Thursday, February 15, 2007

किताबों का शोकगीत

कहीं नहीं गई हैं यहीं हैं किताबें. तखत के पैताने,
टांड के जगर-मगर के बीच, खिलौनों के बाजू,
अलमारी के खानों में, घडी के पीछे, अखबारों के नीचे
कितनी सारी तो किताबें. बस पन्‍नों के बीच की महक
बदल गई है, जिल्‍दों का रंग कुछ फ़ीका पड गया है.
याद नहीं कब चूमी गई थीं आखिरी बार
मगर यही हैं. उम्र गुज़ारती, धीमे-धीमे पियराती हुई,
सासें गिनतीं, अपने समूचेपने में.

पॉलिथीन की हरी थैली में लिये दयाशंकर धीमे दरवाज़ा खोल
कमरे में दाखिल होते. करीने से बाहर करते अमर्त्‍य सेन, फिर
पवन कुमार वर्मा. बडे भाई कृपाशंकर मुंह बनाकर गोली
फेंकते अब यह सब नौटंकी पढोगे? वह हनीफ़ कुरैशी
और नायपॉल के मुरीद थे. कृपा अपने दया के लिए दुनिया
देखने की नई खिडकियां खोलना चाहते थे. चीन, अरब
व जापान की नई हलचलों की रोशनी में उसे नहलाना
चाहते थे. मो यान और मुराकामी दिखलाना चाहते थे.
मगर संस्‍कारी दया भाई के दबदबे से अलग अपना
ज्ञान मांजना चाहता था. विवेकानंद पहचानना चाहता था. दिमाग
में भारत की एक मुकम्‍मल तस्‍वीर बनाना चाहता था. कभी-कभी भाई
से छिपाकर रजनीश भी पढता. कृपाशंकर होशियार थे. दूर से गलत
किताबें सूंघ लेते. फिर दयाशंकर और रजनीश दोनों का जीना
हराम हो जाता. मगर यह सब तब की बात है जब संगीत सीखनेवाली
बंगालिन सहपाठिन ने दयाशंकर के प्रेम को ठुकरा दिया था, कृपा ने
लोकसभा की एक संगीन-सी नौकरी से खुद को बचा लिया था. उसके
उपरांत आलोडन व आरोहण का काल रहा. एक गहरी आत्‍म-समीक्षा
के बाद कृपा ने खबरिया चैनल की एक चौदह घंटे की नौकरी
थाम ली थी. रील्‍के व नेरुदा भूलकर बोकारो ईस्‍पात नगर
की एक सुधड कन्‍या की गृहस्‍थी बांध ली थी. और अब फुरसत में
किताबें नहीं नींद की सोचते. दयाशंकर दो वर्षों से हॉलैंड में हैं. नींद का
रोना उन्‍हें भी है. फुरसत में अब वह किताबें नहीं अपना ओरकुट समाज
व ई-मेल संभालते हैं. अपनी रसोई, बाथरुम व खिडकी के आगे सजे
बर्फ़ की तस्‍वीरों से भौजाई व भाई को उपकृत करते हैं.

किताबों पर कभी कृपाशंकर को जो चैनल पर कार्यक्रम
करने को कहा गया तो शायद सूझेगा नहीं उन्‍हें करना क्‍या है.
कतई याद नहीं आयेगी उन्‍हें एडम स्मिथ का वैल्‍थ
ऑव द नेशंस और अमिय बागची का आर्थिक इतिहास. चेज़रे पवेज़े
की कवितायें और स्‍तांधाल की सामाजिक समीक्षा. शायद अदबदाकर
कृपा डैरलिंपल की लास्‍ट मुग़ल व सुकेतु मेहता की मैक्सिमम सिटी की
मोटाईयों का सहारा लें. जॉनी डेप व मीरा नायर के हल्‍लों के कोरस में
अपने दर्शकों को सूचित करें ग्रेगरी डेविड रॉबर्ट्स का शांताराम कैसे
हमारे समय का ज़रुरी दस्‍तावेज़ है. भाई, नौकरी और बाज़ार का मामला है.
वर्ना तो तौबा कीजिये कि इतने भारी पोथे पढे जायेंगे. पंद्रह-बीस वर्षों पहले
वे शैतान और सिरफिरे लोग हुआ करते होंगे जो प्रगति प्रकाशनों
के बोझा उपन्‍यासों के भाग एक, भाग दो निपटाने का समय
व सहुलियत रखते थे. हुज़ूर, मोबाईल का बिल भरने और सीए की सीटिंग के
लिये तो यहां मोहलत नहीं निकलती, आप खामखा मांदेलस्‍ताम और तुर्गेनेव
का झमेला दे रहे हैं. यार, रहने दीजिये जहां पडी हैं, अच्‍छी हैं, जिंदा हैं.
सभ्‍यता का ज़रुरी खाद हैं किताबें और हमारे मन में उनकी बडी इज्‍ज़त है.

कहीं तो गई नहीं हैं किताबें. यहीं-यहीं तो हैं किताबें.
कुछ पीलापन ही तो चढा है, ऐसा क्‍या खाक़ गजब हुआ है. थोडा पीला
तो यह पूरा का पूरा मुल्‍क हुआ है.

7 comments:

  1. मैं इस गद्य पर कोई कमेंट नहीं करना चाहता था, लेकिन कर रहा हूं। जिस शख्‍स का स्‍केच आपने खींचा, वैसे हममें से कई हैं। लोग मिलेंगे, कहेंगे- हमने कभी लाइब्रेरी बनायी थी, ज़ि‍न्दगी के दौर में बिखर गयी। इस बिखरने की व्‍याख्‍या करनी थी। कुछ फार्स हो गया, जबकि प्रसंग मार्मिक है।‍

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  2. पूरी प्रविष्टी कविता सी लय,ताल,तुक और बेतुकापन लिए!क्या बात है ! बधाई।

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  3. क्या बात कही ! लेकिन वक्त निकालिये । किताबों की दुनिया अब भी रंगीन है ।

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  4. मार्मिक मुद्दा है हम विश्‍वविद्यालयी शिक्षक बिरादरी की तो अहम चिंताओं में से है यह।

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  5. A very nice article, through which the author puts to prospective reading habbits of a common youth through the ficticious character of Dayashankar! Infact Dayashankar exists in all of us.
    I have developed a taste for hindi articles after reading your posts. Keep posting more .

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  6. अनूप शुक्लाFebruary 9, 2007 at 7:36 AM

    किताबों की प्रासंगिकता अभी भी बनी हुयी है। जिस पीढ़ी के लोगों के लिये किताबें 'पैशन'रही थीं उनकी प्राथमिकतायें मजबूरी में जरूर बदल गयीं होंगी लेकिन पुस्तक प्रेम बरकरार होगा। और इस बीच नये लोग तो आ गयें होंगे किताबों पर रीझने के लिये। लेख की भाषा और अन्दाज बहुत अच्छा लगा!

    अनूप शुक्ला

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  7. "कहीं तो गई नहीं हैं किताबें. यहीं-यहीं तो हैं किताबें."

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