Thursday, March 15, 2007

ग्‍लोबलाइजेशन के नये कॉरपॉरेट जंमीदार

विकास की आंधी: पांच

माले के अरिंदम सेन सेज़ (स्‍पेशल इकानॉमिक ज़ोन) के लिए अंग्रेजी के तीन ‘ई’ का इस्‍तेमाल करते हैं. एविक्‍शन (विकास के शरणार्थियों के लिए), एक्‍सेम्‍पशन (निवेशकों की मौज के लिए) और एक्‍सप्‍लॉयटेशन (मजदूरों के दोहन के लिए). भारत में आर्थिक तरक्‍की और छलांग के नाम पर रचे इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों के बारे में वित्‍त मंत्री की धारणा है कि आनेवाले चार वर्षों में इस पर देश एक लाख करोड रुपयों का खर्च उठायेगा और यह कि इस दरमियान इससे रोज़गार के क्षेत्र में कोई विशेष उछाल नहीं आयेगा (बाद में कितना आएगा यह निवेशकों की दया नहीं, संबंधित क्षेत्रों के लोगों की लड-भिड कर अपना अधिकार मांगने के सामर्थ्‍य पर निर्भर करेगा. और फिलहाल वह भी सिर्फ अनुमान का ही विषय हो सकता है). फिर भी, मात्र एक वर्ष के भीतर सेज़ के 300 प्रोजेक्‍टों को मंजूरी दी जा चुकी है. 300 मंजूरी के रास्‍ते पर हैं. अब इसकी इससे तुलना कीजिये कि पूरी दुनिया में ऐसे विशेष आर्थिक क्षेत्रों की संख्‍या 400 है, और चीन जो हमारी इस नई उद्यमशीलता का मॉडल है (जिसकी नकल में हमने सेज़ की हवा बनाई और हौव्‍वा खडा किया है) वहां इनकी संख्‍या मात्र 6 है! तो फिर अपने यहां इतनी भारी मात्रा में भूमि अधिग्रहण के पीछे नज़रिया क्‍या काम कर रहा है? इसकी नियंत्रक एजेंसियां क्‍या होंगी, और किसके प्रति ये जवाबदेह होंगे? आईये, ज़रा तह में चलते हैं.

वापस अरिंदम सेन के ही शब्‍दों में: सेज़ देश के अंदर आम नियम-कानूनों से स्‍वतंत्र जोन्‍स होंगे. आम नागरिक को वहां दाखिल होने के लिए विशेष पहचान पत्र या पासपोर्ट की ज़रुरत होगी. जो किसान कल तक वहां हल चलाते थे उन्‍हें उस ज़मीन पर खडे होने के लिए खास आई कार्ड खोजकर लाना होगा. देश के काफी कानून अंशत: या पूरे के पूरे इन क्षेत्रों पर लागू नहीं होंगे. भारतीय संविधान ने हमारे लिए स्‍वशासन और पंचायत राज की व्‍यवस्‍था दी है लेकिन इन क्षेत्रों में यह विशेषाधिकार डेवलपमेंट कमिशनर के अधीन रहेगा जिसकी नियुक्ति सीधे केंद्र सरकार करेगी. सेज़ एक्‍ट, 2005 के अनुसार किसी भी सेज़ क्षेत्र में विकास का दायित्‍व डेवलपमेंट कमिश्‍नर, केंद्रीय सरकार के तीन अफसर और संबंधित उद्यमी दल के दो नामांकित व्‍यक्तियों में केंद्रित होगा. इनमें से कोई भी व्‍यक्ति जनता की तरफ से चुना हुआ नहीं होगा लेकिन क्षेत्र के अंतर्गत इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के विकास, जल और स्‍वास्‍थ्‍य सेवा, अपनी सेवाओं की ‘वसूली’ और अपनी संपत्ति पर ‘फीस’ (‘टैक्‍स’ जैसे शब्‍द से बचा गया है) वसूलने के सब अधिकार उसके पास होंगे. इसका दरअसल मतलब क्‍या हुआ? इसका सीधा मतलब ये हुआ कि देश के बडे हिस्‍से का संचालन स्‍थानीय स्‍वशासन ए‍जेंसियों के हाथ से छीनकर पूरी तरह से अराजनीतिक ऐसे प्रोफेशनल्‍स (पढिये नौकरशाह) के हवाले कर दिया जाएगा जिनकी जवाबदेही किसी जनता के आगे नहीं, सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार और अपने कॉरपॉरेट बॉसेस के प्रति होगी. जो यहां ‘विकास’ करने आयेंगे या इन क्षेत्रों में अपना कारोबार खडा करेंगे उनके लिए करों की विशेष रियायतें व अन्‍य आर्थिक छूटें होंगी. प्रारंभिक पांच वर्षों के लिए उन्‍हें समूचे तौर पर आयकर से मुक्‍त रखा जाएगा, और अगले दस वर्षों में भी वे उसका भारी छूट के बाद भुगतान करेंगे. यहां मसला सिर्फ करों से छूट व उन विशेषाधिकारों भर का नहीं है जिसमें जब चाहे जिसे लायें और जब चाहें लात मारके बाहर करें के लिए वे हर तरीके से स्‍वतंत्र होंगे, असल चीज़ इसमें एक महीन आड के नीचे विकास के नाम पर भूमि अधिग्रहणों को मिली खुली छूट है.

बडे फाइनांस की आज अगर सबसे सुगम गति बाज़ार और स्‍टॉक मार्केट की ओर है, तो उसका दूसरा महत्‍वपूर्ण गंतव्‍य रियल इस्‍टेट और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चरल डेवलपमेंट है. नई बहुमंजिला रिहायशी इमारतों का निर्माण, होटल, शॉपिंग मॉल्‍स आदि-इत्‍यादि. इन सबके लिए ज़मीन की ज़रुरत है- बहुत, बहुत ज़मीन की ज़रुरत है. और ज़मीन एक ऐसा संसाधन है जिसकी सप्‍लाई सीमित है, और उसे किसी आधुनिक कारखाने में पैदा नहीं किया जा सकता. तो इस समस्‍या का निदान क्‍या है? भूमि अधिग्रहण. जहां-जहां हाथ जाये घेरो ज़मीन, इसके पहले कि बाज़ार में उनकी कीमत और चढे, इसके पहले कि दुनिया के अन्‍य क्षेत्रों में खाली भू-पट्टयां पाना असंभव हो जाए. आज दुनिया में यह एक नया ट्रेंड है. कॉरपॉरेट ज़ंमीदारों की एक नई खेप तैयार हुई है जो पैसों की बडी बोलियां लगाकर यहां-वहां ज़मीनों पर कब्‍जा कर रही है. ग्‍लोबलाइजेशन के इस दौर में दुनिया बडी छोटी हो गई है. स्‍थानीय भूमि बाज़ार भी ग्‍लोबलाइज्‍ड हो चला है. यह महज़ संयोग नहीं कि मॉर्गन स्‍टैनली, मेरिल लिंच और जेपी मॉर्गन जैसे बडे आर्थिक खिलाडी भारत में इंफ्रास्‍ट्रक्‍चरल डेवलपमेंट के पीछे मिलियंस और बिलियन का निवेश कर रहे हैं.

(जारी...)

3 comments:

  1. आपका लेख अच्छा है..लेकिन आप डरा रहे हैं..क्या होगा हम लोगों का..कोई ऎसी प्रेमिका भी नहीं जिसके मत्थे अपने दुर्भाग्य को मढ़ कर मुक्त हुआ जा सके.. ये सचमुच भयानक है..

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  2. विशेष आर्थिक क्षेत्र पर यह लेख भी देखें :
    http://samatavadi.wordpress.com/tag/sez/

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  3. बहुत ही सटीक लिखा है. शायद ये सेज़ हमारे हिंदुस्तान में ग़रीब आदमी की गुलामी का नया डिजाइन है. जिसे दिखाकर मनमोहनी सरकार अपनी पीठ ख़ुद ही ठोकने में मस्त है.

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