Thursday, February 15, 2007

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: एक

इस्‍तांबुल और ओरहान पामुक की यादें

मुरव्‍वत और तंगहाली के समाजों में विचार की बहुत जगह नहीं होती. खाये-अघाये मंचों पर कुछ वैचारिक मुद्राओं वाले ‘पोज़’ लिये जाते हैं. इन मंचों से बाहर कुछ चोट खाये, घबराये लोगों के दिमाग़ में उलझी लक़ीरें बनती हैं, आत्‍मा में भाप उठता है, बेचैन करवटों की लंबी रातें होती हैं; फिर जिंदा रहने के सामाजिक तकाजे उन सारी बेचैनियों को धकियाकर उन्‍हें भीड का जड हिस्‍सा बना डालते हैं.

मीडिया के फरेब और भारी आर्थिक विभाजनों वाले आज के भारतीय समाज में अच्‍छा लेखन दुर्लभ है. वैसा लेखन जिसमें विचारों की रवानी हो, अपने समय का मार्मिक, जीवंत स्‍पंदन हो, संवेदनाओं की पारदर्शी, विविड संकल्‍पनायें हों. जो आज के डिस्‍ट्रैक्‍टेड उपभोक्‍ता समय में आसानी से ‘डेटेड’ होने की मुश्किलों को प्रवीणता से मात करती हो-जिसमें पूरब और पश्चिम के अच्‍छे लेखन की सुघड, सजीव चाशनी हो, और सोने पर सुहागा की मानिंद जो भरपूर मनोरंजन भी करे- ऐसा लेखन तो अपनी गरीब बिरादरी में निश्‍चय ही अकल्‍पनीय और अप्राप्‍य फैंटेसी समझा जायेगा. मगर तुर्की के ओरहान पामुक हमें यह सब देते हैं. काफी सहजता से देते हैं, और काफी-काफी मात्रा में देते हैं.

तुर्की यूरोप के मुहाने पर है. उसके भौतिक हालात निश्चित ही भारत से बहुत बेहतर हैं, लेकिन एक गौरवशाली ऐतिहासिक अमीरी के पश्‍चात यूरोप और दुनिया के आगे ओछा व घटिया होने की प्रतीती, गरीबी व बेरोज़गारी की मार झेलते तुर्की और भारत में ढेरों समानतायें भी हैं. 1954 में जन्‍मे ओरहान पामुक इसी वैविध्‍यपूर्ण तुर्की को अपनी लेखनी में उकेरते, साधते व सजीव करते हैं. अबतक छह उपन्‍यासों के र‍चयिता पामुक की हर किताब एक बौद्धिक सनसनी की तरह है. उनका चौथा उपन्‍यास नई जिंदगी तुर्की इतिहास में दुकानों के रैक से सबसे तेजी से गायब होनेवाली किताब साबित हुआ. 1998 में प्रकाशित पांचवा उपन्‍यास मेरा नाम लाल है की लाखों प्रतियां बिकी हैं, अबतक बिक रही हैं. पिछला वर्ष पामुक के लिये भारी सरगर्मियों का वर्ष रहा. एक विदेशी पत्र को दिये इंटरव्‍यू में तुर्कियों द्वारा आरमेनियाइयों की भारी पैमाने पर नरसंहार की चर्चा से पामुक ने न केवल हाल के तुर्की इतिहास के एक मुश्किल छत्‍ते को छेडा था, अपने खिलाफ आग उगलने को मुस्लिम चरमपंथियों को एक अच्‍छा बहाना भी दिया. सरकार मामला अदालत लेकर गई और पामुक को देशद्रोही होने की सज़ा सुनाई गई. भारी विवादों व अंतर्राष्‍ट्रीय दबावों के बीच फिर अदालती फैसला खारिज़ हुआ, और दूसरी तरफ पामुक नोबेल के साहित्यिक पुरस्‍कार से नवाज़े गये.

पामुक की छठवीं किताब इस्‍तांबुल उपन्‍यास नहीं, संस्‍मरण है. एक शहर की यादों के बहाने ओरहान के एक उच्‍च-मध्‍यवर्गीय परिवार के उनके अपने बचपन, कैशोर्य का वृतांत है. उनके अंतर्लोक व गिर्द की विचार-यात्रायें हैं. नीचे प्रस्‍तुत अंश पामुक की उसी किताब का आखिरी अध्‍याय है. यह अंश गोकि उनकी जानी-पहचानी चमकदार किस्‍सागोई का प्रतिनिधि चित्र नहीं, मगर एक परेशांहाल, पस्‍त व निढाल समाज में कलाकार होने की कामना रखनेवाला नौजवान जिन द्वंद्वों व अंदरुनी लडाईयों से जूझता अपनी शख्सियत खडी करता है, उसकी एक दिलचस्‍प झांकी ज़रुर पेश करता है.


अम्‍मी से एक बातचीत: पेशेंस, सावधानी और कला

लंबे समय तक अब्‍बू की राह तकती अम्‍मी ने अपनी शामें बैठक में अकेले काटीं. अब्‍बू अपनी शामें ब्रिज क्‍लब पर बिताते, वहां से कहीं और निकल जाते, फिर इतनी देर से लौटते कि तबतक इंतज़ार करती अम्‍मी थककर सोने जा चुकी होतीं. रात के खाने को मेरे और अम्‍मी के आमने-सामने बैठ चुकने के बाद (तबतक अब्‍बू का फोन आ चुका होता. मैं कहीं फंसा हुआ हूं, उनका जवाब होता, लौटने में देरी होगी, तुमलोग खाना-वाना कर लो) अम्‍मी क्रीम के रंगवाले टेबल कपडे पर अपने पत्‍ते सजाती और अपना भविष्‍य पढती. एक वक्‍त में एक, महत्‍व के अनुरुप आजू-बाजू लगाते हुए उन बावन पत्‍तों वाले के हर पत्‍ते को जिस तरह वह फेरती, उसमें पत्‍तों के पीछे छिपे राज़ को खोलने की उसकी कोई भारी इच्‍छा न दिखती, और न ही पत्‍तों के एक खास संयोजन के उस खेल में उसे कोई मज़ा मिलता जिसमें लोग भविष्‍य की अपनी लुभावनी तस्‍वीरें निकाला करते थे. उसके लिये तो यह बस एक पेशेंस का खेल था. बैठक में पहुंचने के बाद जब मैं उससे सवाल करता कि आज अपनी किस्‍मत पढ ली या नहीं, तो उसका हमेशा वही जवाब होता:

’मैं यह अपनी किस्‍मत पढने के लिये नहीं कर रही हूं, डार्लिंग, ये सब वक्‍त काटने के लिये है. क्‍या टाईम हुआ... एक बार और आजमाती हूं, फिर सोने जाऊंगी.’

इतना कहकर वह हमारे काले-सफेद टेलिविज़न (तुर्की में उन दिनों वह एक नई चीज़ था) पर चल रही पुरानी फिल्‍म, या गुजरे ज़माने में रमजान कैसे मनता था का कोई चैट शो (तब सरकारी नज़रिया बतानेवाला बस एक चैनल हुआ करता था) पर एक नज़र मारती और कहती, ‘मैं ये सब नहीं देख रही, चाहो तो बंद कर दो.’ पर्दे पर जो कुछ भी चल रहा होता- कोई फुटबॉल मैच, या अपने बचपन की गलियों की काली-सफेद तस्‍वीरें- उसे देखता मैं कुछ वक्‍त गुजारता. शो से ज्‍यादा मेरी अपने कमरे और अपनी अंदरुनी उथल-पुथल से छुटकारा पाने में दिलचस्‍पी होती, और बैठक में बने रहने के दरमियान वही करता जो रोज़ रात का नियम था, अम्‍मी से बातें करता कुछ समय बिताता.

ऐसी कुछ बतकहियां कडवे बहसों में बदल जातीं. मैं भागा अपने कमरे लौटता और दरवाज़ा बंद करके किताबों और अपराध-बोध में सुबह तक डूबा रहता. कई दफा, अम्‍मी से जिरह के बाद, मैं इस्‍तांबुल की ठंडी रातों में बाहर निकल जाता और तकसिम और बेयोलू के गिर्द, भीतर की अंधेरी और झमेलों से भरी गलियों में सिगरेट पर सिगरेट धूंकता तबतक भटकता रहता जबतक कि सर्द हवायें मेरी हड्डयां न कंपाने लगतीं, और फिर अम्‍मी समेत शहर के हर शख्‍स के सोने जा चुकने के बाद ही मैं घर लौटता. सुबह के चार बजे सोने को जाना और दोपहर तक सोये रहने की मेरी कुछ आदत-सी बन गई- आगे के बीस वर्षों तक मैं यही आदत जीता रहा.

बाकी अगली किस्‍‍तों में...

2 comments:

  1. धन्यवाद! एक अच्छी पुस्तक के बारे मे बताने के लिये.

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  2. अब फ़िर से पढ़ना शुरू किया है जी!

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