनिक चिंतायें, सरोकार व जिरह ‘डिज़ाईन’ करती हैं. और अंतत: पाठकों-दर्शकों को इन्‍हीं हल्‍के जुमलेबाजियों के मनोरंजन में उलझाये रखना चाहती है. बात के स्‍तर को उससे थोडा भी ऊपर उठाने के ख़याल से लगता है इन सभी माध्‍यमों का दम फूलने लगता है. इन दिनों न्‍यूज़ चैनलों पर फिल्‍मी उपस्थिति कुछ इतनी ज्‍यादा है कि हमारे एक मित्र की टिप्‍पणी थी कि आजकल वे कब विज्ञापन हैं और कब ख़बर, फर्क़ करना मुश्किल है. आनेवाले वर्षों में दुनिया किन भयावह स्‍तरों पर जल व अन्‍य संसाधनों का संकट झेलने जा रही है, या ग्‍लोबल वॉर्निंग पर किस तरह चौतरफा खतरे की घंटियां बज रही हैं, ऐसी चिंताओं की भारतीय न्‍यूज़ चैनलों पर अभी दस्‍तक तक नहीं पहुंची है, अलबत्‍ता अभिषेक व ऐश्‍वर्या के आसन्‍न विवाह, उनका बंगला, उनके होने वाले बच्‍चों पर चुटकी बजे और वे स्‍टोरी करने की भागम-भाग मचाये दिखते हैं.

बस मनोरंजन के लिए ही एक दिन आप बीबीसी व भारतीय न्‍यूज़ चैनलों की समानांतर झलकियां लेते रहिये, और फिर ज़रा सुलझे माथे से इस फर्क का आकलन कीजिये. इसे समझने में ज्‍यादा वक्‍त नहीं लगेगा कि कैसे सभी भारतीय चैनल न्‍यूज़ नहीं, मनोरंजन चैनल्‍स हैं. और हिंदी फिल्‍मों की गिरफ्त में उतने ही ज्‍यादा हैं जितना अपने यहां टेलिविज़न है. वह अपने समय व सामाजिक सरोकारों का कोई मंच बन सकें इसकी उन्‍हें तमीज़ है और न शिक्षा. या फिर शायद दोनों ही नहीं है. गौर फ़रमाईये जिन दिनों हमारे यहां क्रिकेट का बुखार नहीं होता, या जनाब बुजूर्ग बच्‍चन दाढी सहलाते हुए अपनी किसी नई बेमतलब फिल्‍म के बारे में कोई संजीदा बेमतलब टिप्‍पणी नहीं दे रहे होते, उन दिनों न्‍यूज़ चैनलों में क्‍या सुस्‍ती और उदासी की हवा फैल जाती है. इतने बडे मुल्‍क के पास किसी चर्चा पर एकजुट होने की कोई सूरत नहीं निकल पाती. फिर अकेले एक बेचारे शाहरुख खान का क्‍या कसूर!

4 comments:

  1. सच कहा है आज हमारे न्यूज चैनल पर ऐसे ही टाईम-पास काम होता है…कभी-भी कोई बड़ा विषय दिखाया नहीण जाता या तो सत्ता की गलियाँ या फिर सिनेमा की दुनियाँ…SRK अपने प्रोग्राम को सफल बनाने के लिए वास्तव में लालू रुप अपना रहे हैं…लोगों को मसाज दिया जा रहा है…यह तो हद ही है…फुहर-2 बाते…सस्ते जोक्स लेकिन यह मात्र महिना-दो महिना की बात है…इसकी महत्ता गिरेगी…

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  2. बहुत ही सही बात लिखी है शायद इसी फर्क ने अमेरिका को नंबर एक पर खडा किया है और भारत कहीं भी नही (जो फर्स्ट तीन में नही, वो कही नही)। रहा सवाल खबरों का तो जब न्यूज देखनी होती है तो बीबीसी देखता हूँ और जब मनोरंजन के लिये कुछ देखना होता है तो जी न्यूज ( थैंक गॉड, यहाँ अभी अपने यहाँ एक ही है)।

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  3. truely an interesting observation,though i am not very sure how one can expect any sanity from SRK.Whatever he does to popularize the self-hosted show is an outright desparate attempt to keep the sponsers and producers satiated .His agenda is crystal clear and he has always kept himself away from any kind of of moral and social obligations.These people are completely profit-oriented and guided by there personal requirements. The rest of the world is a dustbin of which they give a damn. it is the politics by which they abide by and we all know how anti people and destructive it is. Therefore i think we should have no qualms in accepting the fact that people like SRK are parasites who thrive on public money and leave no opportunity to make maximum utilization of people's sentiments for there own narrow interests.
    As far as media is concerned they are the best tools for setting anti people agenda of the govts in power. To broadcast as much crap as possible to easily corrupt the thoughtful thinking mind of younger generation so that they develop absolutely no understanding of the society in which they live, the people around and all the struggles of the past. It is the third world media, media of economically backward country with vast problems of poverty and illiteracy, of societies which are characterised by the maintenance of ostensibly traditional, religious, familial and socially segmentary coordinates of identity; but ironically these questions, related issues are absolutely absent from the perview of indian media.The reality is that it is the market which is the guiding spirit and not any moral, social and ethical compulsions.

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  4. सटीक आकलन करते हुए हमें आकलन करने की राह दिखाती बेहतरीन पोस्ट!

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