Tuesday, February 20, 2007

बडे रोते हैं इस घर में बच्‍चा नहीं रोया

मोर्चे पर पार्टी वर्कर की पहली कडी आपने यहां पढी. नीचे आगे का नज़ारा लीजिये.

काली माता की संगत से बाहर आकर गोपाल जी ने चेहरे पर फेरा हुआ अंगोछा हटाकर गरदन पर रख लिया. एक कच्‍ची दीवार का सहारा लेकर खांसने लगे. थूकने के लिए दो बार झुके, उल्‍टा होकर खों-खों करते रहे. ऐसी खांसी से आम तौर पर उन्‍हें डर लगता था पर आज उन्‍होंने संभाल लिया. अंगोछे से आंखों का गीलापन और मुंह पोंछा और धीमे-धीमे डेग भरते हुए मोटर मरम्‍मत की दूकान के पीछेवाले खुले मैदान तक आ गए. मैदान के कोने में गोपाल जी ने एक टूटी हुई दीवार ढूंढ रखी है. उसके एक छोर पर बैठकर सामने गांवों की ओर की हरियाली का ध्‍यान करते हुए थोडी देर आत्‍म-चिंतन में व्‍यतीत करना उनको प्रीतिकर लगता है. मगर आज इस लक्‍ज़री से बिछोह ही उचित है. अभी पर्चा छपवाने का काम छूटा हुआ है. तीन दिनों में वह झमेला (माने नकुल जी) फिर माथा खाने पहुंच रहे हैं. गोपाल जी उन्‍हें फिर से नई व्‍यंग्‍योक्ति मारने का मौका नहीं देना चाहते थे, कि- समय पर एक पर्चा तक रेडी नहीं कर सकते, पता नहीं क्‍या सोचकर लोगों ने नगर संयोजन का कार्यभार दे रखा है! इसकी कल्‍पना मात्र से गोपाल जी का मन कसैला हो गया.

गुप्‍ता जी को मनाकर किसी तरह कल सुबह तक पर्चा प्रैस से निकलवा लेना होगा. लेकिन पिछली दफा पुराना बकाया चुकता करने की बात हुई थी वह अभी तलक पेंडिंग पडा है. रामधनी और जैराम को हजार-डेढ हजार मोबिलाइज करने का काम सौंपा था, उस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है. बकाये की बात उठाकर गुप्‍ता जी पर्चा छापने में अडंगा किये तो बडा अहित हो जायेगा. सोचते हुए गोपाल जी के मुंह का स्‍वाद और कडवा हो गया. गमछे से मुंह पोंछकर उन्‍होंने कुरते की जेब टटोली और तय किया कि प्रैस साइकिल रिक्‍शा से जायेंगे.

रिक्‍शेवाला पैसों के लिए हुज्‍जत करने लगा. गोपाल जी ने उसे समझाने की कोशिश की कि मान जाओ, भैया, हम जनता के ही आदमी हैं, मगर दिन भर जनता की सवारी लादे रहनेवाले रिक्‍शेचालक पर इसका कोई असर न हुआ.

प्रैस की तरफ निकलने की बजाय गोपाल जी घर की ओर निकल लिये. वैसे भी आज सुबह से जाने क्‍यों सिर कुछ भारी-भारी-सा लग रहा था. ऐसे वक्‍त कहीं बुखार-उखार में गिर पडे तो अच्‍छा सत्‍यानाश हो जायेगा.

गोपाल जी इस भोले ख्‍याल से घर लौटे कि पत्‍नी से अदरक-लौंग की चाय बनवाकर पियेंगे, दो रोटी पेट में डालकर घंटे भर झपकी लेंगे, फिर नई ताक़त के साथ बाहर आयेंगे समाज का सामना करने. लेकिन घर पहुंचकर उन्‍हें दूसरा ही नज़ारा देखने को मिला. बीमार गमला स्‍टोव के धुंये के बाजू लगी पडी थी. पास जाकर देखा रो रही है. पत्‍नी की स्थिति देखकर गोपाल जी घबरा गए. उकडू उसके पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ धरकर बोले- मना किया था न बिछौना से उठने को? तुम्‍हारी हालत है अभी है उठने-बैठने की, बोलो?

पत्‍नी मुंह फेरकर रोती रही. अबकी गोपाल जी का पारा चढा- तुम रो काहे रही हो? मोहना आया था? झगडा करके गया है?

पत्‍नी ने धीमे से इंकार में सिर हिलाया और मुंह पर साडी दाबे सुबकती रही. अपने से छह साल छोटे भाई मोहन से गोपाल जी को अब भय होता है. जाने कब मर्यादा भूलकर तू-तडाक में बात करने लगे. पहले ऐसा नहीं था. तब मोहन के मन में भाई के लिए इज्‍ज़त थी. बडे भाई उसके लिए दूसरों से अलग और सलीके-समझदारी वाले इंसान थे. मगर जब से गोपाल जी ने आईटीआई में दाखिल होने की मोहन की इच्‍छा के आगे यह कहकर हाथ जोड लिया, कि बाबू, हम तुमको बाहर भेजने का पैसा कहां से लायेंगे, भाईयों के रास्‍ते अलग हो गए थे. एक दिन चौक में गोपाल जी ने भाई को ट्रक से सामान उतरवाते देखा तो शाम को बिफरकर लताडा- तो अब यही बाकी रह गया है? मजूरी करोगे तुम?

दूसरे कमरे में कपडा बदलते हुए मोहन ने जवाब दिया था- क्‍यों, मजूरी करनेवालों के खिलाफ हो तुम?... चाहते हो तुम्‍हारे उन बीस लोगों की पांत में झंडा लेके हम भी तहसीलदारी पे नारा लगायें?...

लगभग दौडते हुए कमरे में घुसकर गोपाल जी ने छोटे भाई पर कसकर हाथ मारा था. मारते रहे थे. उबलते उल्‍टा-सीधा बोलते रहे थे. मोहन मुंह सिये मार खाता रहा था. गमला के हल्‍ला मचाने पर गोपाल जी शांत हुए थे. दूसरे दिन मोहन घर से निकला तो फिर तीन दिन तक वापस नहीं आया. दुबारा आया तो अपने कपडे उठाने आया था. गमला की ममता और उसके रोने-धोने के बावजूद मोहन घर में ठहरा नहीं. गोपाल जी पीछे वाले कमरे में चुपचाप सिर को हाथों में लिये बैठे रहे. जीवन की अनपेक्षित मांगों के आगे वह एक बार फिर हार गए थे.

-फिर तुम रो काहे रही हो? क्‍या बात है, गमला?...

पत्‍नी ने आंख के आंसू पोंछे. आंचल में नाक सुडककर धीमे-धीमे सहज हुई, बोली- कोई बात नहीं. ऐसे ही रो रहे थे.

गोपाल जी दीवार से लगकर पत्‍नी के बाजू बैठ गये. लाड से उसका माथा लेकर अपने कंधे से सटा लिया. उनका भी मन करता है कभी ऐसे ही बैठकर फुरसत से रोयें. बिना वजह. मन भर. मगर मौका ही नहीं बनता. अकेली औरत क्‍या और कितना करे बेचारी. मोहना के घर में रहते उसकी ममता को एक रास्‍ता मिल जाता था. अब तो वह सहारा भी नहीं रहा. घर में एक बच्‍चा होता तो शायद गमला ऐसी मुरझाई और थकी-थकी और उदास न रहती. इतनी मनौतियां चढाईं, इतने व्रत-उपवास किये, मगर छूंछी ही रही. गोपाल जी क्‍या कर सकते थे. दो बार पत्‍नी गर्भवती हुई. मन में हुलकारें उठीं, लगा इस बार मैदान मार लेंगे, क्रांति हो ही जायेगी. मगर क्रांति क्‍या छोटा-मोटा विद्रोह भी नहीं हुआ.

बाकी का आगे...

4 comments:

  1. कैसी जो होगी वो क्रांति!?

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  2. आगे की क्रांति क इंतजार रहेगा..

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  3. अच्छा है...भाव की दुनिया बन रही है एक..

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  4. भाषा भी सहज हो रही है और भाव की दुनिया भी बनती जा रही है..अच्छा है..

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