Tuesday, February 27, 2007

सूना घर और सूने सपने

मोर्चे पर पार्टी वर्कर की पहली, दूसरी किस्‍त आपने पढी. नीचे उससे आगे...

पत्‍नी को जबर्जस्‍ती बिछौने पर लिटाने के बाद गोपाल जी गोद में थाली लिये उसके सामने आकर बैठे. दाल की कटोरी में सुबह की सूखी रोटी डुबोकर धीमे-धीमे खाते रहे. पत्‍नी ने सुझाव दिया उठकर प्‍याज काट दे, गोपाल जी ने आंखें तरेर कर उसे बरज दिया. वह इनकी तरफ करवट लिये चुपचाप पडी इन्‍हें देखती रही. गुप्‍ता जी और दूसरी चिंतायें अचानक इतनी देर में एकदम जैसे भूल सा गया था. पत्‍नी और घर की सामान्‍य दुरव्‍यवस्‍था के बोझ तले गोपाल जी बेस्‍वाद निवाले निगल रहे थे. ऐसे कैसे चलेगा, कब तक चलेगा? पूरी उमर समाज की चिंता में धूल-गर्द खाते बिता दी, और अपना ही घर समाज-विछिन्‍न भुतहा सूनसान का डेरा बना पडा है!

मोहना के रहने से घर में कम-स-कम चहल-पहल रहती थी. हंसता हुआ वह जोर-जोर से बातें करता था. गोपाल जी से तो न अब जोर से बातें करते बनता है, और घर में हंस सकें ऐसी तो कोई बात उन्‍हें सूझती ही नहीं. गमला भी मोहन की संगत में खिली-खिली रहती थी. उसके लिए आंवडे और कटहल का अचार बनाती. कढी खिलाते हुए उससे अपने बचपन और ननिहाल के किस्‍से कहती. गोपाल जी ने तो पत्‍नी के संग वह अंतरंगता कभी नहीं जिया. गमला उनका आदर करती है मगर उन्‍हें अपने घर के किस्‍से उसने कभी नहीं सुनाये. पत्‍नी के साथ ठीक से समय बिताने की उन्‍हें फुरसत ही कब मिली. और अब तो जाने क्‍या है कि घर के अंदर उनके घुसते ही मुर्दनी छा जाती है. गमला हाथ में कोई काम लेकर बैठ जाती है. और गोपाल जी इधर-उधर कुछ असमंजस में भटकते रहने के बाद पार्टी का मुखपत्र निकालकर उसकी सूक्ष्‍म जांच करने में जुट जाते हैं. कि शायद कोई छूटा हुआ सूत्र हाथ लगे, कोई ऐसा सूराग मिले जिसे वे अपने अज्ञान में अब तक समझ न सके थे, और उसे समझ लेने के बाद उनकी सारी उलझनें दूर हो जायेंगी. कभी उन्‍हें अपनी सीमित शिक्षा से क्षोभ होता तो कभी यह सोचकर वह संशयग्रस्‍त होते कि पार्टी मुखपत्र संगठन की कमियों और उसके कारकों की सही पहचान नहीं कर रहा. फिर इस बात से उन्‍हें स्‍वयं पर क्रोध आता कि अपनी अपर्याप्‍त समझ और बेतरतीब ज्ञान की वजह से वे ऐसे ओछे नतीजे निकालने की हडबड में रहते हैं. क्‍या मालूम पार्टी बडे परिदृश्‍य की रोशनी में स्‍थानीयता की ऐसी सूक्ष्‍म समीक्षाओं पर उचित व पर्याप्‍त ध्‍यान न दे पाती हो.

जिस पार्टी से उन्‍हें समाज और इतिहास की समझ मिली, सभ्‍यता में उन जैसे मामूली जनों के स्‍थान को जिसने गाढे रंगों से चिन्हित किया, उसके प्रति किसी भी तरह का संशय वह पाल भी कैसे सकते हैं भला! नहीं, नहीं, वह बात नहीं, गोपाल जी मन ही मन स्‍वयं को समझाते. पार्टी के प्रति तो अब भी असीम श्रद्धा है. विश्‍वास है. पर पार्टी से ही तो विवेक और आत्‍म-मंथन का संस्‍कार मिला है. कुछ तो है कहीं आखिर जो छूटा जा रहा है. नकुल जी के दोष सामने नहीं आ रहे और सच्‍ची जनभावना का निरादर हो रहा है. वक्‍त रहते इसका निराकरण न हुआ तो इससे तो पार्टी का ही नुकसान होगा. और पार्टी का नुकसान गोपाल जी किसी भी सूरत में होने देना मंजूर न करेंगे.

कभी-कभी इन्‍हीं सब उधेडबुन में खोये-खोये गोपाल जी को झपकी आ जाती और सपना देखते कि कचहरी के बडे थाने में भारी पुलिस निगरानी में उन्‍हें सींखचों में कैद रखा गया है. और वह न केवल थोडा भी विचलित नहीं हैं, बल्कि उनके चेहरे पर असीम शांति है. क्‍योंकि उन्‍हें अपनी जनता के प्रतिकार पर पूरा भरोसा है. और वैसा ही जल्‍दी ही घटित भी होता है. थाने का लंबा-चौडा कमरा अचानक आंदोलनकारी झंडों की लाली और नारों के शोर से कांप उठता है. पुलिस के हतप्रभ सिपाही घबराकर एक ओर हट जाते हैं और कुछ जोशीले युवाओं की टोली गोपाल जी को सींखचों के पीछे से आज़ाद कराकर अपने कंधे पर उठाये उन्‍हें कचहरी के खचाखच भरे अहाते में लाकर स्‍थापित करती है. जननायक गोपाल जी के जयघोष के ऊंचे, भव्‍य शोर से कचहरी की पुरानी इमारत थरथराने लगती है.

रोटी खत्‍म करने के बाद थाली में ही गोपाल जी ने हाथ औंचा. पत्‍नी बुदबुदाई, आओ, थोडा आराम कर लो. हम गोड दबा देते हैं.

गोपाल जी के मन में ऐसा कोई इरादा नहीं था लेकिन मुंह से यही निकला, हमारी चिंता मत करो. हमें अभी प्रैस जाना है.

बाकी का आगे...

3 comments:

  1. आज वाला टुकड़ा कुछ कमजोर जान पड़ रहा है. भाषा की तराश में कुछ कमी लग रही थी और बात के दम-खम में भी. लगा कि कुछ जल्‍दबाजी में, फंसे-फंसे लिखा गया है.
    -मनीषा पांडेय

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  2. इतनी सुंदर तस्वीरें आपको कहां से मिलती हैं। आपको चाहिए कि ऐसी तस्वीरें ढूंढ़कर कोई यथार्थवादी चित्रकथा शुरू करें।

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  3. हुज़ूर, आप जो कोई हों आपने बडी मीठी सी बात कही है. सामने होते तो मैं भागकर आपके लिए समोसे लिये आता. चित्रकथा का ध्‍यान तो ज़रुर है, मगर दिक्‍कत है चित्रकथाएं महज़ सुंदर तस्‍वीरों पर आश्रित नहीं होतीं.

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