Friday, February 16, 2007

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: छह

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की आखिरी किस्‍त


तकसिम की तरफ जाते हुए, मैं गलाता की बत्तियों के अध-उजाले नज़ारों की झलकी लेने घडी भर को ठहरता, फिर बेयोलू की ओर निकल जाता कि इस्तिकलाल एवेन्‍यू के पहले की किताब दुकानों में किताबें पलटता कुछ मिनट गुजार सकूं. फिर बीयर और वोदका का घूंट लेने उन बीयर बारों में रुकता जहां शोर-शराबे वाली भीड की आवाज़ों पर टेलीविज़ल का हल्‍ला भारी पडता होता, और जिस तरह वहां बाकी लोग जलाये होते, मैं एक सिगरेट सुलगाता (इर्द-गिर्द नज़र मारकर देख लेता कि आसपास कोई मशहूर कवि, लेखक या कलाकार तो नहीं बैठा) और जब महसूस करने लगता कि मैं भारी मुंछियल मर्दों का कुछ ज्‍यादा ही ध्‍यान खींच रहा हूं- क्‍योंकि मैं इधर-उधर आंखें घुमाता, अकेला और बच्‍चों-सी सूरत वाला होता- तो मैं फिर बाहर निकल जाता कि रात में घुलमिल सकूं. एवेन्‍यू पर थोडी टहल के बाद मैं बेयोलू की पिछवाडे की गलियों की ओर निकल जाता, और ककरकमा, गलाता, चिहां‍गीर पहुंचने के बाद मैं सडक-बत्तियों के उजालों और गीले फुटपाथ पर टिमटिमाती नज़दीक के टेलीविज़न स्‍क्रीन की रोशनी को निहारने के लिए ठिठकता. और फिर किसी कबाडी की दूकान के अंदर झांकते हुए, या फिर एक रेफ्रीजरेटर को देखकर जिसे किसी बेचारे पंसारी ने अपनी दूकान में बतौर सजावट डाला होता, या दवाईयों के किसी दूकान में अबतक लगे किसी मेनेक्विन (मेरे छुटपन के दिनों में इसका प्रचलन था) को देखते हुए मुझे महसूस होता कि कितना खुश था मैं. अम्‍मी के साथ जिरहों के बाद जो भव्‍य, शुद्ध, बेहोशी जगाने वाला क्रोध मैं उन क्षणों में महसूस करता, बेयोलू के गिर्द- या उस्‍कूदर, या फातिह के पीछे की गलियों में घंटे भर की टहल के बाद गायब हो जातीं. जहां कहीं भी मैं पहुंचता, और जैसे-जैसे बदन की ठंड बढती जाती, मेरे शानदार भविष्‍य की सुलगती आग मुझे उष्‍मा देती. तब तक बीयर और लंबी थकान के असर में मेरा माथा हल्‍का हो चुका होता. और शोकज़दा सडकें किसी पुरानी काली-सफेद फिल्‍म की मानिंद टिमटिमाती-सी लगतीं, एक ऐसा लम्‍हा जिसे फ्रीज़ करने और छिपा लेने की तबियत होती- और उसी लम्‍हे मन करता कि उन सूनसान गलियों से बाहर निकलकर घर लौटकर अपनी मेज़ के आगे कागज़ और पेंसिल लेकर बैठूं कि लिखूं या ड्रॉ कर सकूं.

‘दीवार पर वह जो पेंटिंग लगी है, ना’ नरमिन और अली ने हमारी शादी में गिफ्ट किया था. जब उनकी शादी हुई तो हम उसी कलाकार के पास गए कि बदले में उनके लिए भी हम उसी की बनाई कोई पेंटिंग लेकर जायें. काश कि तुमने देखा होता कि तुर्की का ऐसा मशहूर कलाकार किस कदर बेकल हो रहा था कि आखिरकार उसके दरवाज़े कोई पेंटिंग खरीदने पहुंचा था, याकि अपनी खुशी छिपाने के लिए उसने कैसा हास्‍यास्‍पद जामा ओढ लिया था. अपने हाथों उसकी पेंटिंग लिये जब हम बाहर निकले तो जिस तरह वह लगभग फर्श बुहारता हमें सलाम पर सलाम दाग़ रहा था, जैसी चिकनी-चुपडी बोलता हमें विदा कर रहा था, तुम किसी दुश्‍मन के लिए भी कामना न करते, मेरे बेटे, कि वह इस देश में कलाकार और पेंटर बने. इसीलिए मैं किसी से बोलती नहीं कि तुमने कलाकार बनने के लिए अपनी पढाई छोड दी है. जिन लोगों को तुमने अभी-अभी चिडी दिमाग कहकर खारिज़ किया, एक दिन उन्‍हीं लोगों को तुम्‍हें अपनी तस्‍वीरें बेचनी होगी. जब उन्‍हें पता चलेगा कि पढाई छोडकर तुमने अपना भविष्‍य- अपनी पूरी जिंदगी तबाह कर ली है- तब हां, तुम्‍हारी एकाध पेंटिंग वह तुमसे ज़रुर खरीदेंगे. बस रहम दिखाने की खातिर, तुम्‍हारे अब्‍बू और मुझे छोटा दिखाने की गरज से, या फिर उनको तुमपर तरस आयेगा और वह कुछ पैसे तुम्‍हारे हाथ में रखना चाहेंगे. लेकिन किसी भी सूरत में तुम्‍हारा वे अपनी बेटियों से व्‍याह होने नहीं देंगे. वह प्‍यारी-सी लडकी जिसकी तुम तस्‍वीरें बनाया करते थे, क्‍या लगता है तुम्‍हें, क्‍यों आनन-फानन में उसके बाप ने उसे स्वित्‍ज़रलैंड भेज दिया भला? जिस तरह की हमारी यह जगह है ऐसे गरीब मुल्‍क में- जहां हर तरफ कमज़ोर, हारे हुए, अधपढे लोग भरे पडे हैं, वहां लोग आपको कुचले नहीं और आपको ऊंचा जीवन मिले, आप इज्‍जत से अपना सिर उठाकर चल सकें, इसके लिए आपको अमीर बनना पडेगा. इसलिए आर्किटेक्‍चर मत छोडो, मेरे बेटे. ऐसा करके बाद में बहुत दुख उठाओगे. ले’काबुर्जिये को ही देखो. वह पेंटर होना चाहता था लेकिन उसने आर्किटेक्‍चर की पढाई की.’

बेयोलू की सडकें, उनके अंधेरे कोने, भाग निकलने की मेरी ख्‍वाहिश, मेरा अपराध- सब जलती-बुझती नियॉन बत्तियों की तरह मेरे माथे में झिलमिला रही थीं. मैं जानता था आज की रात अम्‍मी और मेरे दरमियान झगडा नहीं होगा, कुछ मिनटों में मैं दरवाज़ा खोलूंगा और शहर की सुकूनदेह सडकों पर भाग निकलूंगा. और आधी रात तक भटकने के बाद, मैं घर लौटूंगा और अपनी मेज़ के आगे बैठूंगा और कागज़ पर उस पूरे गणित को कैद करुंगा.

‘मैं कलाकार नहीं होना चाहता,’ मैंने कहा. ‘मैं एक लेखक बनूंगा.’

इस्‍तांबुल के आखिरी अध्‍याय का यह किस्‍सा तो यहां खत्‍म हुआ. मगर इस थोडा लंबे चले सिलसिले में हम एक छोटी-सी कडी और जोडना चाहते हैं. नीचे अंग्रेजी में उद्धृत पंक्तियों पर पहले एक नज़र डालिये:


”I believe literature to be the most valuable hoard that humanity has gathered in its quest to understand itself. Societies, tribes, and peoples grow more intelligent, richer, and more advanced as they pay attention to the troubled words of their authors, and, as we all know, the burning of books and the denigration of writers are both signals that dark and improvident times are upon us. But literature is never just a national concern. The writer who shuts himself up in a room and first goes on a journey inside himself will, over the years, discover literature's eternal rule: he must have the artistry to tell his own stories as if they were other people's stories, and to tell other people's stories as if they were his own, for this is what literature is. But we must first travel through other people's stories and books.”

यह पंक्तियां उस बडी तकरीर का हिस्‍सा हैं जो पिछले वर्ष सात दिसम्‍बर को स्‍वीडन में पामुक ने अपना नोबल स्‍वीकारने के दौरान पढा था. तुर्की जुबान में. अंग्रेजी में उसे पूरा देखने में आपकी दिलचस्‍पी हो तो उसे यहां देखिये: अब्‍बू का बक्‍सा.

(भूमिका व पहली किस्‍त, दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी किस्‍त)

2 comments:

  1. कुछ दिन पहले आपके ही ब्लॉग में पढ़ने की आदत के छूटने या छूटते चले जाने के बारे में कवितानुमा कोई चीज़ पढ़ी थी. वो द्वंद्व अपना लगा. कुछ ठोस करने और खोखला हो जाने के बीच का जो अंतर है उसमें मुझ जैसे कई लोग आज खोखले होते जा रहे हैं. किताबें लुभाती हैं. ख़रीद भी लातें हैं. पढ़ नहीं पाते. नौकरी बजाते-बजाते मशीन बन जाने की परिणति हमने ख़ुद ही चुनी है. मुक्त होने के मामले में सार्त्र की एक बात मुझे बार-बार याद आती है कि इस बात का कोई मतलब नहीं कि हम क्या हो सकते थे महत्वपूर्ण ये है कि हम क्या है और क्या कर रहे हैं.
    ख़ैर, ये बातें ओरहान पामुक को फिर से पढ़ते हुए अचानक कुछ उथल-पुथल सी मचाने लगी हैं. ओरहान को मैं स्नो के राइटर के तौर पर जानता हूं. दो-ढाई साल पहले जब पढी थी तो मैं पामुक का दीवाना सा हो गया. काफी वक़्त पहले इस्तांबुल भी पढ़ने की कोशिश की क़रीब एक चौथाई पढ़ने के बाक़ी के पन्ने शायद मेरे अगले जन्म का इंतज़ार कर रहे हैं.
    फटेहाल मुल्क में कलाकार होने का मतलब तलाशने वाली मिस्र की एक फिल्म याद आ रही है--आई लव सिनेमा--आपने शायद देखी होगी. कौन डायरेक्टर था ये अब याद नहीं लेकिन मेरे पास उसकी कुछ यादें बची हैं. फिल्म थी अद्भुत. एक बच्चे को केंद्र में रखकर कलाविरोधी समाज में कला के मानवीय पहलुओं को सामने लाने वाली.
    एक बात और शेयर करना चाहता हूं. जब से ये पता चला कि पामुक की लोकप्रियता में बाज़ार और बाज़ार की राजनीति करने वालों का भी हाथ है तब से उसे लेकर कुछ दूरी सी महसूस करने लगा. ये बात और है कि उसका लिखा आज भी मुझे लुभाता है. पामुक को भी तो अपने साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए मार्केटिंग एजेंट रखने पड़ते हैं. क्या हमारे समय की सारी प्रतिभाएं आख़िरकार बाज़ार के हिसाब से ही चलने को अभिशप्त हैं? फिर तो बाज़ार जिसको बड़ा बनाएगा वो ही बड़ा कहलाएगा. आपकी राय का इंतज़ार रहेगा. बातों का कोई तारतम्य नहीं है. मन जो कुछ उमड़-घुमड़ रहा था जल्दबाज़ी में लिख रहा हूं. आशा है मतलब की बातें पकड़ में आ जाएंगी.

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  2. भूपेन प्‍यारे, पामुक ने सेल्‍फ प्रोमोशन की कोई स्‍ट्रेटजी बनाई हो तो मुझे उसकी जानकारी नहीं. मगर बाज़ार और बाज़ारु एजेंट आज की सच्‍चाई हैं, लेखक उससे स्‍वतंत्र नहीं. फिर पश्चिम में प्रकाशन बडा धंधा है. सवाल यह है, जैसे तुमने खुद सार्त्र को याद करते हुए कहा है, कि लेखक अपनी लेखनी में कर क्‍या रहा है. और पामुक ने अपने थोडे सात-आठ किताबों से जितना किया है वह आज के लुंज-पुंज साहित्यिक परिदृश्‍य में- जंगल में लगे धधकते आग से कम नहीं.

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