Sunday, March 18, 2007

नंदीग्राम: खानेवाले दांतों से ग्‍यारह ख़ून

विकास की आंधी: सात

अच्‍छी विडम्‍बना है. देश के अन्‍य राज्‍यों में बाद में होगा, लोगों को अपनी गोलियों से मारने में वाममोर्चा सरकार नाटकीय पहलकदमी लेकर आगे चल रही है. शायद मृतकों की सबसे ऊंची टैली दिखाकर वह इस विकास यात्रा की दौड में सबसे आगे दिखने का पदक जीतना चाहती है.

ताज़ा खबर यह है कि पूर्वी मिदनापुर के नंदीग्राम में सेज़ की खातिर ज़मीनों के अधिग्रहण के विरुद्ध गांववालों ने जो पिछले दो महीनों से भूमि उच्‍छेद प्रतिरोध कमेटी का प्रतिरोधी मोर्चा खोल रखा था और जगह-जगह गड्ढे खोदकर, पुलों को तोडकर ‘विकासी’ एजेंटों के गांव में प्रवेश पर रोक लगा रखी थी, उन्‍हें पटरी पर लाने व सबक सिखाने की गरज से, और गांव में वापस ‘सामान्‍य स्थिति’ बहाल करने की खातिर बुधवार की सुबह एके 47 से लैस तकरीबन 2000 पुलिसवालों का दस्‍ता नंदीग्राम पहुंचा. अश्रु गैस चले, रबर की गोलियां चलीं और फिर बुलेट फायरिंग हुई. अधिकृत सूत्रों के मुताबिक फायरिंग में चालीस लोग घायल हुए और ग्‍यारह लोगों की जान गई. आंदोलन से जुडे लोग मृतकों की संख्‍या ज्‍यादा बता रहे हैं.

सिंगुर में टाटा मोटर्स और नंदीग्राम में इंडोनेशियाई कंपनी सलीम ग्रुप. नंदीग्राम सिंगुर की तरह कलकत्‍ता के पडोस में नहीं और न ही उसकी तरह उपजाऊ है (इलाका मुस्लिम बहुल है) मगर अपनी ज़मीनों के हडपे जाने पर नाराज़ दोनों ही जगहों के लोग हैं. जानें दोनों ही जगह गई हैं, जा रही हैं (आज अभय बता रहे थे सिंगुर में एक एकड की जोतवाले किसी किसान ने अपना ज़मीन खोने के दुख में इसी रविवार आत्‍महत्‍या कर ली. ऐसी घटनाएं अभी और बढेंगी). देश के अन्‍य हिस्‍सों की बनिस्‍बत पश्चिम बंगाल में किसान मोर्चा बांधकर आमने-सामने की लडाई में उतर रहे हैं. शायद सिर्फ इसीलिए नहीं कि उन्‍हें उकसाने के लिए वहां ममता बनर्जी और चंद नक्‍सल तत्‍व हैं, शायद इसलिए भी कि थोडी जनचेतना है, आम किसान अपना नफा-नुकसान कुछ ज्‍यादा समझता है. और जानता है कि ज़मीन खोने के बाद, भले ही वह मात्र एक एकड ही क्‍यों न हो, उसका दूसरा कोई सहारा न बचेगा.

मुझे नहीं मालूम आनेवाले दिनों में सिंगुर और नंदीग्राम में विकास के एजेंटों से स्‍थानीय लोगों की लडाई का रुप और दिशा क्‍या होगी. लोग जान गंवा-गंवाकर डटे रहेंगे (नंदीग्राम में जनवरी में सात लोग मरे थे, अबकी यह संख्‍या और बढी है) या पुलिस की मदद से सीपीआईएम के गुंडे लोगों पर जबरिया सेजरुपी विकास की अपनी मर्जी मढ सकने में सफल होंगे (जैसा वे कल सुबह हुए. पूर्वी मिदनापुर के एमपी लक्ष्‍मण सेठ के नेतृत्‍व में स्‍थानीय लोगों ने ही लाठियां नहीं खाई, प्रैसवालों को भी गांव में अंदर आने की कोशिश करने पर पीटा गया). जो भी हो सिंगुर और नंदीग्राम के सबक देश के अन्‍य हिस्‍सों सेज़ के विकासी बुलडोजर का सामना कर रहे नागरिकों के काम आएंगे. फिलहाल हम और आप यही कामना कर सकते हैं कि लोगों की यह बेहया बलि व्‍यर्थ न जाए.

(जारी...)

(ऊपर पुलिस व तारों के बीच घिरा नंदीग्राम, नीचे अपनी करनी से सुखी होता मुख्‍यमंत्री)

4 comments:

  1. अब तो क्‍या दक्षिण, क्‍या वाम। सब एक ही नाव के सवार हैं। सब जय साम्राज्‍यवाद, जय विकास के नारे लगा रहे हैं, अपनी जेबें भर रहे हैं। दास कैपिटल का विश्‍लेषण हमारे समय को डिफाइन कर सकने में अब सक्षम नहीं है। आज मार्क्‍स भी होते तो इन आर्थिक परिवर्तनों से भौंचक्‍के रह जाते।

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  2. अंधा युग उतर आया है. सकते में हूं . क्या कहूं और क्या लिखूं.

    पूर्व मेदिनीपुर के डी.एम. के अनुसार १४ लोग मरे हैं.एसयूसीआई ने सौ लोगों के मरने का दावा किया है. कई मृतकों को वहीं पास बहती हल्दी नदी में फ़ेंक देने की भी खबरें हैं.

    हम सबके मस्तक शर्म से झुके हुए हैं .

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  3. यह बर्बर कार्रवाई भारतीय इतिहास में दर्ज नृशंसता की वारदातों में जालियांवाला बाग कांड से भी अधिक जघन्य है। लानत है इसके लिए जिम्मेवार लोगों पर !

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  4. mamta ko aap gali de sakte hain lekin naxal kahkar jinka nam bhi apki juban par nahin aa raha hai unke bare mein kya khyal hain. for the last 25 years I have been waching political and social struggles. it is not in tune with the history to say that kisan ki chetna hi sab kuch hai aur unko netritva karne logon ka koi role nahin hai. I think quite to the contrary, it is the leadership that will ultimately matter. principally on two counts. one on furthering the present struggle and secondly in taking it to next stage politically and also to the larger and bigger arena.
    I hope this is the area that you could have gone with the camera and got the shots of your dream movie. at least its theme and characters.vipin

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