Friday, February 23, 2007

जाने वो कैसे लोग थे जिनके

''जिन्‍हें नाज़ है हिन्‍द पर वो कहां हैं...'' मालूम नहीं आपकी स्‍मृतियों में इसकी कोई धुधली, झिलमिलाती याद शेष है या नहीं. मगर हिंदी फिल्‍मों की जब कभी विचारोत्‍तेजक चर्चा होगी, लोग बार-बार इस खास रचना के जादू, इसकी मार्मिकता- की पहचान करने लौटेंगे. प्‍यासा इस 27 फ़रवरी को अपने प्रदर्शन के पचास वर्ष पूरे कर रही है. देखिये गुरु दत्‍तप्‍यासा पर विशेष सामग्री: सिनेमा-सिलेमा में.

3 comments:

  1. गीत की पंक्तियाँ सुनकर ही मन प्रसन्न हो जाता है, यह मेरे सबसे पसंदीदा गानों में से एक है और हर वक्त मेरे होठों पर यही गाना होता है।
    उम्मीद थी कि कुछ ज्यादा जानने को मिलेगा इस फिल्म के बारे में, खैर कोई बात नहीं अगली पोस्ट में प्यासा, दो बीघा जमीन, दो आँखें बारह हाथ जैसी फिल्मों के बारे में कुछ बतायें।
    www.nahar.wordpress.com

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  3. पहली बार देखा था जब, तब से अब तक बार बार लौटना होता रहा है इस सिनेमा तक.

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