Tuesday, February 27, 2007

अधूरे ब्‍लॉगमुग्‍धता का पूरा बयान

एक ज़माने में यह मधुबाला, मुमताज़, मीना, माधुरियों ने किया था. अब ब्‍लॉग कर रहा है. हमको हमसे छीन रहा है. हम अपने नहीं रह गए. ब्‍लॉग के हो गए हैं. रवीश कुमार खामखा हल्‍ला किये हैं. एक ग़ैर-वैवाहिक संबंध ही तो बनाया है, नौकरी अभी कहां छोडी है. असल सूफी कहलाने के वे आधिकारिक अधिकारी नहीं. हम तो हुज़ूर, यहां दुनिया-जहान के सारे एंगेजमेंट भूलकर बस ब्‍लॉग की सीढियों के नीचे आकर जम गए हैं. दिन-रात का भौतिक, स्‍थूल फ़र्क मिट गया है. सिर्फ ब्‍लॉग का समय रह गया है. टीवी बकवास है, अख़बार रद्दी है, किताबें सब पढ चुके. अब तो बस पोस्‍ट ही पढना चाहते हैं. जिस तरह कभी जे. एम. अकबर का पैर ‘दीन-ए-इलाही’ और आई. गांधी का ‘नसबंदी’ में धंसा था, हमारा ब्‍लॉग में धंस गया है. पैर ही नहीं पराक्रम, प्रतिष्‍ठा सब धंसा हुआ है. चेतन-अचेतन किसी भी घडी में ब्‍लॉग थोडे से बखत के लिए भी जो मुंह फेर ले, हम सिंधु से लौटती सिकंदर की सेना की तरह एकदम पराजित से महसूस करने लगते हैं. पत्‍नी अब अच्‍छी नहीं लगती. उसका सवाल अच्‍छा नहीं लगता. सोचते हैं कमेंट में ही क्‍यों नहीं पोस्‍ट करती, वहीं जवाब दे दिया करेंगे. बंटु को स्‍कूल में एडमिशन की दिक्‍कत हो रही है. हम चाहते हैं लेकिन उस दिशा में सोच नहीं पा रहे. उस वक्‍त अपने को टेपलेट और फॉंट एंड कलर्स के बारे में सोचते व्‍यस्‍त पाते हैं. बंटु बिगड रहा है मगर ब्‍लॉग सुहा रहा है. घडी भर ताज़ी हवा लेने के लिए खुली खिडकी पर जाकर कुहनी टेकते हैं. मगर मन कंप्‍यूटर पर ही टिका रहता है. राउटर की टिमटिमाती हरी बत्तियां देखकर हमारा मन उसी तरह खिल जाता है जैसे मरनेवालों का काशी और काबा पहुंचकर खिलता होगा. ब्‍लॉग हमारा वृंदावन है. अब सारे भजन हम उसी के वृक्ष के नीचे खडे होकर गाना चाहते हैं. हमने स्‍वानंद किरकिरे से कहा है हमारे ब्‍लॉग के लिए गाना लिखो. अब तो एकलव्‍य रीलीज़ भी हो गई है. स्‍वानंद लिख नहीं रहा है. हमें अच्‍छा नहीं लग रहा. हम गोर्बाचोव और पुतिन की तरह दो धुरियों पर जाकर खडे हो रहे हैं. ब्‍लॉग इतिहास में इस परिघटना की सुखद स्‍मृति नहीं दर्ज़ होगी.

6 comments:

  1. रवीशजी की तरह आप भी गये अब काम से... सटीक और सही बयानी किया आपने.

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  2. वाह वाह वाह
    अमॉं ज्‍योतिषी हो क्‍या
    हमारे घर की खबर क्‍योंकर रखते हो।

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  3. बात तो बराबर है मगर एक और बात है... कहीं ऎसा तो नहीं कि हमारे सरोकारों की दुनिया में से लिखने के मसले कम पड़ रहे हैं..मगर दूसरी तरफ़ अपने भीतर के बदलाव के प्रति सजग रहना और उसे ब्लॉग पर रिपोर्ट करना भी सच्चे ब्लॉगजीवी का फ़र्ज़ है...

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  4. लो जी आप भी पक्के ब्लॉगिए बन गए। होता है जी ब्लॉगिंग का प्यार ऐसा ही होता है। छुटती नहीं है काफिर कीबोर्ड से लगी हुई।

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  5. ये ब्लाग आग है एक बार लगने पर बुझाना मुश्किल होता है!

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  6. ब्लागिंग नशा है भाई…फंसे तो गहराई में डूबे…।
    लेकिन मेरी समझसे अभी-भी इसका दिशा आभाव झलकता है…।

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