Thursday, February 15, 2007

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: तीन

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की तीसरी किस्‍त

फिर दूसरे मौकों पर, अपने तर्कों को गरिमा देने के लिए अम्‍मी मुझसे कहती कि उसने मेरा नाम ओरहान इसीलिए रखा था क्‍योंकि सभी ओटोमन सुलतानों में एक सुलतान ओरहान ही ऐसे थे जिन्‍हें वह सबसे ज्‍यादा पसंद करती थी. सुलतान ओरहान कभी हवाई योजनाओं के पीछे नहीं भागते रहे थे, न खामखा अपनी तरफ लोगों का ध्‍यान आकर्षित किया था. हर तरह की अति से बचते हुए उन्‍होंने निहायत सामान्‍य-सी जिंदगी जी थी. यही वजह है कि इतिहास की किताबों में दूसरे ओटोमन सुलतान को इतनी इज्‍ज़त, इतने किफ़ायतशारी से याद किया जाता है. यह कहते हुए अम्‍मी मुस्‍कराती, और यह साफ हो जाता कि वह चाहती थी कि मैं समझूं कि वह क्‍यों इन्‍हें इतना ज़रुरी गुण मानती थी.

उन शामों को जब अम्‍मी अब्‍बू का इंतज़ार करती होती, और मैं अपने कमरे से निकलकर उससे बहस करने आता, मैं जानता होता कि मेरी भूमिका इस्‍तांबुल के नाम पर पेश होनेवाले बदहाल, मामूली , उदास जीवन के प्रति विरोध की होगी, और उससे जुडे साधारणपने के उन तमाम आसरों का जिसकी अम्‍मी मेरे लिए कामना किया करती. कभी-कभी मैं खुद से सवाल करता, ‘मैं क्‍यों बाहर जाकर फिर उससे जिरह कर रहा हूं?’ और कोई संतोषजनक जवाब न पाने पर मैं अंदर एक ऐसी बेचैनी महसूस करता जिसके मानी मैंने तब समझना शुरु नहीं किया था.

’तुमने पहले भी क्‍लासों की गुल्‍टी मारी है,’ अपने पत्‍तों को जल्‍दी-जल्‍दी फेंटते हुए अम्‍मी कहती, ‘तुम कहते मैं बीमार हूं, मेरा पेट दुख रहा है- जब हम चिहांगिर में थे, तब तुमने इसकी आदत-सी डाल ली थी. तो एक दिन जब तुमने कहा- मैं बीमार हूं, मैं स्‍कूल नहीं जाऊंगा- मैं तुमपर चीखी थी, तुम्‍हें याद है? मैंने कहा था- तुम बीमार हो या नहीं, तुम अभी यहां से निकलोगे और सीधे स्‍कूल जाओगे. मैं तुम्‍हें घर के अंदर नहीं देखना चाहती.’

कहानी के इस मोड पर आकर, जिसे सुनाने का वह कोई मौका नहीं चूकती, अम्‍मी ठहरती- शायद इस ख़याल से कि इसे सुनकर कितना मेरा पारा चढता है, और मुस्‍कराती. इसके बाद एक अंतराल आता जब वह अपने सिगरेट का कश लेती, और फिर बिना मुझसे आंख मिलाये, मगर हमेशा कुछ झूमती-सी आवाज़ में, वह जोडती, ‘उस सुबह के बाद मैंने तुमसे फिर नहीं सुना कि- मैं बीमार हूं, मैं स्‍कूल नहीं जा रहा.’

‘तो मैं अभी कह रहा हूं!’ मैं दुस्‍साहसी होकर जवाब देता, ‘आर्किटेक्‍चर फैकल्‍टी में मैं दुबारा पैर रखनेवाला नहीं.’
’फिर क्‍या करोगे? मेरी तरह घर में बैठोगे?

धीमे कहीं मेरे अंदर यह जिद उठती कि इस जिरह को खींचकर इसकी हदों तक ले जाया जाये. फिर दरवाज़ा पीटकर किसी लंबे, तन्‍हां सैर को निकल जायें- बेयोलू के पिछवाडे की गलियों में थोडा नशे में, थोडा वहशी बने सिगरेटें धूंकते रहें और हर किसी और हर चीज़ से नफ़रत करें. उन वर्षों मेरा टहलना घंटों चलता. और कभी ढेर सारी घुमाई कर चुकने के बाद- दुकानों के शीशे, रेस्‍तरां, अध-रोशन कहवाघर, पुल, सिनेमा हॉल, विज्ञापन, लिखावटें, गंदगी, कीचड, फुटपाथ पर इकट्ठा गाढे पानी के जमाव में बरसात की बूंदों का गिरना, नियॉन बत्तियां, कारों के हेडलाईट्स, कुडेदानी को ऊपर-नीचे खंगालते कुत्‍तों की टोली देखते हुए एक दूसरी इच्‍छा मेरे अंदर उमडती, कि घर जाऊं और इन सारी तस्‍वीरों को लफ्जों में भरुं, सही शब्‍द खोजूं जो इस गाढी रूह, इस थके, इस रहष्‍यभरे जंजाल को ज़ाहिर कर सके. यह आग्रह कुछ वैसा ही दुर्दमनीय हुआ करता जैसा पुराने दिनों की एकदम-से पेंट करने की बेचैनी, लेकिन तब मुझे मालूम न होता मैं इस इच्‍छा का क्‍या करुं.

‘ये क्‍या लिफ्ट की आवाज़ है?’ अम्‍मी ने कहा. हम दोनों सुनने के लिए ठहर गए, मगर ऐसा कुछ सुनाई न पडा जो लिफ्ट का अंदाज़ दे. अब्‍बू ऊपर नहीं आ रहे थे. अम्‍मी ने जैसे ही वापस अपना ध्‍यान पत्‍तों में लौटाया, एक नये जोश में उन्‍हें फेंटने लगी, मैंने ताजुब्‍ब से उसकी ओर देखा. उसका अपना एक अंदाज़ था जो मेरे छुटपने में मुझे बहुत राहत देती थी, हालांकि बाद में जब उसने अपना स्‍नेह वापस खींच लिया उसके इसी अंदाज़ से मुझे तक़लीफ हुई थी. अब मेरी समझ में नहीं आता कि उसके भावों के क्‍या मतलब निकालूं. मैंने खुद को प्‍यार और गुस्‍से के एक असीमित मंझधार में फंसा पाया. चार महीने पहले, एक लंबी खोज-पडताल के बाद, अम्‍मी ने मेचिदियेकॉय में उस ठिकाने को खोज निकाला था जहां अब्‍बू अपनी माशूका से मिला करते थे. केयर टेकर से होशियारी से चाभी वसूल वह खाली मकान के अंदर उस दृश्‍य का सामना करने गई जिसका बाद में निर्ममता से वह मेरे आगे बयान करनेवाली थी. अब्‍बू जिसे घर में पहना करते थे उन पजामों का एक जोडा इस दूसरे बेडरुम के एक तकिये पर सजा पडा था, और बिस्‍तरे से लगे मेज़ पर ब्रिज-संबंधी किताबों का एक मीनार सजा था- कुछ वैसा ही जैसा घर में बिस्‍तरे के बाजू के अपने हिस्‍से में उन्‍होंने बना रखा था.

अम्‍मी ने जो कुछ देखा था, काफी वक्‍त तक उसका किसी से जिक्र नहीं किया. यह तो महीनों बाद, ऐसी ही एक शाम जब वह अपने पेशेंस में मगन थी- होंठों में सिगरेट और आंख के कोने टेलीविजन से लगे हुए थे- और मैं अपने कमरे से निकलकर उससे बात करने आया कि यकायक उसके मुंह से वह कहानी फूट पडी. हालांकि मेरी परेशानी ताडकर उसने अपना किस्‍सा छोटा कर लिया था. फिर भी, बाद में हर दफा जब मैं इसके बारे में सोचता- एक दूसरे मकान का ख़याल जहां रोज़ मेरे अब्‍बू जाया करते थे- मेरे रोंगटे खडे कर देता. गोया यह कोई ऐसी चीज़ थी जो मुझसे कभी न हो सकी और उन्‍होंने कर दिखाया था- अब्‍बू ने दूसरा, अपना एक जुडवां खोज लिया था, और उस दूसरे मकान में वह अपनी माशूका नहीं, इस शख्‍स के साथ वक्‍त बिताने जाया करते थे. इस भ्रांति ने ही मुझे अहसास दिया कि मेरा जीवन ही नहीं, मेरी आत्‍मा में भी कुछ है जो अपूर्ण है.

अगली किस्‍त आगे...

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