Monday, March 19, 2007

योगिता की फुंसी के पीछे अटका उपन्‍यास

योगिता बाली रो रही थी. सिर के दो नये सफेद बालों की खोज और गाल पर एक फुंसी ने सुबह-सुबह योगिता का चैन हर लिया था. आंसुओं में दुख उमड रहा था. संकरी कुर्सी में भारी देह का विस्‍तार व छोटे स्‍टूल में गोड फंसाये हमने स्‍नेह उमडाया और योगिता की तरफ मुंह करके दुलार से चीखे- बंद करो नौटंकी, बेवकूफ औरत. हमें फोडा हो जाता है हम आह नहीं करते और तुम एक छोटी-सी फुंसी पर हाय-तौबा किये हो. पडोस में गलत सिगनल भेज रही हो. सुनेंगे यही समझेंगे हम तुम्‍हारा गला घोंट रहे हैं!

चूंकि हमने उसे बेवकूफी का खिताब अता कर दिया था उसे सिर पर घूंघट की तरह डाले वह अपने विशेषण को सार्थक करती रही. मतलब रोती रही. हम अपने अटके उपन्‍यास के बारे में सोचना चाह रहे थे मगर रोने के इस व्‍यतिक्रम ने हमारा फोकस बिगाड दिया. पहले भी बहुत सजा हुआ नहीं था. फोकस. मगर अब वह रोती हुई योगिता के रुप की तरह बिगड गया था. संसार की सब हसीनायें रोते हुए ऐसी ही विरुप हो जाती हैं या अपनी योगिता में चित्‍ताकर्षण पैदा करने की यह विशेष प्रतिभा है? हम भावुक होकर रोती हुई वहीदा रहमान की कल्‍पना करना चाहने लगे. हम रोती हुई वहीदा को ढाढस बंधाकर संसार में अपनी नेकी वापस ले आते लेकिन रोती हुई योगिता रोती वहीदा की कल्‍पना के राह में आडे आ रही थी. दांपत्‍य के ऐसे ही क्षण हैं जब हम कल्‍पना ही नहीं करते, अपनी योगिता से नफरत महसूस भी करने लगते हैं. वह रोना बंद नहीं करके हमारी नफरत को परवान चढाती है. इच्‍छा हुई भागकर रसोई जायें, फर्श पर चीनी की प्‍लेटें, बर्तन-भांडा उलट दें कि हमारे गुस्‍से को अभिव्‍यक्ति मिले. लेकिन पिछले दफा इसी प्रयास में लोहे की एक कडाही फर्श की बजाय हमारे पैर के अंगूठे पर गिरी थी. तीन दिन तक अंगूठे की सूजन को गर्म पानी और योगिता के महकते सांसों की फूंक का सेवन करवाने के बाद अपनी अभिव्‍यक्ति की क्षमता पर हम सशंकित हुए थे (पहली दफा नहीं). सूजन की स्‍मृति अभी तक बनी हुई है. इसलिए रसोई जाने की बजाय हम कुर्सी में ही ज़रा और गहरे चले गए. योगिता को चूल्‍हे में डालकर उपन्‍यास पर लौटना चाह रहे थे लता के एक गाने पर लौट आए: ‘’किस लिए मैंने प्‍यार किया, किस लिए इकरार किया. सांझ-सवेरे तेरी राह देखी, रात भर इंतज़ार किया...’’

योगिता को ही नहीं कभी-कभी हमें भी लगता है उपन्‍यास लिखना हमारे तीन हाथ के बूते की बात नहीं. जब से हम उपन्‍यास हाथ में लेकर बैठे हैं इतनी अवधि में उपेंद्रनाथ अश्‍क ने चौदह उपन्‍यास लिख लिये थे, मोहन राकेश ने अपना समूचा नाट्य-साहित्‍य लिख ही नहीं लिया था राजेंद्र नाथ, ओम और सुधा शिवपुरी ने उसे खेल भी लिया था. ‘आधे-अधूरे’ के साथ श्‍यामानंद जालान दिल्‍ली-इलाहाबाद घूमकर वापस कलकत्‍ता लौट गए थे. असम में गण संग्राम परिषद आंदोलन से निकलकर सरकार में चली आई थी और वही सब खेल खेलने लगी थी जिसके विरोध में वह सडक पर आंदोलन के लिए उतरी थी. राधाकांत झा इस बात से दुखी और दुबले होते रहने के बाद कि क्‍या कोई उनके लिए दुलहिन नहीं खोजेगा क्‍या वह आजीवन कुंवारे रहकर ही यह संसार छोड देंगे, न केवल आसनसोल की एक दुलहिन के व्‍याहता हो चले थे संसार में एक पुत्र-रत्‍न भी ले आए थे. मैं ही अभागा था जो एक अदद उपन्‍यास जनने में असफल रहा था.

ऐसा नहीं है कि वाणी और राजकमल वाले रजिस्‍टर्ड लेटर और ईमेल भेज-भेजकर हमारा जीना दुलम किये हुए हैं. या हिंदी साहित्‍य की प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो गया है (उसका जिम्‍मा तो आगे बढकर कोई मान्‍यवर रवीश कुमार जी हैं उन्‍होंने सम्‍हाल ही लिया है). या पडोस में कोई बाईस वर्षीय बंगालिन बाला (दिव्‍या बालन नहीं. वह बंगालन नहीं मलयालन है और बाईस से ऊपर चल रही है) है जो हमें देखते ही सूती की किनारा वाली साडी और लंबे केश बिखेरे भागी गेट पर चली आती है, गिडगिडाकर विनती करती है कि काकू, कोखन आशबे तोमार बोई, आमार मोन टा जेनो कि दारुण भेसे-भेसे जाच्‍छे! या साहित्‍य अकादमी वाले हमारी वजह से इस वर्ष पुरस्‍कार के वाजिब कैंडीडेटों का नाम प्रकाशित करने से सकुचा रहे हैं. ऐसा नहीं है. इनमें से कोई भी एंगिल सही होता तो शायद हम विदर्भ के किसानों वाली लाईन पर सोचने को मजबूर हो जाते. जेट एयरवेज़ के विमान पर फिर रवीश कुमार के साथ सिर्फ प्रेमचंद ही नहीं होते, हमने अपने लिए भी जगह निकाल ली होती, और शायद अबतक बाज़ार में गोदान, द सिक्‍वल (हिंदी में) आ भी चुका होता. और अमिताभ को निपटाने के बाद इंटरव्‍यू के लिए अभिसार हमें खोज भी रहे होते और हम कहते कि इंटरव्‍यू तो ले लीजिये लेकिन आप नहीं रुपाली तिवारी को भेजिये.

कल्‍पनाओं की अच्‍छी बहक है मगर उपन्‍यास लिख लें पहले. उसके लिए भी यह ज़रुरी है योगिता बाली अपना रोना रोक दे पहले. वह रुक नहीं रही है और उपन्‍यास खत्‍म नहीं हो पा रहा है और दिल्‍ली से विश्‍वस्‍त सूत्र सूचना दे रहे हैं रुपाली तकलीफ में हैं और हम आपको सूचना दे दें कि हमें जेनुइनली बडा गंदा-गंदा लग रहा है.

1 comment:

  1. एक फुंसी होने और दो सफेद बाल पाए जाने पर कोई स्‍त्री ऐसे फूट-फूटकर रोए, ये बात कुछ हजम नहीं हुई। कैसी नोखे की पत्‍नी है आपकी। भगवान आपकी रक्षा करें......

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