Wednesday, February 21, 2007

ना विसाले यार होता

अर्थशास्‍त्र हमारे पल्‍ले नहीं पडता. ऐसा नहीं है कि हमने कोशिश नहीं की. अलग-अलग मौकों पर किताबें खंगाली, आर्थिक रपटों में सिर घुसाया, दोस्‍तों के साथ चखचख किया पर कुल जमा-हासिल यही है कि आर्थिक दृश्‍यावली तेजी से बदलती रही, अब सुनने में आ रहा है भाग रही है, और हम अभी तक पहलेवाली जगह पर खडे हैं.

अर्थशास्‍त्र पल्‍ले नहीं पडता. आर्थिक मामलों और हमारे बीच कुछ वैसे ही कुहरिल, गाढे प्रेम-संबंध हैं जैसाकि अमरीकी फौज और इराकी आबादी के बीच कुछ वर्षों से बना हुआ है. दिक्‍कत यह है कि आजू-बाजू अमरीकी फौज हो तो आपको बडी तेजी से उसे समझना होता है. वर्ना ज्‍यादा संभावना है कि अमरीकी फौज आपको पहले समझ लेगी. फिर आप या तो कारागार में होंगे या फिर ऐसी लंबी यात्रा पर निकलने को मजबूर होंगे जहां पहुंचकर वैसे भी कारा-सारा सब बेमानी हो उठता है. तो उसी मजबूरी में उलझा मैं फिर से कुछ अर्थशास्‍त्र सुलझाने की कोशिश में जुटा हूं. और हमेशा की तरह, समझ में आ रहा है कि हम कितना कम समझ रहे हैं.


दिक्‍कत दरअसल यह भी है कि नून-तेल-तरकारी की अपनी रोजमर्रा की व्‍यवस्‍था हांफते-संभालते जैसे हम हैंडल करते हैं, वह अर्थशास्‍त्र की हमें एक समझ देता है. उसके दूसरे दिन मीडिया हमारे गाल पर तमाचा जडकर सूचित करती है कि हम जो अर्थशास्‍त्र समझ रहे हैं वह असल अर्थशास्‍त्र का सूचकांक नहीं, असल अर्थशास्‍त्र जो है वह कहीं और रचा जा रहा है! यही वजह थी पिछले दिनों रतन टाटा के विदेश में कोरस स्‍टील हथियाने की खबर पढकर हमें भारी झटका लगा. लगना ही था. अपनी महत्‍वाकांक्षा और पचपन हजार करोड के इंवेस्‍टमेंट में हमारी अर्थव्‍यवस्‍था इसके आगे कहीं नहीं टिक रही थी. टिक क्‍या नहीं रही थी, मज़ाक दिखने का चांस बना रही थी. फिर पता चला ऐसा ही एक और अभियान कुमारमंगलम बिडला ने फतह किया है. उनकी कंपनी हिंडालको ने अटलांटा की नोवेलिस को अपने कब्‍जे में लिया है. आगे और, पुणे की एक गुमनाम सी कंपनी- सुजलोन जर्मनी की आरईपावर सिस्‍टम्‍स पर घात लगाये बैठी है. रिलायंस वाले भी पीछे नहीं हैं, और व्‍यवसायी समुदाय में काफी गहमागहमी का नज़ारा है. खबरों की और उलट-पुलट करते हुए हमारी जानकारी में आया कि भारतीय बिजनेस का यह एक नया ट्रेंड है. उसके पंख और अरमान दोनो खुल रहे हैं. देश की कमाई से ज्‍यादा वह लंदन, न्‍यूऑर्क स्‍टॉक एक्‍सचेंज और नास्‍डेक की लिस्टिंग में शामिल होने की आकांक्षा रखता है.

तो धीरे-धीरे एक गूढ रहष्‍य पर से पर्दा उठ रहा है. एक बेसिक सच्‍चाई धुंधलके से उभरकर बडे पर्दे पर छा रही है. मतलब नून-तेल-तरकारी का हमारा दलिद्दर अर्थशास्‍त्र और बाबू कुमारमंगलम, रतन जी और टोली का अर्थशास्‍त्र निहायत अलग-अलग दुनियाओं में जी रहे हैं. अब इसमें फंसान यह है कि कौन वाला अर्थशास्‍त्र भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था का मापक शास्‍त्र हुआ. कहीं ऐसा न हो कि कन्‍फ्यूज़न में हमारा वाला लिस्टिंग में ही न चढे. इस देश में जिस पैमाने पर धांधलियां होती हैं, इतनी-सी धांधली की बिसात क्‍या है. फिर आजकल अंतर्राष्‍ट्रीय फलक पर चीन के पीछे-पीछे भारत को जमवाने की कुछ ज्‍यादा ही तुरही बज रही है. इस बडे खेल में हमारी छोटी-सी अर्थव्‍यवस्‍था को भाई लोग सीधे नक्‍शे से उठवा लें तो कोई ताजुब्‍ब नहीं. शायद उनका कसूर भी नहीं. ऐसे उलझे परिदृश्‍य में यह तय करने के लिए कि कौन वाली असल भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था है इसमें किसी एक के गरदन पर छूरी तो चलानी ही होगी. ज़ाहिर है बाबू कुमारमंगलम बडे आदमी हैं, ऐसा प्रस्‍ताव किसी ने उनके कान में फुसफुसाकर सुनाया भी तो सुनकर हंसने लगेंगे. अलबत्‍ता हम ज़रुर डरे हुए हैं.

1 comment:

  1. असल में ये सारा कुछ भारतीय उद्यमशीलता का विस्फोट है, जिसके लिए इंसानी जान तक की कोई कीमत नहीं होती। एक तरह का reversal of role है। भारतीय उद्योगपति अगर दुनिया में अपनी धमक बढ़ा रहे हैं तो एक सकारात्मक संकेत है। ये एक ऊर्जा है जिसकी झलक गुरु फिल्म में मिली है। ये अलग बात है कि भारतीय किसानों से इसका बुनियादी अंतर्विरोध है।

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