Thursday, February 15, 2007

तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब: पांच

ओरहान पामुक का इस्‍तांबुल की पांचवी किस्‍त

‘फ्लॉबेयर को देखो, सारी जिंदगी वह उसी मकान में रहा जहां उसकी मां रहती थी!’ अपने नये पत्‍तों को गौर से जांचते हुए, थोडी दया व थोडी कातरता से अम्‍मी ने बात आगे बढाई. ‘लेकिन मैं नहीं चाहती कि तुम अपना सारा जीवन इसी मकान में मेरे साथ पडे-पडे बिताओ. वह फ्रांस था. जब लोग कहते हैं कि देखो, महान कलाकार जा रहा है तो वहां पानी भी बहना बंद कर देता है. जबकि यहां कोई पेंटर स्‍कूल छोडकर अगर अपनी मां की संगत में जिंदगी काटे तो या तो वह दारुबाज हो जायेगा या फिर उसका अंत पागलखाने में होगा.’ और फिर एक नया तुरुप: ‘तुम्‍हारा अगर एक पेशा होता, तब यकीन मानो, तुम्‍हें अपनी पेंटिंग से सचमुच खुशी मिलती.’

‘ऐसा क्‍यों था कि दुख, गुस्‍से व बेहाली के इन क्षणों में उन उजाड गलियों की अपनी निशाचरी टहलों में- जहां मेरा संग देने को सिर्फ मेरे ख्‍वाब होते थे- मुझे आनंद की अनुभूति होती थी? पर्यटकों को प्रिय सूरज में नहाये इस्‍तांबुल के पोस्‍टकार्ड वाले नज़ारों की बजाय आखिर क्‍यों मुझे नीम-अंधेरों में ढंकी पिछवाडे की गलियां, शामें, जाडे की सर्द रातें, गली की मद्धिम रोशनी के नीचे से गुज़रते भुतहा लोग, फ़र्शी पत्‍थरों वाले नज़ारे, उनका अकेलापन ज्‍यादा पसंद थे?

‘अगर तुम आर्किटेक्‍ट न बने या कमाई का कोई और ज़रिया नहीं खोजा तो उन कंगाल, विक्षिप्‍त तुर्की कलाकारों जैसा कुछ हो जाओगे जिनके पास अमीरों व ताक़तमंदों की दया पर आश्रित होने से अलग और कोई चारा नहीं बचता- भेजे में घुसती है बात? ज़रुर घुसेगी- इस मुल्‍क में महज़ पेंटिंग के बूते किसी का गुज़ारा नहीं चल सकता. तुम दयनीय हो जाओगे, लोग नीची नज़रों से देखेंगे. ग्रंथियां, बेचैनी और कुढन मरने के दिन तक तुम्‍हारा पीछा न छोडेंगी. तुम्‍हारे जैसा ज़हीन, इतना प्‍यारा, जिस तरह जिंदगी से तुम लबालब भरे रहते हो- वाक़ई तुम इस तरह की चीज़ करना चाहते हो?’

मैं बेसितास तक टहलता हुआ जाता और दोलमाबाशे महल की दीवार से लगा-लगा दूर स्‍टेडियम तक पहुंचकर, दोल्‍मुस स्‍टॉप तक की दुरी नाप आता. मुझे रात में महल की इन ऊंची, पुरानी, काईयों से नहाई भारी दीवारों से लगे-लगे टहलना अच्‍छा लगता था. मैं अपने माथे के अंदर खदबदाते गुस्‍से की उस ऊर्जा को महसूस करता जो मेरे दोलमाबाशे पहुंचने तक हर गुज़रते मिनट के साथ और हिंसक होती चली जाती, फिर मैं एक गली के अंदर घुसता और बारह मिन्‍टों के अंदर तकसिम पहुंच चुका होता.

‘जब तुम छोटे थे, खराब से खराब मौके पर भी हमेशा मुस्‍कराया करते थे. खुश और उम्‍मीदबर रहते थे. ओह, कितने प्‍यारे बच्‍चे थे तुम. तुम्‍हें देखनेवाला बिना मुस्‍कराये नहीं रह पाता था. इसलिए नहीं कि तुम खूबसूरत थे, बल्कि इसलिए कि तुम्‍हें खबर ही न थी कि उदासी किस चिडिया का नाम है, क्‍योंकि बोर तो तुम होते ही न थे. खराब से खराब सूरत में भी तुम अपनी खातिर कुछ खोज लेते थे और घंटों खेल में डूबे रहते थे, ऐसे थे तुम हंसमुख. इस तरह का बच्‍चा एक परेशान, त्रस्‍त कलाकार बने, अमीरों के पीछे-पीछे घूमता फिरे- मैं तुम्‍हारी अम्‍मी न होती तो भी मुझसे बर्दाश्‍त न होता. इस‍लिए मैं नहीं चाहती कि मेरी बातों का तुम बुरा मानो, और अब गौर से मेरी बात सुनो.’

अगली दफा आखिरी किस्‍त...

(भूमिका व पहली किस्‍त, दूसरी, तीसरी, चौथी किस्‍त)

1 comment:

  1. Istanbul : minnen av en stad

    Swedish language mein padhi hai yah pustak, yahaan apni bhasha mein kiston mein padhna accha laga!

    Thanks for uploading on blog:)

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