Sunday, March 18, 2007

आसमान के विस्‍थापित व अविनाश की गरीबी

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: पांच

पता नहीं कब आंख लग गई. मैं जगा हुआ था, माने देख सकता था कि मान्‍या गा रही है लेकिन उसके बोल कानों तक नहीं आ रहे थे. कानों में धीमे-धीमे रावेल की मार्चिंग ट्यून चढ रही थी. जैसे फिल्‍म का क्‍लाइमैक्‍स आसन्‍न हो. फिर मान्‍या धुंधली हो गई. प्रियंकर के हाथों का चायनीज़ पेंग्विन क्‍लासिकल संस्‍करण उनके हाथों से छूट ऊपर उठता गया. जैसे कोई गुरुत्‍वाकर्षण शक्ति उसे हवा में अपनी ओर खींच रही हो. पता नहीं आपने फेल्लिनी की ‘एट एंड हाफ़’ देखी है या नहीं. ट्रेफिक के जगर-मगर में फंसा नायक मारचेल्‍लो अचानक अपनी कार से छूटकर ऊपर की ओर उठा चला जाता है. मैंने दसेक दफा देखी है. आज ग्‍यारहवीं बार देख रहा था. पता नहीं यह मेरे वास्‍तव का विज़न था या विभाजित वर्चुअल का. मारचेल्‍लो का स्‍थान मंडारिन की किताब ने ले ली थी. जाने आसमान के किस बिंदु पर कौन डोर उसकी नियति का स्क्रिप्‍ट लिख रही थी. मैं नशा नहीं करता लेकिन लग रहा था अभी किया है. रावेल के नाटकीय संगीत की जगह अब एरिक सती बज रहा था. मीठी थपकियों से सुलाता हुआ. कहीं ले जाता हुआ. उडाता हुआ. अपने होने को इतना भारहीन और कोमल इससे पहले मैंने महसूस नहीं किया था. डिफरेंट फील ही नहीं कर रहा था, मैं डिफरेंट हो गया था (मैंने मन ही मन रवीश के लिए लंबी उम्र की कामना की). इस अवस्‍था में मुझे मेरी पूर्व प्रेमिकायें देख लेतीं तो भाग-भागकर पास आतीं. मैं अभय वाले भारीपन की नकल करके कहता, जाओ तुमलोग, मेरा दिल टूट गया है, कहा न जाओ! वह मानतीं नहीं, चिरौरी करके साथ रहने की जिद करतीं. मेरा दिल पसीज जाता और मैं मन ही मन तय करने लगता कि इसमें किसको स्‍वीकारना ज्‍यादा फायदेमंद डील होगा.

मगर प्रेमिकायें नहीं दिखीं, अपनी मां दिखी. वही फूलों के छापेवाले अपने फेवरेट ब्‍लू कॉटन साडी में. एक बांह पर ब्‍लाउज़ का तागा उधडा हुआ. बीस वर्ष पहले ही उसे गुज़रे काफी अर्सा निकल चुका था, फिर वह अभी आसमान में कैसे तैर रही थी? मुझे घोर आश्‍चर्य हुआ. उसे नहीं हुआ. क्‍या वह मुझे अवॉयड करने की कोशिश कर रही थी? मेरे हल्‍के शरीर का दिल तेजी से बहुत भारी होने लगा. प्रेमिकाओं से डम्‍प्‍ड होकर मैं अब खुद अपनी मां के हाथों ठुकराया नहीं जाना चाहता था. इसके पहले कि मैं उसकी नीली साडी में सिर छिपाकर रोने लगूं वह बुदबुदाकर बोली तुम वो नहीं हो जिसे मैं जानती थी. और जो हो उसे मैं जानना नहीं चाहती. भले यह वाक्‍य उसने चायनीज़ या अंग्रेजी की बजाय ठेठ भोजपुरी में कहा मेरी आंखें और मुंह दोनों खुले रह गए. मैंने मां को सोहर और छठ के गीत गाते सुना था इस तरह मोहन राकेश की नाट्य-नायिकाओं की तरह आर्टिकुलेटेड वाक्‍यों का इस्‍तेमाल करते नहीं. मैं तो आ ही गया था नीचे बाबूजी भी मां का यह रुप देखकर सकते में आ जाते. नीले धुंए में खो जाने से पहले मां ने साडी की गांठ खोलकर माओकालीन कुछ पुराने युआन निकाले, मुझे सौंपा और नीले में अपनी नीलाई घोलकर अंतर्ध्‍यान हो गई. उसके पीछे पंछियों का एक बडा सा झुंड उडता दिखा.

वे एक खास तरह की कॉरियोग्राफी में उड रहे थे. लगा कोरस के साथ ब्‍लैक एंड व्‍हाईट दौर का कोई अर्ली ओपी नैयर का गाना शुरु होगा. मगर उल्‍लसित वोकल्‍स की बजाय बैकग्राउंड में सारंगी का कारुणिक संगीत शुरु हो गया. पंछियों के सरदार ने मुझे खबर दी कि म्‍यूजिक मैचिंग है. उनके नियमित ठौर को रवीश रिसोर्सेस इंक ने खरीद कर उन्‍हें बेघर-बार कर दिया है. वे नहीं जानते अंतरिक्ष में उनका नया ठिकाना कहां होगा. होगा भी या नहीं. रवीश ऐसा क्‍यों कर रहा है? मैं भावुक होकर नाराज़ होने लगा. इस तरह का विकास रवीश को भले कहीं ले जाये पंछियों को और हम सारे ब्‍लॉगरों को कहां ले जायेगा. कहीं नहीं. रवीश के ब्‍लॉग के शुरु होने के पहले कितनी शांति थी. फोन पर कैसे शरीफ और आज्ञाकारी बच्‍चे की तरह बातें सुनता था. जैसे फोन पर मेरी नहीं दिबांग के चैंबर में दिबांग की बातें सुन रहा हो. मगर अविनाश ने उसे लिखने को उकसाकर शैतान का पिटारा खोल दिया. हमारी नींद छीन ली. एनडीटीवी को मिट्टी कर दिया (इसकी और प्रणव रॉय के भिखारी हो चलने की खबर मुझे बाद में होनी थी, आप सुधी पाठकों को और भी बाद में होगी). रवीश, तुम्‍हें यह दुनिया माफ़ नहीं करेगी. वास्‍तविक और वर्चुअल दोनों. पंछियों के पीछे अब आदिवासियों का काफिला उडता दिखा. महाराष्‍ट्र, एमपी, छत्‍तीसगढ, पंजाब, झारखंड सब जगह के आदिवासी थे. जितना दुखी अंग्रेजी अखबारों के संडे एडिशन और न्‍यूज़ चैनलों की विशेष रपटों में दिखते थे उससे ज्‍यादा दुखी दिख रहे थे. उत्‍पीडन और हिंसा की वही चिर-परिचित कहानी थी जो धीरे-धीरे पूरे देश को अपने अमानवीय जबडे में लील रही थी. दमन, परायेपन और विस्‍थापन की कथा. इतने बडे नक्‍शे में लोगों को अपने परिवार और अपनी इज़्ज़त के लिए दस फुट ज़मीन बचाये रखना असंभव हुआ जा रहा था. आंखें तो पहले से बंद थीं ही, मगर उन मुंदी आंखों के भीतर भी शर्मशार होकर मैंने आंखें मींच ली. दुख बचपन से देखता रहा हूं लेकिन दुख के इतने बडे भूगोल के आगे मैं भी कायर हो गया. आसमान से गिरता नीचे चला आया.

नीचे हरी घास नहीं थी. सीमेंट का पक्‍का फर्श था. स्‍टोव के घौं-घौं की आवाज़ आ रही थी. माथे पर ऊनी टोपा डाले मुक्‍ता रोटी सेंक रही थी. मैंने पूछा गैस का चूल्‍हा क्‍या हुआ. लडकी ने भर्राई आवाज़ में जवाब दिया, बिक गया. बहनों के, और पूर्व प्रेमिकाओं के रोने पर अमूमन मैं उनको रोने के आनंद में छोड घर से बाहर निकल आता रहा हूं लेकिन आज पता नहीं क्‍या था कि मैंने रोती मुक्‍ता के कंधे को हाथों से घेर उसे छाती से लगा लिया; तावे पर रोटी को जलता छोड वो चैन से मेरी छाती पर बिसुरती रही. तेजी से बह रहे आंसुओं से मेरी शर्ट खराब हो रही थी, ऊनी टोपा गड रहा था लेकिन मैं दु:स्‍साहस से मुस्‍कराता रहा. मुक्‍ता फुसफुसाकर बोली, मेरी, बाबूजी किसी की नहीं सुनते ये, आप इनको समझाईये, भैया. येही कंपूटर का वजह से एनडीटीवी इनको बाहर कर दिया. घर में पैसा का हाय-हाय हो गया, हमारी जिंदगी नरक हो गई. सब लत्‍ता- गहना बिक गया मगर इनका कंपूटर नहीं छूटा. साठ के दशक की हिंदी फिल्‍मों में घरेलू तनाव के ऐसे क्षणों में जिस तरह बलराज साहनी मुस्‍काया करते होंगे उस मुसकान की नकल करके मैंने मुक्‍ता से कहा, मुझे मालूम नहीं था उसकी नौकरी छूट गई है. कहां है वो? चिढी हुए स्‍वर में मुक्‍ता बोली, कहां होंगे, वहीं मशीन में मुंह डाले बैठे हैं और क्‍या! परदा हटाकर मैं कमरे की गरीबी के अंदर गया. अविनाश मेरी तरफ पीठ किये बैठा था, मॉनिटर पर मोहल्‍ले का होम पेज खुला हुआ था. पता नहीं मुझसे या खुद अपने आप से फुसफुसाकर उसने कहा, इतने टाईम बाद भी ये काउंटर साला डेढ सौ से ऊपर नहीं जा रहा!

(जारी...)

1 comment:

  1. कथाक्रम अद्भुत से करुण होता जा रहा है...कैसी अनोखी दुनिया में धकेल रहे हैं आप..

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