Sunday, March 18, 2007

चीनी बच्‍चों का भोजपुरी स्‍वागत गान

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: दो

खिडकी से मुंह साटे कभी दायें कभी बायें बाहर की अनूठी दृश्‍यावालियों को देखकर चौंकते-चौंकते मैं कुछ थक-सा गया था. इतने में खुदाये-करम हुआ. ग्‍लास और फाइबर की एक साठ मंजिला इमारत के बाहर आकर टैक्‍सी रुक गई. टैक्‍सी के अंदर तो था ही बाहरी वायुमंडल भी एसी नियंत्रित लग रहा था. इमारत ठाठदार था. सामने खडे होते ही अपनी हैसियत के अहसास से शर्म महसूस होने लगी. हमारे बाप ने सपने में भी ऐसी भव्‍यता न देखी होगी. देखते तो बेहोश हो जाते, और वहीं से स्‍वर्ग पधार गए होते. मैं बेहोश नहीं हुआ. स्‍वर्ग के सामने खडा था. इतने में टैक्‍सीवाले ने मज़ा किरकिरा करना शुरु कर दिया. वह रुपये लेने से इंकार कर रहा था. मैंने अंदर की जेब से मुडी-तुडी अपने दस डॉलर की निधि निकाली तो उसने आंखें फाडकर मुझे देखा जैसे मैं उसे झारखंड के किसी देहात की करेंसी से पटाने की कोशिश कर रहा हूं. मैंने टैक्‍सीवाले को समझाने की कोशिश की कि मैं उसकी खुशी के लिए अचानक युआन पैदा नहीं कर सकता था. कसूर टैक्‍सीवाले का नहीं रवीश का था जिसने एसएमएस में करेंसी का कहीं जिक्र नहीं किया था. युआन के अभाव में मैं अपने को भिखारी महसूस कर रहा था. टैक्‍सीवाले ने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया होगा. नतीजतन बगल की चमकती सडक पर थूककर मुझे छोड दिया.

दरवाज़े पर ही रवीश मिल गए. मुस्‍कराते, हाथ जोडे जैसे चुनाव कैंपेन पर निकले हों. नज़दीक जाने पर पता चला मैडम तुसाद का बनाया स्‍टैच्‍यू है जिसका डूप्‍लीकेट रवीश ने लंदन में रहने दिया, ऑरिजनल उठाकर यहां ले आये हैं. आई कार्ड दिखाने के बाद अंदर घुसते ही मुख्‍य हॉल के जायंट स्‍क्रीन पर एक और जानी-पहचानी सूरत दिखी. चेहरा मेरी ही ओर देखता जोकरों की तरह मुस्‍करा कर अभिवादन कर रहा था. तब ध्‍यान आया कि अरे, यह तो खुद मैं हूं. इतनी देर में उसने (यानी स्‍क्रीन वाले मैंने) फुसफुसाकर एशियाई जबान में कुछ कहा. बगल की पांच फुट आठ इंच की छरहरी एयर होस्‍टेस टाईप परिचारिका ने मेरे लिए उसका अंग्रेजी में तर्जुमा किया. बताया, पूछ रहे हैं हाऊ आर यू डुईंग, मैन. मैं परिचारिका से पूछना चाह रहा था कि मैं स्‍क्रीन वाले खुद को हिंदी, भोजपुरी, बंगला, अंग्रेजी किसमें जवाब दूं क्‍योंकि चीनी तो इस जनम में हम नहीं ही सीख सकते थे. परिचारिका ने मुस्‍कराकर मेरा हाथ दबाया और जाने कहां से निकालकर एक फोल्‍डर मेरे हाथ में रख दिया. फोल्‍डर में ‘नथिंग इज़ इम्‍पोसिबल’, ‘कम विद मी एंड रीच द स्‍काई’ जैसे एक से एक बकवासों की भाषण पुस्तिकायें पडी थीं. कोई भाषण क्‍योतो में दिया गया था तो कोई क्‍वालालमपुर में. कलकत्‍ता वाला कोई भाषण नहीं था. और सब भाषण रवीश ने दिये थे. और चाईनीज़ में दिये थे. जायंट स्‍क्रीन पर अब मेरी जगह जीतू थे.

पर्सनली हमारी पहचान नहीं थी मगर नारद पर लगातार भरी मूंछ और केसरिया टीशर्ट देखते-देखते मुझे अब यह चेहरा याद हो गया था. कोडरमा के बाजार में अपनी छोटी साली के लिए साडी खरीदते एक आदमी को देखकर मुझे यही लगा था कि जीतू से कितना चेहरा मिलता है. मगर स्‍क्रीन वाले जीतू आज मुस्‍करा नहीं रहे थे. चाईनीज़ में अपना अभिवादन वो भी कर रहे थे लेकिन मुस्‍कराने में दिक्‍कत हो रही थी. लाख चाहने के बावजूद मेरी समझ में ये किसी तरह नहीं आ रहा था कि इस चक्‍कर में जीतू कहां से उलझ गए. माने मेरी बात अलग है, अपन तो एचटीएमएल दूर, कंप्‍यूटर भी ढंग से नहीं जानते, भाईयों ने खेल करके हमारा ब्‍लॉग हैक करवा लिया, मगर जीतू भी मुसीबत में हैं सोचकर कलेजा भारी होने लगा. शायद मुसीबत में न हों. शायद सिर्फ मेरी गलतफ़हमी हो. शायद यहां रवीश ने बिशेष अतिथि बनाकर आमंत्रित किया हो. जो भी हो मुझे सच्‍चाई जानने की बेचैनी होने लगी. अच्‍छे-अच्‍छे कपडों में टहलते रवीश रिसोर्सेस इंक के अफसरों-अफसरानियों के बीच मैं जीतू को खोज लेने के लिए मचलने लगा. जीतू की बजाय एक कोने में सुनील दीपक के साथ रविरतलामी थिरकते दिखे. शकीरा के गाने पर नहीं किसी चीनी धुन पर थिरक रहे थे. बगल में घुघूती बासूती रो रही थीं, देबाशीष मना रहे थे. पता नहीं बैंगाणी-अविनाश के तू तू-मैं मैं का नतीजा था या वह रवीश कुमार के नाम को रो रही थीं कि हमारा ब्‍लॉग क्‍यों खा गए. अलबत्‍ता रवीश कुमार का चेहरा हॉल के अलग-अलग कोनों में मुस्‍कराकर सबको उम्‍मीदबर कर रहा था. अबकी जायंट स्‍क्रीन पर भी वही थे. चाईना से सीधे लाईव टेलीकास्‍ट हो रहा था.

ग्‍वानदॉंग प्रदेश के स्‍कूली बच्‍चों का फूलों का उपहार हाथ में लिए रवीश कुमार उनका गाना सुन रहे थे. गंभीरता और ओज में बिल गेट्स को पीछे छोड रहे थे (पता नहीं इयरली आउटपुट में कहां स्‍टैंड करते थे). चीनी बच्‍चे रवीश कुमार के लिए अपना स्‍वागत-गान भोजपुरी में गा रहे थे. मुझे अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. और सबसे ज्‍यादा गुस्‍सा अविनाश पर आ रहा था जो सामने आकर भी सामने नहीं आया था. पता नहीं यह क्‍या और कैसा रैकेट है. अगर जीतू जैसे लोगों की मुस्‍कान छीन गई है फिर अपने जैसे जोकर की क्‍या हैसियत. बेचारी घुघूती बासूती अबतक रो रही हैं. बेहतर हो मैं ब्‍लॉग को हमेशा के लिए भूलकर इस मायालोक से बाहर निकल जाऊं. यही उचित होगा. वैसे भी मेरी जेब में युआन की फूटी कौडी तक नहीं है. मगर तबतक हरे कपडे और स्‍टेट ऑफ द आर्ट के बंदूकों वाले सिक्‍यूरिटी के जवान भीड को चीरते मुख्‍य दरवाज़े की ओर लपके. बाहर हैलिकॉप्‍टर के उतरने की गडगडाती आवाज़ गूंज रही थी. सीन में कथा नायक रवीश कुमार का प्रवेश हो रहा था. अंदर के जायंट स्‍क्रीन पर भी अब वही बाहरवाला हैलिकॉप्‍टर झिलमिला रहा था.

(जारी...)

6 comments:

  1. भय्या कैसी रोमांचक यात्रा में ले निकले हैं आप..गजब रहस्य लोक की रचना कर मारी है आपने..!!

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  2. जिया मे धुकधुकी हो रहा है, ई जाने खातिर कि आगे का होई।

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  3. प्रमोद भाई, फिर रोक दी आपने जारी... पर अपनी गाड़ी. कहो तो रवीश भाई से कहके अंबानी के पेट्रोल पंप का कुपन दिलवा हूं. फिर गाड़ी में पेट्रोल का चक्कर ही नहीं रहेगा.... आ... आ... भूल हो गई... तब तो शायद गाड़ी पेट्रोल से नहीं पानी से चलेंगी... तो क्या हुआ... बिसलेरी का एक टैंकर ही कोक की फैक्टरी से उठवा लो.

    मज़ा आ रहा है...

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  4. प्रमोद जी आपके साथ चीन घूमने में मजा आ रहा है.. जब आप उठेंगे.. फिर घूमेंगे आपके साथ.. वैसे नया-नया हूं ब्लॉग की दुनिया में ... अच्छी बात ये लग रही है.. कि कंप्यूटर पर बैठकर हिंदी में लिखी कुछ बातें पढ़ने को मिल रही हैं..

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  5. सही है। आगे की किस्त का इंतजार है!

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  6. कोडरमा के बाजार में अपनी छोटी साली के लिए साडी खरीदते एक आदमी को देखकर मुझे यही लगा था कि जीतू से कितना चेहरा मिलता है.

    अब हँसी आ ही गई ।

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