Thursday, February 15, 2007

बंबई: शायद सचमुच ज़मीन के नीचे सोना छिपा हो

इन दिनों देश में तरक्‍की के आंकडों का झुलना दिखाने का दौर चला हुआ है. अंदर- बाहर उसी की खुमारी बनी हुई है. छोटे शहर अकुला रहे हैं हमारे यहां मल्‍टीप्‍लेक्‍स कब आ रहा है, अपन लोगों के यहां कब सुपरस्‍टोर और शॉपिंग मॉल्‍स सजेंगे आदि-इत्‍यादि. बाज़ार ऐसा झमाझम फैल रहा है तो ज़ाहिरन लोगों की क्रय क्षमता बढ ही रही होगी. मैं झारखंड व बंबई के बीच आना-जाना करता हूं, और आंखें फाड-फाड कर इस नई उभर रही ताकत के रहष्‍यवाद को भेदने की कोशिश करता हूं, मगर, क्षमा कीजियेगा मुझसे इसके ये गहरे भेद पकड में नहीं आते. खैर, असली प्रसंग यह नहीं है जिसकी वजह से मैंने यह बात शुरु की थी. जिसके लिए की थी वहां चलते हैं.

हमारे यहां आखिर शहर चलते कैसे हैं? मतलब शहरों का नियमन, प्रबंधन कैसे होता है? बंबई में इतना पैसा है फिर बेसिक इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर की ऐसी तकलीफदेह तस्‍वीरें क्‍यों हैं? दूसरे क्षेत्रों की जाने दीजिये सडकों की ऐसी बदहाली का रहष्‍य क्‍या है? गाडियों की इतनी खपत है, रोज़ नई गाडियां खरीदी जाती हैं फिर सडकों का यह सजीला रुप क्‍यों? बांद्रा से आप उत्‍तर की ओर गहरे निकल जाईये हर ओर गड्ढों की दूर-दूर तक फैली अनगढ झांकियां आपके स्‍वागत में बांहें फैलाये सामने आयेंगी. मैं अंधेरी-जोगेश्‍वरी के पूर्वी नोक पर रहता हूं, और हमारे भीड भरे मोहल्‍ले की मुख्‍य सडक इन दिनों एक छोर से दूसरे छोर तक लगभग एक-तिहाई खुदी हुई है. मतलब लगभग आधी बेकार! पिछले वर्ष की जनवरी से अबतक के दरमियान इस सडक की संभवत: यह चौथी कोडाई है. कुछ अर्सा पहले डीएनए अख़बार शुरु हुआ था तो उनके मशहूर विज्ञापन कैंपेन में एक इस अनवरत की कोडाई के बारे में भी था: कि आखिर बीएमसी किस चीज़ की, सोने की खोज में, इतने गड्ढे खोदती रहती है? जो बंबई के उपनगरों में रहते हैं वह इस व्‍यंग्‍य का दर्द समझते हैं. मगर यह किस्‍सा महज़ गली मोहल्‍लों की सडकों भर का नहीं, बाजू में जोगेश्‍वरी-विक्रोली लिंक रोड का चार ट्रैकों वाला भारी काम निमार्णाधीन है. पिछले पांच वर्षों से है. और अभी भी ठीक-ठीक वाईंड अप नहीं हुआ. कभी-कभी वहां की ट्रैफिक में फंसे खयाल आता है क्‍या मालूम एक दिन यह रोड सचमुच बन ही जाये, फिर सरकारी भाई लोग महीने भर इसकी गुडाई में जुटेंगे!

मतलब यही कि इस नियमन-प्रबंधन के पीछे आखिरकार किस तरह की नगरीय दृष्टि काम करती है. बडे स्‍केल पर फ्लाईओवरों व सडकों की चौडाई के काम अंजाम हुए मगर उनके आजू-बाजू गरीब बस्तियों के लोगों के लिए ऐसा कोई वैकल्पिक इंतजाम न खडा किया गया कि वे हाईवे की तेजी से आती-जाती गाडियों के बीच हाथ में बाल्‍टी-कनस्‍तर लिये अदबदाकर सडक पार करने की बेवकूफी व हिंसा से बचें. यह महज भ्रष्‍टाचार है या एक ज़ाहिल जनविमुख व्‍यवस्‍था के बीमार कारनामे? कभी-कभी सोचता हूं इस प्रबंधन व सडकों की गोडा-गोडीवाले प्रसंग पर कोई सजग बंधु अदालत में आरटीआई दायर करके एमएनसी को ज़रा घेरता क्‍यों नहीं? या कि यह मेरा तकनीकी अज्ञान भर है और यह दरअसल ऐसा क्षेत्र है जहां गुणी, सभ्‍य शहरीजनों ने स्‍वीकार लिया है कि बंबई एमएनसी के प्रबंधन का नक्‍शा ही इकलौता व वाजिब नक्‍शा है. जाडा ठीक से पडा नहीं, और गर्मी के शरु होने में ज्‍यादा वक्‍त नहीं. उसके बाद मुसलाधारों का दौर शुरु होगा, और भूलिये मत, जगह-जगह गड्ढे आपकी स्‍वागत में खडे होंगे.

4 comments:

  1. "...बडे स्‍केल पर फ्लाईओवरों व सडकों की चौडाई के काम अंजाम हुए मगर उनके आजू-बाजू गरीब बस्तियों के लोगों के लिए ऐसा कोई वैकल्पिक इंतजाम न खडा किया गया कि वे हाईवे की तेजी से आती-जाती गाडियों के बीच हाथ में बाल्‍टी-कनस्‍तर लिये अदबदाकर सडक पार करने की बेवकूफी व हिंसा से बचें. यह महज भ्रष्‍टाचार है या एक ज़ाहिल जनविमुख व्‍यवस्‍था के बीमार कारनामे? ..."

    यही तो है भारतीय तंत्र का असली चेहरा. लगता है यह कुरूप चेहरा कभी भी बदल नहीं पाएगा...

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  2. हालाँकि मुम्बई जैसा बुरा हाल तो नहीं पर कुछ बातों में शायद सारी दुनिया एक जैसी ही है. मेरी एक मित्र कहती है कि यह शहर अब सिर्फ गाड़ियों के लिए ही हैं, इनमें पैदल चलने वाले, साइकल पर चलने वाले, अँधे या विकलाँग, उनके लिए कोई जगह नहीं, अगर उनके पास गाड़ी नहीं तो घर में ही बैठें!

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  3. यह तो हर जगह की कहानी है.

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  4. आपकी चिट्ठियां पढ़ कर तो नहीं लगता कि आपको कोई, 'पटखनी खाये चित्‍त' कर सकता है :-)

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