Friday, March 2, 2007

देश न बेच पाने का दु:ख

स्थिति व सहूलियत के हिसाब से दिन में अलग-अलग मुद्रायें लेकर मैं जो चिंतित होता रहता हूं उसमें एक मुद्रा राजनीति वाली है. सबसे ज्‍यादा ऐंठन व दर्द भी इसी ही मुद्रा से होता है. पैसे व परिवार वाले झमेलों में तो हमें बात समझ में आती है. कि छोटी उम्र की भावुकता में हमने गड्ढे गोडने शुरु कर दिये थे और अब उसका भरपूर प्रसाद पा रहे हैं. इतनी मात्रा में मिल रहा है कि खाते-खाते बेदम हो रहे हैं. सुगर के मरीज को मिठाईयों के दूकान में ताला लगा के बंद कर दें वाला मामला हो गया है. पहले रोपा था अब उखाड रहे हैं. लेकिन ये राजनीति तो हमने नहीं बोया था. ज्‍यादा चांसेस हैं हमारे बाप ने बोया हो. तो आप उनसे उखडवाते हमसे क्‍यों उखडवा रहे हैं? वह आदमी (हमारे बाप) तो रिटायर होने के बाद इतमिनान से नदी की तरफ टहलने जाता है और मैं यहां पता नहीं कहां-कहां का क्‍या-क्‍या सब उखाड रहा हूं! मैं बाप से पूछता नहीं कि ऐसा तुमने क्‍या बो दिया था कि उखाडते-उखाडते हमारी जिंदगी गंध हो रही है, क्‍योंकि डर है कि बाप जान ने कह दिया हमने नहीं हमारे बाप ने बोया था तो अब इस हाई बीपी के साथ उनको खोजने हम कहां जायेंगे. हद है लेकिन.

कंप्‍लेन रिड्रेसल की कोई एक केंद्रीय जगह होती तो कम-स-कम वहां जाकर धर्मेंद्र वाला सीन करने की सोचा जा सकता था. या फिर शूल के मनोज बाजपेयी की तरह हम क्‍लाइमैक्‍स में सीधे संसद भवन पर धावा बोलने का ख्‍याली पुलाव ही पकाते. रंग दे बसंती वाला इंस्पिरेशन भी यहां वर्क करनेवाला नहीं. प्रॉबलम यह भी है कि पहले की तरह अब विलेनी की सत्‍ता एक प्राण या अमरीश पुरी में केंद्रीत नहीं. कि धर्मेंद्र ने चौदहवें रील में ‘कुत्‍ते, हरामी’ जैसे संबोधनों के साथ ‘गुंडों’ की पोल खोल दी, नाना पलसीकर और लीला मिश्रा के आगे उन्‍हें जमकर हमारे संतोष भर कूटा और फिर पुलिस इंस्‍पेक्‍टर इफ़्तेखार या जगदीश राज के हवाले कर दिया. अनुराग की ब्‍लैक फ्राइडे जैसी फिल्‍मों के बाद अब तो दिक्‍कत यह हो गई है कि हीरो अगर अपनी मां और महबूबा के आगे विलेन को खोजकर कानून के हवाले करने का प्रण ले तो आखिरी रील आते-आते वह विशुद्ध चूतिया नज़र आने लगेगा. फिल्‍म का एंड टाईटल रोल होना शुरु हो जायेगा और विलेन बाबू की हीरो को क्‍या आपको और हमको तक ठीक-ठीक भनक न लगने पाई होगी.

दिक्‍कत यह भी है कि अब पहलेवाले हीरो जोकर लगते हैं. असली हीरो के अभाव में हमने मुन्‍ना भाईयों जैसे गली के लुक्‍कों की ताजपोशी कर दी है. हमारा हीरो डॉन बनकर आता है तो हम ताली बजाकर कहते हैं यह लक्ष्‍य अच्‍छा है. हीरो और विलेन एकरुप हो गए हैं और हमें कहीं कोई फाउल नहीं दिखा है. अच्‍छे और बुरे के बेजोड मेल में हो सकता है हम कल अमरीका को भी पीछे छोड दें. निठारी को स्‍वीकारने में समाज अभी थोडा हील-हुज्‍जत भले कर रहा है लेकिन हफ्ता बीतने दीजिये, देखिये, निशब्द को कितने प्‍यार से स्‍वीकारता है. समाज भयानक उदारता के साथ एक्‍सेप्टिंग हो रहा है. टीवी वाले ऑलरेडी निशब्‍द के हीरो को हमारे समय का जननायक बताकर कोरस गा रहे हैं. हम सुन भी रहे हैं. हमें अच्‍छा लग रहा है. रवीश ने अपने ब्‍लॉग में उसे मुलायम का एकलव्‍य बताकर विलेन की तरह पेंट करने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने भाव नहीं दिया. हमारे मित्र रघुराज जी काफी नाराज़गी के साथ प्रसून जोशियों और शाहरुख खानों को इस देश को बेचनेवालों का एजेंट बता रहे हैं, मुझे शक है कि ब्‍लॉग वर्ल्‍ड की सुधी जनता उसको भी कोई भाव देगी. इसलिए नागरिक अधिकारों के छिनने व इस देश को चलानेवालों के वर्गीय स्‍वरुप के बदलने पर अपनी टिप्‍पणी पर लोगों का खास ध्‍यान न खिंचता देख जब अभय ने दुख ज़ाहिर किया तो मुझे विशेष दुख नहीं हुआ. मैंने कहा परसों होली है तुम होली की बजाय यह सब फालतू क्‍या लिख रहे हो.

जहां तक मेरी बात है तो पानी के निजीकरण का सवाल हो या सडक पर भीख मांगते बच्‍चों को सुधार गृह के अंधेरों में भेजने की बात, मैंने सत्‍तारुढ दल के आरएस पाटिलों को दोषी मानना बंद कर दिया है. पाटिल साहब ही क्‍यों, प्रसून, शाहरुख पैसों के लिए कोई भी हमें बेचनेवालों का एजेंट हो सकता है. जब हमारे-आपका नहीं जा रहा तो उनके बाप का क्‍या जाता है. रघुराज ने अपनी टिप्‍पणी में एक सही बात लिखी है कि इस देश में कुछ लोग रहते हैं और कुछ लोग इसे बेचते हैं. मैं न ठीक से इस देश में रह पा रहा हूं और न बेचनेवालों का ही कुछ हाथ बंटा रहा हूं.

ज़रा सीरियस सुर के साथ हम इसपर फिर लौटेंगे. भागके जायेंगे कहां.

2 comments:

  1. DESH KO BECHIYE MAT. YE SARHAA HUAA MAAL HAI. YAH 5000 SAAL PEHLE HI EXPIRE HO GAYA THA. EXPIRY DATE KA MAAL BECHENGE TO KAUN KHARIDEGA ULTAA JAIL HO JAAYEGEE. RAVISH

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  2. मुलायम और अमिताभ दोनो को ये गाना बहुत सूट करता है ...
    " ना जाने क्या हुआ .. जो तूने छू लिया .. "

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