Thursday, February 15, 2007

श्री सु कु जी का परदेस प्रवास

हमारे एक परम प्रिय, मन से नेक़, सु कु जी अभी-अभी महीना भर का समय इंग्‍लैण्‍ड के एक छोटे शहर में गुजार कर लौटे हैं. नई-नई लगी नौकरी का ऑरियेंटेशन था सो थोडा-बहुत गोरे सीनियरों का लेक्‍चर सुनने से अलग माथे पर काम का विशेष बोझ था नहीं. फुरसत में श्री सु कु मियां छोटे व लगभग खाली-खाली-से लगते शहर की साफ़ सडकों व अपनी भरी जेबों की नई जीवन शैली का खुशी-खुशी अभ्‍यस्‍त हो रहे थे. यहां के देसी सैरों में उन्‍हें किसी चर्च के अंदर पैर रखने का कभी ख़याल नहीं आया था मगर इंग्‍लैण्‍ड में जितना सपर सकता था, उन्‍होंने सभी चर्च, चैपल, कैथेड्रल का मुआयना किया. अपने डिजि‍टल कैमरे में सारी झांकियां कैद कीं. बत्‍तख, बागीचे, औरतें, सडक, हाईवे, बुड्ढे, बस, बाज़ार, आसमान, दिन का अंधेरा, रात के उजाले कुछ नहीं बख्‍शा. इतनी तस्‍वीरें उतारीं कि सब देखने की गुजारिश पर आदमी का उनसे झगडा हो जाये.

श्री सु कु जी के साथ ही इंग्‍लैण्‍ड गये नई नौकरी के दो अन्‍य सिपाही फुरसत के दिनों में नई शादियों के बसे अपने नये घरों के लिए जब कप-चिलमची और फोटो-फ्रेम खरीदते हुए शॉपिंग मॉल्‍स रगेद रहे थे, हमारे सु कु जी ब्रिस्‍टल, मैनचेस्‍टर, लीवरपुल और लंदन की बसें और रेल पकड रहे थे; ट्रेफेलगर स्‍क्‍वॉयर, बकिंघम पैलेस, विक्‍टोरिया व अलबर्ट म्‍यूजियम हॉलों की नुमायश देख रहे थे. बाद में, यहां तस्‍वीरों को दिखलाते हुए उन्‍होंने अपने छोटे भाई को सूचित किया, ‘देख रहे हो ना, हमारा कोहिनूर यहीं बंद है! हमारे यहां का सब लूट-लूटकर अपने यहां सजाया है! उनका बस चलता तो ताज़महल, अजंता और एलोरा भी उठा के लेके जाते! यही हाल ईजिप्‍ट का किया है- पूरी दुनिया का किया है, यार! वर्ना वो हैं क्‍या. पूरी यूके की आबादी से ज्‍यादा लोग तो अकेले अपनी बंबई में रहते हैं! पूरे आयरलैण्‍ड में जितने लोग रहते हैं उससे ज्‍यादा बोकारो में रहते हैं.’ मैंने एतराज़ किया, ‘सु कु जी, आप इस तरह कॉंन्फिडेंटली मत बोलिये.’

श्रीयुत सु कु ने जवाब दिया, ‘नहीं, सर, मैं करेक्‍ट बोल रहा हूं. कॉलोनियल हिस्‍ट्री ने हमारा एकदम बेडा गर्क कर दिया. आर्ट, सोसायटी, सडकें, शहरों का मेन्‍टेनेंस, आर्किटेक्‍चर, लाईफ-स्‍टाईल किसी भी चीज़ में हमारा कोई मुकाबला ही नहीं है उनसे. वी आर वे-वे बिलो देयर मार्क. वी आर- पथेटिक. ऐसी पहाडियां दिखती हैं कि देखकर तबियत हरी हो जाये! फिर हवा- आप उनको छू और सूंघ सकते हो. यहां बंबई में तो पता ही नहीं चलता कि हवा नाम की चीज़ रहती कहां है!’ छोटे भाई ने जो बहुत देर से विदेश की बडाई सुनता खार खाये बैठा था, चिढे अंदाज़ में प्रतिकार किया, ‘ठीक है, ठीक है, बंबई ही इंडिया नहीं है. इंडिया में हवा है अभी!’ सु कु जी ने भाई को अनसुना करते हुए अपनी बात में जोडा, ‘छोटे-छोटे गांव में वहां ऐसी गाडियां दिखती हैं जो आपको बंबई की सडकों पर नहीं दिखेंगी! यहां सब सेकेंड रेट है. गोरों की बात ही अलग है, यार.’ मैंने सु कु जी को समझाने की कोशिश की कि वे कुछ ज्‍यादा ही विदेशी नशे में धुत्‍त होकर लौटे हैं, स्‍वदेस प्रेम कुछ तो उनकी ज़बान की कडवाहट कम करे. हमारे परम-प्रिय श्री सु कु ने हिक़ारत से एक बार मेरी ओर देखा फिर मोहल्‍ला के ब्‍लॉग पर रवीश कुमार की ताज़ा टिप्‍पणी के शीर्षक (क्‍या इस मुल्‍क को चूतिया बनाया जा रहा है? ) पर उंगली उठाते हुए एकदम-से ज़हर उगला, ‘ये गलत है. यह दरअसल सवाल नहीं स्‍टेटमेंट होना चाहिये.’

अनुराग कश्‍यप की राजनीतिक समझ से हमें हमेशा से शंका रही है, अब आगे अपने चहेते सु कु जी को भी मैं सशंकित नज़रों से देखने को मजबूर हो रहा हूं. जीवन की ऐसी दग़ाबाजियां अब आये दिन होती रहती हैं, क्‍या कीजियेगा. अपने समय और इतिहास की लपेट से किसी का कितना बचना होता है?

5 comments:

  1. सु कु जी की कथा पढ़ी। परदेस के एक शहर की उत्तेजना कैसे सु कु जी के सीने में पिघल रही है, यह भी जाना। लेकिन यह तो बताइए, कि सु कु जी की कथा से अनुराग कश्‍यप की राजनीतिक समझ के क्‍या रिश्‍ते हैं?

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  2. बंधुवर अविनाश के जवाब में हम तो दो कदम आगे जाकर ये कहेंगे कि सरकारी मशीनरी ज़रा आंखें खुली रखे, और छोटे शहर के लोगों के विदेश जाने की हर कोशिश को हतोत्‍साहित करे. बाहर जाकर सामाजिक, आर्थिक जो झलकियां मिलती हें, वह दिमाग में देश के प्रति अतिशय अनुराग व देश के चलानेवालों के खिलाफ बडा तीखा गुस्‍सा उपजाती है. श्री सु कु की इस सनक और अनुराग की समझ की काफी नज़दीकियां हैं. बस इतनी बात थी.

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  3. A education system exposes us to a vast resource of knowlegde and experience over a short time. WHat our country needs is a better education system .Infact tour/travels adds to our exposure and enriches our Geography, History, Econimocs etc. How it does this is, we start taking interest in them.

    What ever wrong we see in our society, is more due to ignorance on the part of the weaker section. If they are aware and strong, they will never tolerate any political, social or economical plot against them. But it's a v.cycle. Political will and vision can do anything .. and with out it, things can be difficult or impossible.

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  4. बढि़या है! कामना है कि सु कु जी के गुस्से को दिशा मिले! अनुराग कश्यप के बयान पढ़ाये जायें भाई!

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  5. सुकु जी का रुदन थोड़ा घिसा हुआ मालूम देता है। यह मुल्क एक अदभुत संरचना है। इसकी व्याख्या करने का जोखिम लेंगे तो आपको भी स्टेटमेंट पर ही पहुंचना पड़ेगा। जैसा कि आपने अविनाथ को दिए जवाब में किया भी है। इस मुल्क की दुर्दशा का ठीकरा उसे चलाने वालों पर फोड़ने का क्या फायदा, आखिर उन्हें चुनने वाली जनता के विरोधाभास क्या कम हैं। इस मुल्क में रहने की जो भी पीड़ा है उसे अपने भीतर बसाकर गांधी और विवेकानंद की तरह दार्शनिक अंतर्विरोधों का गट्ठर व्यक्तित्व बन जाना ही सेहत के लिए ज्यादा अच्छा है।

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