Sunday, March 18, 2007

कपल का डबल और मुक्तिबोध का फ्रॉड

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: छह

नज़दीक जाकर मैंने धीमे से अविनाश के कंधे पर हाथ रखा. कहा, तुम्‍हारी नौकरी चली गई और तुमने खबर भी नहीं की. वह कुर्सी पीछे ठेलकर एकदम-से उठ खडा हुआ. मुट्ठे से खींचकर एक बीडी निकाली. अदा से उसे वैसे ही सुलगाया जैसे आज तक मैं राजकमल पेपरबैक के कवर पर देखता आया था आज साक्षात देख रहा था. मुझसे रहा नहीं गया, पूछा- तुमने ये सब कब शुरु कर दिया? बीडी के गहरे कश लेता अविनाश जंगले के निकट गया और नीचे गली की तरफ देखकर हंसने लगा. मेरे अंदर सिहरन-सी उठी. यह इस तरह आचरण क्‍यों कर रहा है. क्‍या नौकरी खोने का इसे इतना गहरा सदमा लगा है? अविनाश की हंसी कमरे में मेरे आने का स्‍वागत नहीं थी. और न वह मेरे तिरस्‍कार में हंस रहा था. मेरे आने-होने से परे यह उसका स्‍वतंत्र-स्‍वायत्‍तलोक था और उसकी लगभग भयानक-सी हंसी न हमारे संवाद को खोलने की कोई प्रतीकात्‍मक खिडकी थी या न ही उसने हंसकर ऐसे किसी संवाद के मुंह पर दरवाज़ा बंद किया था. कमरे में यहां-वहां लिखे-अधलिखे कागज़ बिखरे पडे थे, मार्क्‍स की 'ग्रुंडरिस' का हिंदी अनुवाद अधखुला पडा था (मुझे अविनाश पर गुस्‍सा आया कि ऐसी निधि वह दाबे हुए था और आजतक मुझे खबर नहीं लगने दी. यह बाद में पता चला कि उसका हिंदी अनुवाद होना अभी बाकी है). एक शीशे का पुराना अंडाकार लैंप था, और लकडी की छोटी डेस्‍क, और उस पर महीन अक्षरों में लिखी लंबी, जटिल कवितायें (यह भी मज़ेदार है कि यह सारा सरंजाम रघुराज का कल्पित किया था, ऑर्डर भी उन्‍हीं की तरफ से हुआ था और उन्‍हें मैं देख रहा था अविनाश के कमरे में!).

धीमे-धीमे टहलता मैं जंगले तक गया. नीचे गली में साठ-सत्‍तर लोगों का एक जुलूस नारे लगाता गुज़र रहा था. भंगिमायें नारोंवाली ही थी मगर आवाज़ जैसे पूरी तरह सेंसर कर दिया गया हो. नारों की बजाय परदे से लगे तंग गलियारे के स्‍टोव के घौं-घौं की आवाज़ आ रही थी. अविनाश ने मुस्‍कराते हुए कहा सब उसके लिखे का असर है, और फिर एक गहरा कश खींचा, और जैसे इस बात को और दाबे रहने में तक़लीफ हो रही हो, छूटकर कहा- मैं गजानन हूं माधव हूं मैं ही मुक्तिबोध हूं. कम हो रहे बालों में हाथ फेरकर वह कहता गया, देखो, इन बालों को देखो. धंसे गालों को देखो. मेरी लंबी कवितायें और समाज के साथ मेरे लौमहर्षक द्वंद्वों, संघर्षों को देखो और तय करो मैं मुक्तिबोध हूं या नहीं!

वह मुझसे नहीं जंगले की हवा और कमरे की दीवारों से बात कर रहा था. उसकी आंखों के आगे कोई अदृश्‍य विपक्षी दुर्ग था जिसे वह अपराजित, चुनौतीपूर्ण मुद्रा में बीडी के दुर्गन्‍ध व अपनी सनकभरी फब्तियों से ललकार रहा था. अचानक कांपता हुआ वह मेरे बगल से गुज़र गया और डेस्‍क पर पडे कागज़ों के भारी पुलिंदे को उठाकर सस्‍वर काव्‍य पाठ करने लगा. मैं कमरे से बाहर निकल आया. इस बीच मुक्‍ता न केवल नहाकर कपडे बदल चुकी थी, चीनी के प्‍लेट में भिंडी की भुजिया और तीन पराठे भी निकाल कर चटाई पर रख दिया था. पहला कौर मुंह में रखकर अंदर सुखी मगर चेहरे से दुख जाहिर करते हुए मैंने कहा- ये तो मुझे पहचान ही नहीं रहा! मुक्‍ता गीले बालों को पतले गमछे से झाडती बोली, आप तो भाई हैं, आपको ताजुब्‍ब हो रहा है, हमको तलक पहचानना छोड दिये हैं! हम अपना दुख कौने ला बोले जायें? नौकरी गई ठीक है गडबडी किये थे गई. मगर पटना से काज का बुलावा आया, हुंआं शास्‍त्री जी हैं बोले, आओ मैथिली का शब्‍दकोश तैयार करने का है, हम रो-रो के घर-बाहिर एक कर लिये लेकिन ई लाट साहब टस से मस नै हुए!

मैंने उंगली पर इमली की चटनी का स्‍वाद लेते हुए सवाल किया, क्‍यों, क्‍यों नहीं गया पटना?

- इसलिए कि पटना में लोड शेडिंन है, और लालमोहन भैया का क्‍वार्टर पर कंपूटर नहीं है! चिढकर मुक्‍ता बोली और बाल्‍टी का गीला कपडा लिये छत पर डालने गई.

डांटकर आवाज़ लगाने पर अबकी अविनाश बाहर आया. अब न वह हंस रहा था न स्‍वयं को मुक्तिबोध मनवाने की जिद कर रहा था. उसके चेहरे के उडे हुए रंग को देखकर मेरा दिल भर आया. वजन भी पहले से बहुत कम गया था. इतना वजन खोकर मैं खुबसूरत हो जाता, अविनाश- किसी गरीब अफ्रीकी देश की नागरिकता ले ली हो ऐसा लग रहा था. शर्म से हाथ का प्‍लेट एक ओर रखकर मैंने उसके बैठने की जगह बनाई. खाइये, खाइये आप, बुदबुदाकर उसने कहा और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोला- इस लडकी का बात गंभीरता से मत लीजियेगा. फालतू लबर-सबर करती रहती है.

तब से अंदर की दबी खिन्‍नता एकदम बाहर निकल आई. मैंने कहा- लबर-सबर तुम बोल रहे हो. मुक्‍ता सही कह रही है.

- खुदै सही नहीं है त सही कहां ले कहेगी! राज़दारी से मेरे कानों पर झुककर अविनाश ने कहा, ये मुक्‍ता नहीं है, मुक्‍ता की डबल है.

थोडी देर के फ़ासले में आंखें और मुंह के खुले रहने की यह दूसरी घटना मेरे साथ घट रही थी. खुले मुंह से ही मैंने सवाल किया- यह डबल है तो असल मुक्‍ता कहां है?

- मालूम नहीं. जाकर रवीश से पूछिये. उसीके पास सबका हिसाब-किताब है...

- अजीब आदमी हो. तुम्‍हारी बीवी गायब है और तुम्‍हें चिंता नहीं?

मेरा जवाब देने की बजाय अपने को मुक्तिबोध कहनेवाले इस क्षीणकाय हडियल काया ने रहस्‍यभरी नज़रों से मुझे देखा और तब जाके बात मुझ मूर्ख के भेजे घुसी. छन्‍न् एक बिजली की लहर सिर से पैर तक दौड गई. मुक्‍ता ही नहीं यह दुष्‍ट अविनाश भी अविनाश नहीं- उसका डबल है!

हां, यही थी सच्‍चाई. क्‍योंकि मेरा ऐसा सोचना था कि उसी क्षण मेरे मुंह पराठे का निवाला, हाथ की चीनी की प्‍लेट, सामने मुक्तिबोध की वह काया, छत पर कपडे डालती गीत गुनगुनाती मुक्‍ता की वह डबल, वह निम्‍न मध्‍यवर्गीय मकान, उसकी सांवली गरीबी सब किसी कच्‍चे सेट की डिसमाउंटिंग की मानिंद तेज़ी से धुंआ होते गए. मैं खुद भी धुंआ हो रहा था. एक अजब भारीपन ने छाती को घेर लिया था. सांस घुट रही थी. शायद मरने के ठीक पहले कुछ ऐसी ही थरथराती-थकाती अनुभूति होती होगी. शायद मैं सचमुच मर रहा था. नितांत अकेला. गुमनाम.

(जारी...)

7 comments:

  1. भाईसाब..!! आप क़हर ढा रहे हैं.. हम जानते तो थे कि आप प्रतिभावान हैं.. पर ये तो हमारे अनुमानों के कहीं आगे है..जो ग्रंथियां आप को रवीश कुमार दे रहे हैं.. उससे कहीं भयानक जटिल कॉम्पलेक्सेज़ में आप मुझे धकेल रहे हैं.. जिस अपराध के लिये आप रवीश कुमार की छवि धूल धूसरित कर रहे हैं.. मुझे तो आप में ही उसके सारे लक्षण दीख रहे हैं.. आप सारे ब्लॉगकों को निरीहता बोध दे कर पूरे ब्लॉगजगत पर इजारेदारी करने की योजना को अंजाम दे रहे हैं.. अरे छोड़ो..ये क्या हो रहा है.. मुझे बोलने दो..ने भेजा है तुम लोगों को.. मुझे लिखने दो.. तुम मेरा मुँह..मेरा हाथ बंद नहीं .. घों.. घों.. घुम्म्म..

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  2. मान गए प्रमोद भाई, फ़िल्म दुनिया की काल्पनिकता यहां भी काम आ रही है।

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  3. संवेदनशीलता की धीमी-धीमी आंच पर उर्वर कल्पनाशीलता की चासनी में पगे हुए बेहद भावपूर्ण,आत्मीय और तरल लेखन का उदाहरण. बधाई! बहुत-बहुत बधाई!

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  4. बहुत ही उम्दा, लेकिन दो बातें खटकी. आज से बीस साल तक नौकरी बजाने के बाद बेरोज़गार होने पर अविनाश अचानक दो-दो कौड़ी के लिए मोहताज कैसे नज़र आता है. दूसरा अविनाश को तो आप बीस साल बाद बूढ़ा दिखा रहे हैं लेकिन मुक्ता को तब भी लड़की ही कैसे बता रहे हैं? अगर वर्चुअल रियलिटी ऐसी ही है तो इंडिविजुअल कॉन्सियसनेस को कहां प्लेस किया जाए.
    रवीश कुमार के बहाने खडा़ आपका वर्चुअल संसार अब ज्‍यादा झिंझोड़ने वाला होता जा रहा है. लगे रहिए.

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  5. कितना सवाल करते हो, भूपेन? जैसे मैं कोडरमा के केपी इंटरमीडियेट कालेज का कोई ज्ञानी अध्‍यापक हूं और सब सवालों के जवाब मेरी पीछेवाली पाकेट में हैं! भई, तुम्‍हें दो बातें खटकीं, मुझे बीस खटकती हैं. तुमने कहा तो मुझे सुध हुई कि मैं किसको क्‍या दिखा रहा हूं, वर्ना मैं तो बस जंगल से जा रहा था, यह सारा दिखना तो संयोग मात्र है.

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  6. यार दो बातें मुझे भी खप नहीं रही हैं, पहली तो ये कि व्‍यवहार से चले तो तुम मीडिया वालों जैसी हरकतें कर रहे हो पर उनमें इतनी प्रतिभा आमतौर पर होती नही है ( बाकी के बाद टिप्पिया रहा हूँ व तो आकर देखेंगे नहीं)
    दूसरी बात ये कि यह लेखन TRP की चिंता वालों का सा नहीं है।
    इरादे क्‍या हैं बंधुवर।

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  7. मसिजीवी जी, पता नहीं हमारे किस व्‍यवहार से चलकर आपने हमें मीडियावाला और यार दोनों बना डाला. शायद आप बडे ज्ञाता हों, मैं छोटा ज्ञानी भी नहीं हूं. कोई सुनियोजित इरादे लेकर नहीं चल रहा. अंधेरे में हाथ-पैर फेंक रहा हूं. बस.

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