Thursday, February 15, 2007

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: दो

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की दूसरी किस्‍त

उन दिनों कभी खुलकर तो कभी बिना नाम लिये अम्‍मी और मेरे बीच जिस चीज़ पर अक्‍सरहां जिरह हुआ करती- वह मेरा अनिश्चित भविष्‍य था. क्‍योंकि 1972 की सर्दियों में, आर्किटेक्‍चर फैकल्‍टी के अपने दूसरे साल के दरमियान, मैंने अपनी क्‍लासें अटैंड करना लगभग पूरी तरह से बंद कर दिया था. क्‍लास रजिस्‍टर में मेरी अनुपस्थिति मेरे कॉलेज निष्‍कासन का सबब न बने, से ज्‍यादा मैं शायद ही कभी तसकिसला आर्किटेक्‍चर फैकल्‍टी में कदम रखता.


कभी घबराहट में मैं खुद को तसल्‍ली देता कि, ‘आर्किटेक्‍ट न भी बना, तो कम से कम यूनिवर्सिटी का एक डिप्‍लोमा तो मेरे पास होगा.’ जिन चंद लोगों का मुझ पर थोडा असर था उनमें मेरे अब्‍बू और उनके कुछ दोस्‍त भी यह बात काफी दुहराते. यह सब सुनकर अम्‍मी की नज़रों में मेरी कहानी और संदेहास्‍पद होती. मैंने पेंटिंग से अपनी मुहब्‍बत को मरते देखा था, उससे जन्‍मे तक़लीफदेह खालीपन को जिया था, इसलिये भी मन के गहरे इस बात को बखूबी जान रहा था कि आर्किटेक्‍ट होना मेरे बूते की बात नहीं. साथ ही यह भी समझता था कि सुबह तक किताबें और नॉवेल पढते हुए, और तकसिम, बेयोलू और बेसितास की गलियों में रात-रात भर भटकता मैं पूरी जिंदगी नहीं गुजार सकता. कभी मैं दहशतज़दा एकदम से टेबल से उठ खडा होता कि अम्‍मी को अपनी हकीक़त से रुबरु करवा दूं. चूंकि मुझे इसका अंदाज़ न लगता कि मैं यह क्‍यों कर रहा था, और इसका तो और भी कम कि मैं उसके आगे क्‍या कबुलवाना चाहता था, कई मर्तबा लगता जैसे आंखों पर पट्टी चढाये हम एक-दूसरे से भिडे हुए हैं.

’मैं भी जब छोटी थी, तुम्‍हारी ही तरह थी,’ अम्‍मी कहती (मैं बाद में तय करता कि वह यह सब मुझे चिढाने के लिये किया करती). ‘तुम्‍हारी तरह मैं भी जिंदगी से भागा फिरा करती थी. जबकि तुम्‍हारी चाची-मौसियां सब यूनिवर्सिटी में दाखिल थीं, इंटेलैक्‍चुअल्‍स के बीच उठा-बैठा करतीं, मौज-मजा और नाच, पार्टियों में जातीं, और मैं तुम्‍हारी तरह घर में मुंह छिपाये पडी रहती और घंटों उजबकों की मानिंद, वह रिसाला जो तुम्‍हारे दादू जान को इतना पसंद था, इलस्‍ट्रेशन- उसे उलटा-पुलटा करती.’ फिर वह सिगरेट का एक कश खींचती, और मेरी ओर यह ताडने के अंदाज़ से देखती कि उसकी बातों का कुछ असर हो रहा है या नहीं. ‘संकोची थी, जिंदगी से खौफ़ होता था मुझे.’

उसके मुंह से यह सुनकर मैं समझ जाता उसका मतलब है- ‘तुम्‍हारी तरह’, और मेरे भीतर गुस्‍सा उबलना शुरु हो जाता. मैं यह सोचकर खुद को शांत करने की कोशिश करता कि वह यह सब ‘मेरे भले के लिये’ कर रही है. मगर अम्‍मी वही ज़ाहिर करती होती जो तुर्की में गहरे धंसी, बडे पैमाने पर समर्थित एक सामाजिक धारणा थी. और मेरी खुद की अम्‍मी भी वैसा ही सोचती है सोचकर मेरा दिल तार-तार हो जाता. टेलिविजन से मेरी आंखें हटकर बोसफोरस के ऊपर-नीचे तैरती जहाजी सर्चलाईट पर जाती, और मैं मन ही मन इस सबक को अपने अंदर दोहराता, और सोचता कैसे मुझे उसकी एक-एक बात से नफ़रत है.

इसे मैंने अपनी अम्‍मी से नहीं, जो यूं भी कभी खुले तौर पर इसका इज़हार नहीं करती थी, बल्कि इस्‍तांबुल के आलसी बुर्जूआजी और वैसी ही सोच रखनेवाले अखबारी स्‍तंभकारों से जाना था जो अपने पिटे, महा-निराशावाद के क्षणों में यह नतीजा निकालते थकते नहीं थे कि, ‘इस तरह की जगह से कुछ भी अच्‍छा नहीं निकल सकता.’

ऐसी सोच ने लंबे अर्से से इस शहर की इच्‍छाशक्ति को तोडकर रखा हुआ है. वही अवसाद इस निराशावाद के खाद का काम करती है. मगर यह अवसाद अगर बरबादी और गरीबी की देन है तो फिर शहर के अमीरों ने आखिर इसे गले क्‍यों लगा रखा है? शायद इसीलिए कि उनका अमीर होना भी महज़ एक संयोग है. फिर शायद इसलिए भी कि जिस पश्चिमी सभ्‍यता की नकल का वह सपना देखते हैं उसके मुकाबले खडी होने लायक एक भी शानदार चीज़ उन्‍होंने पैदा नहीं की है.

अम्‍मी के पास अलबत्‍ता उसके इन चेतावनियों भरे मध्‍यवर्गीय चखचख का कुछ आधार था जो वह ताजिंदगी दोहराती रही. शादी के ठीक बाद, मेरे व मेरे भाई की पैदाईश के पश्‍चात, अब्‍बू ने निर्ममता से उसका दिल तोडना शुरु किया. उनकी लंबी अनुपस्थियां, और शादी के बखत उसे जिसका दूर-दूर तक अंदाज़ न था- परिवार में धीमे-धीमे घर कर रही तंगी. मुझे हमेशा लगता कि इन बदकिस्‍मतियों ने उसे मजबूर कर दिया था कि लंबे समय तक समाज के आगे वह एक सुरक्षात्‍मक पोस्‍चर बनाये रहती. हमारे बचपन के वर्षों में, जब कभी वह मुझे और मेरे भाई को लिये बेयोलू खरीदारी को जाया करती, और सिनेमा या पार्क जैसी जगहों में मर्दों को अपनी ओर देखने पर उसका ध्‍यान जाता, उसकी सतर्क मुद्रा से अंदाज़ होता कि परिवार से बाहर किसी भी मर्द के साथ वह किस हद तक सावधानी बरता करती थी. अगर मैं और मेरा भाई सडक पर किसी बात को लेकर जिरह करने लगते तो मैं देखता, अपने गुस्‍से व तकलीफ़ के बावजूद, किस कदर वह हमारे बचाव को बेचैन हो जाया करती.

यह सावधानी मैं खास तौर पर अम्‍मी की लगातार ‘नार्मल, सामान्‍य, और लोगों की तरह बर्ताव’ करने की अपेक्षाओं में देखता. यह मांग बहुत हद तक पारंपरिक नैतिकता से जुडी थी- विनम्र होने का महत्‍व, जितना पास में है उसे स्‍वीकारते हुए सुखी रहना, और सूफी वैराग्‍य का पालन जिसका असर हमारे पूरे कल्‍चर पर छूटा पडा था- लेकिन इस नज़रिये से उसे यह बात किसी तरह समझ न आती कि कोई अचानक कॉलेज क्‍यों छोडना चाहता है. उसके ख्‍याल में अपने महत्‍व की खामख़याली में, अपने नैतिक व बौद्धिक कामनाओं को इतनी गंभीरता से लेकर मैं गलती कर रहा था. ज्‍यादा अच्‍छा होता मैं अपना सारा जोश ईमानदारी, सदाचार, कर्तव्‍य-परायणता का निर्माण व दूसरों जैसा बनने पर खर्च करता. अम्‍मी की बातों में ऐसे इशारे होते मानो आर्ट, पेंटिंग, क्रियेटिविटी- यह सब ऐसी चीज़ें थीं जिन्‍हें संजीदगी से लेने का हक़ सिर्फ यूरोपियन लोगों को था, बीसवीं सदी के उर्तरार्द्ध में इस्‍तांबुल में रह रहे हमारे जैसे लोगों को नहीं, जो गर्दन तक गरीबी में धंसे हुए एक ऐसे कल्‍चर में जी रहे हैं जिसने अपनी ताक़त, इच्‍छाशक्ति और अपनी भूख को खो दिया है. ‘इस तरह की जगह से कुछ भी अच्‍छा नहीं निकल सकता’ की स्‍मृति से अगर मैं हमेशा सावधान बना रहा तो आनेवाले जीवन में पछताऊंगा नहीं.

अगली किस्‍त का इंतज़ार करें...

2 comments:

  1. अच्‍दा लगा अगली किस्‍त का इन्‍तजार

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