Saturday, February 17, 2007

टाईम के किल्‍लत की सामाजिक बहार

खबरी चैनलों पर यह खेल आप सबों ने देखा होगा. पैनल डिस्‍कसन में चेहरे पर गंभीर मुद्रा बनाये हुए संयोजक साहब अ का उत्‍तर सुन रहे हैं. अ ने तौलकर अपना जवाब अभी आर्टिकुलेट करना शुरु किया ही है कि संयोजक जी के अंदर उन्‍हें सुनने की इच्‍छा मर गई. ठीक है, ठीक है की मुंडी डुलाते हुए अ से हटकर स की तरफ मुडते हैं और अपना अगला सवाल दागते हैं.

संयोजक के इस बेहूदा आचरण से अ के साथ-साथ अगर आपको भी तक़लीफ हुई हो तो यह आपकी दिक्‍कत है, क्‍योंकि संयोजक के पास अ की रामकहानी सुनने का वक्‍त नहीं. दर्शकों के पास धीरज नहीं. इसलिए अ अगर चुटकी बजाते ही अपनी बात साफ-साफ और संक्षेप में नहीं कह सकते तो उनके जीवन को धिक्‍कार है, क्‍योंकि उनका समय खत्‍म हुआ. पैनल डिस्‍कसन कोई रात भर चलनेवाली चीज़ नहीं. दूसरे शोज़ हैं. फिर ब्रेक्‍स हैं. विज्ञापन हैं. इतना फालतू टाईम किसके पास है?

खबरी चैनलों पर खामखा बमगोला होना फिजूल है, किसके पास टाईम है? किसी के पास नहीं है. सब टाईम को पैसा में बदलने के बडे सामाजिक उपक्रम में लगे हुए हैं. इस गलतफहमी में मत रहियेगा कि इस उच्‍चादर्शी अभियान में सिर्फ टाटा और अंबानी ही पहलकदमी ले रहे हैं. अहां, पूरा समाज ले रहा है. जो तत्‍काल और झमाझम पैसे बना नहीं पा रहे, उनका टाईम आह भरने और खुद पर शर्म करने में फंस रहा है. फिर आह भरना भूलकर क्‍या करें किधर से पैसा जुगाडें की क्रियेटिव और कनस्‍यूमिंग सोच उनका टाईम खाना शुरु करती है. थोडा-बहुत रोता-गाता पैसा झडना शुरु हुआ तो फिर ये झमेला कि इसको कहां-कहां और ठीक-ठीक कैसे खर्च करें. किधर से कितना लोन लिया है कितना चुकाना है आदि-इत्‍यादि. मतलब यह कि टाईम वाली किल्‍लत सीन से हटती है नहीं. एकदम वक्‍त नहीं बचता.

भागाभागी वाली अदाओं में पत्‍नी के साथ शॉपिंग मॉल की झांकी ले रहे हैं. इतना देख लिया ले लिया मगर अभी इतना और छुटा हुआ है. ठीक है, बाकी का अगले हफ्ते देखेंगे! टाईम रहेगा? यार, किसी तरह से निकालेंगे. हरामी, इतने सारे बिल्‍डर्स हैं मगर किसी को ये नहीं सूझता कि शॉपिंग मॉल्‍स के अंदर ही कुछ हाउसिंग सोसाइटिज़ बनवाना शुरु करें. तब कितनी सहूलियत रहेगी! सुबह चाय की पहली चुस्‍की लेते हुए खिडकी से बाहर का एक नज़ारा लिया और सुबह ही तय कर लिया कि आज किधर-किधर पंजा मारना है. किन-किन मालों से घर भरना है. ख़ैर, जर्मनी में किसी बिल्‍डर ने यह अकलमंदी दिखाई है, तो अपने यहां वाले भी दिखायेंगे. अपने यहां वालों की अकल ज़रा धीरे-धीरे खुलती है. तो भारी बेकली और छटपट की इन दृश्‍यावालियों में जनाब अ के लिये किसी के पास कहां वक्‍त है? नहीं है. सिर्फ संयोजक का कसूर नहीं है. बेचारे संयोजक को अभी जाने किन-किन चाय पार्टियों में जाना है. मंत्री जी की छोटी साली के रिसेप्‍शन में जाना है. गुडगांव के मकान के रेनोवेशन के लिए समय निकालना है. फिर बिग बी से बाईट भी लेनी है. फिर क्रिकेट है, शिल्‍पा है, सीरियल्‍स हैं. इतने सारे दूसरे हलचल हैं, सेंसेशंस हैं! अ के लिए फालतू टाईम किसके पास है? आखिर हैं कौन ये जनाब अ? ऐश्‍वर्या से इनकी शादी हो रही है? फिर? काहे फालतू सिर चढा रहे हो, कह दिया ना, टाईम नहीं है! सॉरी.

हटियेगा नहीं, अभी हमारा टाईम खत्‍म नहीं हुआ. ब्रेक के बाद आ रहे हैं वापस...

6 comments:

  1. बहुत सही कहा। ये टी वी पर पैनल डिस्कशन देख कर बाल नोचने का मन करता है।

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  2. प्रस्तुति अच्छी है... और... अरे! और कहने का अभी टाईम नहीं है!!! ;)
    ...

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    वास्तव में अच्छी है!

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  3. saathi khaas baat hai aapki shaili.aur pramodji sanyojak mahoday ki insab ke baavadjoo ek chinta aur rahti hai ki ye sab bahas jo hui uski TRP kitni aaee. aur darshak hain ki unke paas bhi chupchap baoth kar samachar mein bahas sunne ki fursat nahi hai. saathi aisa hi likhte rahein ham aapke saath hain.

    vimal verma

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  4. excellent writeup . keep writing..
    hamein apne kaam ka objective nahi pata hota. bas kuch bhi karte jate hain. kyun kar rahe hain, kya kar rahe hain, kuch nahi janete ham. aur shayad janna jaroori bhi nahi samjhte..

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  5. Interesting, pathniya. badhai aur mubarakbaad.

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  6. प्रमोद भाई,
    शीर्षक में 'टाइम के किल्लत' के स्थान पर 'टाइम की किल्लत' कर दें तो ठीक होगा . बाकी तो आप बहुत अच्छा लिखते ही हैं .

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