Monday, March 19, 2007

रवीश का चरम रघुराज का पतन

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: ग्‍यारह

मालूम नहीं था आसमान से गिरकर खजूर में अटकेंगे. खजूर भी होता बात थी, नीचे बैंगन-भांटा का बगान था. माने पूरा अक्षरग्राम था. वही जाने-पहचाने चेहरे, मतलब नाम. शुक्‍ला, शक्ति, समीरन, सुदेव, शंकित, रतन, रवि, रंजीत, दीपक, दिवाकर, देवेन, दीक्षा. नारे लगाते. गलत हिज्‍जोंवाली दफ्तियां लहराते. बीच-बीच में ठिलते ऐसा व्‍यंग्‍य उछालते जिसका नमूना देखकर ज्ञान चतुर्वेदी और श्रीलाल शुक्‍ल रोने लगते. मगर उसपर बाद में. पहले वहां चलता हूं जहां ट्रेन से उठाकर सीधे पहुंचा दिया गया था. जिस तामेझामे और सुरक्षा कवचों के बीच से मुझे गुज़ारा गया बात साफ हो गई कि नकाबपोश अभय नहीं रवीश के दल-बल से हैं और मैं कितना बडा बेवकूफ हूं. और रवीश बाद में डालेगा अभय से अपने संबंधों की बात खोलकर अपने को मैंने खुद कितने बडे राजनीतिक गड्ढे में डाल लिया है. अलबत्‍ता जहां आंख की पट्टी खोली गई वह गड्ढा नहीं रवीश के कामकाजी राजमहल का स्‍नानागार था. उसके आकार-प्रकार को देखकर मैंने दांतों तले उंगलिया दबा ली, मतलब कुछ वैसा ही हतप्रभ महसूस किया जैसा पहली दफा हाथ में मुक्तिबोध की कविता लेकर कल्‍पना के संपादक वात्‍स्‍यायन जी हीरानंद ने अनुभव किया होगा. इतनी जगह बाबूजी कब्जियाये होते तो स्‍नानागार की बजाय अभी यहां हमारा ददिहाल बसा होता. खून खौलकर मेरी आंखों में चला आया कि ऐयाशी का ऐसा अकूत भंडारण और अंतर्राष्‍ट्रीय प्रैस में प्रचार यह किया जा रहा है कि शहरों से बाहर लोग इस लिए खदेड़े जा रहे हैं कि शहर में जगह की कमी है! कोई अंतोनेल्‍ला बुकारेल्‍ली को टांगकर लाये और खिंचवाये उससे इस बेहया स्‍नानागार की फोटो? शहर में हम जैसे भिखारियों के लिए स्‍थानाभाव हो जाता है बीस वर्ष पहले भी सुब्रत सहारों को नहीं था आज रवीश कुमारों को नहीं है! हद है. अच्‍छा हुआ अंदर ही रहा खौलकर खून आंखों से बाहर नहीं आया. पीठ पीछे हाथ बांधे देह डोलाते पुराने संगी विमल वर्मा आते दिखे. उनको यहां पाने में कुछ भी आश्‍चर्य नहीं था. पहले सहारा में थे अब रवीश रिसोर्सेस इंक में. कुछ बदला था तो सिर्फ बीच में बीस वर्ष का समय. हमको देखकर विमल हंसने लगे. कहा- अरे, तुमको भी टांग के ले आये?

मैं चाहता नहीं था लेकिन हुआ वही. मैंने गिडगिडाकर कहा- विमल, कुछ करो, यार. लगता है मुझे भी बाडे-वाडे में डाल देंगे. जानते हो मुझे भूखे रहने की आदत नहीं है, तुम तो साथ रहे हो, बस एक बार रवीश से मिलवा दो, यार!

विमल लाल एकदम खिन्‍न हो गए. गंभीर होकर बोले- सुब्रत राय से मिलवाया था पहले कभी! फिर रवीश कुमार से कहां से मिलवायेंगे? हमारे यार लगते हैं वो? हमारी औकात क्‍या है. सहारा में भी कुत्‍ते थे यहां भी वही हैं! समझदार होकर असंभव फरमाइश करते हो. रघुराज जी आते हैं तो उनसे कहो. उनकी रवीश तक पहुंच है...

मुझे झटका लगा. जो चीज़ दबे स्‍वर में कैजुअली कहती दिखनी चाहिये थी वह चौंके हुए अंदाज़ में प्रकट हुई- रघुराज रवीश की नौकरी कर रहे हैं? मुक्तिबोध का भक्‍त रवीश का एजेंट हो गया?

विमल दुबारा सहज होकर हंसने लगे. वैसे ही जैसे बीस वर्ष पहले सहारा के लोअर परेल दफ्तर में मेज़ पर एक पैर डाले कंप्‍यूटर पर फ्री-सेल खेलते हुए रहा करते थे. बोले- सब तुम्‍हारी तरह भूखों मरने का शौक थोडी पाले हैं. घर-बार का जिम्‍मा है. नौकरी जाने के बाद मैं भी आजमगढ में बेकार बैठा था. घूंसी, बस्‍ती, आजमगढ में लोग पकड-पकडकर ट्रकों में बाहर भेजे जा रहे थे. डरकर हमने शाम को छत पे जाना छोड दिया था. बीवी कह रही थी इलाहाबाद चलो, वहां सेफ्टी है. हमने तकिये में सिर छिपाके कहा चुप करो, कहीं सेफ्टी नहीं है. जो टीम इलाहाबाद में धर-पकड कर रही थी उसी में से किसी ने रघुराज का मैसेज देकर हमें यहां बुलवाया. अब आराम है. धर-पकड होती है लेकिन हमारी नहीं दूसरों की होती है. बेटी को पढ़ाई के लिए शंघाई भेज दिया है. खर्चा कंपनी उठा रही है. अपन अब मस्‍त हैं. तुम देखना चार दिन बाद अभय मियां भी बम-बंदूक का खेल छोडकर काम मांगने यहीं आयेंगे. इससे अलग और जायेंगे कहां? मैं तो कहता हूं रघुराज जी से तुम भी पैरवी करो यहीं कहीं तुमको भी सेट करवायें. उनके लिए इंपॉसिबल नहीं है. बाकी पहले गुटका खिलाओ. साला, यही मुश्किल है यहां, गुटका बैन है. क्‍यूबा का चुरुट बैन नहीं है, पान और गुटका बैन है. रवीश बाबू के यहां भी सब वही सुब्रत सहारा वाले लक्षण है. रक्‍खे हो कि नहीं?

मैं गुटका की नहीं सोच रहा था. रघुराज की सोच रहा था और सोचकर सन्‍न था. व्‍यक्ति के पतन की कितनी गहराई है! क्‍या सीमा है? रघुराज अगर यहां तक पहुंच सकते हैं तो मेरा बचे रहना मात्र संयोग ही है! विमल के जवाब में मैने ना में सिर हिलाया और स्‍नानागार की ऐयाशी के बीच किसी भिखमंगे की अजनबीयत में खड़े रहा. विमल ने मेरा कंधा थपथपाके इशारा किया कि वह कहीं से गुटके का प्रबंध करके लौटता है.

स्‍नानागार के ऊंचे छत के एक कोने मतीस की कलाकारियों के पर्दों से सजे थे. मैं सोचने लगा इतने सारे डुप्लिकेट्स के पीछे रवीश को कितने का खर्चा पड़ा होगा. या क्‍या मालूम डप्लिकेट नहीं ऑरिजनल हों! मतीस का अंत मोतिहारी के एक गुंडे के महल में होना लिखा था सोचकर मेरा दिल बैठ गया! आखिर क्‍या मूल्‍य रह गया है आज कला की सामाजिकता का जब सब रवीश कुमारों के ही कब्‍जे में है?

स्‍नानागार के लंबे छोर से इस वक्‍त जो व्‍यक्ति दाखिल हो रहा था उसे मैं पिछले चालीस वर्षों से पहचान रहा था. कहना चाहिये पहचानने के मुगालते में था. क्‍योंकि साहबी लिबास और रौब में जो रघुराज मुझे विशालकाय हॉल में अपनी ओर आते दिख रहे थे उन्‍हें पहचानने की बात कहना वैसा ही हास्‍यास्‍पद था जैसे बीस वर्ष पहले सचिन तेंदुलकर को अपना यार कहना होता.

रघुराज के साथ तीन-चार ऊंची हैसियत के चल्‍ले-बल्‍ले थे जिनके साथ रघुराज का व्‍यवहार कुछ उसी तरह था जैसे हमारे छोटे शहर के सिनेमा हॉल के बाहर टिकट ब्‍लैक करनेवालों के साथ पुलिस का. ज़रुरत मुताबिक लताड़ और उसी में छिपा प्‍यार. खीझ और गुस्‍से में खौलते कुछ शब्‍दों से अंदाज़ हुआ वजह भारतीय क्रिकेट टीम के चीन में जाकर जीतने की है जिसके अंतर्राष्‍ट्रीय परिणाम बहुत सारे स्‍तरों पर रवीश के विपरीत जा सकते हैं. और जैसा रघुराज के शब्‍दों से ज़ाहिर हो रहा था चीन में जाकर भारतीय टीम इसलिए नहीं जीत गई थी कि उसने अच्‍छा खेला था. चल्‍ले-बल्‍लों की असावधानी में असल भारतीय टीम की जगह बांग्‍लादेशी टीम की डबल मैदान में पहुंच गई थी, जिसे स्‍टॉक मार्केट में पटाये रवीश के सौदों की भनक तक नहीं थी, और जिसने अपना नॉर्मल खेल खेला और चीन की घटिया राष्‍ट्रीय क्रिकेट टीम को आसानी से हरा दिया था. बेवकूफों को अंदाज़ नहीं था कि अपनी बकवासी खेल भावना में उन्‍होंने रवीश रिसोर्सेस इंक का न केवल दस बिलियन चायनीज़ युआन का नुकसान करवाया था बल्कि चीन में धीरे-धीरे बन रहे उसकी छवि को भी एक बड़ा धक्‍का दिया था...

(जारी...)

3 comments:

  1. दिलचस्पी बरक़रार है..फ़न्तासी में प्रासंगिकता..क्या बात है..

    ReplyDelete
  2. बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार की अब तक की सारी किस्‍तें हमने पढ़ी है। इसलिए पढ़ी, क्‍योंकि हर किस्‍त के बाद दिलचस्‍पी बढ़ती रही। किसी लेखन को लेकर पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि पढ़ने लायक है या नहीं है। तो आपका ये किस्‍त दर किस्‍त किसी नॉविल की तरफ बढ़ता हुआ वृत्तांत पढ़ने लायक है। हिंदी में ब्‍लॉग एक नयी सामाजिक परिघटना है। सामाजिक इसलिए कह रहा हूं, क्‍योंकि यह अभिव्‍यक्ति का नया दरवाज़ा है और समाज से जुड़े प्रसंगों-स्‍मृतियों का बांट-बखरा लोग यहां करते हैं। यानी तकनीक की गुफा में नयी सभ्‍यताओं का जातीय और राजनीतिक संघर्ष साम्राज्‍यवाद के शासक और गुलामों के लिए छोड़ दें, तो वैचारिक संघर्ष का मैदान खुला है। इस ज़मीन पर हमारी कोशिशें अभी बूंद सरीखी भी नहीं है। ऐसे में भविष्‍य का कथात्‍मक खाका खींचना ज़ोखिम भ्‍ारा है। सबसे संभव नहीं। आपने बीड़ा उठाया है, क्‍यों उठाया है, मक़सद क्‍या है, अभी तक की किस्‍तों में ये साफ नहीं हो पाया है। हालांकि ये संशय कुछ उसी तरह है, जैसे कथा की शुरुआत में ही साफ कर दो कि भाई आप कहना चाहते हैं। हमने जो समझने की कोशिश की, उसके हिसाब से आने वाला वक्‍त कंटेंट मार्केटिंग का है। छोटी-छोटी बात कहने वाले मज़दूर होंगे और बड़ी बातों के सौदागर अपने वक्‍त के शहंशाह होंगे। लेकिन एक पाठक की हैसियत से इस कथा में मैं अपने लिए भी जगह चाहता हूं। जब मैं अपने लिए जगह की बात कर रहा हूं, तो ज़ाहिर है कि मैं चाहूंगा कि इसमें ब्‍लॉग की दुनिया के बाहर का भी अंतर्द्वंद्व शामिल हो। अभी ऐसा लगता है कि कंप्‍यूटर नाम के एक ऐसे ग्रह की चर्चा चल रही है, जहां के बाशिंदें ब्‍लॉगर हों। इसके अलावा कोई मुल्‍क अगर कहीं है भी तो ये ब्‍लॉगर उससे वाकिफ नहीं हैं। फिर रवीश कुमार ने चीनी साम्राज्‍य कैसे खड़ा किया, इसका तार्किक विवरण भी अभी तक नहीं मिला है। अगर आपका नॉविल छप जाए और जो ब्‍लॉग की दुनिया से वाकिफ हों, उनमें से कोई ये सवाल पूछे कि रवीश कुमार की जगह इस साम्राज्‍य के संचालक सुनील दीपक, रवि रतलामी या जीतेंद्र चौधरी क्‍यों‍ नहीं हैं, तो आप क्‍या जवाब देंगे। फिलहाल मेरा सवाल भी यही है। चाहूंगा कि यहां कमेंट बॉक्‍स में इसका जवाब न देकर आगे की किस्‍तों में आप इसका जवाब दें। फिर हम भी आगे ही बात करेंगे।

    ReplyDelete
  3. प्रमोद जी

    पहले तो मुबारक कि मेरे काले साम्राज्य का कुछ पैसा कहानी की इस किश्त में डूब गया । मैं कमज़ोर हुआ हूं । अविनाश भी ठीक कह रहे हैं । मैं ही क्यों अगर ये सवाल पूछा गया तो जवाब क्या होगा ? या कहिये तो अपने काले साम्राज्य की ताकत से किसी प्रोफेसर को भेज दूं जो इन सवालों का जवाब देता रहेगा । रवीश कुमार

    ReplyDelete