Saturday, March 31, 2007

अपनों की दग़ाबाजी और पहली (2007 की) साहित्यिक चोट

साहित्‍य की अप्रगतिशील धारा का पहला अनियकालीन अधिवेशन

कभी होगी का आशावाद अभी बना हुआ है मगर जहां तक अभी की बात है तो अभी ऐसी हैसियत हुई नहीं कि स्‍थानीय कॉरपोरेटर या बिल्‍डर के स्‍तर के दल-बल के जोर से हम इच्छित नतीजा प्राप्‍त कर लें. पुश और पुल की कमी रह जाती हो ऐसा नहीं है, पुश और पुल कहां से शुरू कर के किधर ले चलें की अपनी ट्रेनिंग ही ज़ीरो है. मंच पर विनम्र निवेदन का कुछ अभिनय किया है. सो ज़रूरत का मौक़ा जान उसको अप्‍लाई करते हैं. अगल-बगल लोगों से विनम्र निवेदन करते हैं- गुरु, उद्येश्‍य साहित्यिक ही नहीं सामाजिक भी है, थोड़ा हाथ बंटाईये! लोग उंगली भी बंटाने को तैयार नहीं. एकदम-से यह बात प्रकट होती है कि समाज में सामाजिकता व साहित्यिकता के खिलाफ कैसी प्रतिकूल हवायें चल रही हैं(1).

दरअसल दोष हमारे आशावाद का भी है. साहित्‍य की अप्रगतिशील धारा का पहला अनियकालीन अधिवेशन आहूत करने की घोषणा के समय ही संभावित संकटों का एक औसत अंदाज़ हो जाना चाहिये था. हम अंत तक लड़की फंस जाएगी की तरह अधिवेशन भी निपट जाएगा के भावुक आशावाद के लपेटे में रहे. ऐसे में दुर्गत तो होना ही था. शुरुआत उन्‍हीं के मुखारविंद से हुई जिनकी प्रेरणा से अप्रगतिशील धारा का यह पुण्‍य विचार पहले-पहल हमारे मन में उठा था. अधिवेशन का प्रस्‍ताव सुनकर पहले तो रवीश उत्‍साहित हुए, कहा शुभ कार्य जितनी जल्‍दी हो उतना अच्‍छा, फिर डांट और गालियों(2) से मुझे इस पर राजी करवाया कि मुख्‍य अतिथि की शोभा के लिए क्‍यों उनके बॉस दि बिग ही सबसे उपयुक्‍त कैंडिडेट रहेंगे. अप्रगतिशीलता उनके पैर के अंगूठे से लेकर भौं के बाल तक विराजती है. अप्रगतिशीलता में ताल ठोंककर भी दूसरा उनके टक्‍कर का नहीं. मैं राजी हो भी गया फिर रवीश अपना चिर-परिचित उत्‍तरी बिहारी खेलने लगे. माने लंगी देने लगे. पहले कहा साली के गौना की पहली वर्षगांठ है. फिर गोली दिये बॉस का पेट खराब है और चुनाव कवर करने के लिए हमको जालौन भेज रहा है. हमने भी जमकर डांट और गालियां(3) झाड़ीं मगर उसका रवीश जैसे थेथर पर वांछित असर होना नहीं था. सो नहीं हुआ.

आखिरी मोमेंट की हड़बड़ी में मुख्‍य अतिथि के लिए हमने डॉली शर्मा से बात की. अब देखकर डर लगता था लेकिन कभी इनके पास रूपसी होने की ख्‍याति थी. 1996 में गीता वर्मा के कभी न पूरा होनेवाले सीरियल ‘’जनम-जनम का साथ’’ के पाइलट एपिसोड में डॉली ने आधुनिक माने बदचलन लड़की की एक्टिंग ही नहीं की थी उसको वास्‍तविक जीवन में साकार भी किया था. शूटिंग के ठीक बाद गीता वर्मा के अस्थिर फायनांसर और स्‍थाई प्रेमी को ले उड़ी थी. माने अप्रगतिशीलता के हमारे खांचे में सही बैठती थी. डॉली शर्मा को अधिवेशन का मुख्‍य अतिथि बनाने का एक अन्‍य फायदा यह था कि प्रैस के साथ लसर-पसर का उसका पुराना रेकॉर्ड ही नहीं था, इन दिनों वह ‘बड़े शहर में एक अकेली लड़की’ नामक एक सॉफ्ट पॉर्न वेबसाइट भी चला रही थी. शुरूआती संकोच व हिचकिचाहट के अनंतर एक तरह से कहिये तो मुख्‍य अतिथि के पद पर डॉली को पाकर मेरे हर्ष का पारावार नहीं था. अधिवेशन के एक दिन पहले डॉली के सेक्रेट्री का फोन आया कि एक दिन के लिए मैडम का रेट तीस हज़ार है.

झटकों के शुरुआत की वह पहली घंटी थी. क्‍योंकि डॉली के पीछे-पीछे पता चला आयोजन की संयोजन कमेटी के सभी मेंबर अलग-अलग स्‍तर पर धांधली का खेल खेल रहे थे. नाश्‍ता-पानी और बैठने की व्‍यवस्‍था जिन केपी जायसवाल के हाथों थी (टीवी के लिए इन्‍होंने बेहतरीन घटिया लेखन किया था और अप्रगतिशील धारा के उभरते चमकते सितारे साबित हो रहे थे) इन्‍होंने पहले तो ये कहा कि जमशेदपुर में मां को हार्ट अटैक आया है, पैसे वहां भेजने पड़े. बाद में पता चला अपने मद का पैसा भाई साहब ने अंबूजा सीमेंट के स्‍टॉक में लगा दिया था. हालांकि त्रिलोकी त्रिपाठी (अप्रगतिशील धारा का दूसरा चमकता सितारा) का यह कहना था कि स्‍टॉक वाली खबर गलत है, सच्‍चाई यह है कि जायसवाल की दूसरी प्रेमिका उनकी पहली प्रेमिका के आदर्श नगर वाले फ्लैट से पैसे चुराकर अपनी मां के पास आसनसोल भाग गई है.

उद्घाटन सत्र में किसकी पुस्‍तक का विमोचन होगा की चिंता करता मैं कुछ दुखी हो गया था तभी तारण के लिए अभय तिवारी उपस्थित हुए. टीवी के लिए घटिया साहित्‍य तो इन्‍होंने लिखा ही था, हाल ही में ‘’मेरे अपने राम’’ नाम की एक गुटका-पुस्तिका भी छपवाई थी. नाम की श्रद्धा पर मत जाईये पुस्तिका के अंदर की सामग्री हमारी अप्रगतिशीलता की ज़रूरतों पर एकदम खरी उतरती थी. अभय खुशी-खुशी उद्घाटन सत्र में अपने चालीस पेजी गुटका के संपूर्ण पाठ को तैयार भी हो गए. फिर मौली गुप्‍ता ने जब इन्‍हें निमंत्रण पत्र दिखाया तो मौली के रूप और छापे में अपने नाम के बड़े पायंट पर गौर करने की बजाय ये अप्रगतिशील धारा की संज्ञा पर अटक कर हमसे ज़्रिरह करने लगे. बात ज़्रिरह से खिंचकर हाथापाई तक चली आई. मौली ने अपना असली अप्रगतिशील रूप दिखाकर गुटके पर थूक दिया. अनंतर अभय की हतप्रभावस्‍था का लाभ उठाकर भाग भी आई. मगर उत्‍तेजना में नीचे सीढियों पर गिर पड़ी. गिरी मेरी बांहों में ही थी लेकिन उसका यथोचित लाभ उठा सकने की जगह मेरे भी पैर फिसल गए और इस तरह अप्रगतिशील धारा का प्रथम अनियकालीन अधिवेशन होते-होते रह गया. मगर अधिवेशन, और मौली- दोनों ही के संबंध में हमने आशा अभी छोड़ी नहीं है.

(1). लोग ब्‍लॉग के शॉर्टकट से समाज में जाना चाहते हैं. सीधे रास्‍ते समाज में प्रवेश करना पड़े तो कन्‍नी काट लेते हैं- श्री रोजर सैंडर्स, मैसेचुसेट्स यूनिवर्सिटी, 2001.
(2). उत्‍तरी बिहार का गालीकोश, दरभंगा ग्रंथागार, 1987.
(3). दक्षिणी बिहार गालीकोश, डुमरांव राज-परिवार प्रकाशन, 1988.

3 comments:

  1. कमाल का लेखन है...

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  2. वाह! का बात लिखा है . पर आप हमका भूल गए बस ई बात ठीक नहीं हुआ . अगला अधिबेसन में हमको भी चानस दीजिएगा . ई सब जौन के०पी० जायसवाल-फायसवाल अउर तिरपाठी-उरपाठी हैं न उनका छुट्टी कर देंगे . जमा देंगे आपका मजमा . डउली जी (अदाकारा डउली शर्मा जी)से हमरा राम-राम जरूर-से बोल दीजिएगा.

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  3. मैं अभी भी हतप्रभ हूँ..आप ऐसे साहित्य की रचना कर रहे हैं आप को अधिवेशन की क्या आवश्यक्ता है.. लोग मुक्तक महोत्सव कर रहे हैं..आप एक अधिवेशन नहीं कर पा रहे हैं.कीजिये अधिवेशन..आप ही पंडाल लगाइये.. आप ही बोलिये और आप ही सुनिये.. और आप के ऊपर..आप ही सड़े हुए टमाटर भी फेंकिये..बाद में दरी लपेटना मत भूल जाईयेगा.. वरना पाँच सौ का हरजाना झुट्ठे जायेगा.. छी छी.. अप्रगतिशील क्या और पतनशील क्या.. सारे तत्व मौजूद हैं इस लेखन में.. ऐसी सड़ाँध उठाने के लिये बधाई हो..!!

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