Tuesday, March 6, 2007

ये धुआं कहां से उठता है

विकास की आंधी: एक

बगल की स्‍वायत्‍त, आत्‍मनिर्भर होती ग्रामीण औरत की छवि हमें प्रभावित करती है. ऐसी तस्‍वीरें गाहे-बगाहे हमारे सामने पडकर हमें मुदित करती रहती हैं. इस देहाती लोक से बाहर बडे शहर में आईये तो वहां तो और ही बडा नशा है. हर तरह के फैंसी मालों की सुलभता, नई तकनालॉजी के फ्लाईओवर्स, शीशे और इस्‍पात की आकर्षक बहुमंजिली इमारतें, दिल जीत लें ऐसे लुभावने कॉरपॉरेट हाऊसेस- और हम सब की चहेते, युवजनों के नये मिलन स्‍थल, समाज के नये तीर्थ- शॉपिंग माल्‍स. दो जोडी पैंट-कमीज की पूंजी के साथ महानगरीय स्‍टेशन पर उतरते हुए हमने कब सोचा था कि इस्‍त्री किये कपडेवाले ‘सेल्‍समैन’ से हम सब्जियों की खरीदारी करेंगे. लेकिन कर रहे हैं. और हमारी आत्‍मा शीतल होती रहती है. अखबार विकास दर की बढोत्‍तरी की खबर देता रहता है. सेंसेक्‍स इतना ऊपर जाता रहा है कि अब उसके ऊपर जाने की खबरों पर हमने ध्‍यान देना बंद कर दिया है.

पश्चिमी यूपी के एक औसत देहाती परिवार से आये हमारे एक औसत शिक्षा वाले मगर तेज़दिमाग मित्र ने इकतीस साल की उम्र में अबतक न केवल तीन गाडियां बदल ली हैं, बारह लोगों को रोज़गार मुहैया करवानेवाली कंपनी का मालिक है, और साल में कभी भी तायपेई, शंघाई, टेक्‍सास और न्‍यूऑर्क आता-जाता रहता है. उसके चार वर्षीय बेटे का जर्मन, जापानी, अमरीकी कारों का ऐसा सूक्ष्‍म, समीक्षात्‍मक ज्ञान है कि उसके आगे कार के विषय में मुंह खोलने के ख्‍याल से हमें भय होता है. तो हमने तरक्‍की तो की है. कर रहे हैं. हमारे बाप-दादों ने जिनकी स्‍वप्‍न में भी कल्‍पना न की होगी, उसे हम आंखों के आगे देख रहे हैं, जी रहे हैं. चीन के पीछे-पीछे हमारा भी डंका बज रहा है. और इसका ढोल हमीं नहीं बजा रहे, यूरोप और यूके के अखबार वाले भी हमारे विकास की नोटिस ले रहे हैं. सप्‍लीमेंट छाप रहे हैं. सुझाव दे रहे हैं. स्‍टूडियो में आमंत्रित दर्शकों के बीच फिरंगी चैनल पर हमारा विकास डिस्‍कस हो रहा है. हमारी बांछें खिल रही हैं. कुछ वर्ष आम चुनाव के ठीक पहले इसी तरह बीजेपी की खिली थी.

बीपीओ की कमाई के इंडेक्‍स में प्रमोद महाजन ने ‘शाइनिंग इंडिया’ का नया गुरुमंत्र पा लिया था. चुनाव नतीजों से न केवल महाजन साहब बल्कि पार्टी के सीनियर नेतागण कुंठित हुए थे. हैदराबाद को चमकाने में जोरशोर से जुटे एक मुख्‍यमंत्री के साथ-साथ शहरातियों के एक काफी बडे हिस्‍से को भी हैरानी हुई थी कि देश ललिता जी के साबुन से धुले कपडों की तरह चमकने की बात से मुकर क्‍यों रहा है. तो इस गणना में गडबडी कहां हुई थी? विकास तो आप-हम सब अपनी आत्‍मा में महसूस कर रहे हैं फिर इसे नकारनेवाले ये ज़ाहिल हैं कौन? या फिर इस विकास का ही कोई कैच है? क्‍या कैच है?..;

हम यहां विकास का कोई मौलिक अध्‍ययन नहीं पेश कर रहे. पिछले दिनों इधर-उधर छपी रपटों की ज़रा थोडी-बहुत खंगाल की है, वही आपके सामने रख रहे हैं. आनेवाले दिनों में आज के भारतीय परिदृश्‍य के इस सबसे ज़रुरी प्रसंग पर फिर-फिर लौटते रहेंगे.

(जारी...)

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