Wednesday, March 7, 2007

जनता जिसकी भी हो हम कॉरपॉरेशंस के हैं

विकास की आंधी: दो

इस विकास यात्रा की बडी फांस यह है कि इसकी दिशा इकहरी है. ग्‍लोबलाइज्‍ड इंडिया की इस नई छवि- चमचमाते शहरों के बाजू की एक दूसरी सच्‍चाई यह भी है कि किसान आत्‍महत्‍या कर रहे हैं. आदिवासियों से उनकी आजीविका व वन्‍य अधिकार छीने जा रहे हैं, और अभी जिन्‍होंने ठीक से पैर धरना नहीं सीखा उस उम्र के बच्‍चे इन चमकते शहरों की सडकों पर भीख मांगते घूम रहे हैं. तो एक ही देश में समानांतर दो तरह की वास्‍तविकताएं साथ चल रही हैं. दिक्‍कत यह है कि चमक और सुविधा-संपन्‍नता के भारत ने गरीबी और तकलीफों में उलझे भारत से पूरी तरह मुंह मोडने का मन बना लिया है. और यह केवल दो भारतों के बीच बढते सापेक्षिक असमानता का मसला भर नहीं रहा. चिंताजनक बात यह है कि हम सबकी पीठ पीछे एक ज्‍यादा क्रूर, एक ज्‍यादा बडा खेल खेला जा रहा है, जो केंद्र और राज्‍य सरकारों के सहयोग से इस विभाजन को न केवल सुनिश्चित कर रहा है बल्कि सुनियोजित तरीके से एक ऐसे रास्‍ते पर चल रहा है कि फ़र्क की यह खाई और भयानक रुप से फैले.

ग्‍लोबलाइजेशन के इस दौर में जो सुविधा संपन्‍न भारत है उसके मुंह पर अब हमेशा विकास की बांसुरी बजती रहती है. 2005 के जलप्‍लावन के बाद थोडे वक्‍त के लिए ठंडा कर दिया है नहीं तो विलासराव देशमुख और उनकी टोली हर चौथे दिन बंबई को शंघाई में बदलने का मंत्र दोहराती रहती थी. उन्‍हीं की बात नहीं, विकास का यह हल्‍ला हर तरफ हो रहा है. इस हल्‍ले में हम सभी एक खास तरह का सुख भी ले रहे हैं. मज़ा बस यह है कि जिस अतुलनीय तेजी से अमीर भारत अपनी विकास यात्रा में कुलांचे भरेगा उसी अनुपात में वह पिछडे भारत से अपनी दूरी बढा रहा होगा, उसे और-और पीछे छोड रहा होगा. यह भला क्‍या गुत्‍थी हुई? आईये, पहले इसी गुत्‍थी को साफ करते हैं.

पहली बात तो यह कि विकास की यह सारी कसरत ग्‍लोबलाइजेशन के संदर्भ में हो रही है. इस प्रक्रिया से गहरे आबद्ध जो आर्थिक लिबरलाइजेशन व निजीकरण हैं वह बाज़ार का पलडा उस पहचान की बनिस्‍बत कहीं ज्‍यादा झुकाते हैं जिसे हम-आप राष्‍ट्रीय राज्‍य के रुप में जानते हैं. उन्‍नीसवीं सदी में भी पूंजीवादी विकास बाज़ार और राज्‍य के बीच द्वंद्व व सहयोग की एक जटिल प्रक्रिया से गुजरकर संभव हुआ था. राज्‍य बाज़ार के स्‍वार्थों का रास्‍ता खोलने में सहयोगी हुआ करता था लेकिन ज़रुरत पडने पर वह बाज़ार को नियंत्रित भी करता था. बाल मजदूरी पर रोक, काम के घंटों का नियमन, ट्रेड यूनियनों की मंजूरी सबमें राज्‍य की अहम भूमिका थी. मगर महाकाय कॉरपॉरेशंस के आगे-पीछे जी-हुज़ूरी बजाते राज्‍य का रोल अब काफी बदल गया है. और मज़ा यह है कि इस उलझे खेल में दक्षिणपंथी ही नहीं वामपंथी सरकारें भी उतनी ही विनम्र मुद्रा में बडे कॉरपॉरेशंस की चिरौरी में पंक्तिबद्ध खडे हैं. कॉरपॉरेशंस को पटाने की खातिर विनम्रता और जी-हुजूरी में न केवल एक-दूसरे को मात दे रहे हैं, बल्कि कॉरपॉरेशंस के विरोध में सामने आनेवाली ‘अपनी जनता’ पर आंसू गैस, लाठियां और बंदूक की गोलियां दागने में हिचकिचा भी नहीं रहे. वे आखिर ऐसा कर क्‍यों रहे हैं?

(जारी...)

4 comments:

  1. आप बिल्‍कुल ठीक कह रहे हैं। ग्‍लोबलाइजेशन के दौर की ऊची-ऊची तंख्‍वाहों वाली कॉर्पोरेट की नौकरियां हिंदुस्‍तान के मुट्ठी भर युवाओं को उनका वर्ग बदल जाने का भ्रम दे रही हैं और सी फेस फ्लैट और मारूति सुजुकी कार के लोन और शॉपिंग मॉलों और ब्रांडों के बहाने वो सारे पैसे वापस भी लिए ले रही है। दिन-रात एक किए जिस कॉर्पोरेट के दरवाजे पर नाक रगड़ रहे हैं, वहां से मिल रही पाई-पाई उन्‍हीं की जेबों में वापस जा रही है और हमसे छीन रही है, हमारा वर्ग चरित्र। इस शातिर खेल के हम ऐसे शिकार हैं, जो अपने शिकार होने का जश्‍न मना रहा है।

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  2. बाल मजदूरी पर रोक, काम के घंटों का नियमन, ट्रेड यूनियनों की मंजूरी सबमें राज्‍य की अहम भूमिका थी. मगर महाकाय कॉरपॉरेशंस के आगे-पीछे जी-हुज़ूरी बजाते राज्‍य का रोल अब काफी बदल गया है.सत्य वचन! आगे की किस्त का इंतजार है!

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  3. बाज़ार की राजनीति जैसे जटिल और गूढ़ विषय को आप सहज सरल शब्दों में बयान कर रहे हैं.. और हमें समझ में आ रहा है..साधुवाद!

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  4. ग्‍लोबलाइज्‍ड इंडिया की इस नई छवि- चमचमाते शहरों के बाजू की एक दूसरी सच्‍चाई यह भी है कि किसान आत्‍महत्‍या कर रहे हैं. आदिवासियों से उनकी आजीविका व वन्‍य अधिकार छीने जा रहे हैं, और अभी जिन्‍होंने ठीक से पैर धरना नहीं सीखा उस उम्र के बच्‍चे इन चमकते शहरों की सडकों पर भीख मांगते घूम रहे हैं. तो एक ही देश में समानांतर दो तरह की वास्‍तविकताएं साथ चल रही हैं. दिक्‍कत यह है कि चमक और सुविधा-संपन्‍नता के भारत ने गरीबी और तकलीफों में उलझे भारत से पूरी तरह मुंह मोडने का मन बना लिया है.

    पिछले दो सालों में गाहे बगाहे मैं इस बात को अपनी पोस्टों में लिखता रहा हूँ, आज फिर आपने ये बात उठायी अच्छा किया।

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