Friday, February 16, 2007

ऊंची इमारतों के अंधेरे

आज की सच्‍चाई है कि हमारी पूरी सामाजिकता घिर-घिरकर बस अपने घर, अपने परिवार तक सिमटकर रह गई है. परिवार से बाहर के समाज को हम पहचानते नहीं. वह हमें सशंकित व भयभीत करता है. हम दस तरह की लक्ष्‍मण रेखायें खींचकर इस समाज से अपना नाता जोडते हैं, अपेक्षायें पालते हैं. समाज के जीवंत स्‍पंदन में हमारी सांसों का भी योगदान हो, उसकी गुणवत्‍ता बढाने में हम भी अपनी तरफ से कुछ योग करें, यह मानसिकता बतकहियों में हम भले प्रकट करते रहें, हमारी आत्‍माओं से उसका लोप हो गया है. संगम पाण्‍डेय पेशे से पत्रकार हैं, हमारे पुराने मित्र हैं. आज उनका एक ई-मेल आया. एक छोटी घटना का जिक्र है, लेकिन इसी मानसिकता की वह एक बडी तस्‍वीर बनाता है. गनीमत है बच्‍चे अभी इस समाज के बडों जितना समझदार नहीं हुए. एक नज़र आप भी देखिए:
आज एक दिल को छू जाने वाली घटना हुई. नौवीं मंजिल पर एक खाली पड़े फ्लैट के दरवाजे के नीचे एक फांक बनी हुई है. एक कुत्ते ने उसमें घुसने की कोशिश की, और उसकी गर्दन वहां फंस गई. वह शायद कल दोपहर से ही इस तरह फंसा हुआ था. बिल्डिंग में रहने वाले तमाम लोगों ने कुत्ते के रोने की दर्दनाक आवाज सुनी, पर उसपर तवज्जो देने की फुरसत किसी के पास नहीं थी. फुरसत थी चुन्नू (संगम का दसेक साल का बेटा) और उसके दोस्त कार्तिक और उसकी बहन विदुषी के पास. कार्तिक शायद छुट्टी पर था, वह सुबह ही कुत्ते को देख आया था. चुन्नू के आने के बाद तीनों उसे मुक्त कराने के लिए वहां पहुंचे. उन्होंने काफी परिश्रम किया. आखिर एक ईंट की ठोकर से दरवाजे के नीचे की एक टायल ढीली हुई और इस तरह कुत्ता मुक्त हुआ. डेढ़ दिन से फंसे-फंसे वह बुरी तरह लस्त हो चुका था. किसी तरह उतरा और हमारे फ्लोर के एक बिना दरवाजे के खाली फ्लैट में पड़े मलबे पर जाकर पड़ गया. बच्चों ने उसे रोटी दी, जिसे उसने लपक कर खा लिया, और फिर पड़ गया. शाम को वह फिर बुरी तरह रोने लगा. इस बार मैं और मीना भी गए. उसे पानी और डबलरोटी दी गई. उसने जल्दी से उन्हें खा लिया. उसे ओढ़ाने के लिए एक कपड़े का बंदोबस्त भी हो गया है. मगर बच्चों की चिंता खत्म नहीं हुई. वे बहुत देर तक उसके बिछौने के लिए एक खाली डिब्बा ढूंढ़ते रहे. उसके लिए जॉर्डन, जैकी इत्यादि नाम सोचते रहे. मैंने अपनी व्यावहारिक बुद्धि से उन्हें बताया कि उसे उतना ही दो जितना उसके स्वस्थ हो जाने तक के लिए जरूरी है. वरना वह परक जाएगा और स्वस्थ होने के बाद भी घर के चक्कर लगाएगा. अच्छा हो कि कुत्ता जल्द ही स्वस्थ हो जाए. ताकि कहीं कोई कचोट बाकी न रहे.

3 comments:

  1. संगम की टुकड़ी पढ़ी। एक साधारण वाकये का साधारण सा वृत्तांत। मानवीय संवेदनाओं की झलकियां इन्‍हीं साधारण साधारण वृत्तांतों में देखी जा सकती हैं। एक दोस्‍त बताते हैं कि मरने के कगार पर खड़े समाज को आईना दिखा रहे हैं बच्‍चे। संगम की इस टुकड़ी में ये ज़ाहिर भी होता है।

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  2. मुझसे एक बात बताइए ,
    अगर आप बच्चों की जगह होते तो आप क्या करते ? इसी के साथ ये बात भी जोड़ लीजिए कि आपकी उमर उतनी ही है जितनी कि अभी है .

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  3. गनीमत है बच्‍चे अभी इस समाज के बडों जितना समझदार नहीं हुए
    ***
    इन अंधेरों में ये कुछ एक नादानियाँ ही दीप की तरह रोशन है और यह दुनिया मुट्ठी भर ऐसी संवेदनाओं के बल पर ही तो चल रही है.

    Thanks for sharing!

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