Tuesday, February 20, 2007

फिर वही शाम वही ग़म वही तनहाई है

टाईम की किल्‍लत का रोना हमने पहले यहां रोया था. वह कहानी नीचे एक कदम और आगे बढ रही है:

पैनल डिस्‍कसन के संयोजक का निजी कसूर नहीं. वह तो हैं ही इस रोल में कि ज़माने की हवाओं को हवा देते रहें. और ज़माने की हवा यही है कि उसमें हवा तो नहीं ही है, टाईम एकदम नहीं है. बंबई की लोकल में आपका रोज़ाना का आना-जाना होता और झपट्टा मारकर ट्रेन की भीड को जीत लेने की कला में अगर आप पारंगत न होते, तब आपको सिंसीयरली अंदाज़ हो जाता कि प्‍लेटफॉर्म पर पांच-पांच मिनट का नुकसान करते हुए आपने जीवन का कितना कीमती समय बंबई की लोकलों में खो दिया है. ‘टाईम इज़ मनी’ का मुहावरा बंबई के लोकल्‍स को ध्‍यान में रखकर ही ईजाद किया गया है. मगर लोकल की लसर-पसर की भीड में फंसे हुए मुसाफिर अक्‍सर इस महत्‍वपूर्ण सूक्ति को भूल जाते हैं. और इसके महत्‍व पर विचार करने की बजाय सामनेवाले के तेलिया बालों को सूंघते और मां की आंख हमको इसी ट्रेन में क्‍यों चढना था जैसी गालियों से खुद को नवाजते हुए सफर पूरी करते हैं. अलबत्‍ता लोकल छोडते ही उन्‍हें बोध होता है कि ट्रेन उनका कितना टाईम खा गई!

मैं दोस्‍त की तरफ देख रहा हूं मगर उसकी बातें नहीं सुन रहा. क्‍या फ़ायदा? बीस सालों से वह कह रहा है, बीस सालों से मैं सुन रहा हूं. हुआ. अब नहीं सुनना. पंखे का घनघनाना सुनता हूं. सोचता हूं कितना टाईम खराब हो रहा है. रसोई में दोस्‍त की पत्‍नी कामवाली पर भुनभुना रही है कि वह बहुत टाईम खराब करती है. दोस्‍त का बच्‍चा कंप्‍यूटर पर वीडियो गेम खेलता टाईम खराब कर रहा है. इस बात के अहसास से मैं कांप-सा जाता हूं कि हम सबने मिलकर कितना सारा टाईम खराब कर लिया है. इस टाईम को संजोकर रखा जा सकता था. इसका दिल्‍ली जाने में उपयोग हो सकता था. मगर एक कदम आगे जाकर मैं एक कदम फिर पीछे लौट आता हूं. याद आता है पिछली दफा दिल्‍ली के दोस्‍त के यहां चार दिन गुज़ारते हुए सीधे-सीधे लग रहा था मैं खामखा टाईम खराब कर रहा हूं. दोस्‍त ने अपनी लिखी किताब पढने को थमा दी थी उसे पढते हुए तो और भी एक्‍स्‍ट्रा टाईम खराब हुआ था.

कोई भले कितना ही अंतरंग क्‍यों न हो, सिनेमा चलने का प्रस्‍ताव रखे, मैं झट मना कर देता हूं. ढाई घंटे खराब करने को अब अपने पास टाईम न रहा. किल्‍लत है. टाईम को संजोकर रखना है. उसको संभाल-संभालकर और किफायत से उपयोग में लाना है. और पंखे की घनघनाहट को सुनता मैं जान रहा हूं कि मैंने ऑलरेडी कितना टाईम लूज़ कर दिया है. इस टाईम को ठीक-ठीक कहीं क्रियेटिवली इन्‍वेस्‍ट होना है. -कहां? इसका मुझे अभी कायदे से अनुमान नहीं. मगर बहुत सारी कोमल संभावनाएं हैं जिसके पीछे मैं टाईम को कर सकता हूं. और खुद जाकर उसके पीछे खडा हो सकता हूं. टाईम ऐसी प्रेमिका है जिसके साथ मैं रिश्‍ते बिगाडना नहीं चाहता. मैं सोच रहा हूं. हालांकि इस गिल्‍ट के साथ ही सोच रहा हूं कि मैं टाईम नाली में बहा रहा हूं.

टाईम मैनेजमेंट का यह किस्‍सा यहीं निपटता दिखता नहीं. लौटकर यह फिर आएगा...

2 comments:

  1. इंतजार के दिन एक भूरा बादल तैरता रहा
    देर तक आकाश में
    एक चिट्ठी आई किसी के पास
    इंतजार के दिन
    लड़कियों ने अपनी भवें संवारीं
    एक बूढ़ा निकल कर आया सड़क पर
    चिल्लाकर सोचा उसने मृत्यु
    यह सब कुछ घटित हुआ
    इंतजार के दिन
    आक्सीजन की जगह बुढ़ापा उसकी मजबूत देह में भर गया
    समय का संस्कार मिट गया था
    इंतजार के दिन

    -संगम

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  2. हम बहुत देर तक बैठे-बैठे सोचते रहे
    कि अब वक़्त को यूं ही नहीं जाने देंगे
    जब हम कुछ करने के लिए खड़े हुए
    तो वक़्त जा चुका था

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