Thursday, February 15, 2007

घर वापसी

दो छोटे कमरे और एक अंधेरा बरामदा
सोचकर ताज्‍जुब हुआ इतनी-सी जगह
में अम्‍मां ने नौ लोगों को पाला-पोसा
संसार में मुफलिसी, तीतर बटेर के खेल
खेलने, आवारा घूमने के काबिल बनाया.

आंगन में दीवार से लगी जंगलगी टूटी
साइकिल पड़ी. बरसाती पानी में और
करियाती हुई. तुलसी का एक मुरझाया,
लावारिस हो रहा पौधा.

वह स्‍त्री जो चालीस वर्षों तक इस उखड़े घर को
कोमलता से भरने के जतन करती फिरी
चूल्‍हा बरतन में झुंकती रही
छोटे-छोटे सिक्‍कों से ऊंचे हौसले सिलती रही
अब अचानक सब छोड़कर एकदम से चुप हो गई है.

दीवार के शीशे में जड़ी उसकी फोटो के नीचे छुट्टन
बैठा पालक में भात सानकर खा रहा है. ज़रा हटकर
दरवाज़े से बाहर बाबू दांत पर गुड़ाखू मल रहे हैं
थोडी देर में पानी के लोटे के लिए आवाज़ लगायेंगे
भौजी अनसुना किये रहेगी. रामजीत तीन दिनों से गायब है
उसकी याद करने की किसी को फुरसत नहीं.

मैंने भौजी से कहा भौजी इस बार कटहल की तरकारी खिला दो
भौजी लंबी सांस छोड़कर बुदबुदाई एक दिन
इस घर के लोग उसकी जान लेकर छोड़ेंगे.
सुगना पिंजरे में बेमतलब पंख मार रहा है.
मैं फुसफुसाकर कहना चाहता हूं अम्‍मां
मैं तुम्‍हारी खातिर घर लौटा हूं. अम्‍मां तुम कहां हो.
अम्‍मां बहुत गोड़ दुख रहा है.

दरवाज़े के बाहर बाबू पानी के लिए आवाज़ लगाते हैं
छुट्टन भात की मक्‍खी उड़ाता है
भौजी अनसुना किये दीवार तकती बैठी रहती है
थोड़ा ठहरकर छुट्टन कहता है मैं भैया के लौटने तक रुक जाऊं.

4 comments:

  1. "छोटे-छोटे सिक्‍कों से ऊंचे हौसले सिलती" वह जैसे साक्षात् प्रगट हो गयी आपके शब्दचित्रों द्वारा...

    शब्दों से कितना सटीक स्केच बना है!
    वाह!

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