Thursday, February 15, 2007

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: चार

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की चौथी किस्‍त


‘तुम्‍हें अपनी यूनिवर्सिटी की पढाई खत्‍म करने का आखिर कोई तो तरीका ढूंढना ही होगा,’ अम्‍मी ने अपने आगे नया खेल सजाते हुए कहा. ‘पेंटिंग के बूते तुम अपनी जिंदगी नहीं चला सकते. तुम्‍हें कोई नौकरी ढूंढनी होगी. वैसे भी हमलोग अब पहले की तरह अमीर नहीं रहे.’

’ये सच नहीं है,’ मैंने कहा. बहुत पहले से सोच-समझकर मैंने यह नतीजा निकाला हुआ था कि मैं जिंदगी में कुछ न भी करुं तो भी मेरे घरवाले मेरा खर्चा तो ज़रुर उठायेंगे.

‘तुम यह कहना चाहते हो कि तुम पेंटिंग से अपना खर्च चलाओगे?^’

थोडी कातर और थोडा ताने-सी मारती जिस गुस्‍से के अंदाज़ में अम्‍मी ने ऐश-ट्रे में अपनी सिगरेट बुझाई, और इतने महत्‍वपूर्ण विषय पर बात करते हुए भी वह जैसे ताश खेल रही थी, मुझे इसका खूब अंदाज़ था कि हम किधर बढ रहे हैं.

’यह पैरिस नहीं है, यह समझ लो. यह इस्‍तांबुल है,’ अम्‍मी ने कहा, जैसे इस बात से उसे खुशी हो रही हो. ‘अगर तुम दुनिया के सबसे पहुंचे हुए कलाकार होते तो भी यहां कोई तुम्‍हारी रत्‍ती भर भी परवाह नहीं करता. पूरी जिंदगी अकेले काटते. किसी के पल्‍ले न पडता कि पेंटिंग के पीछे तुमने इतना अच्‍छा भविष्‍य चौपट क्‍यों कर लिया. अगर हम भी समृद्ध समाज होते जहां कला और पेंटिंग की इज्‍जत होती तब मालूम नहीं, तब शायद और बात होती. मगर यूरोप में भी सब यही मानते हैं कि वैन गॉग और गोगें सनकी थे.’

यकीनन उसने अस्तित्‍ववादी साहित्‍य के बारे में वह सारी कहानियां सुन रखी थीं जिसे पचास के दशक में मेरे अब्‍बू खूब दिलो-जां से पसंद करते थे. एक विश्‍वकोश जैसी डिक्‍शनरी हुआ करती थी, जिसके पन्‍ने अब पीले पड गए थे और जिल्‍द जीर्ण-शीर्ण हो चला था, तथ्‍यों की जांच के लिए वह मेरी अम्‍मी की सबसे बडी कूंजी थी. ज्ञान के उस खास रिवाज़ का जवाब मैंने इस व्‍यंग्‍यपूर्ण प्रत्‍युत्‍तर के साथ दिया: ’तो तुम्‍हारी Petit Larousse कहती है कि सारे कलाकार सनती होते हैं?’

‘मुझे कोई अंदाज़ नहीं, मेरे बच्‍चे. एक शख्‍स अगर बहुत प्रतिभाशाली, बहुत मेहनती है, और उसकी किस्‍मत भी अच्‍छी है तब शायद यूरोप में वह मशहूर हो जाये. लेकिन तुर्की में तुम सिर्फ पागल हो सकते हो. प्‍लीज़, मेरी बातों को गलत मत समझो. ये सब मैं तुम्‍हें अभी इसलिए कह रही हूं कि बाद में तुम्‍हें पछतावा न रहे.’

लेकिन मुझे अभी पछतावा हो रहा था, और यह सोचकर और ज्‍यादा हो रहा था कि वह पेशेंस खेलती और अपनी किस्‍मत पढती मुझसे ऐसी चोट पहुंचानेवाली बातें कह सकती थी.

’तुम्‍हारे हिसाब से ठीक-ठीक क्‍या वजह है जो मैं इतना चिढा हुआ हूं?’ मैंने पूछा, शायद इस उम्‍मीद में कि वह कुछ ऐसा कहे जिससे मेरे घाव को और चोट पहुंचे.


’मैं नहीं चाहती कि लोग समझें तुम्‍हें साइकॉलाजिकल दिक्‍कतें हो रही हैं,’ अम्‍मी ने कहा. इसीलिए मैं अपने दोस्‍तों के बीच कहती नहीं फिरती कि तुम अपनी क्‍लासेस नहीं अटेंड कर रहे. वो ऐसे लोग नहीं जो समझें कि क्‍यों तुम्‍हारी हैसियत का लडका पेंटिंग के पीछे यूनिवर्सिटी छोड रहा है. उन्‍हें लगेगा तुम्‍हारा दिमाग़ चल गया है, पीठ पीछे तुम्‍हारा मज़ाक उडायेंगे.’

’तुम्‍हें उनसे जो कहना है कहो,’ मैंने कहा. ‘उनकी तरह नमूना न बनने की खातिर तो मैं कुछ भी छोड दूं.’

’तुम ऐसा कुछ भी नहीं करने जा रहे,’ अम्‍मी ने कहा. ‘आखिर में तुम वही करोगे जो छुटपन में करते थे- अपना बस्‍ता उठाओगे और बडबडाते हुए स्‍कूल जाओगे.’

’मैं आर्किटेक्‍ट बनना नहीं चाहता- मुझे पक्‍का मालूम है.’

’दो साल और पढ लो, मेरे बेटे, यूनिवर्सिटी का डिप्‍लोमा हासिल कर लो, फिर उसके बाइ तय करते रहना कि तुम्‍हें आर्किटेक्‍ट बनना है या पेंटर.’

’नहीं.’

’तुम्‍हें बताऊं तुम्‍हारे आर्किटेक्‍चर छोडने पर नरीहान क्‍या सोचती है?’ अम्‍मी ने कहा, और मैं समझ रहा था कि अपनी एक सबसे बेकार सहेली की राय की आड में वह मुझपर चोट करने की कोशिश कर रही थी. ‘मेरे और तुम्‍हारे अब्‍बू के बीच जो ये रोज़ लडाईयां होती हैं तुम उससे परेशान हो, तुम्‍हारा मन भटका हुआ है- क्‍योंकि वे हर वक्‍त दूसरी औरतों के पीछे भागते रहते हैं- ये कहती है नरीहान.’

’मुझे परवाह नहीं चिडिया-से भेजे वाले तुम्‍हारी सोसायटी के दोस्‍ते मेरे बारे में क्‍या सोचते हैं!’ मैं चीख़ा. बावजूद जानते हुए कि वह मुझे उकसाने की कोशिश कर रही थी मैंने उसके जाल में पैर फंसाया, इस उम्‍मीद में कि यह सबकुछ नाटकबाजी की बजाय असल रोश की तस्‍वीर बन जाये.

’तुम बहुत अभिमानी हो, मेरे बच्‍चे,’ अम्‍मी ने कहा. लेकिन तुम्‍हारी यह चीज़ मुझे पसंद है. क्‍योंकि जिंदगी में जो ज़रुरी है वह कला-फला की बकवास नहीं, स्‍वाभिमान है. यूरोप में बहुत लोग हैं जो कलाकार बनते हैं क्‍योंकि वे अभिमानी और ईमानदार हैं. क्‍योंकि वहां कलाकार को बनिया और जेबकतरा नहीं समझा जाता. कलाकारों से लोग ऐसे पेश आते हैं मानो वे खास हों. लेकिन तुम बताओ इस तरह के मुल्‍क में तुम कलाकार बनोगे और तुम्‍हारा स्‍वाभिमान फिर भी अक्षुण्‍ण बना रहेगा? जिन्‍हें कला की कोई तमीज़ नहीं ऐसे लोग तुम्‍हें मंजूरी दें, तुम्‍हारी कला खरीदें, इसके लिए तुम्‍हें हुकूमत, अमीरों- और सबसे गये-गुज़रे, अधपढे ख़बरनवीसों के आगे नाक घिसनी होगी- तुम समझते हो तुमसे यह सब होगा?’

मेरे उन्‍माद ने मुझमें एक ऐसी मदहोश-सी करनेवाली ऊर्जा भर दी कि मैं अपने आपे से बाहर निकल आया. मैंने एक अद्भुत महत्‍वाकांक्षा का अहसास किया- इतनी विराट कि खुद मुझको हैरानी हुई- कि घर छोड दूं और बाहर गलियों में निकल भागूं. फिर यह सोचकर मैंने खुद को रोक लिया कि यहां लफ्जों की मार-काट मचाता अगर मैं थोडी देर और जमा रहा, जितना हो सके उतनी तहस-नहस करके, दम भर बग़ावत करके, चोट देकर और जवाब में चोट पाकर, इसके बाद जब हम दोनों ही अपना सबसे तीख़ा ज़हर उगल चुके होते, मैं तब भी भागकर दरवाज़े से बाहर गाढी, गंदले शाम और पिछवाडे की गलियों में पहुंच सकता था. गलियों की बत्तियों की फ़ीकी या गुल रोशनियों के पार, तंग ईंटोवाली सडकों की उदासी में मेरे पैर मुझे उबड-खाबड फुटपाथों पर इस छोर से उस छोर तक चलवाते. और ऐसी शोकपूर्ण, गंदी व बदहाल जगह से जुडे होने के एक पतित सुख से मैं आनंदित होता. गुस्‍से में लबालब डूबा, विचारों व तस्‍वीरों की कडियों की लडियों में गुज़रता मानो वे किसी नाटक के किरदार हों, उन महान कार्यों की कल्‍पना करता जो मैं किसी दिन करुंगा- मैं बिना ठहरे चलता चला जाता.

बाकी आगे...

(भूमिका व पहले के किस्‍तों के लिये ऊपर दायें लिंक पर माऊस की तीर बजायें)

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