Monday, March 19, 2007

फालतू की बतकही

फालतू की बतकही फालतू की ही बतकही होती है. फालतू से शुरु होकर फालतू पर खत्‍म होती है. मगर संवेगी, सुशिक्षित सिपाही फालतू के ऐसे ही नहीं जाने देते. फालतू को घर लाते हैं. दिया बालते हैं. कभी कुर्सी कभी मेज़ बिठाते हैं. फालतू की बतकही का एक नया ब्‍लाग बनाते हें. उसपर फालतू की बतकही के संदर्भ ग्रंथ चढाते हैं. तय करते हैं कौन फालतू पर अच्‍छा लिख सकेगा. कभी चीखकर कभी फुसफुसाकर जिरह करते हैं कौन साथ है कौन शुत्रु फालतू की बतकही का. रात-रात जागकर तैयार करते हैं पोस्‍टर. विचित्र देश की विचित्र कथा का एक बहुत ही भावपूर्ण अनुवाद करते हैं. रेडियो पर प्रसारित करते हैं उसे चार घरों के अपने राष्‍ट्र के लिए. गुप्‍त कोडेड संदेश की एक सीरीज़ तैयार करते हैं मानो मुश्क्लि वक़्त वही उनका सबसे सशक्‍त हथियार साबित होनेवाला हो. चार कदम दायें और सात कदम बांये मुडकर पीछे देखते हैं दुनिया, कि उनके देखने ने कितना पुनर्संस्‍कार किया है संसार का. मजिस्‍ट्रेट को गाली देकर पुलिस को समझाते हैं कि इससे बडा संकट पहले कभी नहीं आया था फालतू की बतकही पर. कहवाघर में शराब और टीवी स्‍टुडियो में साहित्यिक पेपरबैक ढूंढते हैं फालतू के बतकहीकार. ताजुब्‍ब करते हैं कैसे चल रही है दुनिया बगैर उनकी फालतू की बतकहियों के. कैसे बचे रह गए हैं ऐसे बुरे वक्‍त में वे अभी भी निष्‍पाप. शोक से भर आता है उनका गला. सुदूर, सुदीर्घ, प्रवंचना, अन्‍वेषण, विडंबना, विलोम जैसे शब्‍दों से लैस वे नई ऊर्जा से लौटते हैं फालतू की बतकही में. कभी लुंगी, कभी लंगोट फिर गहरी मंत्रणा के बाद वे पैर डालते हैं पतलून में. हर्ष से करते हैं घोषणा इतना सार्थक संवाद पहले कभी नहीं हुआ था फालतू की बतकही का. उन्‍हीं का प्रताप है एक नये दौर में जा सकती है फालतू की बतकही. बशर्ते कुछ गद्दार सुधर जायें और सिनेमा हाल के बाहर खडी जनता सीख ले उनसे कविता. अराजनीतिक और समझौतापरस्‍त की गालियों की चुईंग गम जीभ के नीचे दाबे अपनी डगमग नाव पर निकलते हैं फालतू के बतकहीकार. पहाडों के पार उनकी इच्‍छाओं का कल्पित रक्‍ताभ सूरज उनको बहुत मुदित करता है. फालतू की बतकही का ब्‍लाग चल निकला तो जल्‍दी ही किताब भी आयेगी बाज़ार में फालतू की बतकही.

5 comments:

  1. अभी जबकि चेतना अपने झुट्पुटे में उनींदे साथियों के साथ आँख्मिचौली खेल रही है..इस दौर का सबसे सशक्त सबसे राजनीतिक और सबसे डिक्लासता का एह्सास कराने वाला प्रवंचनात्मक लेख...

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  2. आपने फालतू की बतकहियों को सम्मान दिला कर बहुत अच्छा किया । फालतू की बतकही गंभीर लोगों की चाल है । गंभीर कहलाने के लिए वो अपने खिलाफ फालतू को खड़ा करते हैं । आप उलट दीजिए । कहिए फालतू गंभीर है और गंभीर फालतू । बाकी हम तो हैं ही । मैंदान में । साथ देने के लिए । रवीश कुमार

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  3. सही है प्रमोद भाई। फालतू की बतकही। ब्‍लॉग और किताब क्‍या, जल्‍द ही इस पर बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे जाएंगे, विश्‍वविद्यालयों मे शोध होंगे।

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  4. इंतजार में हैं कुछ लोग जो हैं फालतू
    कुछ तो है एकदम पालतू

    अच्छा है जनाब
    शोक से भर आता है उनका गला. सुदूर, सुदीर्घ, प्रवंचना, अन्‍वेषण, विडंबना, विलोम जैसे शब्‍दों से लैस वे नई ऊर्जा से लौटते हैं फालतू की बतकही में. कभी लुंगी, कभी लंगोट फिर गहरी मंत्रणा के बाद वे पैर डालते हैं पतलून में. हर्ष से करते हैं घोषणा इतना सार्थक संवाद पहले कभी नहीं हुआ था फालतू की बतकही का.

    फालतू की बतकही, कहीं से कही ले जा सकती है जनाब लगे रहो, फालतू बैठे और क्या कर सकते हो पीटो कीबौर्ड.

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  5. शानदार। इश्टाइल निखरती जा रही है। पढ़ने में मजा आता है।
    पहाड़ों के पार इच्छाओं का कल्पित रक्ताभ सूरज जिनको बहुत मुदित करता है, उनकी छोटी-छोटी चाहतें बहुत मायने रखती हैं।

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