Sunday, March 18, 2007

छूटी सोच की सोहबत योगिता के संग

अब पहले वाली स्थिति नहीं रही. कि साइकिल निकाला और सोहबतगंज के पीछे के जंगलों की ओर निकल गए, या कच्‍चे पुलिया पर खडे नीचे बहते पानी का अध्‍ययन कर रहे हैं, या ढलती दोपहरी में खेतों की तरफ निकल गए, या नदी किनारे बैठे हैं और पहाडों के पार सूरज के गोले को डूबता देख रहे हैं और सोच रहे हैं. नहीं, सोच की फुरसत वाला ज़माना गया.

मन खाली-खाली-सा रहता है मगर दिमाग़ खाली नहीं रहता. एक बेचैनी फन काढे बैठी रहती है, और जाने किन-किन दिशाओं में फुत्कारती अपना विष फेंकती रहती है. ऐसा नहीं कि एक पोज़ीशन लिया और उस पर टिके हुए हैं. नहीं. उसमें एक फुदकन वाला एंगल बना रहता है. बैंक के कागज़ों के बारे में सोचते हुए धींगडा साहब की मंशाओं के बारे में भी एक राऊंड-अप सोच लेते हैं. फिर उसमें चिंताओं की एक पूंछ यह भी जुड जाती है कि एचटी सही कह रहा है या एक्‍सप्रेस? फिर- अखबारों की रद्दी घर में बहुत बढ रही है. पीछे वाले कमरे की सफाई भी काफी वक्‍त से पेंडिंग पडी है, पता नहीं पत्‍नी का ध्‍यान उधर क्‍यों नहीं जाता. मगर अपनी योगिता बाली तो मोबाइल से लगी हुई है. सुबह सात बजे से घनघनाना शुरु हो जाता है, फिर जो कर लो, थम नहीं सकता. कितना टाईम खाता है ये मोबाइल.

मगर यह भी सही है कि एक दिन ज़रा खामोश रहे तो पत्‍नी का प्रेशर बढ जाता है. वोदाफोन के आने का क्‍या मतलब है कि हच वालों का डेरा-डंडा उठ जायेगा? मगर दीपू ने सुबह-सुबह क्‍यों फोन किया? कहीं पैसों की उम्‍मीद तो नहीं बांध रहा मुझसे? जिस किसी को देखो हमारे पैसे मारने की फिराक में है! इन बैंक वालों से तो बात करनी ही होगी! इतने में योगिता बाली धम्‍म-धम्‍म करती कमरे में आईं और हमारी सोच उठाकर खिडकी के बाहर डाल दिया. सवाल किया- तो क्‍या सोचा? इतनी देर बाद हमें खयाल आया हम गोद में कुछ और सोचने का काम लिये बैठे थे.

अपराध बोध छिपाने की गरज से मुंह पर मुस्‍कान और अदा में लाड लाकर हमने काउंटर क्‍वेस्‍चन किया, कितना सोचना है? पत्‍नी मेरी अदा देखने नहीं अपना जवाब लेने आई थी. तमक कर बोली, तब से तुम ऐसे ही बैठे हो? इसीलिए इस घर का एक काम नहीं होता! मैंने आवाज़ में थोडी तक़लीफ का पुट डालकर कहा, वही तो कर रहा था, भई. इसीलिए तो पूछ रहा हूं कितना सोचूं. वह आधे भरोसे से देखती मुझे असेस करती है, तुमसे मैंने कोई उपन्‍यास सोचने को नहीं कहा; एक सीधा सवाल किया, उसका सीधा जवाब मांग रही हूं. इतनी देर सोचने का क्‍या फायदा कि तुम्‍हारे सोचने में हमारी दिलचस्‍पी खत्‍म हो जाये! छोटे में सोचो, और अच्‍छा सोचो. मैंने दिमाग़ मे ट्रांसलेट किया, मतलब शॉर्ट एंड एंटरटेनिंग. हमारी योगिता बाली का सोचना भी अब टीवी के प्रोग्रामिंग की तर्ज़ पर होता है. मैंने मन ही मन सर्द आह भरी और एकदम-से फ़ैसला कर लिया.

योगिता बाली को जवाब दिया, ठीक है, केबल कटवा देते हैं. क्‍या? पत्‍नी ऐसे चौंकी जैसे शादी से पहले कुछ खास तरह के प्रस्‍तावों पर कस्‍बाई लडकियां चौंकती हैं. चौंकने से ज्‍यादा वह बिदकना होता है. मैंने अपोलाजाइजिंग तरीके से प्रतिकार किया, माफ़ करो, चुमकी, मगर मैं इतने छोटे से घर में दो-दो टीवी का बिल नहीं भर सकता! वैसे भी मैं टीवी नहीं देखता! तुम किचन वाले टीवी को हटा क्‍यों नहीं देती? खामखा केबल वालों को बहाना दे रही हो. योगिता बाली तमककर बोली, और किचन में काम करते हुए भाग-भागकर यहां टीवी देखने आऊं? मैंने ज्‍यादा समझदार होने की अदा के साथ जवाब दिया, वही तो. किचन में काम करोगी तब काम करो, उतनी देर मत देखो टीवी. मगर दिक्‍कत यह थी कि इस तरह की मेरी फटीचर चतुराईयां वह मेरे दिमाग़ में बुने जाने के पहले सूंघ लेती थी. बिफरकर बोली, क्‍यों, तुम एक साथ दो किताबें नहीं पढते? दस किताबें पढते हो. फिर मैं किचन में एक साथ दो काम क्‍यों नहीं कर सकती? मैंने छटपटाकर कहा, तुम्‍हारी बात सही है, चुमकी, मगर इसी बहाने घर में थोडी शांति रहेगी. मेरा उपन्‍यास खत्‍म हो जायेगा. वह हवा में हाथ मारती तमक कर बोली, तुम्‍हारा उपन्‍यास कभी नहीं खत्‍म होने वाला. फिर हिंदी में लिखकर कौन सा तीर मार लोगे तुम? कितना पैसा बनाओगे? फिर टीवी पर वो हिंदीवालों को कभी नहीं बुलाते!

मैंने अपने क्षत-विक्षत होने के रास्‍ते खोल दिये थे. भीष्‍म की तरह तीरों से छलनी होने से अब मुझे कोई रोक नहीं सकता था. और इसके लिए योगिता बाली नहीं मैं खुद जिम्‍मेदार था. सोच की लगाम मैंने शुरु में ही दुरुस्‍त रखी होती तो पराजय के इस क्षण का साक्षात् न कर रहा होता. दुनिया से हारा हुआ अब मैं योगिता बाली से तो नहीं ही हारना चाहता था. जितना हो सकता था आवाज़ को सर्द और संज़ीदा बनाते हुए मैंने कहा, आईंदा से मैं अपने उपन्‍यास के बारे में तुमसे कुछ नहीं सुनना चाहता! मेरे घटिया परफॉरमेंस का असर होगा, योगिता बाली मुझे देखकर हंसने लगी.

चोटों का बाकी बयान कल या परसों...

4 comments:

  1. अच्‍छी कहानी कहने की कोशिश की है आपने। अच्‍छी कहानी हम दरअसल उसे मानते हैं, जो नाटक नहीं लगता। नाटक भी अच्‍छा वही होता है, जो दरअसल नाटक नहीं होता। यानी एक ऐसा वाकया, जो आपके ज़ेहन के सवालों को हल करता है, अपने लिए आपकी तरफ से विधा चुन लेता है। कहानी में आसानी ये है कि आप इसके निर्माता-निर्देशक और अभिनेता खुद होते हैं, कविता में भी, लेकिन नाटक या सिनेमा के साथ बहुत मुश्किल है। दांपत्‍य के राग-रंग हर विधाओं में आये हैं। इतने आये हैं कि ये राग पुराना लगने लगा है। फिर भी अगर वक्‍त की पेचीदगियों और विसंगतियों और उठा पटक के साथ ऐसे प्रसंगों को जोड़ा जाए, तो बात कभी पुरानी नहीं पड़ती। आपकी कहानीनुमा इस रचना में ऐसे प्रसंग बारीकी से आये हैं, यही इसकी कामयाबी है।

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  2. यह रसोई में टी वी लगाने का ध्यान मुझे क्यों नहीं आया ? वैसे भी दो टी वी हैं और जो कुछ चैनल आते हैं वे मुफ्त हैं । अब पतिदेव को क्या पता चलेगा कि यह खुराफाती विचार कहाँ से हमें मिला ? नहीं तो केबल तो नहीं ,शायद नेट काटने के चक्कर में पड़ जाएँगे ।
    घुघूती बासूती
    ghughutibasuti.blogspot.com

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  3. पत्नी से पंगा वो मोल ले जिसे अपने 'लच्छन' झरवाने हों . वहां तो भइये राहुल द्रविड़ की तरह स्ट्रेट बैट से खेलना ही सुरक्षित है . तब भी आउट होने का खतरा तो बना ही रहता है. भला पत्नी के जैसी ललचाने वाली फ़्लाइटेड और क्लीन बोल्ड कर देने वाली स्पिन बॉलिंग और कौन कर सकता है.

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