Tuesday, February 20, 2007

मोर्चे पर पार्टी वर्कर

क्षमा कीजियेगा यहां उन पार्टियों की चर्चा नहीं होनी है जिनकी चिंता और चर्चायें यूं भी राष्‍ट्रीय अख़बारों का मुख्‍य खबर बनी रहती हैं. जो दिल्‍ली के आलीशान बंगलों से ऑपरेट करते हैं. खबरी चैनल में घुसते और उद्योगपतियों के ऑफिस से निकलते हैं. कितनी भी बडी मुसीबत आ जाये हमेशा मुस्‍कराते हुए पत्रकारों को जवाब देने की काबिलियत रखते हैं. यह बडी खुराकों पर पलनेवाली बडी मछलियां हैं. आपको जानकारी न हो तो हम दे दें कि इन बडी पार्टियों से अलग इस बडे देश में बहुत सारी छोटी पार्टियां भी हैं. अपने गोपाल जी ऐसी ही एक नगण्‍य-सी पार्टी के नगण्‍य-से वर्कर हैं, जो न केवल अब तक सामाजिक बदलावों के घोषणापत्र छापती है बल्कि हैरतअंगेज़ तरीके से उसमें यकीन भी करती है. तो आईये, ऐसी ही बेमतलब, बेसिर-पैर की, बिना उद्योग‍पतियों के सपोर्टवाली और खबरी चैनलों से हजारों मील दूर वाली पार्टी के पार्टी वर्कर गोपाल जी की नगण्‍यता पर से थोडा धूल झाडकर, उनसे मिलने चलते हैं.

इस बेमतलब और खामखा चिडचिडी और उत्‍साहित-सी होती पार्टी के गोपाल जी नगर संयोजक हैं. नगर ऐसा नगर है जिसने नगर होने की सारी अदायें पाल ली हैं मगर सहुलियतों के स्‍तर पर किसी बडे देहात के आगे-पीछे चलता रहता है. तो नगर है. लेकिन नहीं भी है. जैसे भारत में पैसा आ रहा है लेकिन हमारे घर में नहीं आ रहा. बहरहाल, गोपाल जी ऐसे उदीयमान नगर के नगर संयोजक भये. मुरझाये चेहरों व धीमे-धीमे अक्षर ज्ञान की जटिल बुदबुदाहटों में उतर रहे कुछ दस-बारह सकुचाई-सी संभावनाओं की एक युवा-अधेड जन टोली के साथ डिपो के ऊपर के एक अंधेरे-से कमरे में गोपाल जी शनिवार दर शनिवार अपनी साप्‍ताहिक मीटिंग करते हैं. उच्‍च कमान के मासिक पत्र के विशेष अंशों का सामूहिक अध्‍ययन होता है. स्‍थानीय, क्षेत्रीय और राष्‍ट्रीय परिस्थिति पर परिवर्तनकारी एकमत नज़रिया बन सके इसके लिए गोपाल जी साथियों का दिशा निर्देश करते हैं. और अतिशय ज्ञान के बोझ से साथीगण थकते-से दिखें तब डिपो के बाजूवाली गुमटी के लौंडे को चाय के लिए आवाज़ लगाई जाती है. पिछले ग्‍यारह वर्षों से गोपाल जी पार्टी की ओर से दिये गए इस भारी जिम्‍मे का पूरे तन-मन से निर्वाह कर रहे हैं. धन होता तो उससे भी करते मगर धन देखने का सौभाग्‍य गोपाल जी को आज तक हुआ नहीं.

पार्टी, राष्‍ट्र और अंतर्राष्‍ट्रीय शांति के हित में बनी यह व्‍यवस्‍था पिछले ग्‍यारह वर्षों से- डोलती, लुढकती, सिमटती, फिर जुडती- निर्वाध रुप से चल रही थी, और गोपाल जी उसे पूरी आत्‍मा के जोर से चला पाने में सफल भी होते रहे थे, मगर अचानक उसमें व्‍यवधान आ गया है. गोपाल जी की वजह से नहीं पार्टी की वजह से आ रहा है. पार्टी कहती है गोपाल जी की वजह से आ रहा है. माने गोपाल जी से ऊपर जो जिला सचिव नकुल जी हैं वह स्‍थानीय जन समर्थन में आई गिरावट के लिए सीधे-सीधे गोपाल जी को जिम्‍मेदार बता रहे हैं. (थोडा सा व्‍यतिक्रम में जाते हुए आपको सूचित करे कि यह रुपक जिला सचिव नकुल जी के बारे में भी उतना ही है जितना नगर संयोजक गोपाल जी के बारे में. पार्टी के साथ नकुल जी का तीसेक वर्षों का प्राचीन व कुछ वैसा ही रिश्‍ता है जैसा भारतीय सभ्‍यता और मोहंजोदडो और हडप्‍पा के बीच रहता आया है. पार्टी से नज़दीकी का भाव ऐसा प्रगाढ कर लिया है नकुल जी ने कि अब पार्टी को व्‍याख्‍यायित करने की उन्‍हें ज़रुरत नहीं होती. बिना प्रयास के वह इंदिरा इज़ इंडिया वाला उदाहरण हो गए हैं. पेट में दर्द उठता है तो काडर के बीच कहते हैं पार्टी के पेट में उठा है.) गोपाल जी की आत्‍मा जानती है कि नकुल जी की बातों में एकांगिकता है, मिथ्‍यारोपण है, छद्म जनभावना और अनावश्‍यक वैचारिक व्‍यभिचार है. और सबसे ज्‍यादा तो गैर-पार्टी आचरण है. मगर दिक्‍कत यह है कि ग्‍वातेमाला का सही उच्‍चारण और लातिनी अमरीका को एटलस में खोज लेने के बावजूद नकुल जी के मुंह लगने से गोपाल जी को अभी भी भय होता है.

नकुल जी की तेजी से बोलने और बोलते चले जाने की आदत के सामने गोपाल जी वैसे ही असहाय हो जाते हैं जैसे मेहरी और अस्‍पताल के अभाव में बच्‍चा जननेवाली गर्भवती स्त्रियां होती होंगी. फिर नकुल जी अपनी हर बात पार्टी का ऐसा ही मानना है के तडके के साथ गोपाल जी की ओर फेंकते थे. और हर बार पूरी तैयारी के बावजूद ऐसा हो नहीं पाता था कि नकुल जी हवा में ऊंचा शॉट लगायें और बाउंड्री पर गोपाल जी उनका कैच लोप लें. कैच वह लगातार मिस कर रहे थे. और नकुल जी का स्‍कोर कंटिन्‍युवसली बढ रहा था. लेकिन इससे भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है कि नगर स्‍तर पर पार्टी का स्‍कोर प्रभावी रुप से घट रहा था. इसकी चिंता गोपाल जी को अपनी बीमार पत्‍नी और घर की दरिद्रता से ज्‍यादा उद्वीग्‍न किये रहती है. दो महीनों में पार्टी का प्रांतीय सम्‍मेलन होने को है. कलकत्‍ता से बडे नेता पहुंचने वाले हैं. सबकी नज़रों में जनता व पार्टी-शत्रु के रुप में चिन्हित होने के ख्‍याल मात्र से गोपाल जी का दबा हुआ दमा फिर से उभर आया था. सबसे छिपाकर वह नियम से नगर के दूसरे छोर पर अवस्थित काली माता के दर्शन को भी जाने लगे मगर अपराध-बोध से उन्‍हें छुटकारा नहीं मिल रहा था. तीन रातों की उनींदी थकान के बाद अंतत: गोपाल जी ने तय किया कि पार्टी के आगे प्रांतीय सम्‍मेलन में मुंह की खाने से बचने की एक ही सूरत है कि वह अपने इलाके में नकुल जी को मुंह की खिलायें. और इसके बारे में उत्‍साह से योजना बनाते हुए गोपाल जी को अचानक बोध हुआ कि वे इतना कमज़ोर नहीं हैं जितना अपने को समझे हुए थे.

बाकी का आगे...

5 comments:

  1. बडी पार्टियों को तो आपने मीडियौकर बता ही दिया, छोटी पार्टियों का मामला भी साफ कर दिया कि इनका देश से कोई लेना-देना नहीं है. कुल मिलाकर आप एक ऐसी स्थिति में पहुंच गये हैं, जहां से बताया जा सके कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता, सब बेकार है! इससे बेहतर होता कि आप अपनी कथा-व्याख्या के ज़रिये देश में पैदा हुए इस राजनीतिक शून्य को साफ करते. तब आपकी व्यंग्य से भरी ज़बान और मारक लगती.

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  2. अनूप शुक्लाFebruary 19, 2007 at 1:13 PM

    कथा हम बड़े दुखी मन से सुन रहे हैं। आगे कहिये!

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  3. गोपालजी और नकुलजी जैसी मुख्यधारा से दूर किंतु पूरी राजनैतिक संस्कृति को बदलने का मकसद लिए चलने वाली एक छोटी पार्टी से जुड़ा होने के नाते बहुत गौर से पढ़ रहा हूँ।कम-से-कम चिट्ठे पर गोपालजी और नकुल की पार्टी का नाम अज़दक देंगे,आशा है । अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी।

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  4. भाई अफलातून,
    यह महज एक गल्‍प-कथा है न कि किसी दल विशेष की कार्य शैली पर की गई खोजी रपट. यहां असल बात है गोपाल जी के अन्‍तर और बाह्यलोक व आसपास की विसंगतियों के चित्र. उसके भूगोल को कोई नक्‍शे में ठीक-ठीक लोकेट न कर पाये तो इससे विशेष्‍ा फर्क नहीं पडता. जो उसे पहचानने का स्‍वयं को ज्ञानी समझेंगे और इन चित्रों में अपनी झलक देखकर बुरा मानेंगे, मैं उनका क्षमाप्रार्थी हूं. लेकिन इतना फिर और जोडूंगा, कि उनकी दाढी में तिनका है.
    -प्रमोद सिंह

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  5. बहुत अच्छा पकड़ा है आपने. ऐसा भी होता है, लेकिन सिर्फ ऐसा ही नहीं होता. देखें आगे आपके पात्रों का क्या हश्र होता है.

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