Sunday, March 18, 2007

दु:ख के भूगोल से गुजरती सुख की रेल

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: नौ

ट्रेन चली जा रही थी. जापान के बुलेट ट्रेनों वाली चाल. खट-खट-खटाक. धड-धड-धडाक. स्टिंग-ढिंग. सैंग-सैंग. जैंग-जैंग. कुपे की उम्‍दा आरामफ़रोशी का मैं इकलौता भोक्‍ता. मेरी देखरेख में नगा रेजीमेंट के तीन सुटेड-बुटेड नौजवान. खिडकियों पर महीन नीले पर्दे. कुर्सी के गद्दों पर इटैलियन गिलाफ. सफ़र की संगत के लिए मेज पर फिग्‍स, पियर, नासपाती, सिसिलियन अंगूर, रिवियेरा की वाईनें, तश्‍तरी में स्विस चॉकलेट्स. दिमागी संगत के लिए बीजिंग टाईम्‍स, बीजिंग रिव्‍यू, बीजिंग एटूज़ेड, बीजिंग रात की बांहों में (हिंदी एडीशन). कवर स्‍टोरी के हेड लाईन पर उडती-सी नज़र मारी. तियानमन चौक में स्‍वामी सत्‍यश्री सहजानंद की प्रेम संबंधी सत्रह संध्‍याओं के आयोजन पर विशेष कवरेज़ था. उचटे मन से नज़र फेरकर मैंने बांयें बैठे फौजी से सवाल किया- हम कहां जा रहे है? फौजी ने विनम्रता से सूचित किया यह बताने का उसे हुक्‍म नहीं है. ट्रेन कहां से गुज़र रही है के सवाल पर भी उसका वही रटा हुआ जवाब था. मैंने थर्मस खोलकर अपने लिए काली कॉफी निकाली और गद्दे पर फैलकर उसके घूंट भरने लगा जैसे ‘जलसाघर’ में अपनी हवेली के बरामदे में छबि विश्‍वास उचटे मन से मद्य का सेवन करते हैं. साऊंडट्रैक पर खट-खट-खटाक, धड-धड-धडाक, स्टिंग-ढिंग, सैंग-सैंग, जैंग-जैंग का धीमा पडा संगीत वापस फेड इन होना शुरु हुआ.

कॉफी पीकर मैंने फौजियों से सिगरेट तलब की. जानता था वे सिगरेट यहां अलाउड नहीं है का रटा जवाब देंगे और मुझे झगडने का बहाना मिलेगा. लेकिन नहीं मिला. रटे जवाब की जगह फौजी ने मुझे रवीश रिसोर्सेस इंक की मेड ईन चाइना ब्‍लैक ड्रैगन का खुशबूदार पैकेट ऑफर किया. होंठो के बीच ब्‍लैक ड्रैगन रखते ही तबियत हरी हो गई. लग रहा था सिगरेट नहीं किसी हसीना के मदभरे होंठ हों. ख्‍यालों में बहकूं इसके पहले फौजी ने अपने लाइटर से सिगरेट जलाकर मुझे बहकने से रोक लिया. लंबे कश खींचता मैं दूसरी बहकों में बहका. दिमाग में अस्‍पताल की घटनाओं को व्‍यवस्थित करने की कोशिश की. एक खबर के मुताबिक भागते हुए भूपेन भट्टराय सिंह को गोलियों से भून दिया गया था. मगर एक अन्‍य अफवाह यह भी थी कि अफरा-तफरी अचानक अस्‍पताल पर अभय के धावा बोलने से मची थी. मुस्‍तैद जवाबी कार्रवाई में चार फौजियों की जान गई थी लेकिन अभय को शहरी रक्षा कमेटी ने अंतत: गिरफ्तार कर लिया था. मगर कुछ दूसरे सूत्रों के अनुसार अभय तक पुलिस पहुंच नहीं पाई थी और चार नहीं नौ फौजियों की जान गई थी. कुछ लोग यह भी मान रहे थे कि ये सारी सूचनाएं गलत हैं. अस्‍पताली गंडगोल और गोलीबारी के पीछे भूपेन और अभय नहीं बल्कि अस्‍पताली कर्मचारियों का अंदरुनी असंतोष था. अंदर ही अंदर महीनों से उठती उनकी खदबदाहट को प्रशासन एक बार फिर निर्ममता से कुचल डालने में सफल हुई थी. चार नर्स, तीन वॉर्ड बॉय और एक डॉक्‍टर की बलि चढाकर तीन वर्ष पुराना अस्‍पताली कर्मचारियों का आंदोलन फिर वहीं अटक गया था जहां से वह शुरु हुआ था.

मैं ब्‍लॉग पर यह सब दर्ज़ करना चाहता हूं. मगर उससे पहले अपना ब्‍लॉग वापस चाहता हूं. रवीश कुमार ने टीवी पर मैसेज दिया कि वह जल्‍दी ही आकर मेरे ब्‍लॉग की समस्‍या का हल करेगा. आने की बजाय मुझे ट्रेन में चढाकर कहीं भेज रहा है. कहां भेज रहा है? अंडमान-निकोबार? काले पानी का कोई नया लोकेशन? लेकिन मेरा जुर्म क्‍या है? अभिसार के नज़रिये की आलोचना की थी, रवीश को तो कभी भला-बुरा नहीं कहा? दलितों वाली उसकी टिप्‍पणी और प्रेमचंद की विदर्भ यात्रा पर तारीफ ही की थी. पीठ ठोंकने की वह मुझे यह सज़ा दे रहा है?

महीन पर्दे एक ओर सरकाकर मैंने बाहर का अंदाज़ लेने की कोशिश की. खिडकी के मोटे शीशों के पार सब धुंधला था. धुंधला और अस्‍पष्‍ट. मैंने कुहनी रगडकर फिर हाथ के रुमाल से शीशा चमकाने की चेष्‍टा की. तनाव में दो फौजी खडे हो गए. मैने उन्‍हें ऊपर से नीचे देखा तो वे वापस बैठ भी गए. बाहर का नज़ारा थोडा-थोडा खुलना शुरु हुआ. काफी सारी परती ज़मीन के एक किनारे हरियाली दिख रही थी. शायद कोई वन था, या पार्क. हां, पार्क ही था.

पटरियों के घुमाव के बाद ट्रेन के नज़दीक होने पर एक विशालकाय नियॅन लिखावट दिखी: द मोस्‍ट अमेजिंग एंटरटेनमेंट पार्क ऑफ द सेंचुरी. चायनीज़ में ही लिखा था लेकिन मैंने अपनी कल्‍पना से हिंदी में पढ लिया. उससे लगे लकडी के ऊंचे:ऊंचे पट्टों व नंगे तारों से घिरे बाडे दिख रहे थे. शायद जानवरों को बंद रखने का कांजी हाऊस हो. मगर तारों के ऊपर बच्‍चों व महिलाओं के वस्‍त्रों को सूखता देख झट भेजा खुला कि अंदर मवेशी नहीं मनुष्‍यों को कैद करके रखा गया है. सचमुच! मगर क्‍यों?

तबतक एक फौजी ने, संभवत: मेरी उत्‍तेजित अवस्‍था देखकर, मेरे ऊपर झुककर फुर्ती से खिडकी का पर्दा खींच दिया. मैं शायद विरोध करता, फौजी से झगडता, लेकिन बाडे के अंदर चीखती आवाजों की कल्‍पना ने मेरे अंदर झुरझुरी भर दी थी. मैं अचानक खोखला, कायर और भीतर से बहुत कमजोर महसूस कर रहा था. क्‍या मेरा भी अंत ऐसे ही किसी बाडे में होगा! किसी कोठरी के एकांत अंधेरे में भारी सांसें लेता अपने विदा होने के दिन की राह तकूंगा? भय की मदहोशी में कभी भी मुर्च्छित हो जाऊंगा, और आंख खुलने पर फटी आस्‍तीन से होंठों का लार पोंछता फुसफसाकर दीवारों से, दरवाज़े से, सामने पडनेवाले हर गरीब, हर पागल से विनती करुंगा मुझे यहां से निकालो, मेरी जान बख्‍श दो, भैया!

जैसी अंदर बाथरुम, बाहर गलियारे में एसी नियंत्रित हवा थी वैसे ही मेरे आस-पास कुपे के अंदर भी थी लेकिन कल्‍पना को थोडी हवा देकर अब मेरा दम घुट रहा था. नगा रेजीमेंट के तीनों फौजी मेरी ओर से आश्‍वस्‍त होकर आपसी गपशप की अंतरंगता में लौट गए थे. एक ने बटुए से फोटो निकालकर राय के लिए अपने साथियों को दिखाया. शायद उसकी मंगेतर की तस्‍वीर थी. फोटो के साथ अख़बारी कटिंग का एक टुकडा भी निकला और फौजी की असावधानी में फर्श पर गिर पडा. फौजियों की नज़र बचाकर मैंने कटिंग उठा ली. ओट में देखा तो वही बातें थीं जिनकी कल्‍पना से मैं थोडी देर पहले मुर्च्छित हो रहा था.

(जारी...)

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