Friday, March 2, 2007

क्रेडिट कार्ड से जिसकी खरीदारी नहीं हो सकती

बीस साल की उम्र में साइकिल पर तेजी से अपने छोटे शहर को एक छोर से दूसरे छोर तक नापते हुए लगता था हमने दुनिया का भेद पा लिया है. संकरी, तंग गलियों के भीतर, रज़ाक टाकीज़ के लोहे के गेटवाले अहाते की छोटी-सी किताबों वाली गुमटी पर हेमिंग्‍वे, गोर्की, कमलेश्‍वर के एक रुपल्‍ली हिंद पाकेट बुक्‍स संस्‍करणों को उलटते-पुलटते महसूस होता सारे रहस्यों पर से धीरे-धीरे परदा अब उठा ही चाहता है. छाती में ज्ञान का उजाला व नवजीवन की कुंजी सजाये हर वक़्त हमारी आत्‍मा किसी अजाने ‘जैज़ी’ धुन पर थिरकती-सी संगीतमय बनी रहती. तैरती साइकिल की तय यात्राओं से मन कहीं बहुत आगे, बहुत दूर निकल जाया करता. जादू और आत्‍मविश्‍वास से भरे कितने अनोखे दिन थे वे. मगर रहष्‍यों का भेद पा लेने का अब वह पहले-सा आत्‍मविश्‍वास नहीं रहा.

किताबों के बीहड लोक से आजीवन का नाता जोड लेने के बाद अब यही लगता है कि हम कितना कम जानते हैं, और यह भी कि पुरानी संस्‍कृतियों की विरासत से रागात्‍मक होकर आधुनिक जीवन दृष्टि बनाना कैसी टेढी, जटिल प्रक्रिया है. इन सीमाओं का एहसास लगातार हमारे ‘जैज़’ का लय बिगाडता रहता है. शायद कुछ इसीलिए पडोस में उड रही गर्म हवाओं की मैं ढंग से प्रोसेसिंग नहीं कर पा रहा. एक के बाद एक ‘सही’ और ‘ग़लत’ की ठीक-ठीक शिनाख्‍त कर देने और हो लेने की तीखी छटपटाहट मुझे बस चिंतित और उदास कर रही है.

जातीय व संप्रदायगत धारणाएं हमारे मनों में बडी टेढी, उलझी गांठें बनाये बैठी होती हैं. दूसरों से पहले, स्‍वयं हमको सबसे कम पता होता है कि विशेष परिस्थितियों में हमारा व्‍यवहार ठीक-ठीक कैसा होगा. सामाजिक जमाव में हमारा आचरण कुछ और होता है, घरेलू अंतरंगता में कुछ और. बहुत सारे मौकों पर हम मुंह खोलते हैं तो बहुत सारे मौकों पर चुप भी रहते हैं. सात वर्ष पहले एक खास मौके पर हमारा जो आचरण था ज़रुरी नहीं आज वैसी स्थिति सामने पडने पर हम उसी तरह का व्‍यवहार करेंगे. फिर ऐसी निश्चिंतता व ‘फिनैलिटी’ के साथ अपने मतों को हर तरह से मनवा लेने की जिद क्‍यों? ट्रेन तक में पास में सीट हो तो सहयात्रियों के साथ कैसा आचरण हो की जिस गाईड बुक का हम अनुकरण करते हैं, सीट के अभाव व थकान में उसका चरित्र तत्‍काल बदल जाता है. सीट का सवाल तो बडा छोटा सवाल है. फिर किसी के जाती, जिये गये अनुभवों पर आखिरी फ़ैसले के अंदाज़ में बयान देना क्‍यों इतना ज़रुरी है? हम ऐसा देश हैं जो नागर संस्‍कृति के बाह्य उपकरणों से भले लदता चल रहा हो, हमारे संस्‍कारों का उसने कोई नगरीकरण नहीं किया है. अपनी दुनिया का न हो तो किसी नये अपरिचित के लिए मुस्‍करा देना या दुआ-सलाम में हाथ जोडना, हमें हेठी न भी लगे, हमारे आचरण का स्‍वाभाविक अंग नहीं ही हुआ है. थोडी-थोडी दूरी के भूगोल पर हमारी सहिष्‍णुता का रंग बदलता रहता है. औरत की आज़ादी के बारे में हमारे विचार और होते हैं मगर अपने ही घर की बहन भाग जाये तो उन विचारों की व्‍याख्‍या बदलने में भी हमको उतना ही कम समय लगता है.

शॉपिंग माल्‍स की भीड में उत्‍साहित खरीदारी करते हुए हम नागर नहीं होंगे. उसके लिए विवेक और नई सामाजिकता को जोहना होगा. और वह क्रेडिट कार्ड दिखाकर नहीं पाई जा सकेगी. उसके लिए हमारे पास अभी खुदरा पैसे भी पर्याप्‍त नहीं हैं. वर्ना तो ऊंची आवाज़ वाली तिक्‍तता की संपत्ति हमारे पास काफी मात्रा में है ही. मगर फिर उसकी प्रकृति भी बहुत हद तक कुछ वैसी ही होगी जैसे रटे अंदाज़ में मास्‍साब कक्षा को संबोधित करें- अच्‍छा बच्‍चा कौन?- और जवाब में हाथ उठाये सामूहिक रुप से खडी होकर कक्षा अपने को अच्‍छा बच्‍चा मनवाने की धकमपेल मचाने लगे.

5 comments:

  1. Baaton ko dilchasp dhang se kahna aapki visheshta hai.Mujhe sada aashcharya hota hai ki aapne itni saari chintaaon ko ek saath abhivyakt karne ki aesi padhhati kaise saadhi.Baatein rochak dhang se kahi jaati hain aur laainon ke beech kuchh aesa chhupa rahta hai jiski maar prabhavkari hoti hai.Mohalle mein jo hulchal machi hui hai sambhawatah uska kaaran Brecht ke pad chinhon par chalna hai jinhone seedhi aur sacchi baaton ko aesa bataya hai jinko sunkar kaleja taar taar ho jaata hai(anuvaad ke liye prabudh anuvaadkon ko dosh dein).To main kah raha hoon ki metaphoric aur alegoric writting style sambhav hai ki samay kee maang ho, arthat yadi kisi kee aalochna karna ho to 'aakash mein kuhara ghana hai kahna padega'(ref. Dushyant).Aap swastgh rahein shatayu hon aur apni ghrina aur rachnatmak banatey rahein.Iti.

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  2. आपकी गूढ़ और गहरी चिन्ता को भीतर धकेलने मे थोड़ी मेहनत करनी पड़ी..अवसाद जायज़ है..बात दिमाग़ में अट रही है।
    -अभय

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  3. शॉपिंग माल्‍स की भीड में उत्‍साहित खरीदारी करते हुए हम नागर नहीं होंगे. उसके लिए विवेक और नई सामाजिकता को जोहना होगा. और वह क्रेडिट कार्ड दिखाकर नहीं पाई जा सकेगी.सही लिखा आपने, अच्छा लगा!

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  4. शायद ये फिक्र एक बेहतर इंसान होने या देखने की ज़्यादा है. सुनते हैं कि हम भी आधुनिक समाज हो चुके लेकिन ये सवाल बड़ा परेशान करने वाला है कि आज भी हिंदुस्तान में किस खेत की मूली हैं आधुनिक मूल्य. इंसानी उपलब्धियों(सिविलाईजेशनल एचिवमेंट)को हम ठेंगे पर रखते हैं. नकल करने में माहिर हैं इसलिए हमारे यहां हर अच्छी चीज़ के ढ़ांचे तो देखने को मिल जाते हैं लेकिन उससे स्प्रिट ग़ायब मिलती है.
    एक बात और- कहते हैं कि जब भविष्य के सपने धुंधले पड़ने लगते हैं तब हम ज़्यादा नॉस्टेलजिक हो जाते हैं. सही बात है कि क्रेडिट कार्ड से कबाड़ी की दुकान में मिलने वाली दुर्लभ किस्म की क़िताबें नहीं मिल सकती है या उस तरह का आनंद नहीं मिल सकता है. लेकिन आज बाज़ार में तो सबकुछ बिकता है. इसलिए शायद वहां वो बात नहीं मिल सकती जो आप पाना चाहते हैं. अब इस यथार्थ से मुठभेड़ करने के लिए कैसी कसरत की जाए ये बड़ी बात है. ये चुनौती एक बेहतर नागर समाज होने की ही नहीं बल्कि संपूर्णता में एक बेहतर समाज होने की भी है. शायद ये हमारे पिछड़ेपन और आधुनिकता के बीच का ज़रूरी द्वन्द्व है और हमारी उम्र इस संक्रमणकाल के बीच में पड़ती है. जो लोग उत्तरआधुनिक हो चुके हैं उन्हें ज़्यादा फिक्र करने की ज़रूरत नहीं.

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  5. आपके लिखने का अंदाज़ भाता है ।

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