Tuesday, February 27, 2007

खडखडिया साइकिल और लम्‍बा रास्‍ता

मोर्चे पर पार्टी वर्कर की पहली, दूसरी, तीसरी कडी आपने पढी. यह चौथी किस्‍त है:


गोपाल जी सीधे प्रैस नहीं गये. अब अपनी नहीं, पत्‍नी की चिंता हो रही थी. कैसा कामकाजी देह था बेचारी का, देखते-देखते कांटा हो गई है. भाई, देखरेख करना चाहिये न? एक अपनी ही तो संभाल करनी है, कौन बडा काम है? हम अब दुनिया संभालें कि घर बैठकर मेहरारु अगोरें? गमला के बारे में सोचते हुए उन्‍हें चिढ हो रही थी, और गुस्‍सा आ रहा था. फिर यह गुस्‍सा मोहन की तरफ मुड गया. वह घर छोडकर न जाता तो ऐसी नौबत न आती. अपना सगा भाई भी अपना नहीं होता. आदमी आखिर किसका भरोसा करे. रिश्‍तेदारी में भी सब कटे पडे हैं, कोई हाल-चाल लेने तक नहीं आता. हमसे नाराज़गी है, निभाओ नाराज़गी, मगर बेचारी उस औरत ने क्‍या बिगाडा है. जब सपरा है आपके काम-कारज में कितना जांगर चलाई है. आज उसे दरकार है तो कोई पूछवैया नहीं. यही साला जगत की रीत है. आज हम कहीं बडे सरकारी बाबू होते तो हमारे दरवाज़े सब चिरकुट पार्टी का भीड लगा रहता. सब हांकी देते फिरते कि गोपाल जी हमारे मौसा हैं, गोपाल जी फूफा हैं! लेकिन गोपाल जी नोट नहीं काट रहे तो कुच्‍छो नहीं हैं. सब शिक्षा-दीक्षा बेकार है. सरकार का षडयंत्री सूचनातंत्र और सामा‍जिक पिछडेपन का ज़हर सबके नस में घुसा बैठा है- बाहरी हो चाहे अपने घर का आदमी. सबमें वही स्‍वार्थी और जनविरोधी संस्‍कार. इसीलिए तो उनके जैसों की समाज को इतनी ज़रुरत है. नकुल जी इसको कहां से बुझेंगे. उनको तो समाज का लौकना ही ज़माने से बंद हो गया है. इन्‍हीं विचारों की घिसी हुई पुरानी फिल्‍म दिमाग में घुमाते, खड-खड करती साइकल को गली में खेलते बच्‍चों से बचाते, गोपाल जी दीनानाथ बैद के दरवाजे पहुंचे. मगर बैद जी दुनिया-जहान का सब काम छोडकर उन्‍हीं के इंतज़ार में नहीं बैठे थे.

घर पर पता चला बेटी के लिए लडका देखने गाजीपुर गए हैं. उनकी छोटी लडकी से पानी लाने को कहकर वह बेंच पर घडी भर सुस्‍ताने को बैठे. अब दो दिन में फिर एक पूरा चक्‍कर लगाकर इनको जोहते हुए आना होगा. यह सोचते हुए भी गोपाल जी को चिढ हुई कि बैद जी को भी ससुर आजे दामाद देखने जाना था!

मगर दीनानाथ बैद अच्‍छे आदमी हैं. गोपाल जी को पैसों के लिए कभी तंग नहीं किया. उल्‍टे मौका-बेमौका सौ-पचास की मदद ही करते रहे हैं. गोपाल जी की राजनीतिक विवेचना भी मुडी डुलाकर चुपचाप सुन लिया करते हैं. ये नहीं कि बीच-बीच में बात काटकर अपनी राय दिये बिना उनको खाना नहीं पचता. दरअसल बैद जी शांत प्रकृति के हैं, सबसे बना के चलते हैं. गोपाल जी का पर्चा अपने कागज़ के नीचे रख लेते हैं, गौर से उनकी राजनीतिक समीक्षा सुनते हैं, मगर आजतक किसी पार्टी कार्यक्रम में हिस्‍सेदारी करने नहीं आये. पूछने पर हमेशा यही कहते हैं कि साहेब, जितनी पाटी को हमरी जरुरत है, उससे जादा दरकार हमारी मरीजों को है, मानते हैं न?

***

जाने क्‍या कारण है कि घर और धंधे दोनों की कमाई के बावजूद गुप्‍ता जी ऐसी जगह प्रैस खोले हैं. साफ-शुद्ध आदमी एकाएक अंदर चला आये तो अदबदाकर उल्‍टी कर दे. पीछे की तरफ तंग सीढी से ऊपर कमल प्रैस के मुख्‍य दफ्तर तक पहुंचने के लिए गोपाल जी को इतने वर्षों बाद अब भी मानसिक तैयारी करनी पडती है. पता नहीं कहां का क्‍या रसायन है कि ऐसी महक छूटती है. और दो-चार नहीं, बारहों महीने. गोपाल जी ही नहीं, जैराम और सर्वेश्‍वर चौधरी भी कमल प्रैस आने के नाम से बहुत उत्‍साहित नहीं होते.

नाक पर हाथ धरे, पडोस के पिछवाडे नाद पर बंधे एक गाय की जुगाली देखते धीमे-धीमे गोपाल जी ऊपर आ गए. नीचे ध्‍यान नहीं गया था कि गुप्‍ता जी का नीला पुरनिया बजाज पार्किंग नहीं है, ऊपर लेबर से खबर हुई कि गुप्‍ता जी कागज के इंतजाम में निकले हैं, घंटा-पैंतालिस मिनट में लौटेंगे. काम करनेवाले सब पुराने लोग थे. गोपाल जी को बहुत सालों से देख रहे थे. मुबारक नाम का ज़रा लंगडा के चलनेवाला एक मुसलमान लडका पार्टी के पोस्‍टर के लिए तनी मुट्ठी वाला आदमी या नारा लगाती जुलूस की कुछ उलटी-सीधी कलाकारियां भी कर दिया करता था. उसने गोपाल जी को देखा तो एक काले कपडे में हाथ पोंछता किसी को चाय के लिए आवाज़ दी. गोपाल जी उसके जवाब में हाथ उठाकर मुस्‍कराये मगर अंदर ही अंदर अभी भी सोच में पडे थे कि गुप्‍ता जी ने पैसों की बात उठाई तो उनको क्‍या जवाब देंगे. पर्चा रात में छपकर तैयार नहीं हुआ भद्द हो जायेगी. मुबारक के पास आने पर झोले से अपनी पुरानी कापी निकालकर उसे खोलते हुए बोले, एक छोटा पर्चा है, कल सुबह तक मिल जाये तो अच्‍छा है.

मुबारक मुस्‍कराने लगा, आप भी एकदम लास्‍ट मिनट में आते हैं, कामरेड साहेब. सुबह से एक कुंजी चढा हुआ है, कल शाम तक तो उसी में फंसे रहेंगे. पर्चा के लिए अभी कहां से टाईम लहेगा.

गोपाल जी का चेहरा उतर गया. नकुल जी की अलग-अलग अप्रीतिकर भंगिमायें दिखने लगीं.

2 comments:

  1. सही जा रहे हैं..इसी राह पर इसी चाल से चलते चलिये.. नॉवेल नहीं तो नॉवेल्ला तो हो ही जायेगा..

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  2. pramod bhai aapke likha padhane me acha lagta hai

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