Sunday, March 18, 2007

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार

अंदाज़ नहीं था एक मासूम शरीरी हरकत इतना बडा अनर्थ करवायेगी. पलकों के मुंदने तक सब वैसा ही बोझिल, बासी, उदास-उदास-सा था, लेकिन आंख खुली तो पता चला बीस वर्ष गुज़र चुके थे. बाहर का नज़ारा बदला हुआ था. अमरीकी चीनी दूतावास के सामने ‘साम्राज्‍यवादी चीनी हाय, हाय!’ और ‘चीनी अमरीका छोडो!’ का नारे लगाते प्रदर्शन कर रहे थे. पुलिस लाठी और बंदूकों के साथ तैयार बैठी थी. साफ दिख रहा था कि थोडी देर में अम‍रीकियों की वही दुर्गत होगी जो बीसेक वर्ष पहले कारखानों के गेट पर हडताली भारतीय मजदूरों की हुआ करती थी. पास खडे तमाशाई जत्‍थे में मैंने एक सज्‍जन से सवाल किया, ये सब क्‍या हो रहा है, भाई साब? अमरीकी लोग चीनियों को साम्राज्‍यवादी कह रहे हैं! आदमी ने सिर हिलाते हुए जैसी थकान से मुझे देखा उससे ज़ाहिर था कि वह समझ गया था मैं बीस वर्ष के फ़ासले को एक हाई जंप में निपटाकर दुनिया में वापस घुसा हूं. जवाब दिया, पॉवर इक्‍वेशन बदल गए हैं. अमरीकियों की हालत खराब है, सिर से पैर तक कर्ज़ में डूबे हैं. वर्ल्‍ड बैंक, यूएनओ सबपर चीनियों का कब्‍जा है. मैं वाकई बीस वर्ष पिछड गया था. मैंने हैरानी से आस-पास देखकर दुनिया समझने की कोशिश की. तत्‍काल इस झटके को अपने ब्‍लॉग पर चढाने की बेचैनी होने लगी.

ब्‍लॉगर में साईन-इन करते ही ‘मामा माओ’ और चीनी पॉर्न के विज्ञापनों की बाढ-सी आ गई. न्‍यू पोस्‍ट को क्लिक करते ही एक लाल बत्‍ती जलने लगती थी. मैं कभी खुशी कभी ग़म वाले ‘मोड’ में था. खशी हो रही थी कि बीस वर्ष के अंतराल के बावजूद अपना ब्‍लॉग वहीं जमा पडा है. और रोना आ रहा था कि एड-वेयर के वाईरसों ने हमारे ब्‍लॉग में सेंघमारी कर ली थी. हमने गूगल से निकलकर वर्डप्रैस में साईन किया. वहां भी वही लाल बत्‍ती. इतनी देर में अपने फोन पर दस एसएमएस आ चुके थे. नंबर जाना-पहचाना लगा. थोडी देर देखने के बाद समझ में आया कि यह तो अपने रवीश कुमार का नंबर है. मैसेजेस सारे एक थे- अपने ब्‍लॉग को बचाने के लिए फलां पते पर संपर्क करो. एक लाईन के मैसेज में तीन गल्तियां थी. एकदम से यकीन हो गया कि रवीश का ही मैसेज है.

पतेवाले ठिकाने पर सख्‍त पहरा. लोहे का महाकाय गेट और अंदर सैकडों एकड का फैलाव. बंबई के बीचोबीच इतनी ज़मीन किसी ने हासिल कैसे की, और यहां रहनेवाले कहां गए? टैक्‍सीवाले ने जैसे बिना कहे मेरा मन पढ लिया. सूचना दी यहांवालों को हटाकर पूना भेज दिया है. मुझे समझने में दिक्‍कत हो रही थी. मैंने चट सवाल किया, इतने लोगों को पूना भेज दिया तो पूनावाले कहां गए? इस बार टैक्‍सीवाले ने लंबी सांस ली और चुप हो गया. गेट पर टाईट सिक्‍युरिटी देखकर मैं नर्वस हुआ था मगर अंदर टैक्‍सी के घूमने पर बात थोडा समझ में आना शुरु हुई. यह अपना नॉर्मल बंबई नहीं था. हर तरफ पैसे और ऐयाशी की नालियां बह रही थी. लगता था जैसे बीस वर्ष पहले के किसी अमरीकी शहर को लाकर बंबई के बीचोबीच स्‍थापित कर दिया गया हो. मगर यह मामला पेंचदार था. मतलब बंबई में इतनी ज़मीन किसी ने कैसे हासिल की है? कौन है भला वह तीसमार खां जुगाडू- मुकेश या अनिल? या सुब्रत राय न केवल अभी भी जेल से बाहर हैं बल्कि उनकी किस्‍मत ने एक और नाटकीय छलांग मारी है? तबतक टैक्‍सीवाले ने मुझ नादान को करेक्‍ट किया, ये सारी ज़मीन रवीश कुमार की है. रवीश कुमार की?- मैं टैक्‍सी के अंदर बेहोश होते-होते बचा.

तो हर दो सौ मीटर पर जो ऊंचे-ऊंचे आदमकद होर्डिंग्‍स लगे हैं वो सुब्रत सहारा के नहीं अपने रवीश कुमार के हैं! हाथ जोडे हुए, मुस्‍कराते, जनसमूह को संबोधित करते, फिरंगी डेलीगेशन को नया रास्‍ता दिखाते. मगर इतना कायाकल्‍प कैसे हो सकता है? मुझे रवीश कुमार की यह नई पहचान सशंकित करने लगी. क्‍या कल का भोला रवीश कुमार आज बिक गया है? मगर किसी को भी बेचने के लिए बीस वर्ष एक लंबा समय होता है. तबतक एक और पहचानी सूरत नज़र आई. देह सूखकर कांटा हो चला था लेकिन इसमें कोई शक नहीं था कि यह अपना अविनाश ही है. मैंने आवाज़ लगाई. अविनाश ने घबराकर मुझे देखा और एकदम से शीशे के हरे जंगलों के पीछे गायब हो गया. ये माज़रा क्‍या है, ये अपना अविनाश मुझसे छिप क्‍यों रहा है? और फिर ये दिल्‍ली के एनडीटीवी वाले बंबई में क्‍या कर रहे हैं? टैक्‍सीवाले ने मुस्‍कराते हुए मेरा अज्ञान दूर किया ये वर्चुअल रियैलिटी का टाईम है, सर; कोई कहीं भी हो सकता है. मैं बंबई में हूं लेकिन मेरी दूसरी टैक्‍सी दिल्‍ली में चल रही है और एक तीसरी बेजिंग में.

तो क्‍या दुनिया इन बीस वर्षों में जेम्‍स बांड को भी पीछे छोडकर आगे निकल गई है? शर्मिंदगी से मैंने सिर खुजलाया और यह सोचकर उत्‍साहित होने लगा कि ब्‍लॉग पर कितने सारे नये दुख लिखे जाने हैं.

(जारी...)

9 comments:

  1. आगे क्या होगा ?

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  2. इसे पढ़ते हुए अपन भी कुछ वैसे ही झटके खा रहे हैं! :)

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  3. हा हा, प्रमोद साहब, टाईम मशीन की याद आ गई क्या अचानक, या फ़िर मुआफ़ कीजिएगा, हैंग ओवर तो नही कहीं, खैर ये सब तो मजाक की बातें है।
    लिखा बढ़िया है आपने हमेशा की तरह, एक बात तो माननी ही पड़ेगी आपकी कल्पना की उड़ान बढ़िया है

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  4. बवाल है भाई..धांसू..

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  5. अच्छा चित्र खींचा है । कहीं हम सब चीनी में तो नहीं लिख रहे थे ?
    घुघूती बासूती

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  6. ये तो ग़लत है. आपने लिख दिया जारी... और हमारे लिए विराम हो गया. इस जारी को हटाकर जल्दी इस नयी दुनिया की कमेंट्री शुरू कीजिये. कहीं आपके इस वर्णन के बहाने अपना भविष्य भी दीख जाये.

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  7. pramodji is saare paridrishya mein aapne apne aapko kis character mein dekha? achha lag raha hai aage ki kahaani bataiye bhai .....

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  8. प्रमोद जी , ठीक पहचान लिया मुझे आपने । बीस साल बाद मैं भी उदारीकरण के बाद का कोई शहर होना चाहता हूं । जिसमें कई होर्डिंग्स होंगे । मेरे गले में अजगर लिपटा होगा । एक लड़की उसकी ज़हर से मर चुकी होगी । किसी मुलायम को अपनी गाड़ी में घुमाता हुआ ...पर अब शर्म आ रही है । बीस साल बाद ऐसे होने पर । मगर बहुत पसंद आया । हमें ब्लाग ही नहीं वर्चुअल जगत में भी विचरण करने की आदत डाल लेनी चाहिए । रवीश

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  9. जरा अगली बार ये भी बताना भैया कि बीस साल बाद हम में से किस किस के ब्लॉग कायम हैं।

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