Sunday, March 18, 2007

रवीश कुमार इज़ नॉट ह्यूमन, ही इज़ डेविल्‍स ब्रांड!

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: तीन

कुछ सौएक मीटरों की दूरी पर ही रहा होगा हैलिकॉप्‍टर. गडगडाहट अब भी गूंज रही थी. पंखे घन्‍न्-घन्‍न् नाच रहे थे. मशीन के, मेरे मन के. आंखों के आगे हैलिकॉप्‍टर का उतरना इससे पहले कभी इतना रोमांचक नहीं हुआ था. बचपन में हमारे छोटे शहर के नेहरु मैदान में इंदिरा गांधी उतरी थी तब भी नहीं. मगर आज हो रहा था. मुझे लगा मैंने अपने को संभाला नहीं तो किसी भी वक्‍त मेरी आंखें गीली हो सकती हैं. चेहरे पर अपनी नैचुरल अनमनस्‍कता छापे मैं साईड में एक ओर डटा रहा. भीड से ज़रा हटकर लेकिन बहुत ज्‍यादा हटकर भी नहीं, उसी तरह जैसे हर नई हिंदी फिल्‍म अपने को हटकर बताती मगर असल में चिरकुटई की वही चिर-परिचित दास्‍तान होती है. सुरक्षावालों के जबरपने ने याचक भीड को एकदम कातर कर दिया था. कोई औरत रोने लगी थी. नहीं, ये अपनी घुघूती बासूती जी नहीं थीं. उनका रोना मैं पहचान गया था. इस रोने में विनम्रता नहीं क्षोभ और गुस्‍सा था. मुझे लगा ये औरत गडबड करेगी. रवीश कुमार सुरक्षा कवच के बीच तेजी से गुजरते हुए मुझ अनमनस्‍क को एकदम से पहचान कर खिल जायें, कंधे पर हाथ डाले मुझे अपने साथ विशिष्‍टता की आभा में लिये चलें के खास मौके को इस औरत का रुदन डिसऑरियेंट कर देगा. औरतों के रोने ने हमेशा इतिहास की धारा बदल दी है. मालूम नहीं यह बात बीस वर्षों बाद अब भी लागू होगी या नहीं लेकिन रोती औरत के लिए मेरी आत्‍मा में नफ़रत पैदा होना शुरु हो गई. देबाशीष घुघूती बासूती को चुप कराते दिखे थे, इस मनहूस को क्‍यों चुप नहीं करा रहे थे?

सुरक्षा अधिकारियों की तेज़ पहलकदमी भी औरत को शांत करने में असफल हो रही थी. अब रोने के साथ-साथ औरत चीख रही थी. पता नहीं किस विदेशी ज़बान में. श्राप दे रही थी. हां आशीष वचन तो वे नहीं ही थे. अज्ञेय की तरह धवल केश-कुंज वाले सुनील दीपक तेजी से औरत की तरफ भागते दिखे. क्‍या करेगा यह आदमी? दुखियारी स्‍त्री की तस्‍वीरें उतार कर छायाचित्रकार में इस कुशासन का दुश्‍प्रचार करेगा? इसे मालूम नहीं कि रवीश रिसोर्सेस इंक हम सारों के ब्‍लॉग पर बैठा हुआ है और इस तरह का प्रोवोकिंग बिहेवियर मुसीबतें खडी करेगा, मदद किसी सूरत में न होगा? इटली में इतना समय गुजारने के बाद इतनी अकल तो इन्‍हें आ गई होगी कि सत्‍ता के साथ किस विनम्रता और आदर से पेश आया जाता है? बेर्लुस्‍कोनी के राज में सीखे सबक को रवीश के यहां क्‍यों अन-डू कर रहे हैं? तब तक स्‍पीकर्स पर चायनीज़ में कुछ अनाउंस होना शुरु हुआ और रोती औरत की आवाज़ एकदम-से गायब हो गई. सुनील दीपक भी गायब हो गए थे. जायंट स्‍क्रीन पर अब एक चिलियन बैंड आ गया था. वो चायनीज़ में फोक गा रहे थे. हैलिकॉप्‍टर उड गई थी. और रवीश कुमार एंड कंपनी मुख्‍य हॉल की बजाय किसी गुप्‍त रास्‍ते से अपने गुप्‍त डेस्टिनेशन पहुंचाये जा चुके थे. मैं अब अनमनस्‍क नहीं उि‍द्वग्‍न हो रहा था. जानता था मतलब नहीं होगा मगर किसी क्षण उत्‍तेजित भी हो सकता था.

रांची के एक पुराने मित्र वी राजगढिया ने हिकारत से फोन पर समझ दी थी कि जिम्‍मेदार घर-बार वाले आदमी हो, क्या ब्‍लाग-स्‍लाग पर एनर्जी वेस्‍ट कर रहे हो. जिम्‍मेदार होने की बजाय मैंने डांटकर पुरानी दोस्‍ती खत्‍म कर ली थी. समझदारी दिखाकर तब बात मान ली होती तो आज इस तरह वेस्‍ट नहीं हो रहा होता. माने वेस्‍ट हो भी रहा होता तो जिम्‍मेदार जिम्‍मेदारियों में होता. बीस वर्ष पहले समझदार बच्‍चे जैसे प्‍ले-स्‍टेशन के लिए मचला करते थे मैं अपने ब्‍लॉग के लिए मचल रहा था. और अंदर ही नहीं बाहर से भी खुद को बेवकूफ महसूस कर रहा था. सोचकर दिल तार-तार हो गया कि बेचारी मान्‍या का क्‍या हुआ होगा. सांवरे वाली सारी कविताओं के रुक जाने पर अब वह कैसा जीवन जी रही होगी! और नीलिमा का लिंकित मन- क्‍या वह अब भी लिंक्‍ड होगी या उसके भी सारे तार छिन्‍न-भिन्‍न हो गए होंगे? तब तक अविनाश फिर दिखा. इसके पहले कि मैं उसकी ओर लपकूं उसके पीछे पुलिस के तीन बडे अधिकारी दिखे. एक वॉकी-टॉकी में इंस्‍ट्रक्‍शन दे रहा था. चायनीज़ में. नज़र मिलते ही अविनाश ने कातर नज़रों से इशारा किया कि मैं उसे पहचानने की किसी भी तरह से कोशिश न करुं. और जिस तरह से दिखा था उसी तरह वह गायब हो गया. अबकी सुनील दीपक दिखे. पुलिसवाले उनके पीछे नहीं साथ थे. बहस हो रही थी. दीपक बाबू इटैलियन में झींक रहे थे, पुलिसवाले उन्‍हें मराठी में समझा पाने में असफल होने के बाद अब चायनीज़ की गंदगी पर उतर आये थे.

पता चला हरामख़ोरों ने भले आदमी का कैमरा जब्‍त कर लिया है. सुनील दीपक ने चीखकर कहा रवीश कुमार ऐसे नहीं छूटेगा, वे मामला एमनेस्‍टी इंटरनेशनल तक लेकर जायेंगे! एक पुलिसवाले ने हंसकर सूचित किया कि एमनेस्‍टी इंटरनेशनल का सात कैमरा उसने पहले ही सीज़ किया हुआ है. तब तक एक तेज़ कलरफुल लहर हॉल में तैरती-सी निकल गई. कुछ वैसी ही जैसे बीस वर्ष पहले रेड चिली प्रोडक्‍शन की अमोल पालेकर डायरेक्‍टेड मूवी पहेली में घटिया स्‍पेशल इफैक्‍ट के मार्फत निकला करती थी और लहर के गायब होते ही शाहरुख पैदा हो जाते थे. इस बार शाहरुख नहीं अभय तिवारी पैदा हुए थे. और उनके पैदा होते ही पुलिसवाले घिघियाने लगे और सुनील दीपक को एकदम-से छोड दिया. मैं भागता हुआ अभय के पास गया. नाराज़ होकर कमेंट बॉक्‍स में पोस्‍ट करने की बजाय सीधे मुंह से कहा, ये क्‍या आनंदमार्गियों वाली वेशभूषा बना रखी है! लंबी दाढी और सफेद धोती में लिपटे अभय ने धीमी मगर भारी आवाज़ में, कुछ वैसी ही जैसी निकालने में कास्‍त्रो से लेकर चावेज़ तक सब इतिहास पुरुष फेल होते रहे हैं मगर खास सिनेमाई क्षणों में बीग बी निकाल-निकालकर हमको और इतिहास को ठगते रहे हैं- मुझे सूचित किया- दूसरी आज़ादी का वक्‍त आ गया है, प्रमोद भाई! हैवानियत और शोषण पर टिके इस शासन का अंत मेरे ही हाथों होना लिखा था. मैंने दुखी होकर कहा, कैसी बात करते हो, अभय. एक तो दूसरी आज़ादी ऑलरेडी जेपी देकर चले गए हैं. दूसरे रवीश अपना यार है, यार! अभय ने बिना मेरी ओर देखे उसी गंभीरता से कंधे पर धोती ठीक की और भारी आवाज़ में जवाब दिया, रवीश किसी का यार नहीं, ही इज़ नो मोर इवन ए ह्यूमन, ही इज़ ए डेविलिश ब्रांड. यह आखिरी वाक्‍य अभय जैसे शुद्धतावादी ने भी ठेठ कैंटोनीज़ में कहा था.

(जारी...)

(ऊपर शैतान का वर्तमान अवतार, नीचे बीस वर्ष परिवर्तनकारी चोगा धारण करने से पहले के सुखद दिनों में अति)

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