यह अकारण नहीं है कि क्षेत्रीय भाषाओं के फ़ीके रंगों की बनिस्बत अंग्रेजी साडी का रंग ज्यादा चटख व गुलाबी लगता है. जातीय पहचानों के इस नये विज्ञान में देशज कहीं पीछे छूट गया है. हमारे मन व समय से उसकी पपडियां धीरे-धीरे उतरती व विस्मृत हुई जा रही हैं. दिल्ली में साहित्य अकादमी की इमारत के बाहर व भीतर भटकते हुए कुछ इन्हीं सवालों पर भावुक हो रहे हैं अविनाश.
कविता में अब तक स्मृतियां खासी काम आती रही हैं. गांव, अपने छोटे शहर के बदबूदार नाले में गिरी गेंद कोनिकालने का उत्साह और सड़कों पर बहाये कोलतार के गोले बनाकर कमीज़ की जेब में डालने की हिम्मत. जबकि मालूम होता था कि ये कमीज़ अब दुबारा कभी धुल नहीं पाएगी. फट जाएगी, लेकिन कोलतार से अलग नहीं होगी. ग़रीब बाबूजी की ग़रीब पत्नी में मौजूद मेरी अमीर मां ने लेकिन कभी ऐसी फटकार नहीं लगायी, जिससे इस तरह की हिम्मत के लिए आगे हौसला पस्त पड़ जाए. यह सब कुछ कविता में आएगा, तो एक जादू की तरह लोग पढ़ेंगे. लेकिन जिंदगी का विज्ञान स्मृतियों की कक्षा में और उलझ जाता है. समाज आगे बढ़ता है अपने पुरानेपन को झाड़कर.
कई बार इस तरह की प्रस्थापनाएं कुछ ऐसी टोकरियों में डाल दी जाती हैं, जिनके बाहर चिप्पी सटी होती है- ये परंपरा से कटे हुए हैं, इनकी कोई ज़मीन नहीं है, इनका कुछ नहीं हो सकता. लेकिन सच यही है कि पुरानी ऐतिहासिकता से वे सारे सूत्र खारिज़ और कमज़ोर हो गये हैं, जिनसे हम साम्राज्यवादी ज़मीन से एक किसान के लिए थोड़ी मिट्टी मांगने की ताक़त बटोर सकें. इक्कीस फ़रवरी की दोपहर साहित्य अकादमी के दरवाज़े पर एक पोस्टर चिपकाया गया था. नौजवान लड़की थी. नाम था रूपा बाजवा. पैदाइश का साल छपा था 1976, यानी कुल 31 साल. इन रूपा बाजवा को 2006 के लिए अपने अंग्रेज़ी उपन्यास ‘द साड़ी शॉप’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है. हिंदी में ज्ञानेंद्रपति को यह पुरस्कार मिला है और उर्दू में मख़मूर सईदी को. दोनों की उम्र 50 के ऊपर है. अब इस फर्क से ये भी साफ होता है कि सम्मान लायक समझी जाने वाली उम्र से भी ये तय होता है कि कोई समाज अपने पुरानेपन से कितना
बंधा हुआ है या आधुनिकता के लिए उसने अपने रौशनदान कितने फैलाये हुए हैं. हम हिंदी समाज के नागरिक हैं. हम विज्ञान से ज्यादा भावनाओं की कद्र करते हैं. हमें लाइब्रेरी में बरसों से बसी पुरानी किताबों की खसखसाहट विभोर कर देती है. और घर की किसी बूढ़ी महिला को मानस के पद गाते हुए देख कर लगता है कि हमारी दुनिया में कितनी लय बची हुई है.हमारी भाषा मैथिली के वयोवृद्ध लेखक चंद्रनाथ मिश्र अमर वहीं रूपा बाजवा की तस्वीर के सामने खड़े मिल गये. वे अकादमी पुरस्कार की मैथिली राजनीति के सूत्रधार रहे हैं और उनसे लड़कर कभी इस भाषा में अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक नहीं हुआ जा सकता. हालांकि वो अपनी उम्र के आखिरी सालों में हैं और खड़े रहना उनके लिए ज़रा मुश्किल होता है. मैं दौड़ कर उनके लिए कुर्सी लाया और जैसे ही वे उसकी गहराइयों में धंसे, बताया कि जोड़ों में दर्द रहने लगा है और मोतियाबिंद की वजह से लिखने-पढ़ने में अब ज़रा दिक्कत होती है. फिर वे मेरे दादाजी के जिक्र पर आये और कहा कि उनके अक्षर छापेखाने के अक्षरों से भी अधिक सुव्यवस्थित और सुंदर हुआ करते थे. उनकी कई किताबें अप्रकाशित हैं, आपलोगों की जिम्मेदारी बनती है उन्हें छपवाना. मिथिला का गौरव तो वही सारी पुरानी चीज़ें हैं. साहित्य के बाज़ार का लाभ उठाने वाले अमरजी को साम्राज्यवादी बाज़ार से इसलिए कोफ्त है कि क्योंकि वे स्वाद पर हमला कर रहे हैं. कहा कि अब न चावल में वो स्वाद बचा, न सब्ज़ी न दाल में. मिठाइयों में भी वो स्वाद नहीं. नये लेखन में भी अब वो पुराना स्वाद कहां. न लय न छंद न गहराई. वर्णरत्नाकर हमारा गौरव है, लेकिन हम उसे भूलते जा रहे हैं. मैंने उनसे आग्रह किया कि वे उन स्वादों के संस्मरण लिखें, लेकिन मोतियाबिंद का जिक्र आग्रह के आड़े आ गया और इससे पहले कि तमाम असहमतियों के बावजूद मैं उनसे लिखवाने के दुराग्रह की ओर बढ़ता, उनकी गाड़ी आ गयी और एक बार फिर मेरे आसपास सिर्फ वही तस्वीर बची- रूपा बाजवा की.
हिंदी के कितने ही लेखक अभी रूपा बाजवा की उम्र में हैं और वे दरियागंज से लेकर मंडी हाउस में सर उठाये घूमते रहते हैं, लेकिन कलमकारी के नाम पर हंस और कथादेश में कविता-कहानी छप जाने से आगे उनका उत्साह जवाब दे देता है. ज्यादा से ज्यादा इस काबिलियत का इस्तेमाल अख़बारों या व्यावसायिक तरीक़े से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं में नौकरी हासिल करने तक ये उत्साह बना रहता है. और जब तक ऐसी नौकरियां नहीं मिलती हैं घरों से पैसे आते हैं, फ्रीलांसिंग चलती है और कभी कभार एक अदद साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी में वे पाये जाते हैं. बरसों बाद एक बार फिर इस लाइब्रेरी में गया. अलमारियों की वही कतारें अपनी पुरानी जगह पर खड़ी. लकड़ी की उन्हीं पुरानी कुसिर्यों पर बैठे किताबी कीड़े उन्हीं पुराने चेहरों में... और वही पुरानी गंध, जो दस साल पहले सन सनतानबे में हमें मिला करती थी. हमारे एक मित्र कहीं इन्हीं में खो गये थे. मुझसे अलग छूट कर. हर चेहरे को नज़दीक से जाकर निहारने और मित्र को तलाशने का धैर्य भी नहीं बचा था. मैंने अपनी ऊब को एसएमएस में दर्ज किया और उनके नंबर पर छोड़ दिया. जवाब आया- बाहर रुकिये, बस पांच मिनट में आया. और वे पूरे एक घंटे बाद हमें उसी पोस्टर के सामने मिले, जिसमें रूपा बाजवा अपनी उम्र से हमें चिढ़ा रही थीं.
बहुत छोटे किंतु प्रभावशाली तबके की भाषा होने के कारण अंग्रेजी में लिखने वाले लेखकों के लिये बहुत कम उम्र में साहित्य अकादमी या अन्य पुरस्कार पाना आसान है. हिंदी जैसी बड़े भूभाग की भाषा के साहित्यकारों के साथ तो इसकी तुलना किसी भी तरह नहीं की जा सकती .
वैसे सबसे कम उम्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले लेखकों में पंजाबी के अप्रतिम कवि-गीतकार शिव कुमार बटालवी (१९३६/३७-१९७३)का नाम अग्रगण्य है जिन्हें १९६७ में अपने काव्य-नाटक 'लूना' के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया था.