Thursday, February 15, 2007

बडा हो रहा बच्‍चा

जामुन के पेड से छूटकर गिरा था बच्‍चा
पिता देखने आये अस्‍पताल
बहन आई दो संतरे लेकर
लौटने लगे जब
अस्‍पताल की खिडकी से लगकर
बहुत देर रोया बच्‍चा.

कभी गले में तक़लीफ रहती
कभी दाने आ जाते कभी फोडा
पिता कहते कोई नहीं,

जा, खेल आ.
कोई नहीं के जतन में बच्‍चा खेलने चला जाता
और तक़लीफ भूल जाती


जो अगर बदमाशी लगती
पिता फिर पीटते बहुत
दंड का एक दूसरा तरीका था
कपडे उतरवा के बाहर गली में खडा कर दिया
बेइंतहा चोट लगती
वापस कपडे पाकर भी नंगा देर तक कांपता बच्‍चा

इतने तरीके थे बडे होने के
हिंसा और अपमान का एक बीहड-सा भूगोल था
इनसे इतर तरीकों का बचपन भी पाया जाता है संसार में
यह समझने के लिए बच्‍चे को बडा होना पडा
कभी तो बच्‍चा निडर क्‍या मज़े में रहता
सडक के एक छोर से दूसरी तक
बिजली और जादू फैलाकर
लगभग एक अच्‍छी-सी कविता हो जाता.

स्‍कूल के अंधेरों व हैरत के उजालों में
बच्‍चा किसी दूर की कल्‍पना करता
कोई नई जगह, कोई एक चेहरा,
एक गाने की धुन तेज़ी से घूमती साइकिल
कोई फिल्‍म रंगीन

बच्‍चा ठहरकर भागता
और फिर चुपचाप वापस लौटता घर
चकित होकर पहचानने की कोशिश करता
कि वह क्‍या है यहां जो उसकी छाती पर सवार
एकदम-से उसे इतना उदास बना डालता है, कि वह
क्‍या है जिसे वह पहचानता नहीं अब इस घर में, या कि
बदल गया है वह खुद.

रात की नींदों में डोलती
शहर के सिरे से जब एक रेल गुजरती
बच्‍चा उसमें सवार होता
यह न सचमुच की रात होती
न सचमुच की रेल
इच्‍छाओं के तागों में बच्‍चा भविष्‍य बुन रहा था
असल यात्रा के फलित होने में अभी और बरस बाकी थे.

4 comments:

  1. गहराई है, एकरुपता और सामन्जस्य बनाने की आवशयक्ता है हर पेरा ग्राफ के बीच...बाकी तो ठीक है.

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  2. इनसे इतर तरीकों का बचपन भी पाया जाता है संसार में
    यह समझने के लिए बच्‍चे को बडा होना पडा

    वाह!

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