Sunday, March 18, 2007

तुझ संग नैन लडाके हम तो हार गए, योगिता

दो दिन पहले योगिता बाली और हमारी सोच के फ़ासलों का दर्दभरा वाक़या आपने यहां पढा था. अब आगे का पढिये:


न चाहते हुए भी एक दफा सिर से पैर तक मैंने योगिता बाली का सर्द नज़रों से मुआयना किया. इन नज़रों में वैसी ही मुहब्‍बत थी जैसी नुस्‍ली वाडिया के मन में धीरुभाई को लेकर रही होगी, या करिना ने पहली दफा मल्लिका शेरावत के लिए ज़ाहिर किया होगा, या इमरजैंसी के दौरान इंदिरा के मन में जेपी के लिए जागती होगी. बहरहाल, इस बार मेरी एक्टिंग ऑथेंटिक रही होगी, नतीजा यह हुआ अपनी ओवर-कॉंफिंडेट योगिता बाली कुछ कांप-सी गई (याकि यह महज़ मेरा भ्रम था, जैसाकि अनिल कपूर का फिल्‍मों में अपनी वापसी को लेकर अभी भी बना हुआ है, या हिंदी के कुछ विशेष प्रदेशों में गीतों की वापसी को लेकर बीच-बीच में बनता रहता है. देखिए, फिर मेरी सोच बहक रही है. एक ज़माना था जब मैं इतना व्‍यवस्थित था कि मुझे ठीक-ठीक खबर रहती थी कि भूरे फाईल में किस प्रेमिका के ख़त हैं और नीले में किसके! मगर इस योगिता की संगत में मैं ही नहीं, मेरी सोच की दिशायें भी बिगड गई हैं!).

मैंने रूखी आवाज़ में कहा, ‘अगर तुम नहीं होती मेरा उपन्‍यास कब का पूरा हो गया होता! पत्‍नी ने पलटकर वार किया, ‘रौब मत गांठो. मेरे होते एक बच्‍चा तो ला नहीं सके, बड उपन्‍यास जन्‍माने वाला हुए!’ इस बार कांपने की बारी मेरी थी. और मैं जेन्‍युनली कांप रहा था. गुस्‍से से. ‘जिसका जो पैदा करना होता है, कर लेता है. जिससे नहीं सपरता वही तुम्‍हारी तरह झुंझनी बजाकर इसपे और उसपे इलजाम मढता रहता है. पता नहीं ऐसा कौन बिस्‍नु पुरान लिखनेवाले हो कि झुट्ठे हम गरीब गाली खाय रहे हैं.

हमें क्‍या करना, चूल्‍हे में जाये तुम्‍हारा उपन्‍यास. बस किचन का केबल नहीं कटेगा, हां!’ इसके पहले कि मैं अपनी शर्म और गुस्‍से की थरथराहट से बाहर आऊं, हलक में आवाज़ वापस लौटे, और मैं किसी उलझे साहित्यिक उपमानों में चीखकर योगिता बाली के चिथडे कर दूं, वह तमकती धम्‍म् धम्‍म् कमरे से बाहर जा चुकी थी.

तो अब यह नौबत आ गई है कि शॉपेनआवर और श्री श्री रवि शंकर वाले तेवरों में योगिता बाली हमसे शास्‍त्रार्थ भी करेगी? और हमारे पौरुष की खिल्‍ली उडाते हुए? शर्म और खीझ में नहाया मैं सहमा-सहमा-सा सोचना शुरु करता हूं. मैं एक अदद उपन्‍यास नहीं पूरा कर पाया और इस योगिता बाली ने कितना लंबा सफर तय कर लिया! कहां से कहां पहुंच गई. क्‍या थी क्‍या हो गई है. हावडा के छोटे से घर में माथे पर घूंघट डाले प्‍लेट में सिंघाडा और चाय लिए पहली दफा लजाई-घबराई सामने पडी थी और अब यूनाईटेड नेशंस के सयानों की तरह गाल पर हाथ दिये न्‍यूज़ से सीरियल से साहित्‍य, पडोस और अमरीका पर ऐसी बेशर्मी से बोलती है कि कोंडोलिसा रायस को खबर हो जाये तो बेचारी अपने पोस्‍ट की आउट-सोर्सिंग की बात सोचकर घिघियाने लगे!

उपन्‍यास के बारे में सोचने का फिलहाल कोई तुक नहीं था. अधिक से अधिक मैं केबल के बारे में सोच सकता था. मगर उस विषय पर तो योगिता बाली ने फैसला कर ही लिया था, मेरे पास तो भारतीय राष्‍ट्रपति की तरह मुहर लगाने का अधिकार भर रह गया था. हां, अपने उखडते दांपत्‍य के बारे में सोचने को मैं ज़रुर स्‍वतंत्र था. योगिता बाली के गरदन पर उसके बालों के छूटे महक से अगर मेरी ऐसी बेहया आशनाई नहीं होती तो मैं ज़रुर इस नतीजे तक पहुंच जाता कि हमारे दांपत्‍य का स्‍वर्णकाल अब अतीत की बात है. फिर एक वजह यह भी थी कि रात को तकिये पर सिर डालकर सपना देखने की मेरी आदत अभी खत्‍म नहीं हुई. जीवन के यही तो छोटे-मोटे सुख हैं अपने हिस्‍से, योगिता बाली से झगडा करके मैं इतने को भी खराब नहीं करना चाहता. एक भयानक झगडे से बच निकलने का मैंने पत्‍नी को आसान-सा बहाना दे दिया. चेहरे पर मुसकान लाकर आवाज़ लगाई, योगिता बाली झट मुस्‍कराती कमरे में वापस आई.

3 comments:

  1. दांपत्य की आपकी फंतासी में गद्य का खेल ज्यादा दिखाई देता है। पत्नी की पारंपरिक छवि में आपने कुछ नया तो नहीं जोड़ा। एक बार दांपत्य के माधुर्य की फंतासी में जाकर भी कोई पीस लिखने की कोशिश करें। और कृपा करके उसे अनिल कपूर नुमा उदाहरणो और जुमलों से बचाकर लिखें।

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  2. कितनी आसानी से खुश किया जा सकता है योगिता बालियों को ! एक मीठी आवाज ही उन्हें भागते हुए मुस्काते हुए पति के सामने ला खड़ा करती है ।
    घुघूती बासूती
    ghughutibasuti.blogspot.com

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  3. मन खाली खाली सा रहता है मगर दिमाग खाली नही रहता..काफ़ी कुछ् बयान करता है। पुलिया के नीचे के बहते पानी का अध्ययन.. स्मृतियो को जगाता है..लिखते रहिये प्रमोद भाई|

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