Sunday, March 18, 2007

घास पर काव्‍य चर्चा और ब्‍लॉग भविष्‍य की चिंता

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: चार

पुलिसवाले घिघियाने लगे थे इसका यह मतलब नहीं था कि श्‍वेतवस्‍त्री परिवर्तनकामी के आगे उन्‍होंने हथियार डाल दिया था. डाला भी था तो उसी क्षण वे नये हथियार पैदा भी कर रहे थे. इतना असला जीवन में मैंने पहले कभी नही देखा था. जापानी एनिमेटेड एक्‍शन फिल्‍मों में भी नहीं. हॉल अचानक ठक्-ठक् के सुर में रिद्म ऑफ डेथ (रिद्म ऑफ लाईफ की यहां बहुत पहले हत्‍या हो चुकी थी) बजाते हुए हरी वर्दी के सोल्‍जरों से भर गया. सॉफिस्टिकेटेड विपनरी से सजे हुए, विश्‍व में शांति लाने को कृतसंकल्‍प. लग रहा था हॉलीवुड की किसी पुरानी एंटी-वियतनाम फिल्‍म का अपडेटेड शॉट हो. अभय के साथ देखे जाने पर मुझे अभय से ज्‍यादा अपने लिए चिंता हुई. मगर बीस वर्ष पहले जिस तरह आईएसआई वाले घूस और तिकडमों से भारतीय सरकार की आंख में धूल झोंकने में सफल हो जाया करते थे, वैसी ही सिद्धि अभय ने मात्र तकनालॉजी के बूते प्राप्‍त कर ली थी. धोती से सिगरेट के आकार का उसने अपना सेल फोन बाहर किया, मुझको इग्‍नोर करते हुए जय शंकर बुदबुदाकर एक मंत्र का पाठ किया और फोन में फूंक मारी. समूचे हॉल में तत्‍काल कोहरे की एक गाढी परत फैल गई और कोहरा के छंटते ही न अभय का कहीं पता था न शांतिदूत सोल्‍जरों का. मेरा भी नहीं था. थोडी देर बाद जाकर मुझे अपना पता चला. हरी दूब पर क्षण भर वाला पोज़ लिये पडा था.

दूब कुछ ज्‍यादा ही हरी थी. और पडे हुए मुझे क्षण भर से काफी ज्‍यादा हो रहा था. अपने सिलेमा वाले ब्‍लॉग पर चढाये गुरुदत्‍त के प्‍यासा वाले एक ब्‍लैक एंड व्‍हाईट फ्रेम की याद आ गई. पास में गुलाब का फूल नहीं था लेकिन एक हाथ सिर के नीचे रखे और दूसरी में कल्‍पना का गुलाब लिये मैं फ्रेम वाली अदा से आसमान की ओर देखने लगा. फूल कल्‍पना का था इसलिए थोडी देर में उसके कुचल दिये जाने का मुझे भय नहीं हुआ, मगर प्‍यासा के शायर की नियति कहीं अपने गले भी न पड जाये की चिंता ने मुझे अचानक चौकन्‍ना कर के कविगत खामख्‍याली से उबार लिया. घास थोडी दूरी पर भी हरी ही थी जहां एक वयस्‍क और दो अपेक्षाकृत कम वयस्‍क अपनी कवितायें मांज रहे थे.

हिंदी के साथ-साथ चायनीज़ में भी इस ओज के साथ काव्‍य पाठ हो सकता है, अन्‍य और कई बातों के साथ प्रियंकर तत्‍काल इसका साक्षात प्रमाण बन रहे थे. बाकी के दोनों कवि (कवियत्री) थोडा आतंक में थे. शायद उनका चायनीज़ डिक्‍शन ठीक नहीं चल रहा था. शायद विषय की प्रस्‍तावना को लेकर उनकी राय कुछ जुदा थी. प्रत्‍यक्षा ने उंगलियों से अपने बाल पीछे करते हुए कहा प्रियकंर जी, मैंने लैंग्‍वेज ठीक से अभी पिक नहीं किया है मगर इतना समझ सकती हूं कि आप बहुत जटिल शब्‍दों में जा रहे हैं. जवाब में प्रियंकर ने हंसते हुए कहा आप जिसे जटिल कहेंगी मैं उसे प्रगाढ कहूंगा. इंटेंस एक्‍सपीरियेंस. ऐसे सघन काव्‍यानुभवों को हम विष्णु नागर वाली चीनी में नहीं आंक सकते. इसके लिए हमें क्‍लासिकी मंडारिन की ही शरण में जाना होगा. मान्‍या क्षुब्‍ध होकर पेंसिल से घास पर (हरी, हवादार) आकार खींच रही थी. बुदबुदाकर उसने कंप्‍लेन किया मालूम नहीं, दीदी, हिंदी में इतनी आसानी से हो जाती थी वही सब चायनीज़ में कहने पर उन्‍हें ही नहीं, मुझे भी एकदम पराया-पराया-सा लगता है. प्रत्‍यक्षा ने उसे जवाब देने की बजाय मुंह फेरकर अनमनस्‍कता से देखा और मुझे खडा पाया, बोली, आप यहां किसकी जासूसी करने आये हैं? मैंने हंसने की एक्टिंग की और हाथ वास्‍तव वाले जोडे, जी, आपलोगों को देखा तो सोचा हैलो बोलता चलूं. मान्‍या बेचैन होकर बोली, आप भी कविता करते हैं?

कविता के नाम से मेरी हमेशा घिग्‍घी बंध जाती है. अभी भी बंध रही थी. प्रियंकर ने मुझे बचा लिया. मेरी ओर से मान्‍या को जवाब दिया, ये सिनेमा पर लिखते हैं. कभी-कभी ठीक भी लिख देते हैं लेकिन अच्‍छी भाषा का अभाव है. परंपरा से रुटेड न हों, क्‍लासिक्‍स का अध्‍ययन न हो तो इसी तरह की दिक्‍कतें होती हैं. मैंने मान्‍या के हाथ से पेंसिल ले ली और शर्म से घास पर आकार इस बार मैं बनाने लगा. मान्‍या मुझे देखकर हंसने लगी. देर तक हंसती रही. प्रियंकर ने चीनी क्‍लासिकल पोयट्री का एक चायनीज़ पेंग्विन संस्‍करण खोल लिया. प्रत्‍यक्षा ने जम्‍हाई रोकने के लिए मुंह पर हाथ रख लिया. मैंने पेंसिल फेंक दी और शर्मिंदगी से घास में मुंह डाले अंदर ही अंदर रोने लगा. सब अपने अपने में बझे हैं. कोई मेरे ब्‍लॉग के लौटाने की बात नहीं कर रहा! ब्‍लॉग वापसी के लिए आंदोलन करने की बजाय सब चायनीज़ सीख रहे हैं. मैं चायनीज़ सीखना नहीं चाहता. मैं अपना ब्‍लॉग चाहता हूं. प्रत्‍यक्षा ने कंसर्न के साथ मेरे कंधे पर हाथ रखा और कवियत्रियों वाली मिठास में बोली, हम सभी अपना ब्‍लॉग चाहते हैं. लेकिन आंदोलन वाले तोडफोड के रास्‍ते नहीं, लीगल और पीसफुल मींस से. मान्‍या चहककर बोली, मैं चायनीज़ में एक गाना सुनाऊं? मैंने दुखी होकर फिर से प्‍यासा के गुरुदत्‍त वाला पोज़ ले लिया. आसमान की तरफ देखते हुए भावुक होने लगा. अच्‍छा तमाशा है. टेंपरेचर की तरह टाईम भी जैसे ऑटो कंट्रोल्‍ड हो. दिन ऊपर चढ रहा था न नीचे आ रहा था. अपने को वश में नहीं किया तो जल्‍दी ही मैं भी रवीश कुमार से भारी नफ़रत करने लगूंगा.

(जारी...)

5 comments:

  1. पिछली बार अपना विप्लवी स्वरूप देख कर मैं थोड़ा संकुचित हुआ..थोड़ा आनन्दित हुआ..फिर आगे की कड़ियों में आप मेरा क्या हाल करेंगे इस से थोड़ा संशकित भी हुआ.. और अन्ततः प्रतिक्रिया से क़तरा के निकल गया.. फिर एक भी टिप्पणी देख के दुख हुआ..फ़न्तासी कथा में मेरे आते ही सब लोग चुप क्यों हो गये.. खैर..कोई नहीं तो कम से कम मैं तो चुप न रहूं..मस्त है प्रमोद भाई.. आपका कल्पना संसार रंजक है..अगली कड़ी का इन्तज़ार है..

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  2. अभय जी आपके आते ही चुप ही रहते हैं न । मेरा सोचिये । लोग मुझे शैतान समझते हैं । नफरत करना चाहते हैं । ख़ुद को सागर पार दुबई में किसी डॉन की तरह देख कर कराह रहा हूं । मगर क्या करें । पढ़ रहा हूं । चुपचाप । सोचता हूं कि क्या इस कहानी के कोई तत्व हैं मेरे भीतर। मैं वो बन रहा हूं जो नहीं चाहता । मगर किसी को मेरे भीतर के तत्वों को देखने से कैसे रोक सकता । डेविल हो गया हूं । ह्यूमन नहीं रहा । रीयल से वर्चुअल मथ कर पता नहीं क्या क्या निकल जाता है । प्रमोद जी आप मथते रहिए । हम लाचार हैं । पढ़ते रहेंगे । पर हर बुरे का कोई अच्छा रूप भी है । वो दान करता है । ग़रीबों की मदद करता है । रोबिन हूड होता है । क्या मैं वैसा भी नहीं हूं ।

    रवीश कुमार

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  3. रवीश कुमार की जो तस्वीर आप दिखा रहे हैं वो कितनी वर्चुअल है कितनी रियल, समझने की कोशिश कर रहा हूं. पता नहीं रवीश कितना समझ रहे होंगे. शायद चिन्हों (simiotics)का कुछ ज्ञान होता तो मैंने सारा सत्य जान लिया होता.
    तस्वीरों में मुझे कुछ-कुछ मैजिकल भी लग रहा है. जादू पर भरोसा हो ना हो लेकिन जादूगर मुझे लुभाते हैं. अब किसी ऐसी दुनिया की तरफ लेकर चलिए ना डॉलर और युआन के बगैर भी काम चलाया जा सके. और दरवाजे पर रवीश जी हिंदी ब्लॉगर्स के स्वागत में खड़े हों.

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  4. मस्त चित्रण कर रहे हैं आप , आखिरकार आपकी कल्पना में सभी चिठ्ठाकारों को किसी ना किसी रुप मे जगह मिल रही है, ये देखने लायक है कि आप किसका चित्रण किस रुप मे कर रहे हैं। इंतजार रहेगा अगली किश्त का

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  5. "जल्‍दी ही मैं भी रवीश कुमार से भारी नफ़रत करने लगूंगा."
    मैं भी :-)
    हा हा , अब मैं वाकई चली मैंडरीन सीखने ।

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