Friday, February 23, 2007

ब्‍लॉग के फ़ायदे

इस अर्थशास्‍त्री झमेले से बाहर आते हैं. दम घुट रहा है. आर्थिक सवालों के लपेटों में जब भी झांकने गया हूं हमेशा यही नतीजा निकला है. कि दम घुटता है. और फिर डिप्रेसन शुरु होता है. और डिप्रेशन शुरु होने का मतलब आप समझ ही रहे हैं- टाईम की ऐसी-तैसी हो जाती है. ब्‍लॉग के होने से अब यह सुविधा हो गई है कि अपना डिप्रेसन आपकी तरफ फेंक सकें. बाद में आपकी प्रतिक्रिया पाकर और अच्‍छा लगता है कि डिप्रेसन की अच्‍छी तस्‍वीर खींची है. हालांकि कुछ लोगों की शिकायतें भी आती हैं कि तस्‍वीर तो जो थी सो थी, डिप्रेसन के वर्णण में व्‍याकरणिक अशुद्धियां रह गई हैं.

ब्‍लॉग को शुरु करके अब आराम हो गया है. नहीं तो अकेले डिप्रेस होते-होते कुछ थकान-सी हो जाती थी. अब तसल्‍ली है आपकी तरफ से जिज्ञासा वाली नज़र उठेगी कि आज अज़दक में डिप्रेसिंग क्‍या है. हम मेज़ पर पैर फैलाये, सिर के पीछे हाथ बांधे इतमिनान से चेहरा उठाकर कहेंगे वो देखो उधर, डेस्‍कटॉप पर शॉटकट पडा हुआ है, जाकर देख लो. आप आईकन मैक्सिमाइज करके कंप्‍यूटर की खिडकी को अज़दकी उजाले से भर देंगे, और भीनी मुस्‍की मारके कहेंगे, अच्‍छा है, और हमारा डिप्रेसन सार्थक हो जायेगा! क्‍योंकि आर्थिक मोर्चे पर तो वह सार्थक होने से रहा. नहीं, उस दिशा में तो अब हमने उम्‍मीद छोड दी है. एक तो अपनी उमर हो रही है, दूसरे कुमारमंगलम एंड पार्टी अपनी वाली को स्‍थापित करने के चक्‍कर में हमारी वाली अर्थव्‍यवस्‍था पर यूं भी थू-थू कर रहे हैं. कुमारमंगलमों की सक्रियता बढने के बाद तो अपने आर्थिक संगणकों के अस्तित्‍व तक को लेकर हमारे अंदर शंका हो गई है (संदर्भ के लिए कृपया रेफर करें: कुमारमंगलम एंड टोली के अर्थशास्‍त्र में हमारी नून-तेल-तरकारी वाली व्‍यवस्‍था की हत्‍या). लेकिन ब्‍लॉग ने हमें इस संकट से उबार लिया है. हमारे वास्‍तविक आर्थिक पिछडेपन को टेक्निकल ऊंचाई के वर्चुअल स्‍पेस में भेजकर हमें अपने दुखों पर हंसने के लिए मुक्‍त छोड दिया है. और अपने साथ आपको हंसता देखकर तो हम बीच-बीच में भूल भी जाते हैं कि हम दरअसल क्‍यों हंस रहे हैं.

पर ब्‍लॉग के फ़ायदे ही फ़ायदे हों ऐसा नहीं, नुकसान भी है. ब्‍लॉग जहां नई दोस्तियां बनाता है वहीं पुरानों में दरार भी लाता है. दोस्‍त (नैचुरली, पुराने) को ख़बर हुई कि हमने अपना ब्‍लॉग शुरु कर दिया और वह (पुराने) पीछे रह गए तो उन्‍होंने हमसे मुंह फुला लिया. हमने पूछा क्‍या बात है तो जबर्जस्‍ती गंभीर होकर बोले, ब्‍लॉग-स्‍लॉग लेकर हम क्‍या करेंगे. ऐसा करो, हमारी जो कवितायें हैं उनको तुम अपने यहां ही चढा दो, हम वहीं देख लिया करेंगे. न हमने उनकी कवितायें आज तक अपने यहां चढाईं, और न उन्‍होंने आज तक हमारा ब्‍लॉग देखा है. वैसे भी दोस्‍त पुराने हो गए थे. दोस्तियों की भी एक उम्र होती है. हमने एक आह भरी और बात भूल गए. मगर यह किस्‍सा एक ही दोस्‍त का नहीं. आगे सुनिये.

कुछ ऐसे भी दोस्‍त हैं कि रास्‍ते में सामने से आ रहे हों और हम पर नज़र पड जाये तो एकदम से रास्‍ता बदल लेते हैं. फ़ोन करो तो फ़ोन नहीं उठाते. कि मैं बेवकूफ बच्‍चे की तरह उत्‍साहित होकर फिर सवाल करुंगा कि इसको देखा? उसको पढा? और वो फिर सिर झुकाकर शर्मिंदा होंगे कि यार, बहुत टेंशन चल रहा है, तुम्‍हारे ब्‍लॉग के लिए टाईम नहीं मिला. और मैं अविश्‍वास व शॉक से उन्‍हें देखूंगा जैसे मुझे अभी-अभी अपनी पत्‍नी के किसी के साथ भाग जाने की ह्रदयविदारक ख़बर मिली हो. और फिर तेजी से मेरे माथे पर डिप्रेसन के गाढे बादल मंडराना शुरु करेंगे. तो ब्‍लॉग के फ़ायदे हैं, लेकिन नुकसान भी हैं. मगर उसके बारे में फिर कभी.

3 comments:

  1. दोस्तों को ब्लोग पढ़वाना चाहते हैं तो किसी का नाम ले कर उसके बारे में कुछ लिखिये, कुछ बुरा लिखेंगे तो और भी अच्छा, बस देखिये किस तरह उनमें आपस में खबर फ़ैलती है, तब आप फोन उठाने से भागते रहियेगा. पढ़नेवालों की संख्या बढ़ जायेगी और दोस्तों की कम हो जायेगी. :-)

    ReplyDelete
  2. "...दोस्‍त (नैचुरली, पुराने) को ख़बर हुई कि हमने अपना ब्‍लॉग शुरु कर दिया और वह (पुराने) पीछे रह गए तो उन्‍होंने हमसे मुंह फुला लिया...."

    ओह, तो आपके साथ ऐसा भी हो चुका है!

    आश्चर्य, घोर आश्चर्य!

    ReplyDelete
  3. संजय बेंगाणीFebruary 22, 2007 at 1:38 PM

    दुनिया-जहान की चिंता छोड़ बस लिखते रहें.

    ReplyDelete